रविवार, 4 अप्रैल 2010

चलो आज फिर...

[ग्रीष्म का प्रणय-काव्य]
चलो आज फिर
आशाओं की बंजर धरती पर
चाँद की चंचल और स्निग्ध छाया में
अपने जलते और जख्म भरे चहरे पर
चन्दन का ही लेप चढ़ा लें !

चलो आज फिर
गीत विरह के छोड़
प्रीति भरे उन्मुक्त पवन में
नहीं प्रणय का दाह
और नहीं अंतर की ज्वाला को भड़काने
किन्तु चलो तुम साथ हमारे
स्निग्ध प्रेम की शीतल बारिश में
अपनी अंजुरी आज बढ़ाने !

वैसे तपिश बहुत है अंतर की
औ ' आक्रोश उबलता जैसे ज्वार,
यह नहीं बाँध की तैयारी है,
यह नहीं समय की शक्ति परखने का अवसर है,
चलो आज फिर साथ हमारे--
हम अपने आंसू की शीतलता से
आज तपिश यह झूठी कर देंगे,
अंगारों की जगह तुम्हारे आँचल में हम
फूलों का अम्बार लगा देंगे !

स्नेह मनुज की स्वाभाविकता है
और मुट्ठियों में
भरे हुए जो अंगारे हैं,
उनसे भी हम प्रेम करेंगे;
हम वचन तुम्हें देते हैं--
जीवन में विश्वास भरेंगे !

जब तक आग तुम्हारे अंतर में जीवित है
सच मानो, तब तक जीवन है,
आओ मिथ्या से दूर चलें
आओ कुनैन की गोली को
शीतलता औ ' सपनों संग पी जाएँ
आओ यथार्थ की कड़वाहट के साथ-साथ
हम नीलकंठ को जीने की कोशिश करते हैं !

इसे न कहना स्थितियों से
समझौता करने की कविता है,
नहीं भला जीवन किसका संघर्षों से भरा हुआ है ?
नहीं भला दुर्दिन की हथकड़ियों में
है कौन मनुज जो बँधा हुआ है ?

हम प्रण लेते हैं,
जीवन में संघर्ष करेंगे !
जीतेंगे वह दुर्ग, तभी जीने का उद्घोष करेंगे !
लेकिन ठहरो ज़रा,
अभी घड़ियाँ बाकी हैं,
हाथों में शीतलता की मदिरा ले
आयीं किरणे बनकर साकी हैं !!

14 टिप्‍पणियां:

M VERMA ने कहा…

स्निग्ध प्रेम की शीतल बारिश में
अपनी अंजुरी आज बढ़ाने !

बूँद बूँद से भर जायेगा
दाह भी मन का मर जायेगा
बेहतरीन रचना

शायद अंतिम बंद में प्राण की जगह प्रण होना चाहिये.

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना!

Suman ने कहा…

nice

CS Devendra K Sharma ने कहा…

jeevan ke prati unnat drishtikon ko pradarshit karti bahut sunder rachna..

kshama ने कहा…

Tapish, aag...sab hain...phirbhi ek sheetal rachana!चलो आज फिर
आशाओं की बंजर धरती पर
चाँद की चंचल और स्निग्ध छाया में
अपने जलते और जख्म भरे चहरे पर
चन्दन का ही लेप चढ़ा लें !

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

वर्माजी,
'प्रण' ही था, 'प्रण' ही होना चाहिए था... 'प्राण' हो गया... पूरी कविता पढ़कर पोस्ट की थी; फिर भी....! इन नाशुक्र आँखों का क्या करूँ ? ध्यान दिलाने का शुक्रिया !
अब दुरुस्त कर दिया है !
साभार--आ.

वाणी गीत ने कहा…

स्नेह मनुज की स्वाभाविकता है
और मुट्ठियों में
भरे हुए जो अंगारे हैं,
उनसे भी हम प्रेम करेंगे....

नफरत , विद्वेष , शत्रुता पर भारी है
शीतलता के संग अपनत्व का चन्दन लेप और सहज आत्मीयता ....!!
आशा और विश्वास जगाती कविता ....
आभार ...!!

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

बहुत बढ़िया कविता!
--
मेरे मन को भाई : ख़ुशियों की बरसात!
--
संपादक : सरस पायस

दिगम्बर नासवा ने कहा…

जब तक आग तुम्हारे अंतर में जीवित है
सच मनो, तब तक जीवन है,
आओ मिथ्या से दूर चलें
आओ कुनैन की गोली को
शीतलता औ ' सपनों संग पी जाएँ ...

Saanson ki garmi jab tak hai jeevan bhi hai ... aur jeevan hai to misri ke saath saath kunen ki goli bhi khaani padhegi ...

Bahut lajawaab rachna hai ...

अरुणेश मिश्र ने कहा…

प्रशंसनीय ।

बेचैन आत्मा ने कहा…

हम प्रण लेते हैं,
जीवन में संघर्ष करेंगे !
जीतेंगे वह दुर्ग, तभी जीने का उद्घोष करेंगे !
---ऐसी कविताएँ निराश मन में जीवन का संचार करती हैं।
---आभार।
सच मनो-सच मानो-पाँचवे पैरा में।

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

चलो आज फिर
आशाओं की बंजर धरती पर
चाँद की चंचल और स्निग्ध छाया में
अपने जलते और जख्म भरे चहरे पर
चन्दन का ही लेप चढ़ा लें !

आपकी हर पंक्ति में गहरी पकड़ होती है ....ज़ख्मों पर चन्दन का लेप .....वाह ......!!
यह नहीं समय की शक्ति परखने का अवसर है...

आनंद जी यहाँ अंत का 'है' पंक्ति में अवरुद्ध पैदा कर रहा है देखिएगा .....

चलो आज फिर साथ हमारे--
हम अपने आंसू की शीतलता से
आज तपिश यह झूठी कर देंगे,
अंगारों की जगह तुम्हारे आँचल में हम
फूलों का अम्बार लगा देंगे !

कितनी विनम्रता है शब्दों में ....!!
आज प्रेम पर सब कुछ न्योछावर कर देने की इस चाह के पीछे बरसों की पीड़ा भी छिपी है शायद .....

जब तक आग तुम्हारे अंतर में जीवित है
सच मनो, तब तक जीवन है,
आओ मिथ्या से दूर चलें
आओ कुनैन की गोली को
शीतलता औ ' सपनों संग पी जाएँ
आओ यथार्थ की कड़वाहट के साथ-साथ
हम नीलकंठ को जीने की कोशिश करते हैं !

ओह.....कितनी सार्थकता है शब्दों में ...अद्भुत ....एक-एक शब्द जान है ......

नहीं भला दुर्दिन की हथकड़ियों में
है कौन मनुज जो बँधा हुआ है ?

जीवन का सत्य है यह ......

लेकिन ठहरो ज़रा,
अभी घड़ियाँ बाकी हैं,
हाथों में शीतलता की मदिरा ले
आयीं किरणे बनकर साकी हैं !!
वाह....वही शीतलता जो ज़ख्मों पर चन्दन के लेप किरने बनकर आई है .....!!
कितनी गहराई है आपकी कविताओं में .......
आपकी कवितायेँ सिलेबस में रखने लायक हैं .....!!

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

आओ यथार्थ की कड़वाहट के साथ-साथ
हम नीलकंठ को जीने की कोशिश करते हैं !
आज इन्सान विषपान कर नीलकंठ ही तो हो गया है.बहुत सार्थक और संघर्षों का सामना कअने को प्रेरित करती रचना. आभार.

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

यहाँ पढ़ूँ, पढ़कर चुप रह जाऊँ, बस यही चाह है ! हाजिरी लगा रहा हूँ बस !

"जब तक आग तुम्हारे अंतर में जीवित है
सच मानो, तब तक जीवन है,.."- अटक गया इसी पर ! सारांश यहीं है !