बुधवार, 16 जून 2021

आँख से न आँख लड़ जाये, इस कारण से....

 आँख से न आँख लड़ जाये...इस कारण से...


मालूम था, सप्ताह में दो-तीन दिन माली आता है बेटी शैली के घर और देखभाल करता है बागीचे की, लेकिन मैंने कभी देखा नहीं था उसे। बीस दिनों के प्रवास में वह आया न हो, ऐसा तो नहीं है, मगर वह जब भी आया, मैं घर के अंदर, गुसलखाने में, शेव करता हुआ, अखबार पढ़ता या टीवी देखता रहा। आमना-सामना कभी हुआ नहीं था उससे मेरा। आज सुबह मैं बिलकुल उसके सामने जा पड़ा। तब मैं बारामदे में बैठा पान बना रहा था। वह आया और मुझसे छह फीट की दूरी पर खड़ा हो गया। मुझे लगा, उसे कुछ कहना है मुझसे। मैंने आँख उठाकर देखा उसे, तो पाया कि वह मुझे ही एकटक देख रहा है। मेरी आँखें उससे जैसे ही मिलीं, वह मीठा मुस्कुराया। मैंने सोचा, मुस्कुरा लेने के बाद वह कुछ कहेगा, लेकिन वह चुप था और लगातार मुझे घूरने की हद तक देखता हुआ मुस्कुराता जा रहा था। यह मुझे कुछ अजीब-सा लगा। यह बात भी मन में उठी कि मानसिक रूप से वह स्वस्थ भी है या...


मुझे उम्मीद थी, वह नमस्ते कहेगा, 'गुड मार्निंग' बोलेगा, लेकिन वह तो मुस्कुराता हुआ 'मौनी बाबा' निकला। मन में आया कि कहूँ उससे, 'भले आदमी, जब कुछ कहना ही नहीं है तो जाओ, अपना काम करो।' लेकिन वह स्थायी भाव में था, अडिग था। अब क्या करूँ, कुछ समझ नहीं पाया। माली भाई तब ही सामने से हटे, जब मुझसे मेरी एक अदद विवश मुस्कान उन्होंने वसूल ली।...


आज ही लगे हाथ दूसरा-तीसरा हादसा भी हो गया। परसों की वापसी की यात्रा है मेरी। मैं, श्रीमतीजी और बेटी के साथ 'लुल्लू माॅल' चला गया। बचपन में महामूर्खतापूर्ण एक खेल खेला करता था--'लुल्लूपाला'। सिलाई के धागों में ढेला बाँधकर पेंच लड़ाना और प्रतिपक्षी के धागे को काटकर उसे परास्त कर सुख पाना। लगता है, उसी 'लुल्लू' नाम पर एशिया का बेस्ट माॅल उठ खड़ा हुआ है। क्या नहीं मिलता वहाँ! मैंने सोचा, कुछ मेवे-मसाले खरीद ले चलूँ, यहाँ बड़े अच्छे मिलते हैं। दोनों देवियाँ जानती हैं कि माॅल में बहुत हलकान होना मुझे प्रिय नहीं है और पान न मिलने से मेरे अस्तित्व का नेटवर्क भी 'वीक' हो जाता है, सो वांछित सामग्री खरीद लेने के बाद उन्होंने मुझे टरका दिया, कहा--'जाइये, कार में सामान सेट कीजिए और वहीं बैठकर पान खाइये, हम अभी आते हैं।'


मैंने उनकी बात मान ली, क्योंकि मेरा नेटवर्क भी कमजोर पड़ रहा था। पार्किंग में खड़ी कार में सामान रखकर मैं बैठ गया और पान बनाने लगा। तभी एक सम्भ्रांत व्यक्ति सामने से आते दिखे। पास आकर उन्होंने एक मीठी मुस्कान मेरी ओर फेंकी और जब तक जवाबी कार्रवाई में मैं अपनी चवनियाँ मुस्कुराहट उन्हें लौटा पाता, वह आगे बढ़ गये।


अभी पाँच मिनट ही बीते होंगे कि माॅल के गणवेश में चालीस के आसपास की एक महिला ट्राॅली समेटती दिखी। जिस ट्राॅली से मैंने सामान खाली किया था, उसे लेने वह कार के समीप आयी और पास पहुँचते ही उसने भी एक मीठी मुस्कान दी। एक बार तो भ्रम हुआ कि मुझमें कहीं कोई गड़बड़ी तो नहीं? लोग मुझे देख-देखकर मुस्कुरा क्यों रहे हैं आखिर? फिर मैंने तय पाया कि नहीं, गड़बड़ तो कहीं कुछ नहीं; अच्छा-खासा आधी बाहोंवाला श्वेत-स्वच्छ कुरता, वैसा ही धवल पायजामा, आँखों पर ऐनक और पाँवों में सैंडल--सब यथास्थान है, गड़बड़ क्या होगी भला? लेकिन इस दफ़ा मैंने देर नहीं की, लगे हाथ मैंने भी एक फीकी-सी मुस्कान लौटनियाँ उसे दे दी। विलंब करने में यह खतरा भी था कि कहीं वह भी मालीजी की तरह वहीं अँटक गयी और मुझे देखकर मुस्कुराती खड़ी रही, तो मेरा क्या होगा! लेकिन चिंतनीय कुछ नहीं हुआ और मेरी असहज मुस्कान लेकर वह चली गई। उसके चले जाने के बाद मन में खयाल आया कि काश, वह एक सम्भ्रांत विदुषी होती तो मैं भी, पान से पिटी और सड़ी हुई अपनी बत्तीसी बचाता हुआ, एक 'एक्सट्रा लार्ज' साइज की मुस्कान उसे दे ही देता।


मुझे फ़िक्र हुई, अपरिचित लोगों के इस तरह मुस्कान लुटाने के पीछे आखिर माजरा क्या है, यह मुझे बेटी से पूछना ही चाहिए। उसे यहाँ रहते हुए एक साल हो गया है, कुछ तो समझा ही होगा उसने, इस रहस्यमयी मुस्कान का राज़!


बेटी ड्राइव कर रही थी, मैं उसकी बगलवाली सीट पर था और उसकी माता पीछे। माॅल से लौटते हुए मैंने पूरी बात बेटी को बतायी। उसने कहा कि 'यह यहाँ का स्वाभाविक अभिवादन है। वैसे भी, मलियाली लोग वेशभूषा से भिन्न भाषा-भाषियों को चिह्नित कर लेते हैं, इसीसे वे एक स्माइल देकर ऐसे लोगों का स्वागत करते हैं।' बेटी की इस बात से मैं चकित हुआ।


दौड़ती कार मेें जब मैैं यही प्रसंग सुना रहा था और बात ट्राॅली समेटनेवाली महिला तक पहुँची थी, तभी श्रीमतीजी ने मेरी अतिभाषिणी जिह्वा थाम ली और कहा--'वह संभ्रांत विदुषी भी होती तो उससे आपको क्या फ़र्क पड़ता था?' पत्नी नामक प्रजाति में यही बड़ी ख़ामी होती है। वे मूलतः दोष-दर्शन और छिद्रान्वेषण की अधिकारिणी होती हैं। अगर मेरे मन में ऐसी कामना जगी भी थी, तो इसमें कोई दोष कहाँ था? बस, कामना-भर ही तो थी। मैैंने दबी जबान मेें कहा--'लेकिन, इसमें आपत्तिजनक क्या हैै?'


श्रीमतीजी ने जो कुुुछ कहा, वह रेेेखांकित करनेे योग्य हैै--'आपत्तिजनक तो कुुुुछ भी नहीं, बस आप यह नहीं समझ पा रहे कि यह आपका यूूूपी-बिहार नहीं, केेेेरल हैै, जहाँ शत-प्रतिशत साक्षरता है। सामान्य लोग भी अंंग्रेजी केे शब्द, वाक्य समझ लेेेेते हैैं, महिलाएँ स्कूटी चलाती हैं और पुरुष पिछली सीट पर बैठे होते हैं। यहाँ स्त्री-पुरुष का भेद ही मिट गया है। यदि पुरुष आपकी ओर देखकर मुस्कुरा सकता है और इसी रूप में आपका स्वागत-अभिनन्दन कर सकता है तो स्त्रियाँ भी ऐसा कर सकती हैं। आप अपना बिहारी चश्मा उतार कर देखेंगे, तभी यह फर्क भी समझ सकेंगे।'

श्रीमतीजी की बातों से मेरे ज्ञान-चक्षु हठात् खुल गये। मैंने अपनी स्मृति को कुरेदा तो मुझे याद आया कि तीन दिन पहले ही जब मैं अथिरापल्ली प्रपात से लौटते हुए पहाड़ की चढ़ाई चढ़ रहा था, तो सामने से आती हुई हर उम्र की कई महिलाओं और पुरुषों ने मुझे अपनी मधुर मुस्कान से नवाजा था और मैं संकुचित हो उठा था। और, मार्ग में, हम सबों ने एकसाथ ही तो देखा था, एक ग्रामीण युवती को, जो अपने छोटे-से बालक और संभवतः पतिदेव को स्कूटर पर पीछे बिठाकर आराम से चली जा रही थी।...

बेटी और श्रीमतीजी की बातों से अब समझ में आया, वह मुस्कान अकारण तो नहीं ही थी, असहज भी नहीं थी। मैं ही अपने अनुभवों और संस्कारों के शिकंजे में था और उससे मुक्त नहीं हो पा रहा था।


मैं तो खैर पकी उम्र का व्यक्ति हूँ, श्रीमतीजी की अहैतुकी कृपा से सँभल भी गया हूँ; लेकिन अपने समस्त मित्रों को सावधान करना अपना दायित्व समझता हूँ कि यहाँ आपको कोई देखकर मुस्कुराये तो आप भी भद्रतापूर्वक मुस्कुराकर उसके अभिवादन-अभिनन्दन का प्रत्युत्तर दें। भारत की इस पावन भूमि में यथासंभव नजरें झुका के चलें, कहीं ऐसा न हो कि किसी से आपकी आँख लड़ जाए और आपको कोई मुगालता हो या मुस्कुराने की विवशता से आप किसी द्विविधा में पड़े हिचकोले खाने लगें... ठीक मेरी तरह।...

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शुक्रवार, 26 मार्च 2021

चाँद ! मेरे पंजे में आ जा...

 चाँद ! मेरे पंजे में आ जा...


ऐ चाँद! मेरे पंजे में आ जा,

मेरी मुट्ठी में समा जा।

तू मुझ में अपना आलोक बसा जा!

ऐ चाँद! मेरे पंजे में आ जा!


यह आलोक जो तेरे प्रभा-मण्डल में 

इठला रहा है, मैं उसे समेटूँ

अपने आसपास बिखेरूँ

तेरा थोड़ा आलोक गुटक लूँ,

फिर चमकूँ मैं भी 

जैसे तू नभ में चमकता है,

अँधेरों की शक्ल पर

मक्खन लगता है, 

धूप-जली धरती पर चंदन का 

लेप चढ़ाता है।

ऐ चाँद! मेरे पंजे में आ जा!


मानवता का क्रंदन सुनकर 

मेरा मन होता आकुल है,

हरी-भरी वसुंधरा की जलन देख 

अंतर भी बेहद व्याकुल है।

पशु-पक्षी कातर-निरीह हैं 

मुझको ही तो रहे पुकार,

उनकी करुणा से

मेरे मन होता रहता हाहाकार,

उनको उपकृत करने का

तेरे मन में आता नहीं

क्या कोई विचार?


तू क्यों इतनी दूर खड़ा है 

जाने कब से अपनी ही ज़िद पर

हुआ अड़ा है

तू सबका है स्वजन श्रेष्ठ,

तेरा तो औदार्य बड़ा है।


तू दे दे अपना आलोक मुझे 

वह आलोक मैं सबको दूँगा--

तू दूर गगन में एकाकी चलता जाता है 

मैं धरती के जन-कोलाहल बीच खड़ा हूँ 

देकर सबको स्निग्ध किरण तेरी--

सबकी पीड़ा मैं हर लूँगा ।


हे आलोकपुंज! मेरे पंजे में आ जा,

मेरी मुट्ठी में समा जा।

मैं भी तुझ-सा चमकूँ-दमकूँ

तू मुझ में समा जा...!

ऐ चाँद! मेरे पंजे में आ जा...!!

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[पुनः -- चि. ऋतज के इस चित्र और इस मुद्रा को देख उपर्युक्त पंक्तियाँ बरबस उपजी हैं। इन पंक्तियों को सँवारने-तराशने की चेष्टा अभी नहीं की गयी है। ये यथारूप हैं, मासूम हैं, निर्दोष हैं। ये भाव-विचार भी ऋतज के ही हैं और स्थायी भाव में रहते हैं। वही कह रहे हैं अपने चंदा मामा से... मैं नहीं।

--आनन्द. गोवा-प्रवास/25-02-2021]

बुधवार, 29 मई 2019

जिजीविषा...

कल की ही तो बात थी--
हवा में झूमता-इठलाता खड़ा था,
मुसाफिरों को छाया देता था,
प्रार्थियों को फल--
आज निष्प्राण हूँ,
नदी के तट पर पड़ा हूँ,
अपार जल है, गीली मिट्टी है,
मेरी कुछ टहनियाँ जिनमें धँसी हैं,
यूँ प्राण-शेष हो गया हूँ
कि जल की एक बूँद भी
ग्रहण कर नहीं सकता,
लेकिन जिजीविषा का क्या ठिकाना
एक युग के बाद, न जाने कब
मेरी शिराएँ मदमत्त हो पीने लगें अमृत,
जड़ जमा लें वहीं
और मैं जाग जाऊं
अलस अंगड़ाइयाँ लेकर,
लूँ फिर करवटें
जिस धरा पर हूँ पड़ा,
वहीं से फूट आयें
कोपलें नयी, नए पात, हरी टहनियाँ--
बिल्कुल नयी, टटकी, सुकोमल... !
कौन जानता है,
सिरजनहार की मर्जी में क्या है...?

--आनन्द.

मंगलवार, 18 दिसंबर 2018

व्याधियों की व्याध-कथा...

व्याधियाँ होती हैं
व्याध-सरीखी,
वे दुबककर रहती हैं
किसी शिकारी की तरह
मौके की प्रतीक्षा में
और अवसर पाते ही
कर देती हैं आक्रमण
किसी कटाहे कुत्ते की तरह...!

व्याधियों का व्याधा
कभी बहुत क्रूर और निर्मम-सा
आता है यम का दूत बनकर
और कभी हरकारे की तरह
अपने शिकार को निरीह बनाकर,
शेष जीवन जीने की
सूचना देकर चला जाता है।

बड़ा निर्मोही है
व्याधियों का व्याधा,
उसे सजीव को निर्जीव बनाने की
कला आती है,
वह बूँद-बूँद प्राण-तत्व निचोड़कर,
शिकार को सप्राण छोड़कर,
अट्टहास करता,
दूर खड़ा हो मुस्कुराता है
जाने किस जन्म का हिसाब चुकाने में
उसे मज़ा आता है।

कल तक जो अर्थों को, अनर्थों को भी
रौंदते रहे, वे अचानक
मुमुर्षुवत् असहाय हो जाते हैं,
काल की प्रवंचना को
टुकुर-टुकुर देखते रह जाते हैं।
कुछ अति प्रबुद्ध स्नेही परिजन
व्याधि के कारणों का
गणित बिठाते हैं
आचरण, खान-पान, आहार-व्यसन
की जन्मकुण्डली बनाते हैं।
मुझे लगता है,
वे नाहक बुद्धि का व्यायाम करते हैं,
होता वही है जो नियति के कारक तत्व
तय करते हैं।

--आनन्द. /10-12-2018
सतना-प्रवास

शनिवार, 8 दिसंबर 2018

अपार श्रद्धा की पराकाष्ठा पर आजीवन अडिग रहे :
पं. रामनारायण मिश्र...(2)

सन् 1993-94 में दो मोर्चों पर मैंने भरपूर श्रम किया। यह तो ऐसा ही था, जैसे दो नदियों की तीव्र प्रतिकूल धारा में  एक साथ तैरना हो। युद्धकाण्ड के जितने पृष्ठ पिताजी मुझे सुबह के वक़्त देते, वरीयता क्रम में उसे ही मैं पहले कंपोज़ करता और रात्रिकाल में मिश्रजी की पुस्तक पर काम करता। जुलाई 94 तक दोनों पुस्तकों की कंपोज़िंग हो गयी और प्रूफ संशोधन किया जाने लगा। युद्धकाण्ड दो महीने में ही प्रेस भेजने योग्य हो गया, लेकिन मिश्रजी प्रूफ़-संशोधन में शिथिल पड़ गये। कुछ अस्वस्थ भी रहने लगे थे उन दिनों। बाद में स्थिति ऐसी हो गयी कि मैं ही प्रूफ़ पहुँचाने उनके मीठापुर (पटना) स्थित घर जाने लगा।

मैंने लक्ष्य किया कि प्रथम दर्शन से लेकर बाद-बाद की प्रत्येक मुलाक़ात में मिश्रजी मुझे चरण-स्पर्श का या पहले प्रणाम निवेदित करने का एक भी अवसर नहीं देते थे। मैं चरण-स्पर्श के लिए झुकता तो वह एक क़दम पीछे हट जाते और मेरे दोनों कंधे पकड़कर कहते--'चलऽ-चलऽ, आवऽ, बइठऽ'! (चलो-चलो, आओ, बैठो)। वह मेरे घर आते, तब भी और बाद में जब मैं उनके घर जाने लगा, तब भी; आचरण उनका एक समान था। अपने मीठापुर वाले मकान के पहले माले पर वह रहते थे। पहले तल पर पहुँचने के लिए संकीर्ण गलियारे में बनीं लम्बवत् सीढ़ियाँ थीं। मैं काॅल बेल बजाकर ऊपर पहुँचता तो देखता, मिश्रजी पहले से ही हाथ जोड़कर खड़े हैं। मैं सीढ़ी के शीर्ष पर पहुँचकर भी उनसे एक पायदान नीचे होता, वहीं से उनके चरण स्पर्श को जैसे ही झुकता, वह शीघ्रता से एक क़दम पीछे हट जाते और कहते--'आवऽ-आवऽ! अन्दर चलि आवऽ!' (आओ-आओ, अन्दर चले आओ।) उनके मुख से आशीर्वाद के दो शब्द भी कभी नहीं निकलते, मैं चकित होता, क्षुब्ध भी।

एक दिन तो उन्होंने हद कर दी। मैं उनके घर पहुँचा तो उनकी पत्नी ने द्वार खोला। मैंने उनके चरण छुए, उन्होंने कोई एतराज़ नहीं किया, आशीर्वाद देते हुए कहा--'खुसी रहऽ बबुआजी! ओन्ने जा, बलकोनियां में बठल बाड़े।' (खुश रहिये बबुआजी! उधर जाइये, बालकनी में बैठे हैं।)
मैं सीधे बालकनी में पहुँचा। देखा, मिश्रजी टेबल पर प्रूफ फैलाकर बैठे हैं। मैं शीघ्रता से उनके पास पहुँचा और चरणस्पर्श को उद्यत हुआ। मिश्रजी के पास पलायन की पर्याप्त सुविधा नहीं थी--उनकी कुर्सी के पीछे रेलिंग का अवरोध था और अगल-बगल खाली कुर्सियाँ। मैंने उनके पास पहुँचते ही उनके चरणों पर जैसे आक्रमण ही कर दिया। मिश्रजी घबराकर उठ खड़े हुए और लड़खड़ाए तथा बगलवाली खाली कुर्सी को परे धकेलते हुए दो कदम सरककर सुस्थिर हुए और बोले--'तूं तऽ डेराइए देलऽ हो। आवऽ, बइठऽ।' (तुमने तो डरा ही दिया। आओ, बैठो।)

इस बार भी मिश्रजी ने अपने चरण-कमल की मुझसे रक्षा कर ली थी, लेकिन उनके आशीर्वाद की आकांक्षा की मेरे मन में बहती हुई संयमित गंगा उस दिन कूल-किनारा तोड़ देने पर आमादा हो उठी। मैंने विनम्रता से ही कहा--'मैं तो आपसे बहुत छोटा हूँ, पुत्रवत् हूँ, आपके आशीर्वाद का आकांक्षी हूँ, अधिकारी भी हूँ। आप मुझे चरणस्पर्श क्यों नहीं करने देते? मुझे आशीष क्यों नहीं देते? मुझसे पहले ही हाथ जोड़कर क्यों खड़े हो जाते हैं?'
मेरी बात चुपचाप सुनने के बाद मिश्रजी ने अपनी कड़क आवाज़ में कहा--'एकदम बेकूफ़े हवऽ का जी? तोहरा के परनाम करऽ ता? हम तऽ ऊ वंश-परम्परा के परनाम करऽ तानी, जेकर तूं प्रतिनिधि बाड़ऽ। तोहरा सोझा हाथ जोरि के हम आपन परनाम तोहार बाबा लगे, शास्त्रीजी (पुण्यश्लोक पं. चन्द्रशेखर शास्त्री) के पासे भेजऽ तानी, काँहे कि उनुकरे नूं अंश बाड़ऽ तूं। बुझलऽ?' [एकदम बेवकूफ़ ही हो क्या जी? तुम्हें कौन प्रणाम करता है? मैं तो उस वंश-परम्परा को प्रणाम कर रहा हूँ, जिसके तुम प्रतिनिधि हो। तुम्हारे सामने हाथ जोड़कर मैं अपना प्रणाम (अपनी श्रद्धा) तुम्हारे पितामह, शास्त्रीजी के पूज्य चरणों में निवेदित कर रहा हूँ; क्योंकि तुम उनके अंश हो। समझे।]

मिश्रजी की बातें सुनकर मेरी बोलती बंद हो गयी। किस ऊँचे तल से उन्होंने यह बात कही थी! सुनकर मैं तो स्तब्ध रह गया। यह अपार श्रद्धा की पराकाष्ठा थी। उस दिन मिश्रजी के घर से लौटा तो मन विह्वल था और हृदय मिश्रजी के प्रति श्रद्धा से भरा हुआ था। घर पहुँचते ही यह बात पिताजी को विस्तार से बतायी। पूरा वृत्तांत सुनते हुए पिताजी मंद-मंद मुस्कुराते रहे, फिर बोले--'मैं मिश्रजी के मन की श्रद्धा को पहचानता था, तभी तो मैंने कहा था, मिश्रजी की याचना को ठुकराया नहीं जा सकता।'

दिसम्बर 1994 में युद्ध काण्ड की प्रतियाँ जिल्दसाज़ घर पहुँचा गये। साल-भर बाद पिताजी का निधन हुआ। समाचारपत्रों से पिताजी के निधन की सूचना पाकर सुबह-सबेरे पहुँचने वालों में मिश्रजी भी थे। उस दिन मैंने उन्हें फूट-फूटकर रोते देखा था।... जैसे उन्होंने अपना सगा ज्येष्ठ भ्राता खो दिया हो...!



उसके बाद परिस्थितियाँ विषम होती गयीं। जहाँ तक स्मरण है, मिश्रजी अपनी पुस्तक की पाँच प्रतियाँ लेकर संभवतः अपनी बेटी के पास दूसरे शहर चले गये और मुझसे दूरभाष पर कह गए कि लौटकर किताबों का पूरा गट्ठर जिल्दसाज़ के यहाँ से उठवा लेंगे। लेकिन, विधिवशात् ऐसा हो न सका। वह वहीं बीमार पड़े और कुछ समय बाद काल-कवलित हो गये। कुछ महीने बाद उनके सुपुत्र दूरदेश से पटना आये और अपने पूज्य पिता की अंतिम कृति का पूरा स्टाॅक उठा ले गये। इस पूरे कार्य-व्यापार में मैं उनका विनीत सहयोगी बना रहा और हम दोनों एक-दूसरे को पितृशोक-संवरण की सान्त्वना देते रहे।

अब तो लंबा अरसा गुज़र गया है। परमपूज्य पितामह को गुजरे 84 वर्ष हो गए, पिताजी को जीवन्मुक्त हुए 23 वर्ष। मैं भी अपनी ज़िन्दगी का लंबा रास्ता तय कर आया हूँ, उम्र की इस दहलीज़ तक आकर स्मृतियाँ भी गड्मड होने लगती हैं; लेकिन मिश्रजी का 25 साल पुराना उपर्युक्त कथन मेरी यादों में अमिट बना हुआ है। जानता हूँ, कभी धूमिल होगा भी नहीं।...
===
[पुनः -- मुझे खेद है कि मिश्रजी का कोई चित्र मेरे पास नहीं है और उनकी पुस्तक का नाम भी स्मृति से उतर गया है। उसकी एक प्रति मेरे संग्रह में अवश्य होगी, लेकिन उसे खोज निकालना अभी तो असंभव है। अगले उत्खनन में प्रति मिल गयी तो मित्र-पाठकों को अवश्य बताऊँगा, वादा रहा। --आ.]
--आनन्दवर्धन ओझा.

रविवार, 18 नवंबर 2018

अपार श्रद्धा की पराकाष्ठा पर आजीवन अडिग रहे : पं. रामनारायण मिश्र...




एक बुजुर्ग थे। विद्वान् थे। श्वेतकेशी थे। संस्कृतज्ञ थे। कड़क भी थे, भोजपुरीभाषी भी; लेकिन पचहत्तर पार की उम्र में भी शरीर से सक्षम थे। एक दिन पद-यात्रा करते मेरे घर 'मुक्त कुटीर' (कंकड़बाग, पटना) आ पहुँचे। उनका नाम था-- पण्डित रामनारायण मिश्र। मुझसे ही पूछकर सीधे पिताजी के कक्ष में चले गये और प्रियवार्ता में निमग्न हो गये। डेढ़ घण्टे बाद पिताजी ने आवाज़ लगाई तो मैं हाज़िर हुआ। पिताजी ने कहा--'ये रामनारायण मिश्रजी हैं। अपनी किशोरावस्था में तुम्हारे पितामह के छात्र रहे हैं। प्रणाम करो।' मैं प्रणाम करने आगे बढ़ा तो मिश्रजी कुर्सी से उठ खड़े हुए और यह कहते हुए प्रणाम करने से मुझे रोक दिया कि ' हँ-हँ, दुअरा पऽ परनाम-पाती तऽ होइए गइल रहे।' (हँ-अहँ, द्वार पर प्रणाम-नमस्कार हो ही गया है)।

जबकि उनके चरण-स्पर्श का पिताजी का आदेश यथोचित ही था। द्वार खोलते ही एक अपरिचित, सुदर्शन वयोवृद्ध को देख मेरी ग्रीवा सहज ही आन्दोलित होकर थोड़ी-सी नत हुई थी, लेकिन उसमें अपरिचय-बोध का सम्भ्रम, एक वयोवृद्ध के प्रति सहज सम्मान, प्रणति-भाव से प्रबल था। परिचय के बाद चरण-स्पर्श कर आशीर्वाद पाने के लाभ से मिश्रजी ने मुझे उस दिन क्यों वंचित कर दिया था, यह मैं समझ न सका।

आपसी विमर्श में ज्ञात हुआ कि मिश्रजी संस्कृत उद्धरणों सहित हिन्दी में स्वलिखित एक पुस्तक की फोटोकाॅपी बँधवाकर साथ लाये हैं और चाहते हैं कि पिताजी उसे एक नज़र देख लें, फिर मैं उसे शुद्ध-शुद्ध अपने कम्प्यूटर पर कंपोज़ कर दूँ। पुस्तक वृहत् तो नहीं थी, लेकिन समय और श्रम की माँग तो करती ही थी। भगवद्गीता और उपनिषदीय ऋचाओं के सम्यक् अनुशीलन का ग्रंथ था, कठिन तो था ही। मिश्रजी को विश्वास ही नहीं था कि पटना के बड़े-से-बड़े संस्थान में भी उनकी पुस्तक शुद्ध रूप में टंकित हो सकेगी। उन्हें पिताजी की लेखनी के संस्पर्श का भी लोभ था।
समस्या यह थी कि उन दिनों पिताजी के साथ मिलकर मैं पितामह द्वारा अनूदित श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के पुनर्प्रकाशन में जुटा हुआ था। अंतिम दो खण्ड, युद्घ और उत्तर काण्ड, प्रकाशन की प्रतीक्षा में थे, जिसमें युद्घकाण्ड सबसे बड़ा था और उसका काम भी आधे रास्ते ही पहुँचा था। पिताजी उसी काम में प्राणपण से जुटे हुए थे और मैं उसकी कंपोज़िंग में। हमारे पास अवकाश बिल्कुल नहीं था। लेकिन मिश्रजी का संपर्क-संबंध पुराना था। अपनी किशोरावस्था में वह मेरे पितामह के पास संस्कृत-ज्ञान की पिपासा लेकर इलाहाबाद पहुँचे थे और पितामह की असीम अनुकम्पा से कृतकृत्य हुए थे। लिहाज़ा, पिताजी उनका अनुरोध ठुकरा न सके। सो, मिश्रजी की पाण्डुलिपि भी हमारे जिम्मे आ पड़ी।...

मिश्रजी के विदा होने के बाद मैंने पिताजी से शिकायती लहज़े में कहा--'बाबूजी! आपने मिश्रजी की पुस्तक की जिम्मेदारी नाहक उठा ली। अब संस्कृत-हिन्दी की दो-दो पुस्तकों का काम कैसे पूरा होगा?'
पिताजी ने शांत स्वर में कहा--'मिश्रजी को मैं अपने नकार का शिकार नहीं बना सकता था। उनसे निकट के, आत्मीय और पुराने संबंध हैं। हाँ, अपनी वर्तमान दशा और परिस्थितियों का हवाला देते हुए मैंने उनसे इतना अवश्य कह दिया है कि काम पूरा होने में वक़्त लगेगा और प्रूफ़-संशोधन आपका दायित्व होगा। मिश्रजी ने इसे स्वीकार भी किया है।'

यह वाक़या वर्ष 1993 मध्य का है। सन् 93 के शेष पाँच-छः महीनों में हमने लग-भिड़कर युद्धकाण्ड का काम पूरा किया। युद्धकाण्ड जिस दिन मुद्रण के लिए प्रेस में भेजा गया, उसी दिन शाम में पिताजी ने मुझे बुलाकर मिश्रजी के ग्रंथ की पाण्डुलिपि सौंप दी। उन्होंने पुस्तक में आवश्यक संशोधन कर दिया था। यह देखकर मुझे आश्चर्य हुआ। मैंने सस्मित कहा--'आपने इसमें सारे करेक्शन कब कर दिये बाबूजी? देर रात तक आपके कमरे में टेबल लैंप की रौशनी देखकर मैं तो यही समझता रहा कि आप युद्धकाण्ड की भाषा का परिष्कार कर रहे हैं।'
पिताजी मुस्कुराये और बोले--'करने से कौन-सा काम है, जो पूरा नहीं होता? रामायण के काम में पहले चौदह घण्टे लगाता था, काम की उसी अवधि को बढ़ाकर मैंने सोलह-सत्रह घण्टे कर दिया और देख लो, काम की इसी भीड़ में मिश्रजी की पुस्तक भी परिशुद्ध हो गयी।'
पिताजी की संकल्प-शक्ति और उनके जीवट को मैंने मन-ही-मन प्रणाम किया और मुस्कुराता हुआ कमरे से बाहर निकल आया।..
( क्रमशः)

रविवार, 11 नवंबर 2018

शब्द-निःशब्द

जब तुम प्रयासपूर्वक निचोड़ते हो
शब्दों से अतिरिक्त अर्थ,
शब्दों को अच्छा नहीं लगता,
वे मुँह फुलाकर बैठ जाते हैं
और करीब बैठे शब्द से
बस, इतना ही कह पाते हैं--
'दोस्त ! बहुत दोहन हो रहा है मेरा!'

बगलगीर शब्द सांत्वना देते हुए
कहता है--
'फ़िक्र मत करो,
बहुत चबाकर उगले हुए शब्दों को
निचोड़ने से कुछ हासिल नहीं होता,
तुम्हारा निहितार्थ, तुममें ही रहता है--
चुपचाप...!
निचोड़नेवाले की उँगलियों में ही
दर्द होता है--बेपनाह...!!

(--आनन्द, 13/06/2018.
)