सोमवार, 8 अप्रैल 2013

मैं ग़ज़लों को गुलाब कहता हूँ...

मैं उनकी ग़ज़लों को गुलाब कहता हूँ,
इन चरागों को आफ़ताब कहता हूँ !

शेरो-सुखन का इल्म कितना दिलफरेब है,
उनकी हर बात पे मैं वाह जनाब कहता हूँ!

इस हसीन नश्तर का हुनर तो देखिये--
हौले-से चुभता है तो लाजवाब कहता हूँ!

खुली आँखों से देखा करता हूँ सारे मंज़र,
बड़े यकीन से फिर उनको ख़्वाब कहता हूँ!

रोज़-ब-रोज़ गिराते हैं कलेजे पे बिजलियाँ,
उनकी नवाजिशों को बेहिसाब कहता हूँ!

चराग ले के भी ढूँढ़ता तो मिलता नहीं वो,
मोड़ पे ठहरा रहा जो, उसे इंतखाब कहता हूँ!

हम जितनी दूर साथ चलें, मस्ती से चलेंगे,
पस्तियों को मैं खाना-खराब कहता हूँ!

खुदा का नूर है या कोई बाँकी किरन है,
उसकी बाबस्तागी को मैं अदाब कहता हूँ!!

मंगलवार, 18 दिसम्बर 2012

यादों के आइने में कवि बच्चन...

[समापन क़िस्त]

बाद के वर्षों में पत्राचार और संवाद शिथिल होता गया। बच्चनजी अस्वस्थ रहने लगे थे और पढ़ना-लिखना उनके लिए कठिनतर होता गया था। दिन पर दिन बीतते रहे। ....

वह 6 नवम्बर 1995 की सुबह थी। पिताजी मृत्यु-शय्या पर थे--शरीर की नितांत अक्षमता की दशा में--हतचेत से! मैं पिताजी के कक्ष के बाहर ही बेसिन पर ब्रश कर रहा था, तभी उनकी पुकार सुनाई पड़ी--"मुन्ना! "मैं क्षिप्रता-से उनके पास पहुंचा। लेटे-लेटे उन्होंने आँखें उठाकर देखा--उनकी आँखों में गहरी पीड़ा की छाया थी। दीन स्वर में उन्होंने कहा था--"जानते हो, 'इलाहाबादवाली भाभी (पूज्या श्यामाजी) आयी थीं। विश्वासपूर्वक कह सकता हूँ, मैं निद्राभिभूत नहीं था। ब्रह्ममुहूर्त में वह सचमुच आयी थीं।" अपने पायताने छत की ओर इशारा करते हुए उन्होंने अपनी बात जारी रखी--"सस्मित दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार की मुद्रा में थीं। केश खुले थे, श्वेत साड़ी  में थीं। सिर कमरे की छत से लगा हुआ और पाँव अधर में थे। मैंने उनसे कहा--"मैं इतनी तकलीफ में हूँ और तुम मुस्कुरा रही हो?" भाभी इलाहाबादी में बोलीं--"ई तकलीफों कौन रही! ... हम इधर से जात रही तो सोचा तोसें मिल लेई!" ....

पूज्य पिताजी से यह सुनकर मैं आश्वस्त हुआ था कि  अब उनकी तकलीफें दूर हो जायेंगी और वह पहले की तरह स्वस्थ-प्रकृतिस्थ हो जायेंगे। तब मोही मन यह सोच भी न सका था कि जब शरीर ही न रहेगा तो तकलीफें भी न रहेंगी। हुआ भी ऐसा ही। प्रायः 26 दिनों की यंत्रणा के बाद 2 दिसम्बर  1995 को पिताजी ने शरीर के साथ ही पीडाओं से भी मुक्ति पायी थी। ... लेकिन यह सोचकर मैं आज भी हैरान होता हूँ कि  60 वर्षों के लम्बे प्रसार में, पिताजी के हर गाढ़े  वक़्त में, उनकी 'इलाहाबादवाली भाभी' कैसे आ खड़ी  हुई थीं? परा-जगत से जीवन-जगत में आकर यह उनका चौथा हस्तक्षेप था। 'मरणोत्तर जीवन' नामक आलेख में पिताजी ने ऐसी तीन घटनाओं की विस्तार से चर्चा की है। इस अंतिम हस्तक्षेप के बारे में कुछ लिखने का मौक़ा उन्हें क्रूर काल ने नहीं दिया था। ...

पिताजी के निधन के आठ वर्ष बाद 2003 में बच्चनजी ने भी जीवन-जगत से छुट्टी पाई थी। उस दिन बच्चनजी के साथ एक युग का अवसान हुआ था। दूरदर्शन पर उनके पार्थिव शरीर को देखकर मैंने श्रद्धापूर्वक उन्हें नमन किया था और सारे दिन टीo वीo स्क्रीन से चिपका रहा था। अतीत की स्मृतियों में डूबने लगा था  मन! यह संयोग ही था कि दोनों मित्रों की जन्म-तिथि एक ही थी--27!  बच्चनजी  की जन्म-तिथि 27 नवम्बर है और पिताजी की 27 जनवरी। पिताजी को गुज़रे आज 17 वर्ष हो गए हैं। इन 17 वर्षों में कोई भी 27 नवम्बर ऐसा नहीं गुज़रा, जब इस दिन सुबह-सुबह पिताजी की आवाज़ मेरे श्रवण-रंध्रों में न गूँजी हो--"आज बच्चन (इतने...) वर्ष के हो गए, मैं 27 जनवरी को (इतने...) वर्ष का हो जाऊँगा।"..... मुझे लगता है, पिताजी की यह आवाज़ मैं आजीवन सुनता रहूँगा--अवसाद और प्रसन्नता के सम्मिलित भाव के साथ....!
[समाप्त]

सोमवार, 17 दिसम्बर 2012

यादों के आइने में कवि बच्चन...


[नवीं क़िस्त]

कालान्तर में हम हरद्वार होते हुए पटना आ गए। भौतिक दूरियां बढ़ गई थीं, लेकिन बच्चनजी और पिताजी के मन की प्रीति अक्षुण~ण रही। पत्र आते-जाते रहे--बहुत अन्तरंग और आत्मीय पत्र ! बच्चनजी अद्भुत व्यक्ति थे। उन्होंने संघर्षों के दिन भी देखे और आराम-आशाइस  के भी और दोनों स्थितियों में वह दृढ़ता के साथ अविचल भाव से चलते रहे, लिखते रहे। उनकी कविताओं में जीवन-दर्शन को शब्द मिले हैं तो मार्मिक पीड़ा को भी अभिव्यक्ति मिली है। जीवन-संघर्षों की आँच में तपकर उन्होंने मधुगीतों की रचना की है। उन्होंने स्वयं लिखा भी है--
हो खड़े जीवन समर में, हैं लिखे मधु-गीत मैंने !
लेखन उनके जीवन का नियमित व्यायाम सरीखा था। वह निश्चित समय पर अपनी टेबल पर जा बैठते और लिखना प्रारंभ कर देते। वह अपनी लेखानावाधि को 'समाधि में रहना' कहते थे। पिताजी को लिखे अनेक पत्रों में उन्होंने सूचित किया है--"अभी समाधि में हूँ, तुम्हारे पत्र का बाद में विस्तार से उत्तर दूंगा।" उनके पास जीवनानुभवों का खज़ाना था, जिसे वह मुक्तहस्त से जीवन भर पाठकों के बीच बाँटते रहे।

मुझे अच्छी तरह याद है, जब उनकी आत्मकथा का पहला खंड प्रकाशित हुआ था, उसके महीने भर पहले उनका पत्र पटना आया था। उन्होंने पिताजी को आदेशात्मक स्वर में लिखा था--"मैं चाहता हूँ, अमुक.... तारीख को तुम मेरे पास रहो। मार्ग-व्यय की चिंता मत करना, वह मेरी ज़िम्मेदारी है। बस, इसे आदेश समझना और दिल्ली चले आना।" पिताजी जान न सके कि बच्चनजी के इस बुलावे का कारण क्या है। उन्होंने कभी ऐसे आदेश के स्वर में कुछ कहा भी नहीं था। थोड़े संभ्रम में पड़े पिताजी निश्चित तिथि के एक दिन पहले ही दिल्ली जा पहुंचे और मेरे छोटे चाचाजी (स्व. भालचंद्र ओझाजी) के पास राजौरी गार्डन में ठहरे। नियत तिथि को शाम के वक़्त जब पिताजी अपने अनुज भालचंद्रजी के साथ बच्चनजी के आवास पर पहुंचे, तो उन्होंने वहाँ बहुत हलचल देखी। किसी आयोजन की व्यवस्था की गई थी। बच्चनजी पिताजी से बड़े उत्साह से गले मिले। वहाँ अनेक पुराने साहित्यिक मित्र भी उपस्थित थे। एक बड़े-से हॉल में, आयताकार स्वरूप में ज़मीन पर ही मसनद सहित आसन बिछाए गए थे। कार्यक्रम के प्रारंभ में बच्चनजी ने कहा--"मैंने आप सबों को एक विशेष प्रयोजन से यहाँ आमंत्रित किया है। अपनी युवावस्था के दिनों के दो मित्रों को मैंने आदेश देकर कहा था कि वे आज की शाम मेरे साथ व्यतीत करें। मुझे ख़ुशी है कि उन्होंने मेरे आदेश की अवहेलना नहीं की और आज वे दोनों मेरे अगल-बगल में बैठे हैं, उनमें पटना से मेरे परम मित्र मुक्तजी और सुल्तानपुर (अवध) से राजनाथ पांडेयजी पधारे है। ..."

फिल्मों के पार्श्व-गायक महेंद्र कपूर ने गायन प्रस्तुत कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया, फिर अमिताभजी ने भी बच्चनजी की कविताओं का पाठ किया। इसी बीच पिताजी ने देखा कि किसी पुस्तक की दो प्रतियां सभा में उपस्थित गण्यमान्य साहित्यकारों के हाथों में क्रमशः खिसकती आ रही हैं और प्रत्येक सभासद उस पर बारी-बारी से हस्ताक्षर कर रहे हैं। वे प्रतियां जब बच्चनजी के पास पहुँचीं, तो उन्होंने भी उन पर हस्ताक्षर किये और फिर खड़े होकर एक प्रति पिताजी को और दूसरी राजनाथ पांडेयजी को दी। वह बच्चनजी की आत्मकथा के पहले खंड 'क्या भूलूँ क्या याद करूँ' की प्रतियां थीं, जिसे उन्होंने अपने इन्हीं दो मित्रों को समर्पित किया था। यह सौहार्द, यह समर्पण और ऐसी अनूठी प्रीति देखकर पिताजी विह्वल हो उठे थे और उन्होंने बच्चनजी को गले से लगा लिया था। जलपान और चाय-कॉफ़ी के बाद सभा समाप्त हुई थी। 'क्या भूलूँ क्या याद करूँ' की वह दुर्लभ प्रति आज भी मेरे संग्रह में कहीं सुरक्षित है।

पिताजी का वर्चस्व और प्रभामंडल ऐसा था कि  उनका आदेश पाकर ही हवा का झोंका भी उनके कक्ष में प्रविष्ट होता था। वैसे, वह कोमल ह्रदय के, संवेदनशील, मितभाषी और अति स्नेही थे; लेकिन उनके आदेश के विरुद्ध किसी को बोलने का साहस नहीं होता था। संभवतः 1984-85 (संभव है, काल-गणना में त्रुटि हो) में उन्होंने निर्णय लिया कि वह अपनी एक आँख का ऑपरेशन अलीगढ़ में डॉo पाहवा से करवायेंगे और वहाँ अकेले जायेंगे। ऑपरेशन के लिए अकेले जाना निरापद नहीं है, यह मानकर मैंने दबी ज़बान में प्रतिरोध करना चाहा तो उन्होंने मुझे यह कहकर चुप रहने पर विवश कर दिया कि "घर और छोटी बहन की देखभाल के लिए तुम्हारा यहाँ रहना आवश्यक है।" बहरहाल, वह अकेले ही अलीगढ़ गए। वहाँ डॉo पाहवा ने उनकी एक आँख की शल्य-चिकित्सा की। ऑपरेशन के बाद के दस दिनों में उन्होंने बहुत कष्ट उठाये। स्थिति यहाँ तक बिगड़ी कि दिल्ली फ़ोन करके उन्हें छोटे चाचाजी (स्वo भालचंद्र ओझा) को बुलाना पड़ा, जो स्वयं बहुत स्वस्थ नहीं थे। उन्होंने चार-पांच दिनों तक पिताजी की बहुत सेवा की, फिर उन्हीं की तबीयत बिगड़ने लगी। चाचाजी दिल्ली लौट गए। दस दिनों बाद डॉक्टर ने पिताजी को घर जाने की इजाजत दी। पिताजी ने अलीगढ़ से पटना का नहीं, दिल्ली का टिकट लिया और एक आँख पर हरी पट्टी बांधे वह दिल्ली चले गए। दिल्ली में उन्हें वाल्मीकीय रामायण के प्रकाशन के काम से कई मित्रों से मिलना था, जिनमें बच्चनजी का नाम सर्वप्रथम था।

उन दिनों बच्चनजी गुलमुहर पार्क के अपने नए भवन में रह रहे थे। पिताजी सुबह-सबेरे उनके घर पहुंचे। छोटे चाचाजी उन्हें द्वार पर टैक्सी से छोड़ गए थे। घर के लॉन में पड़ी कुर्सियों पर दोनों मित्र बैठे और बातों का सिलसिला शुरू हुआ। पिताजी की आँख पर बंधी पट्टी और उनकी जर्जर दशा देखकर बच्चनजी फूट-फूटकर रो पड़े थे। बच्चनजी की विकलता देखकर पिताजी भी स्वयं को रोक न सके थे। दोनों मित्रों ने आंसुओं की ज़बान में क्या-कुछ कहा-सुना, यह तो मैं नहीं जानता; लेकिन यह सच है कि जब पिताजी वहाँ से विदा हुए तो घर से बाहर आकर जाने क्यों उस भवन के लौह्द्वार को उन्होंने प्रणाम किया था। क्या उन्हें प्रतीति हो गई थी कि  अब कभी बच्चनजी से उनकी मुलाक़ात नहीं होगी? पिताजी का यह प्रणाम ही उनका अंतिम प्रणाम सिद्ध हुआ।...
[क्रमशः]

शनिवार, 15 दिसम्बर 2012

यादों के आइने में कवि बच्चन...


[आठवीं क़िस्त]

एक और अनूठे प्रसंग की याद आ रही है। तब तक बच्चनजी मुंबई में अपना घर 'प्रतीक्षा' बनाकर वहाँ शिफ्ट हो गए थे और हम मॉडल टाउन, दिल्ली में ही थे। एक दिन दोपहर के वक़्त करीब तीन बजे घर की घंटी बजी। पिताजी दिवा-निद्रा से जागकर कुछ लिख-पढ़ रहे थे और मैं दूसरे कमरे में था। पिताजी ने ही द्वार खोला--सामने बच्चनजी को खडा देखकर चकित-विस्मित हुए और उच्च स्वर में उन्होंने मुझे आवाज़ दी--"मुन्ना, देखो कौन आये हैं!" मैं जैसा था, वैसा ही उठ खडा हुआ और क्षिप्रता-से पिताजी के कमरे में पहुंचा। मेरे साथ मेरे अनुज यशोवर्धन भी थे। तब तक बच्चनजी को लेकर पिताजी अपने कमरे में आ गए थे। मैंने और यशोवर्धनजी ने आगे बढ़कर बच्चनजी के चरण छुए। बच्चनजी ने हमें आशीर्वाद दिया। पिताजी ने उनसे बैठने को कहा तो बोले--"देखो, मेरे पास बैठने का जितना वक़्त था, उसे मैं टैक्सी में खर्च कर चुका हूँ। जाने कैसे मुझे भ्रम हो गया और मैंने टैक्सी ड्राइवर को 'टैगोर पार्क' की जगह 'टैगोर गार्डन' चलने का आदेश दे दिया। टैगोर गार्डन में जब तुम्हारा घर ढूंढ़ते-ढूंढ़ते मैं हैरान-परेशान हो गया, तो ड्राइवर ने ही कहा कि 'कहीं 'टैगोर पार्क तो नहीं जाना था', जैसे ही उसने 'टैगोर पार्क' का नाम लिया, मैं समझ गया कि मुझसे गफलत हो गई है। टैगोर गार्डन से मैं भागा-भागा आ रहा हूँ, लेकिन इसमें सारा वक़्त बर्बाद हो गया। मैंने टैक्सी रोक राखी है। बैठूंगा नहीं। शाम की फ्लाइट से अमित आनेवाले हैं। उन्हें हवाई अड्डे से लेकर मुझे होटल जाना है। फिर शाम को तैयार होकर राष्ट्रपति भवन।"
पिताजी ने पूछा--"राष्ट्रपति भवन, क्यों?"
बच्चनजी ने तब रहस्योदघाटन किया--"आज मुझे राष्ट्रपतिजी के हाथों अलंकरण मिलनेवाला है। मैंने सोचा, अलंकरण लेने के पहले मैं तुम्हारा आशीर्वाद ले लूँ। इसीलिए आया हूँ।"
पिताजी ने कहा--"आशीर्वाद की क्या बात है ? भला मैं तुम्हें आशीर्वाद कैसे दे सकता हूँ ? बड़े तुम हो।"
बच्चनजी बोले--"बड़ा तो मैं हूँ, लेकिन ब्राह्मण तो तुम हो; फिर मुझे अलंकरण मिल रहा है, इस बात की ख़ुशी की जो चमक मुझे तुम्हारी आँखों में दिखेगी, वह और कहाँ मयस्सर होगी ?" फिर किंचित विराम के बाद बोले--"लेकिन... ब्राह्मण तो दक्षिणा लिए बिना कुछ देता नहीं, तो लो, तुम्हारे लिए मिठाई ले आया हूँ. मिठाई खाओ और मुझे आशीर्वाद दो।"
यह कहकर बच्चनजी ने मिठाई का एक बड़ा-सा डिब्बा पिताजी को दिया और हमारे आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब मैंने देखा कि बच्चनजी सचमुच पिताजी के पाँवों की ओर झुके। पिताजी ने त्वरित गति से मिठाई का डिब्बा मुझे पकड़ाया और बच्चनजी को कन्धों से पकड़कर 'यह क्या करते हो?' कहते हुए ऊपर उठाया और गले से लगा लिया। दोनों मित्रों की आखों की नमी में मैं बहुत कुछ पढ़ रहा था, पढ़ने की चेष्टा कर रहा था।

उसके बाद बच्चनजी रुके नहीं, हमारे प्रणाम पर आशीर्वाद देते हुए शीघ्रता से टैक्सी में जा बैठे। देखते-देखते टैक्सी आँखों से ओझल हो गई और पिताजी देर तक भाव-विह्वल रहे। वह आजीवन यह प्रसंग याद करते रहे और गदगद भाव से यह रेखांकित करते रहे कि "एक अनन्य मित्र का यह भरोसा कि उसे अलंकरण मिलने की ख़ुशी की चमक मेरी ही आँखों में दिखेगी अन्यत्र नहीं, यह मेरी बहुत बड़ी उपलब्धि है।" बच्चनजी में पुरातन और अधुनातन--दोनों के प्रति स्वीकृति का भाव था--दोनों में जो वरण करने योग्य था, उसे उन्होंने स्वीकार किया था। वह मानस-पाठी थे। रामनवमी में मानस का नवाह पाठ वह नियमित रूप से आजीवन करते रहे।
[क्रमशः]

शुक्रवार, 14 दिसम्बर 2012

यादों के आइने में कवि बच्चन...


[सातवीं क़िस्त]

1979 में मैंने अपनी नौकरी बदली और दिल्ली से हरद्वार चला आया। हरद्वार आये थोडा ही वक़्त बीता था कि 'कुली' के सेट पर गंभीर चोट खाकर अमित भैया के अस्पताल में भर्ती होने की सूचना मिली। उन दिनों की याद करके आज भी सिहर उठाता हूँ। बच्चनजी के पत्रों में उनकी व्यग्रता, विकलता और संताप की झलक मिलती। उस कठिन काल में मैंने पिताजी को दिन-रात महामृत्युंजय मंत्र का पाठ करते हुए देखा था।पिताजी अपने पत्रों से तो बच्चनजी को ढाढस बंधाते, हिम्मत देते और प्रभु की अनंत कृपा का भरोसा दिलाते; लेकिन मैं जानता हूँ, वह स्वयं बहुत विकल-व्यग्र और चिंतित थे। यह विकलता-व्यग्रता तब तक बनी रही, जब तक अमिताभ भैया पूरी तरह प्रकृतिस्थ होकर घर नहीं आ गए।

संभवतः 1981 में मुझे अचानक अपने मालिकों के पास मुंबई जाना पडा। गाड़ी सुबह-सुबह मुंबई पहुंची थी। मैं सीधे हिंदुजा-बंधुओं के निवास पर चला गया और दिन भर वहीं  बना रहा। हिंदुजा-बंधुओं के गेस्ट हाउस से ड्राइंग रूम तक चहलकदमी करता मैं इस प्रयत्न में लगा रहा कि मुझे अपनी बात मालिकों के सम्मुख रखने का अवसर शीघ्र मिल जाए। दिन के करीब 12-1 बजे हिंदुजाजी के ड्राइंग रूम में एक सुदर्शन युवक को देखा, जो श्रीअशोक पीo हिंदुजा की पत्नी से बातें कर रहे थे। वह मुझे जाने-पहचाने-से लगे। मैंने स्मृति पर जोर डाला तो यह निश्चय होने लगा कि  ये तो अजिताभ बच्चनजी हैं, जिनसे मैं 10-11 साल पहले मिला था। अजित भैया में ज्यादा फर्क नहीं आया था, सिवा इसके कि वह कुछ अधिक पुष्ट देह-यष्टि के हो गए थे।मेरे मन में जैसे ही यह सुनिश्चित हुआ कि  ये अजित भैया ही हैं, मैं उनसे मिलने को व्यग्र हो उठा; किन्तु  ड्राइंग रूम में हठात प्रवेश करना शिष्टता की सीमा का उल्लंघन होता। मैं वहीँ कैरिडोर में टहलता रहा। थोड़ी देर बाद अजित भैया बाहर आये। मैंने उन्हें पीछे से आवाज़ दी। वह पलटे ग्यारह वर्षों बाद अचानक यहाँ मुंबई में, वह भी हिंदुजाजी के आवास पर, मुझे पहचान  लेना उनके लिए भी आसान नहीं था। उनकी आँखों में अपरिचय का भाव देखकर मैंने उन्हें अपने बारे में बताया, 1970 की मुलाकात की याद दिलाई तो वह पुलकित हुए। उन्होंने कहा--"तुम तो बहुत बदल गए हो, बड़े भी हो गए हो।" मैंने बच्चनजी के स्वास्थ्य के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा--"अच्छे हैं। तुम घर आकर उनसे मिल सकते हो।" मैंने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा--"यहाँ जिस काम से आया हूँ, वह जैसे ही हो जाएगा, मैं अवश्य बच्चन चाचाजी के दर्शन करने आउंगा।" थोड़ी औपचारिक बातों के बाद अजित भैया विदा हुए।
श्री एसoपीo हिंदुजाजी से शाम 3  बजे की मेरी मीटिंग तय हुई। उनसे मिलते ही समस्याओं का समाधान भी हो गया; लेकिन उन्होंने मुझे आदेश दिया कि  'तुम अभी शाम 6 बजे की फ्लाइट से दिल्ली चले जाओ और वहाँ से टैक्सी लेकर कल तक हरद्वार पहुँचो। मैंने फ्लाइट में तुम्हारा टिकट बनाने के लिए दफ्तर में कह दिया है।' एक दिन की मुहलत माँगने की जगह भी उन्होंने नहीं छोड़ी थी। मैं क्या करता, बच्चनजी के दर्शन किये बिना ही हुझे मुंबई से लौटना पड़ा।
हरद्वार लौटे मुझे 5-6 दिन ही बीते थे कि बच्चनजी का लंबा पत्र पिताजी के पास आ पहुंचा। थोड़ी नाराजगी के स्वर में उन्होंने पिताजी को लिखा था--"अजित से ज्ञात हुआ था कि आनंदवर्धन बम्बई आये थे। उन्होंने अजित से कहा भी था कि  वह मिलने मेरे पास आयेंगे। मैं तो उस दिन देर रात तक और दूसरे  दिन भी 'प्रतीक्षा' में प्रतीक्षा ही करता रह गया। ... मिलने आने में कोई अड़चन थी तो उन्हें फ़ोन करना चाहिए यथाशीघ्र सूचित करो कि  वह सकुशल तुम्हारे पास पहुँच गए हैं।" पिताजी ने उन्हें विस्तार से मेरी व्यस्तता और विवशता के बारे में लिखा था और तब मुझे क्षमादान मिला था; लेकिन यह जानकार मैं मन-ही-मन हर्षित-प्रफुल्लित हुआ था कि एक पिता की तरह ही उन्हें मेरी फिक्र थी और मेरे बिना मिले लौट आने का मलाल भी था। बच्चनजी ऐसे ही स्नेही और निकटस्थों  पर प्रीति  लुटानेवाले सहृदय व्यक्ति थे।
[क्रमशः]

बृहस्पतिवार, 13 दिसम्बर 2012

यादों के आइने में कवि बच्चन...



[छठी क़िस्त]

20  नवम्बर 1978  को जब मैं सपत्नीक बच्चनजी से आशीर्वाद लेने पिताजी के साथ जाने लगा तो विवाह में सम्मिलित होने पटना से आये मेरे एक कविमित्र कुमार दिनेश भी साथ हो लिए। हम सभी एक टैक्सी में सवार होकर विलिंगटन क्रिसेंट पहुंचे। घर का लौह्द्वार बंद था और उसपर एक संतरी विराजमान था। हमारी टैक्सी को द्वार पर ही रुकना पडा। दिनेशजी थोड़े चिंतित दिखे; लेकिन जैसे ही पिताजी का नाम संतरी ने दूरभाष पर घर के अन्दर पहुंचाया, द्वार खोलकर हमें अन्दर बुला लिया गया। बच्चनजी और तेजीजी ने हमें बड़े स्नेह से अपने पास बिठाया और बातें कीं। पिताजी और बच्चनजी जब भी मिलते, उन दोनों की उड़ान अलग होती। इतनी बातें कि मत पूछिये ! कई बार तो वे दोनों भूल ही जाते कि उनके आसपास और भी लोग हैं जो अधीरता से अपनी बात कहने या कुछ पूछने को व्यग्र हैं। विवाह की मिठाइयों से अघाए हुए हमलोगों ने वहाँ फिर मिठाइयाँ खायीं और कॉफ़ी पी।

पिताजी और बच्चनजी की वार्ता में एक अल्प-विराम का लाभ उठाकर अचानक मेरे मित्र कुमार दिनेश ने पूछा--"तेरह अंक को सर्वत्र अशुभ माना गया है। जब आप 13 विलिंगटन क्रिसेंट में रहने आये, तो क्या आपके मन में इस अंकवाले भवन को लेकर कोई असमंजस या दुविधा उत्पन्न नहीं हुई ?" दिनेश का प्रश्न सुनकर बच्चनजी गंभीर हो गए और थोड़ी देर मौन रहकर बोले--"ऐसा प्रश्न आज तक मुझसे किसी ने नहीं पूछा; लेकिन प्रारंभिक दौर में यह सवाल मेरे मन में बार-बार उठाता रहा और मैं किंचित उद्विग्न भी रहा। इस सवाल को लेकर मेरे अंतःकरण में चिंतन चलता रहा। अंततः उसका समाधान भी मुझे अंतर्मन से मिल ही गया। गुरु नानकदेवजी जब छोटे थे, तो उन्हें उनके पिताजी ने कपास की तिजारत करनेवाली अपनी दूकान की गद्दी पर बिठा दिया था, जहां बैठे-बैठे कपास की गांठों की तौल की गिनती भर करनी थी। गुरु नानकदेवजी यह काम करने लगे। पहली तौल पर वह कहते--'एक्क-म एक', दूसरी तौल पर 'दुई -ए दू'... और इसी तरह यह क्रम चलता जाता. एक दिन गुरु नानकदेवजी इसी तरह रुई की गांठों की तौल की गणना कर रहे थे--'एक्क-म एक', दुई-ए दू, तीन-इ तीन....इसी तरह आगे बढ़ते हुए गिनती जब तेरह पर पहुंची तो गुरु नानकदेवजी के कानों में गिनती के स्वर पड़े--'तेर-इ तेरा... तेर-इ तेरा...' ! और उन्हें प्रकाश मिल गया, ज्ञान मिल गया, बोध की प्राप्ति हो गई कि यह सब तेरा ही तो है प्रभु! मैंने भी 13 विलिंगटन क्रिसेंट को प्रभु-चरणों में अर्पित कर दिया और निश्चिन्त हो गया. और देखिये, यहाँ रहते हुए जो थोड़ी-बहुत यश-प्रतिष्ठा मैंने पायी है, जो मान-सम्मान मुझे मिला है, यह इसी विश्वास का फल है. मैंने पभु की कृपा पाकर इस भवन में सुख से अपना समय व्यतीत किया है। मैं संतुष्ट हूँ।"

बच्चनजी की इस व्याख्या से न सिर्फ दिनेशजी, बल्कि हम सभी चकित-विस्मित और परितुष्ट हुए थे। पिताजी ने अपना दायाँ हाथ ऊपर उठाकर (भगवान् की ओर इंगित करते हुए) बच्चनजी से कहा था--"मैंने तो उसे अपना सेक्रेटरी बना लिया है। मेरे योग-क्षेम की सारी चिंता वही करता है, यह कम-से-कम तुम अच्छी तरह जानते हो।" बच्चनजी बोले--"हाँ, जानता हूँ, वह तुम्हारा निजी-सचिव है।" सबों की सम्मिलित हंसी ड्राइंग रूम में गूँज उठी थी। बात हंसी में बिखर तो गई थी, लेकिन पिताजी की यह दृढ़ आस्था आजीवन बनी रही।

मेरी श्रीमतीजी को सहज ही यह विश्वास नहीं हो रहा था कि वह बच्चनजी के घर में आ पहुंची हैं। वह थोड़ी घबराई-शरमाई-सी सिर झुकाए बैठी थीं। तभी तेजीजी अन्दर गयीं और प्लास्टिक का एक पैकेट लेकर लौटीं। उन्होंने उसे खोला और एक साड़ी निकालकर बच्चनजी को देने लगीं। बच्चनजी बोले--"इसे आप ही बहू के हाथों में दीजिये।" तेजीजी ने साधना के पास आकर वह तह की हुई साड़ी उनके हाथों में सौंप दी और स्नेह से साधना के सिर पर हाथ रखकर उन्हें आशीष दिया। थोड़ी गप-शप के बाद हम विदा लेने को उठे। साधनाजी  उठकर खड़ी ही हुई थीं कि शगुन की तह की हुई साड़ी के बीच से एक रुपये का सिक्का फर्श पर आ गिरा। उसकी खनक पर सबों का ध्यान गया। बच्चनजी ने थोड़े इलाहाबादी अंदाज़ में साधनाजी से कहा था--"बिटिया, अभी से रुपया पकड़ना सीख लो, पूरी गृहस्थी संभालने की यही कुंजी है। उनकी इस टिप्पणी पर सभी हंस पड़े थे और साधनाजी संकुचित हो उठी थीं।
[क्रमशः]

मंगलवार, 11 दिसम्बर 2012

यादों के आइने में कवि बच्चन...


[पांचवीं क़िस्त]

एक अवांतर कथा यहीं जोड़ देना चाहता हूँ। अपनी युवावस्था में पिताजी ने चाहे जितनी फ़िल्में देखी हों, मैंने बाल्यकाल से अपनी युवावस्था तक उनके साथ कोई फिल्म नहीं देखी। बाद के दिनों में पिताजी को फिल्मों से विराग हो गया था। जब मैं कौतूहल और जिज्ञासाओं से भरा चंचल बालक था, तब की याद है। पटना के गाँधी मैदान के पूर्वी छोर पर एलिफिंस्टन सिनेमा हॉल में 'सम्पूर्ण रामायण' नामक चलचित्र का प्रदर्शन हो रहा था। घर की महिलाओं की इच्छा हुई कि यह फिल्म देखी जाए। पिताजी के सम्मुख अनुरोध रखा गया। उन्होंने बात मान ली और हम सभी कार में लदकर 'सम्पूर्ण रामायण' देखने गए। जब सिनेमा हॉल में प्रवेश की बारी आयी, पिताजी मेरा हाथ पकड़कर पीछे हट गए। घर के सब लोग हॉल में प्रविष्ट हो गए और मैं पिताजी के साथ एलिफिंस्टन के बाहर विचलित होता हुआ बादाम खाता रहा और पिताजी कोई पुस्तक पढ़ते रहे।
जब मैं 19-20 साल का था, तब अमिताभ भैया की फिल्म 'आनंद' का प्रदर्शन हुआ था। मुंबई से बच्चनजी का पत्र आया था। उन्होंने इस फिल्म की प्रशंसा करते हुए पिताजी को लिखा था--"मेरा अनुरोध है कि  अमिताभजी की यह फिल्म तुम  अवश्य देखो, इसमें उन्होंने सराहनीय अभिनय किया है।" 43 वर्षों की दीर्घ जीवनावधि में मैंने पिताजी के साथ एकमात्र जो फिल्म देखी है, वह है--'आनंद'। यह चलचित्र देखकर पिताजी बहुत प्रसन्न हुए थे और उन्होंने बच्चनजी को लंबा पत्र लिखा था, जिसमें अमित भैया के लिए बहुत-बहुत आशीर्वाद था। पिताजी के गुज़र जाने के बाद यह फिल्म जब कभी मैंने दूरदर्शन पर या अन्यत्र देखी, पिताजी की परोक्ष उपस्थिति के सिहरन देनेवाले और भावोद्वेलित करनेवाले एक विचित्र अहसास से भरा रहा। ....

एक बार पिताजी दिल्ली-प्रवास से लौटे तो बच्चनजी की दी हुई दो पुस्तकें साथ ले आये--एक मेरे लिए, दूसरी बड़ी दीदी के लिए। अपने संग्रह से बच्चनजी ने ये पुस्तकें हमें भेंट-स्वरूप भेजी थीं। जहां तक स्मरण है, मेरे लिए जो पुस्तक उन्होंने दी थी, वह दक्षिण भारतीय प्रसिद्ध लेखक जी0 शंकर स्वरूप की रचना थी-- 'ओट्ट्कुशल ' और दीदी के लिए 'गणदेवता' की प्रति थी। दोनों पुस्तकों पर बच्चनजी ने अपना आशीर्वाद भी हमें लिख भेजा था। मुझे जो पुस्तक उन्होंने दी थी, उसकी विशेषता यह थी कि उसके हर पृष्ठ पर बच्चनजी ने छोटे हर्फों में अपनी टिपण्णी, मंतव्य, रिमार्क और रेखांकन कर रखा था--पूरी पुस्तक बच्चनजी के अक्षरों से रँगी हुई थी। यह परिश्रम इस बात का द्योतक भी था कि  उन्होंने पुस्तक कितने मनोयोग से पढ़ी है। यह बच्चनजी की विशेषता थी। जो पुस्तक उन्हें रुचिकर प्रतीत होती, वह उनकी टिप्पणियों, अधोरेखाओं और आलोचनाओं-समालोचनाओं से रँग  जाती थी।

सन 1974 में हमलोग भी सपरिवार दिल्ली जा बसे थे। 1978 में मेरा विवाह दिल्ली से हुआ। वधू-स्वागत-समारोह में दिल्ली के वरिष्ठतम साहित्यकार पधारे थे। लेकिन उनमें बच्चनजी नहीं थे। दरअसल, बच्चनजी उन दिनों अस्वस्थ थे और अपने नहीं आने की सूचना देते हुए उन्होंने पहले ही साधिकार लिखा था कि "विवाहोपरांत आनंद-साधना आकर स्वयं मुझसे आशीर्वाद ले जाएँ।"  तब तक अमिताभ भैया की कई फिल्मों का प्रदर्शन हो चुका था और उन्होंने पर्याप्त ख्याति अर्जित कर ली थी। बच्चनजी के घर की शक्ल-सूरत और विधि-व्यवस्था भी अब थोड़ी बदल गई थी।
[क्रमशः]