शुक्रवार, 24 मार्च 2017

'बिजली' और 'आरती' का वो गुज़रा हुआ ज़माना...

[पूर्वपीठिका]
सन् 1936 में पूज्य पिताजी (पं. प्रफुल्लचन्द्र ओझा 'मुक्त') 26 वर्ष के युवा थे। सन् 1934 में, इलाहाबाद में, पितामह के देहावसान के एक साल बाद पिताजी पटना आ गये थे। विद्यालय-महाविद्यालय की कोई डिग्री तो उनके पास थी नहीं, लेकिन कुछ कर गुज़रने का अदम्य उत्साह था उनके मन में। अपने पितृश्री की कृपा-छाया में और जीवन की पाठशाला में उन्होंने जो कुछ अर्जित किया था, विद्वज्जनों के आत्मीय सान्निध्य से जो प्रसाद पाया था, वह स्वाध्याय की आँच में पककर उबल रहा था और ज्ञान-पात्र के किनारों से तड़पकर बाहर आने को अधीर था। कथा-कविता के विशाल फलक पर तब तक 'मुक्त' नाम अंकित हो चुका था। इलाहाबाद के दिनों का अर्जित संपादन-अनुभव ही उनकी पूँजी था।
सन् 35 में जब वह पटना आये, उस समय तक साहित्यिक गतिविधियों के मामलों में बिहार मरुभूमि-समान था। पूर्ववर्ती काल में कलकत्ता ही हिन्दी की साहित्यिक गतिविधियों का केन्द्र बना हुआ था, जहाँ महादेव सेठ के 'मतवाला-मण्डल' में निरालाजी, नवजादिकलाल श्रीवास्तवजी और शिवपूजन सहायजी की तिकड़ी जमी हुई थी। जब यह तिकड़ी टूटी, तब 'मतवाला' के मंच पर पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र'जी अवतरित हुए, लेकिन सेठजी के अवसान के साथ ही 'मतवाला' का तिलस्म भी टूट गया और हिन्दी की गतिविधियों के तीन केन्द्रीय ध्रुव बन गये--इलाहाबाद, वाराणसी और लखनऊ। उन दिनों की याद करते हुए पिताजी ने निरालाजी के अपने संस्मरण "जुही की कली' के कवि : निराला" में लिखा है :
"...फिर बहुत समय बीत गया। हिन्दी के लिए कलकत्ता का वह महत्व न रहा, जो पहले था। उसकी जगह इलाहाबाद, काशी और लखनऊ ने ले ली। शिवपूजनजी काशी जा बसे। नवजादिकलालजी इलाहाबाद आ गये। निरालाजी प्रायः अपने गाँव में रहते, कभी-कभी लखनऊ आ जाया करते थे। उग्रजी अपनी जन्मभूमि में लौट आये थे, लेकिन वहाँ ज्यादा दिन टिके नहीं, बंबई चले गये। 'मतवाला' बंद हो गया और कुछ समय बाद सेठजी ने भी इह-लीला संवरण की।'
"मैं उन दिनों इलाहाबाद में ही था। इलाहबाद, वाराणसी और लखनऊ में हिंदी की गतिविधियाँ तीव्र हो गयी थीं। कलकत्ता की चमक-दमक अब इन त्रिपुरियों ने ले ली थी। बनारस में प्रसादजी और प्रेमचंदजी थे, इलाहबाद में पंतजी और महादेवीजी, लखनऊ का अखाड़ा निरालाजी ने संभाल रखा था। अब निरालाजी से मिलना-जुलना अधिक हो गया।...'
"काल-चक्र घूमता रहा। सन १९३४ में पिताजी का देहावसान हुआ। उसके एक साल बाद, पच्चीस वर्षों से सेवित प्रयाग छोड़कर मैं पटना आ बसा। लम्बे अंतराल के बीच यदाकदा निरालाजी के दर्शन तभी हुए, जब वह पटना या मुजफ्फरपुर के किसी साहित्यिक समारोह में पधारे। उस ज़माने में इलाहाबाद साहित्यिक और राजनैतिक गतिविधियों का केंद्र था--पटना में साहित्यिक गतिविधि नाम की कोई चीज़ नहीं थी। इलाहबाद छूटा तो साहित्यिकों के संपर्क से भी मैं वंचित हो गया।..."
बिहार की राजधानी पटना से भी कोई स्तरीय साहित्यिक पत्रिका निकले, इस प्रदेश में भी थोड़ी साहित्यिक हलचल हो और हिन्दी की एक मशाल तो जले; इसी अभिप्राय से पिताजी ने सन् 36 में पटना से 'बिजली' नामक साप्ताहिक पत्रिका का संपादन किया। वह पत्रिका शीघ्र ही चर्चित-समादृत हुई। पिताजी ने 'बजली' के माध्यम से बिहार के सहित्याकाश में ऐसी चपला चमकायी कि उसकी चकाचौंध से प्रभावित होकर उदीयमान लेखकों-कवियों की एक बड़ी जमात उनके साथ आ खड़ी हुई। पिताजी ने दो-ढाई वर्षों तक घोर परिश्रम किया और आर्थिक तंगी से जूझते हुए पत्रिका के प्रकाशन का दायित्व उठाते रहे।

पिछले दिनों मैं पटना गया तो पटनासिटी के बिहार हितैषी पुस्तकालय में मैंने 1936-37 की 'बिजली' की ज़िल्द देखी। आप कल्पना ही कर सकते हैं कि समय के इतने लंबे अंतराल के बाद 'बिजली' के अंकों का दर्शन करके मेरी मनोदशा क्या रही होगी! 1936 अर्थात् वह काल, जब मैं दुनिया से नदारद था। मेरे पास समय कम था और मेरी तलाश/ अनुसन्धान का लक्ष्य कुछ और...; फिर भी 'बिजली' से कुछ क्लिपिंग ले आया हूँ। आगामी कुछ किस्तों में उसी की चर्चा होती रहेगी, उसके अनंतर मासिक 'आरती' की भी।... और मुझे आशा है, उससे जुड़े रहना आपको प्रीतिकर लगेगा।...
(क्रमशः)
(चित्र : 'बिजली' का मुखपृष्ठ)

शुक्रवार, 17 मार्च 2017

नेत्र-दर्शन...

अधिक नहीं, महज़ चार वर्ष पुरानी बात है। पुणे के एक दैनिक पत्र 'लोकमत समाचार' में डाॅ.राजेंद्र प्रसाद पर मेरा एक छोटा-सा संस्मरण 28 फरवरी, 2013 को छपा था--'ताहि बिधि मस्त रहिये'। यह पत्र अपने नियम-विधान से ही लेखक का चित्र, परिचय, संपर्क-सूत्र, मोबाइल नंबर, मेल-एड्रेस आदि प्रकाशित करता था। मेरे इस आलेख में भी चित्र के सिवा मुझसे संबंधित सारी सूचनाएँ छपी थीं। छोटा-सा लेख चर्चित हुआ था और स्थानीय पाठकों के कई फोन कॉल्स मेरे पास आये थे। स्वभावतः मुझे प्रसन्नता हुई थी।
लेकिन, उनमें एक बंधु ऐसे भी थे, जिन्होंने मुझे कई बार फोन किया, बातें कीं। वह मुझसे मिलने को आतुर थे और संकुचित भी। लेख के प्रकाशन के तीन दिन बाद रविवार को वह तब आये, जब मैंने ही जोर देकर उनसे कहा कि 'मिलना हो आ जाइये, संकोच की क्या बात है बंधु?' वह मेरे तत्कालीन निवास से बहुत दूर भी नहीं थे। पुणे के बाम्बे सैपर्स के विशालकाय फौजी कैम्पस में थे, जो मेरे बेटी-दामाद के सरकारी बंगले से महज तीन-एक किलोमीटर की दूरी पर था। जब वह आये तो बँगला ढूंढ़ने में उन्हें दिशा-भ्रम हो रहा था, उन्होंने मुझे फ़ोन किया, मैं बँगले के गेट पर जा खड़ा हुआ और उन्हें दिशा-निर्देश देता रहा। वह जब प्रकट हुए तो उन्हें देखकर मुझे हैरत हुई। २२-२४ वर्ष के युवा थे--श्यामवर्णी! फ़ौज में भर्ती हुए नए रंगरूट की दुर्वह दशा में थे--कटोरा-कट कटे केश, भीषण परिश्रम से क्लान्त शक्ल-सूरत, पीठ लदा हुआ हैण्ड-बैग और जीन्स-पैंट-शर्ट धारण किये हुए। मेरे पास पहुँचते ही उन्होंने पूछा--'आप ओझाजी न ?' स्वीकृति में मेरा सिर हिलते ही वह उत्फुल्ल हुए और बड़ी श्रद्धा से झुककर उन्होंने मेरे पाँव छुए। मैंने उन्हें कंधे से पकड़ उठाया और अपने साथ बँगले में ले गया। उन्होंने अपना नाम 'उमेश बालाजी' बताया और कॉरिडोर में पड़ी आराम कुर्सियों पर जमकर बैठ गए।
बातों का सिलसिला शुरू हुआ। उनकी बोली-बानी से मुझे लगा था कि वह बिहार के ही रत्न हैं । मेरा अनुमान ठीक निकला, वह बिहार के भागलपुर जिले के किसी गाँव के रहने वाले ही निकले। इन दिनों फौजी ट्रेनिंग के लिए पुणे में थे और अत्यंत अनुशासनात्मक कठोर श्रम झेल रहे थे। तीन दिन पहले उन्होंने मेरा उपर्युक्त लेख पढ़ा था और तभी से मुझसे मिलने को व्यग्र-विकल थे।
उन्होंने मुझसे कहा कि बाबू राजेंद्र प्रसादजी को वह भारतीय राजनीति का सर्वाधिक श्रेष्ठ और निःस्वार्थ राजनेता मानते हैं और भक्ति की हद तक उन्हें पूजते हैं। उन जैसा देश-प्रेमी, सत्य-निष्ठ, सरल-निश्छल और पूर्णतः समर्पित व्यक्ति देश की राजनीति में कोई दूसरा हुआ ही नहीं। उनके संभाषण में बिहारी अंदाज तो था ही उच्चारण की अशुद्धियाँ भी बहुत थीं, लेकिन बातें वह कमाल की कर रहे थे। स्पष्ट था कि वह ग्रहणशील युवक थे और सार-तत्व को पकड़ने की छटपटाहट उनमें बहुत थी। मेरी बड़ी बेटी ने उमेशजी को नाश्ता करया और चाय पिलायी। जब वह आये थे, बहुत संकुचित थे, बँधे बैठे थे, लेकिन धीरे-धीरे उनका संकोच जाता रहा। वह मुखर हो उठे। उन्होंने बताया कि वह 'इण्डियन आइडल' की सांगीतिक प्रतियोगिता के प्रतिभागी भी बने थे, लेकिन सोलह प्रतिभागियों की चयनित सूची में प्रवेश पाने से वंचित रह गये थे। यह जानकर कि उमेश बालाजी आइडल-प्रतिभागी रहे हैं, पूरा घर उनके पास आ जुटा। सभी उनसे गाने का अनुरोध करने लगे। पहले तो वह बचने की राह ढूँढ़ते रहे, लेकिन जब एक बार शुरू हुए तो कई गीत सुना गए--फ़िल्मी भी और लोकगीत भी। सुर में थे, खुलकर गाते थे, पर शब्दों के उच्चारण में बड़ी गलतियाँ उनसे हो रही थीं, जो हमारे शुद्ध उच्चारण सुनने के अभ्यासी कान पर हथौड़े-सी बज रही थीं। मैंने उन्हें सचेत किया तो बोले--'यहीं तो मार खा गया बाबाजी!'
जाने क्यों, शुरू से ही वह मुझे 'बाबाजी' कहकर संबोधित कर रहे थे, जबकि मुझे ऐसा नहीं लगता था कि मैं इतना आयु-सम्पन्न हो गया हूँ कि मुझे 'बाबाजी' कहा जाए। लेकिन मैंने कोई आपत्ति दर्ज़ नहीं की और उनके लिए 'बाबाजी' बना रहा। उनकी प्रीति और मेरे प्रति उनकी श्रद्धा आत्यंतिक होने की सारी हदें लाँघ जाने को उन्मत्त थी। मैंने यह भी लक्ष्य किया कि ढाई-तीन घण्टों की बैठक में वह लगातार मेरी आँखों में आँखें गड़ाये मुझे घूरते रहे थे। प्रश्न किसी ने किया हो, उत्तर वह किसी और को दे रहे हों या संगीत सुना रहे हों अथवा अपनी कोई बात बता रहे हों या मेरी सुन रहे हों; देख वह मुझे ही रहे थे और निरंतर देख रहे थे--अपलक ! उनका यह दृष्टि-संयोग मुझे असहज भी लगा था, लेकिन इसके लिए उन्हें टोकना भद्रता नहीं थी। उस दिन जब तक वह मेरे सान्निध्य में रहे, मैं उनका तीक्ष्ण और विकल कर देनेवाला दृष्टि-प्रहार मौन रहकर सहता रहा।
तीन घण्टे बाद जब वह जाने को उठे तो जैसे उन्हें ख़याल आया हो, उन्होंने चौंकते हुए कहा--'अरे, मैं तो यह सब भी अपने साथ ही लिए चला जाता न?' और, इतना कहकर उन्होंने अपने हैण्ड बैग से मिठाई के दो डिब्बे, च्यवनप्राश और हॉर्लिक्स की दो शीशियाँ और बिस्कुट-नमकीन के कई पैकेट निकाले और विनम्रता से कहा--'बाबाजी, यह सब आपके लिए लाया हूँ।'
मैंने कहा--आपने नाहक तकलीफ़ की, इसकी क्या ज़रूरत थी?'
वह सरल-निश्छल युवक थे, बोले--'हमारी कैंटीन में यह सब थोड़ी कम कीमत में मिलता है न! और आपके स्वास्थ्य के लिए यह आवश्यक भी है बाबाजी! इसका रोज़ सेवन कीजियेगा और स्वस्थ रहकर खूब लिखा कीजियेगा। मैं तो अब प्रतिदिन 'लोकमत समाचार' देख लिया करूँगा और जिसमें आपकी रचना होगी, उसे खरीद भी लूँगा।'
उनकी श्रद्धा अप्रतिम थी और मैं उसके सामने निरुपाय था। जब उन्हें छोड़ने बंगले के गेट तक गया तो वहाँ रुककर उन्होंने मेरे पाँव पुनः छुए और आँखों में आँखें गड़ाकर बोले--" मैं फिर आऊँगा बाबाजी! आज आपलोगों से मिलकर मुझे बहुत अच्छा लगा--बिलकुल घर-जैसा! मुझे भूल मत जाइयेगा, अपना आशीर्वाद बनाये रखियेगा जरूर।"
मैंने कहा--"हाँ-हाँ उमेशजी, आप अवश्य आइयेगा, हम फिर मिलेंगे और मेरा आशीष तो हमेशा आपके साथ है ही !"
वह लौट जाने को चल पड़े और मैं बंगले में वापस जाने को मुड़ा। अभी दो कदम ही बढ़ा था की उमेश बालाजी की पुकार सुनकर पलटा। वह क्षिप्रता से मेरे पास आये और विकलता से बोले--"आपसे अभी बहुत-सी बातें करनी हैं, बहुत कुछ सीखना है आपसे बाबाजी! आज तो मैं सिर्फ उन आँखों को देखने के लिये आया था, जिन आँखों ने राजेन्द्र बाबू को देखा था।"
इतना कहकर वह पलटे और तेजी से चले गए। मैं वहीं ठिठका रहा और उन्हें जाता हुआ तब तक देखता रहा, जबतक वह मुख्य सड़क पर मुड़कर मेरी दृष्टि से ओझल नहीं हो गए।...


बाद के कई दिनों तक मैं उमेश बालाजी जैसे प्रेमी बालक के विषय में बस, सोचता ही रहा और उनकी कही यह बात तो मैं आज तक नहीं भूला कि 'मैं उन आँखों को देखने आया था, जिन आँखों ने...!' मेरे नेत्र-दर्शन से उन्हें क्या मिला, यह तो मैं नहीं जानता, लेकिन उनका यह कथन जब कभी याद आ जाता है, मैं विस्मित होकर सोचता रह जाता हूँ कि ऐसा अनूठा ख़याल उमेशजी के मन में उपजा भी तो कैसे? आज के युग में उमेश बालाजी-जैसे भाव-प्रवण और संवेदनशील युवा कितने होंगे?...
इस मुलाक़ात के बाद उमेशजी डेढ़ वर्ष पूना में रहे। उनसे संपर्क बना रहा। वह फ़ोन पर लंबी-लंबी बातें करते रहे। उनके हृदय की प्रीति-तरंगें कुछ ऐसी उन्मत्त हुईं कि वह मुझे किसी देवोपम आसन पर बिठाने को मचल पड़े, जिसकी योग्यता-पात्रता मुझमें थी ही नहीं। मुझे उन्हें वर्जना देनी पड़ी, लेकिन उनकी सज्जनता, विनम्रता और अनूठी प्रीति ने मुझे बाँधे रखा। हम कई बार मिले, हमने बातें कीं और निकट से निकटतर होते गए। हमने पटना से पूना तक की रेल-यात्रा भी अलग-अलग बाॅगियों में साथ-साथ की। अलग-अलग और साथ-साथ यूँ, कि वह अपनी बाॅगी मय-सरो-सामाँ छोड़कर अधिकांशतः मेरे पास ही बने रहे--अपने अनन्य प्रेम के वशीभूत! और, पुणे पहुँचकर जब वह विलग होने लगे तो उन्होंने प्लास्टिक का एक बड़ा-सा डिब्बा मेरी श्रीमतीजी को बलात् सौंप दिया, जिसमें, घर में माँ का बनाया हुआ, आम का अँचार था और जिसे वह अपने लिए घर से ले आये थे। यह उनकी अनूठी प्रीति का अवश कर देनेवाला हठ था।
डेढ़ वर्ष बाद अचानक वह अलभ्य हो गए और उसके भी साल-भर बाद अजमेर से उनका फोन आया, वहीं उनकी पदस्थापना हुई थी। गाँव में माता का निधन हो चुका था और वह बहुत मर्माहत थे। मैंने उन्हें ढाढ़स बँधाया। वक़्त का एक लंबा टुकड़ा फिर आँधी-सा गुज़र गया।...
पिछले वर्ष उनका एक फ़ोन मुझे फिर मिला था, जिससे ज्ञात हुआ था कि अब वह जम्मू-कश्मीर में हैं--हमारी सीमाओं की रक्षा में सन्नद्ध! जिस नंबर से उनका फ़ोन आया था, उसे मैंने सुरक्षित कर लिया था।
अभी दस-पंद्रह दिन पहले मेरे माँगने पर किसी नए नंबर से एक चित्र मेरे पास आया। सैन्य-गणवेश में वह चित्र किसी अपरिचित व्यक्ति का-सा लगा। मैंने अज्ञात नंबर से पूछा--'क्या आप उमेश बलाजी हैं और क्या यह चित्र तथा नंबर आपका ही है? यदि हाँ, तब तो आप बहुत बदल गए हैं बंधु! पहचान में नहीं आते।' लगे हाथ उनका संवाद मिला--"बाबा, आपने ठीक पहचाना, पर मैं आज भी पहले की तरह हूँ, बिलकुल नहीं बदला।"
सच में वह बिलकुल नहीं बदले, देश की सेवा के गौरव ने उन्हें जो संतोष दिया है, वही उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व पर परिव्याप्त हो आया है।
आज भी जब कभी उमेश बालाजी की याद आती है, उनकी कही बात मेरे मन में कौंध जाती है और मैं विचार-मग्न हो जाता हूँ। दरअसल, मेरे उस छोटे-से आलेख में ऐसा कुछ था भी नहीं, सिवा राजेन्द्र बाबू के एकमात्र दर्शन की चर्चा और एक गम्भीर दार्शनिक सन्देश के उल्लेख के। बात तो उमेश बालाजी के मन पर उस आलेख के अप्रत्याशित प्रभाव की है, उस उत्कंठा-विकलता की है जो मेरे 'नेत्र-दर्शन' से जाने क्या अलभ्य पा लेना चाहती थी। उनकी भाव-प्रवणता, ग्रहणशीलता मुझे आज भी चकित-विस्मित करती है, लगता है, आजीवन करती रहेगी।...
आज देशपूज्य डॉ. राजेंद्र प्रसाद की ५४वीं पुण्य-तिथि है, उनकी पावन स्मृतियों को मेरा नमन है!
[चित्र : 1) सैन्य गणवेश में श्रीउमेश बालाजी का सद्यःखचित चित्र। 2) लोकमत समाचार : 28 फरवरी, 2013 की कतरन.]

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

और वह शांत हो गये...

बहुत पहले जयपुर गया था। जाता रहता था वहाँ । तब जयपुर में बड़ी दीदी का निवास था। उनके पड़ोसियों से भी आत्मीय संबंध हो गये थे। दीदी के घर के ठीक सामनेवाले घर में एक बुजुर्ग थे। जयपुर जब जाता, वह बड़े स्नेह से मिलते। खूब बातें करते।

दरअसल हुआ यह था कि किसी एक यात्रा में राजस्थान-भ्रमण पर लिखी अपनी एक कविता मैंने दीदी को सुनायी थी और उसकी प्रतिलिपि वहीं छोड़ आया था। बाद में दीदी ने वह कविता 'राजस्थान पत्रिका' को भेज दी। जब वह कविता पत्रिका में छप गयी तो दीदी आस-पड़ोस में सोल्लास सबको बता आयीं कि यह मेरे भाई की कविता है। तभी से उन बुजुर्ग का मुझ पर अतिरिक्त स्नेह हो आया था, वह मुझे पकड़ बिठाते और पूछते, 'इन दिनों नया क्या लिखा है? कुछ सुनाइये।' मैं भी उल्लसित होता और उन्हें अपनी नयी रचनाएँ सुनाता। उनके परिवार के लोग भी मुझे जान-पहचान गये थे। उन्हें मालूम था कि जब मैं आ गया हूँ तो दादाजी के पास लंबा बैठूँगा। जयपुर में मेरी अनुपस्थिति दीर्घकालिक हो जाती तो दीदी से पूछते रहते, 'कब आयेंगे आनन्दजी?'

मैं जान गया था, उनकी मुझमें आन्तरिक प्रीति है। साहित्य में उनकी रुचि थी, यह तो स्पष्ट ही था। लेकिन कई वर्ष बाद, इस बार की यात्रा में, वह बुजुर्ग कहीं दिखे नहीं--न बारामदे में बैठकर अखबार पढ़ते हुए, न अहाते के पौधों को जल से सींचते हुए। मुझे हैरत हुई। लेकिन कई वर्षों बाद दीदी के पास आया था, बहुत-सी बातें एकत्रित हो गयी थीं करने की और मेरी दोनों भांजियाँ इतनी स्नेही थीं कि मुझे छोड़ती ही नहीं थीं। लिहाजा, दादाजी की बावत कोई बात नहीं हुई।

प्रवास के दो दिन बीत गये। तीसरे दिन, सुबह के वक्त उन्हीं बुजुर्ग के घर से एक युवक दीदी के पास किसी काम से आये। उन्होंने मुझे और मैंने उन्हें पहचान लिया। उन्होंने जैसे ही 'नमस्ते अंकल' कहा, मैंने पूछा--'भाई! दादाजी कहाँ है, जबसे आया हूँ, दिखे नहीं।'
उन्होंने थोड़ी उदासी से कहा--'वह शांत हो गये अंकल!'
मैं कुछ समझा नहीं। यह मेरे लिए एक नव्य प्रयोग था। मैंने तत्काल पूछा--'क्यों? पक्षाघात वगैरह कुछ हुआ क्या? वह शांत क्यों हो गये?'
मेरे प्रश्न पर उन्हें आश्चर्य हुआ, बोले--'नहीं-नहीं, मेरा मतलब है, वह पूरे हो गए।'
मैं कुछ बोला तो नहीं, लेकिन मन में ये ख़याल आया कि वह अधूरे कहाँ थे कि पूरे हो गये? लेकिन 'पूरे हो गये' शब्दों के प्रयोग से इस आशंका ने सिर उन्नत किया था कि कहीं उन्हें कुछ हो तो नहीं गया? तभी दीदी आयीं, उन्होंने बालक से आने का कारण पूछा और मैंने उनसे दादाजी के बारे में जिज्ञासा की। दीदी ने कहा--'अब तो कई महीने हो गये उनको गुजरे।' दीदी के कथन से 'शांत होने' का अर्थ अब मेरी समझ में आया। इस  सूचना से मन व्यथित हुआ। वह युवक जब अपना प्रयोजन सिद्ध करके चले गये और मेरे मर्म की व्यथा कुछ शांत हुई तो मस्तिष्क इस 'शांत' होने का मर्म समझने में व्यस्त हो गया।

मैं ठहरा बिहारी आदमी, सीधी बात सीधे समझता हूँ, टेढ़ी बातें अव्वल तो समझ में आती नहीं और अगर आ गयीं तो फिर टेढ़ी ही करता हूँ। किसी के शांत हो जाने से कैसे मान लूँ कि वह गुज़र ही गया?
 'वक्ता अपना भाषण देकर शांत बैठ गये।' क्या इसका अर्थ यह निकालूँ कि वक्ता अपना भाषण देकर बैठे और मर गये।

कक्षा में बच्चे जब बहुत शोर मचाते हैं तो मेरी श्रीमतीजी उन्हें अक्सर आदेश देती हैं--'बच्चों, शांत हो जाओ।' और बच्चे शांत हो जाते हैं। इस कथोपकथन का क्या अर्थ-अभिप्राय लूँ?
एक अन्य उदाहरण पर गौर करें--'डॉक्टर परिचर्या में लगे हैं और मरीज शांत लेटा है।' अगर मरीज शांत ही हो गया है, तो फिर डॉक्टर परिचर्या क्यों और किसकी कर रहे हैं? बिहारी होकर ऐसा अनर्थ मैं तो कदापि नहीं निकाल सकता। वाक्य जो सीधा अर्थ प्रकट कर रहा है, उसे ही ग्रहण करूँगा।

बात पीड़ादायक थी, लेकिन उस दिन, देर रात तक, 'शांत होने' को लेकर नये-नये शगूफ़े बनते रहे और जीजाजी-दीदी-बच्चों के साथ घर में हँसी के फव्वारे छूटते रहे। बात यहाँ तक आ पहुँची कि तय हुआ कि अब हमें शांत नहीं रहना है, बोलते-बतियाते, चलते-फिरते रहना है। दीदी की छोटी बिटिया गुन्नू तब बहुत छोटी थी, अचानक उसने पूछ लिया--'लेकिन मामा, जब रात में हमलोग सो जायेंगे, कैसे बोल सकेंगे, तब तो सबको शांत होना ही पड़ेगा न?' वह छोटी थी, पर उसने बात पते की पूछी थी। मैं भी चक्कर में पड़ा, क्या उत्तर दूँ उसे? हँसी-हँसी में कैसी गलत धारणा उसके मन में बद्धमूल हुई जा रही है। मैंने सोच-विचार कर उससे कहा--'जब हम सो जाते हैं तो भगवान् हमें शांत नहीं होने देता, वह हमें स्वप्न देता है, करवटें लेने, खर्राटे लेने को बाध्य कर अशांत रखता है।'

मैंने गुन्नू को तो समझा दिया, लेकिन अपने मन का ही समाधान नहीं हुआ। जब सोने गया तो इस चिन्ता ने देर तक सोने न दिया कि कहीं सोते ही मैं शांत हो गया तो? इस 'तो' का उत्तर देने वाला वहाँ कोई नहीं था।

हमारी बोलचाल में भाषा और शब्द-प्रयोग की ऐसी-ऐसी व्यंजनाएँ हैं कि सुनकर बड़ी उजलत और कोफ़्त होती है। यहाँ पुणे में मेरी मेड अक्सर मुझसे पूछती है--'पापा, आपको चाय बना दूँ?' और कई बार उत्तर में मैं उससे कह चुका हूँ कि मुझे चाय मत बनाओ, चाय को बना दो।' मेरा उत्तर सुनकर वह बात समझती और हँसती भी है, लेकिन हर बार प्रश्न यही करती है। यहाँ आप किसी के घर जाइये, आपसे कुछ यूँ पूछा जाएगा--'चाय चलेगी आपको?' मन में आता है, कहूँ मेजबान से--'आप चाय से ही पूछ लीजिए न, क्या वह चलेगी मुझको?'

खैर, पुणे तो अहिन्दीभाषी क्षेत्र है, यहाँ मराठी का बोलबाला है, हिन्दी पर भी उसी का प्रभाव-प्रभुत्व है; लेकिन सुदूर पश्चिम चले जाइये, जहाँ खड़ीबोली हिन्दी का वर्चस्व है, वहाँ भोजन करते वक्त आपसे पूछा जाएगा--'आपको एक रोटी डाल दूँ?' इच्छा होती है, मेजबान से कहूँ--'नहीं, कुत्ते को डाल दीजिए, वह बाहर ही दुम हिलाता बैठा होगा।' लेकिन मुझे शांत रहना पड़ता है।...

हिन्दी में ऐसे शब्द-प्रयोगों की कमी नहीं है। शब्दों से मनचाहे अर्थ निचोड़ लिए जाते हैं और वे सर्व-स्वीकृत होकर प्रचलन में स्थायी भाव में रहते हैं। ऐसे अनेक उदाहरण और दिये जा सकते हैं, जिन्हें सुन-सुनकर सिर धुनने की इच्छा होती है और कभी-कभी तो 'शांत' हो जाने की भी।...