शुक्रवार, 24 मार्च 2017

'बिजली' और 'आरती' का वो गुज़रा हुआ ज़माना...

[पूर्वपीठिका]
सन् 1936 में पूज्य पिताजी (पं. प्रफुल्लचन्द्र ओझा 'मुक्त') 26 वर्ष के युवा थे। सन् 1934 में, इलाहाबाद में, पितामह के देहावसान के एक साल बाद पिताजी पटना आ गये थे। विद्यालय-महाविद्यालय की कोई डिग्री तो उनके पास थी नहीं, लेकिन कुछ कर गुज़रने का अदम्य उत्साह था उनके मन में। अपने पितृश्री की कृपा-छाया में और जीवन की पाठशाला में उन्होंने जो कुछ अर्जित किया था, विद्वज्जनों के आत्मीय सान्निध्य से जो प्रसाद पाया था, वह स्वाध्याय की आँच में पककर उबल रहा था और ज्ञान-पात्र के किनारों से तड़पकर बाहर आने को अधीर था। कथा-कविता के विशाल फलक पर तब तक 'मुक्त' नाम अंकित हो चुका था। इलाहाबाद के दिनों का अर्जित संपादन-अनुभव ही उनकी पूँजी था।
सन् 35 में जब वह पटना आये, उस समय तक साहित्यिक गतिविधियों के मामलों में बिहार मरुभूमि-समान था। पूर्ववर्ती काल में कलकत्ता ही हिन्दी की साहित्यिक गतिविधियों का केन्द्र बना हुआ था, जहाँ महादेव सेठ के 'मतवाला-मण्डल' में निरालाजी, नवजादिकलाल श्रीवास्तवजी और शिवपूजन सहायजी की तिकड़ी जमी हुई थी। जब यह तिकड़ी टूटी, तब 'मतवाला' के मंच पर पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र'जी अवतरित हुए, लेकिन सेठजी के अवसान के साथ ही 'मतवाला' का तिलस्म भी टूट गया और हिन्दी की गतिविधियों के तीन केन्द्रीय ध्रुव बन गये--इलाहाबाद, वाराणसी और लखनऊ। उन दिनों की याद करते हुए पिताजी ने निरालाजी के अपने संस्मरण "जुही की कली' के कवि : निराला" में लिखा है :
"...फिर बहुत समय बीत गया। हिन्दी के लिए कलकत्ता का वह महत्व न रहा, जो पहले था। उसकी जगह इलाहाबाद, काशी और लखनऊ ने ले ली। शिवपूजनजी काशी जा बसे। नवजादिकलालजी इलाहाबाद आ गये। निरालाजी प्रायः अपने गाँव में रहते, कभी-कभी लखनऊ आ जाया करते थे। उग्रजी अपनी जन्मभूमि में लौट आये थे, लेकिन वहाँ ज्यादा दिन टिके नहीं, बंबई चले गये। 'मतवाला' बंद हो गया और कुछ समय बाद सेठजी ने भी इह-लीला संवरण की।'
"मैं उन दिनों इलाहाबाद में ही था। इलाहबाद, वाराणसी और लखनऊ में हिंदी की गतिविधियाँ तीव्र हो गयी थीं। कलकत्ता की चमक-दमक अब इन त्रिपुरियों ने ले ली थी। बनारस में प्रसादजी और प्रेमचंदजी थे, इलाहबाद में पंतजी और महादेवीजी, लखनऊ का अखाड़ा निरालाजी ने संभाल रखा था। अब निरालाजी से मिलना-जुलना अधिक हो गया।...'
"काल-चक्र घूमता रहा। सन १९३४ में पिताजी का देहावसान हुआ। उसके एक साल बाद, पच्चीस वर्षों से सेवित प्रयाग छोड़कर मैं पटना आ बसा। लम्बे अंतराल के बीच यदाकदा निरालाजी के दर्शन तभी हुए, जब वह पटना या मुजफ्फरपुर के किसी साहित्यिक समारोह में पधारे। उस ज़माने में इलाहाबाद साहित्यिक और राजनैतिक गतिविधियों का केंद्र था--पटना में साहित्यिक गतिविधि नाम की कोई चीज़ नहीं थी। इलाहबाद छूटा तो साहित्यिकों के संपर्क से भी मैं वंचित हो गया।..."
बिहार की राजधानी पटना से भी कोई स्तरीय साहित्यिक पत्रिका निकले, इस प्रदेश में भी थोड़ी साहित्यिक हलचल हो और हिन्दी की एक मशाल तो जले; इसी अभिप्राय से पिताजी ने सन् 36 में पटना से 'बिजली' नामक साप्ताहिक पत्रिका का संपादन किया। वह पत्रिका शीघ्र ही चर्चित-समादृत हुई। पिताजी ने 'बजली' के माध्यम से बिहार के सहित्याकाश में ऐसी चपला चमकायी कि उसकी चकाचौंध से प्रभावित होकर उदीयमान लेखकों-कवियों की एक बड़ी जमात उनके साथ आ खड़ी हुई। पिताजी ने दो-ढाई वर्षों तक घोर परिश्रम किया और आर्थिक तंगी से जूझते हुए पत्रिका के प्रकाशन का दायित्व उठाते रहे।

पिछले दिनों मैं पटना गया तो पटनासिटी के बिहार हितैषी पुस्तकालय में मैंने 1936-37 की 'बिजली' की ज़िल्द देखी। आप कल्पना ही कर सकते हैं कि समय के इतने लंबे अंतराल के बाद 'बिजली' के अंकों का दर्शन करके मेरी मनोदशा क्या रही होगी! 1936 अर्थात् वह काल, जब मैं दुनिया से नदारद था। मेरे पास समय कम था और मेरी तलाश/ अनुसन्धान का लक्ष्य कुछ और...; फिर भी 'बिजली' से कुछ क्लिपिंग ले आया हूँ। आगामी कुछ किस्तों में उसी की चर्चा होती रहेगी, उसके अनंतर मासिक 'आरती' की भी।... और मुझे आशा है, उससे जुड़े रहना आपको प्रीतिकर लगेगा।...
(क्रमशः)
(चित्र : 'बिजली' का मुखपृष्ठ)

शुक्रवार, 17 मार्च 2017

नेत्र-दर्शन...

अधिक नहीं, महज़ चार वर्ष पुरानी बात है। पुणे के एक दैनिक पत्र 'लोकमत समाचार' में डाॅ.राजेंद्र प्रसाद पर मेरा एक छोटा-सा संस्मरण 28 फरवरी, 2013 को छपा था--'ताहि बिधि मस्त रहिये'। यह पत्र अपने नियम-विधान से ही लेखक का चित्र, परिचय, संपर्क-सूत्र, मोबाइल नंबर, मेल-एड्रेस आदि प्रकाशित करता था। मेरे इस आलेख में भी चित्र के सिवा मुझसे संबंधित सारी सूचनाएँ छपी थीं। छोटा-सा लेख चर्चित हुआ था और स्थानीय पाठकों के कई फोन कॉल्स मेरे पास आये थे। स्वभावतः मुझे प्रसन्नता हुई थी।
लेकिन, उनमें एक बंधु ऐसे भी थे, जिन्होंने मुझे कई बार फोन किया, बातें कीं। वह मुझसे मिलने को आतुर थे और संकुचित भी। लेख के प्रकाशन के तीन दिन बाद रविवार को वह तब आये, जब मैंने ही जोर देकर उनसे कहा कि 'मिलना हो आ जाइये, संकोच की क्या बात है बंधु?' वह मेरे तत्कालीन निवास से बहुत दूर भी नहीं थे। पुणे के बाम्बे सैपर्स के विशालकाय फौजी कैम्पस में थे, जो मेरे बेटी-दामाद के सरकारी बंगले से महज तीन-एक किलोमीटर की दूरी पर था। जब वह आये तो बँगला ढूंढ़ने में उन्हें दिशा-भ्रम हो रहा था, उन्होंने मुझे फ़ोन किया, मैं बँगले के गेट पर जा खड़ा हुआ और उन्हें दिशा-निर्देश देता रहा। वह जब प्रकट हुए तो उन्हें देखकर मुझे हैरत हुई। २२-२४ वर्ष के युवा थे--श्यामवर्णी! फ़ौज में भर्ती हुए नए रंगरूट की दुर्वह दशा में थे--कटोरा-कट कटे केश, भीषण परिश्रम से क्लान्त शक्ल-सूरत, पीठ लदा हुआ हैण्ड-बैग और जीन्स-पैंट-शर्ट धारण किये हुए। मेरे पास पहुँचते ही उन्होंने पूछा--'आप ओझाजी न ?' स्वीकृति में मेरा सिर हिलते ही वह उत्फुल्ल हुए और बड़ी श्रद्धा से झुककर उन्होंने मेरे पाँव छुए। मैंने उन्हें कंधे से पकड़ उठाया और अपने साथ बँगले में ले गया। उन्होंने अपना नाम 'उमेश बालाजी' बताया और कॉरिडोर में पड़ी आराम कुर्सियों पर जमकर बैठ गए।
बातों का सिलसिला शुरू हुआ। उनकी बोली-बानी से मुझे लगा था कि वह बिहार के ही रत्न हैं । मेरा अनुमान ठीक निकला, वह बिहार के भागलपुर जिले के किसी गाँव के रहने वाले ही निकले। इन दिनों फौजी ट्रेनिंग के लिए पुणे में थे और अत्यंत अनुशासनात्मक कठोर श्रम झेल रहे थे। तीन दिन पहले उन्होंने मेरा उपर्युक्त लेख पढ़ा था और तभी से मुझसे मिलने को व्यग्र-विकल थे।
उन्होंने मुझसे कहा कि बाबू राजेंद्र प्रसादजी को वह भारतीय राजनीति का सर्वाधिक श्रेष्ठ और निःस्वार्थ राजनेता मानते हैं और भक्ति की हद तक उन्हें पूजते हैं। उन जैसा देश-प्रेमी, सत्य-निष्ठ, सरल-निश्छल और पूर्णतः समर्पित व्यक्ति देश की राजनीति में कोई दूसरा हुआ ही नहीं। उनके संभाषण में बिहारी अंदाज तो था ही उच्चारण की अशुद्धियाँ भी बहुत थीं, लेकिन बातें वह कमाल की कर रहे थे। स्पष्ट था कि वह ग्रहणशील युवक थे और सार-तत्व को पकड़ने की छटपटाहट उनमें बहुत थी। मेरी बड़ी बेटी ने उमेशजी को नाश्ता करया और चाय पिलायी। जब वह आये थे, बहुत संकुचित थे, बँधे बैठे थे, लेकिन धीरे-धीरे उनका संकोच जाता रहा। वह मुखर हो उठे। उन्होंने बताया कि वह 'इण्डियन आइडल' की सांगीतिक प्रतियोगिता के प्रतिभागी भी बने थे, लेकिन सोलह प्रतिभागियों की चयनित सूची में प्रवेश पाने से वंचित रह गये थे। यह जानकर कि उमेश बालाजी आइडल-प्रतिभागी रहे हैं, पूरा घर उनके पास आ जुटा। सभी उनसे गाने का अनुरोध करने लगे। पहले तो वह बचने की राह ढूँढ़ते रहे, लेकिन जब एक बार शुरू हुए तो कई गीत सुना गए--फ़िल्मी भी और लोकगीत भी। सुर में थे, खुलकर गाते थे, पर शब्दों के उच्चारण में बड़ी गलतियाँ उनसे हो रही थीं, जो हमारे शुद्ध उच्चारण सुनने के अभ्यासी कान पर हथौड़े-सी बज रही थीं। मैंने उन्हें सचेत किया तो बोले--'यहीं तो मार खा गया बाबाजी!'
जाने क्यों, शुरू से ही वह मुझे 'बाबाजी' कहकर संबोधित कर रहे थे, जबकि मुझे ऐसा नहीं लगता था कि मैं इतना आयु-सम्पन्न हो गया हूँ कि मुझे 'बाबाजी' कहा जाए। लेकिन मैंने कोई आपत्ति दर्ज़ नहीं की और उनके लिए 'बाबाजी' बना रहा। उनकी प्रीति और मेरे प्रति उनकी श्रद्धा आत्यंतिक होने की सारी हदें लाँघ जाने को उन्मत्त थी। मैंने यह भी लक्ष्य किया कि ढाई-तीन घण्टों की बैठक में वह लगातार मेरी आँखों में आँखें गड़ाये मुझे घूरते रहे थे। प्रश्न किसी ने किया हो, उत्तर वह किसी और को दे रहे हों या संगीत सुना रहे हों अथवा अपनी कोई बात बता रहे हों या मेरी सुन रहे हों; देख वह मुझे ही रहे थे और निरंतर देख रहे थे--अपलक ! उनका यह दृष्टि-संयोग मुझे असहज भी लगा था, लेकिन इसके लिए उन्हें टोकना भद्रता नहीं थी। उस दिन जब तक वह मेरे सान्निध्य में रहे, मैं उनका तीक्ष्ण और विकल कर देनेवाला दृष्टि-प्रहार मौन रहकर सहता रहा।
तीन घण्टे बाद जब वह जाने को उठे तो जैसे उन्हें ख़याल आया हो, उन्होंने चौंकते हुए कहा--'अरे, मैं तो यह सब भी अपने साथ ही लिए चला जाता न?' और, इतना कहकर उन्होंने अपने हैण्ड बैग से मिठाई के दो डिब्बे, च्यवनप्राश और हॉर्लिक्स की दो शीशियाँ और बिस्कुट-नमकीन के कई पैकेट निकाले और विनम्रता से कहा--'बाबाजी, यह सब आपके लिए लाया हूँ।'
मैंने कहा--आपने नाहक तकलीफ़ की, इसकी क्या ज़रूरत थी?'
वह सरल-निश्छल युवक थे, बोले--'हमारी कैंटीन में यह सब थोड़ी कम कीमत में मिलता है न! और आपके स्वास्थ्य के लिए यह आवश्यक भी है बाबाजी! इसका रोज़ सेवन कीजियेगा और स्वस्थ रहकर खूब लिखा कीजियेगा। मैं तो अब प्रतिदिन 'लोकमत समाचार' देख लिया करूँगा और जिसमें आपकी रचना होगी, उसे खरीद भी लूँगा।'
उनकी श्रद्धा अप्रतिम थी और मैं उसके सामने निरुपाय था। जब उन्हें छोड़ने बंगले के गेट तक गया तो वहाँ रुककर उन्होंने मेरे पाँव पुनः छुए और आँखों में आँखें गड़ाकर बोले--" मैं फिर आऊँगा बाबाजी! आज आपलोगों से मिलकर मुझे बहुत अच्छा लगा--बिलकुल घर-जैसा! मुझे भूल मत जाइयेगा, अपना आशीर्वाद बनाये रखियेगा जरूर।"
मैंने कहा--"हाँ-हाँ उमेशजी, आप अवश्य आइयेगा, हम फिर मिलेंगे और मेरा आशीष तो हमेशा आपके साथ है ही !"
वह लौट जाने को चल पड़े और मैं बंगले में वापस जाने को मुड़ा। अभी दो कदम ही बढ़ा था की उमेश बालाजी की पुकार सुनकर पलटा। वह क्षिप्रता से मेरे पास आये और विकलता से बोले--"आपसे अभी बहुत-सी बातें करनी हैं, बहुत कुछ सीखना है आपसे बाबाजी! आज तो मैं सिर्फ उन आँखों को देखने के लिये आया था, जिन आँखों ने राजेन्द्र बाबू को देखा था।"
इतना कहकर वह पलटे और तेजी से चले गए। मैं वहीं ठिठका रहा और उन्हें जाता हुआ तब तक देखता रहा, जबतक वह मुख्य सड़क पर मुड़कर मेरी दृष्टि से ओझल नहीं हो गए।...


बाद के कई दिनों तक मैं उमेश बालाजी जैसे प्रेमी बालक के विषय में बस, सोचता ही रहा और उनकी कही यह बात तो मैं आज तक नहीं भूला कि 'मैं उन आँखों को देखने आया था, जिन आँखों ने...!' मेरे नेत्र-दर्शन से उन्हें क्या मिला, यह तो मैं नहीं जानता, लेकिन उनका यह कथन जब कभी याद आ जाता है, मैं विस्मित होकर सोचता रह जाता हूँ कि ऐसा अनूठा ख़याल उमेशजी के मन में उपजा भी तो कैसे? आज के युग में उमेश बालाजी-जैसे भाव-प्रवण और संवेदनशील युवा कितने होंगे?...
इस मुलाक़ात के बाद उमेशजी डेढ़ वर्ष पूना में रहे। उनसे संपर्क बना रहा। वह फ़ोन पर लंबी-लंबी बातें करते रहे। उनके हृदय की प्रीति-तरंगें कुछ ऐसी उन्मत्त हुईं कि वह मुझे किसी देवोपम आसन पर बिठाने को मचल पड़े, जिसकी योग्यता-पात्रता मुझमें थी ही नहीं। मुझे उन्हें वर्जना देनी पड़ी, लेकिन उनकी सज्जनता, विनम्रता और अनूठी प्रीति ने मुझे बाँधे रखा। हम कई बार मिले, हमने बातें कीं और निकट से निकटतर होते गए। हमने पटना से पूना तक की रेल-यात्रा भी अलग-अलग बाॅगियों में साथ-साथ की। अलग-अलग और साथ-साथ यूँ, कि वह अपनी बाॅगी मय-सरो-सामाँ छोड़कर अधिकांशतः मेरे पास ही बने रहे--अपने अनन्य प्रेम के वशीभूत! और, पुणे पहुँचकर जब वह विलग होने लगे तो उन्होंने प्लास्टिक का एक बड़ा-सा डिब्बा मेरी श्रीमतीजी को बलात् सौंप दिया, जिसमें, घर में माँ का बनाया हुआ, आम का अँचार था और जिसे वह अपने लिए घर से ले आये थे। यह उनकी अनूठी प्रीति का अवश कर देनेवाला हठ था।
डेढ़ वर्ष बाद अचानक वह अलभ्य हो गए और उसके भी साल-भर बाद अजमेर से उनका फोन आया, वहीं उनकी पदस्थापना हुई थी। गाँव में माता का निधन हो चुका था और वह बहुत मर्माहत थे। मैंने उन्हें ढाढ़स बँधाया। वक़्त का एक लंबा टुकड़ा फिर आँधी-सा गुज़र गया।...
पिछले वर्ष उनका एक फ़ोन मुझे फिर मिला था, जिससे ज्ञात हुआ था कि अब वह जम्मू-कश्मीर में हैं--हमारी सीमाओं की रक्षा में सन्नद्ध! जिस नंबर से उनका फ़ोन आया था, उसे मैंने सुरक्षित कर लिया था।
अभी दस-पंद्रह दिन पहले मेरे माँगने पर किसी नए नंबर से एक चित्र मेरे पास आया। सैन्य-गणवेश में वह चित्र किसी अपरिचित व्यक्ति का-सा लगा। मैंने अज्ञात नंबर से पूछा--'क्या आप उमेश बलाजी हैं और क्या यह चित्र तथा नंबर आपका ही है? यदि हाँ, तब तो आप बहुत बदल गए हैं बंधु! पहचान में नहीं आते।' लगे हाथ उनका संवाद मिला--"बाबा, आपने ठीक पहचाना, पर मैं आज भी पहले की तरह हूँ, बिलकुल नहीं बदला।"
सच में वह बिलकुल नहीं बदले, देश की सेवा के गौरव ने उन्हें जो संतोष दिया है, वही उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व पर परिव्याप्त हो आया है।
आज भी जब कभी उमेश बालाजी की याद आती है, उनकी कही बात मेरे मन में कौंध जाती है और मैं विचार-मग्न हो जाता हूँ। दरअसल, मेरे उस छोटे-से आलेख में ऐसा कुछ था भी नहीं, सिवा राजेन्द्र बाबू के एकमात्र दर्शन की चर्चा और एक गम्भीर दार्शनिक सन्देश के उल्लेख के। बात तो उमेश बालाजी के मन पर उस आलेख के अप्रत्याशित प्रभाव की है, उस उत्कंठा-विकलता की है जो मेरे 'नेत्र-दर्शन' से जाने क्या अलभ्य पा लेना चाहती थी। उनकी भाव-प्रवणता, ग्रहणशीलता मुझे आज भी चकित-विस्मित करती है, लगता है, आजीवन करती रहेगी।...
आज देशपूज्य डॉ. राजेंद्र प्रसाद की ५४वीं पुण्य-तिथि है, उनकी पावन स्मृतियों को मेरा नमन है!
[चित्र : 1) सैन्य गणवेश में श्रीउमेश बालाजी का सद्यःखचित चित्र। 2) लोकमत समाचार : 28 फरवरी, 2013 की कतरन.]

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

और वह शांत हो गये...

बहुत पहले जयपुर गया था। जाता रहता था वहाँ । तब जयपुर में बड़ी दीदी का निवास था। उनके पड़ोसियों से भी आत्मीय संबंध हो गये थे। दीदी के घर के ठीक सामनेवाले घर में एक बुजुर्ग थे। जयपुर जब जाता, वह बड़े स्नेह से मिलते। खूब बातें करते।

दरअसल हुआ यह था कि किसी एक यात्रा में राजस्थान-भ्रमण पर लिखी अपनी एक कविता मैंने दीदी को सुनायी थी और उसकी प्रतिलिपि वहीं छोड़ आया था। बाद में दीदी ने वह कविता 'राजस्थान पत्रिका' को भेज दी। जब वह कविता पत्रिका में छप गयी तो दीदी आस-पड़ोस में सोल्लास सबको बता आयीं कि यह मेरे भाई की कविता है। तभी से उन बुजुर्ग का मुझ पर अतिरिक्त स्नेह हो आया था, वह मुझे पकड़ बिठाते और पूछते, 'इन दिनों नया क्या लिखा है? कुछ सुनाइये।' मैं भी उल्लसित होता और उन्हें अपनी नयी रचनाएँ सुनाता। उनके परिवार के लोग भी मुझे जान-पहचान गये थे। उन्हें मालूम था कि जब मैं आ गया हूँ तो दादाजी के पास लंबा बैठूँगा। जयपुर में मेरी अनुपस्थिति दीर्घकालिक हो जाती तो दीदी से पूछते रहते, 'कब आयेंगे आनन्दजी?'

मैं जान गया था, उनकी मुझमें आन्तरिक प्रीति है। साहित्य में उनकी रुचि थी, यह तो स्पष्ट ही था। लेकिन कई वर्ष बाद, इस बार की यात्रा में, वह बुजुर्ग कहीं दिखे नहीं--न बारामदे में बैठकर अखबार पढ़ते हुए, न अहाते के पौधों को जल से सींचते हुए। मुझे हैरत हुई। लेकिन कई वर्षों बाद दीदी के पास आया था, बहुत-सी बातें एकत्रित हो गयी थीं करने की और मेरी दोनों भांजियाँ इतनी स्नेही थीं कि मुझे छोड़ती ही नहीं थीं। लिहाजा, दादाजी की बावत कोई बात नहीं हुई।

प्रवास के दो दिन बीत गये। तीसरे दिन, सुबह के वक्त उन्हीं बुजुर्ग के घर से एक युवक दीदी के पास किसी काम से आये। उन्होंने मुझे और मैंने उन्हें पहचान लिया। उन्होंने जैसे ही 'नमस्ते अंकल' कहा, मैंने पूछा--'भाई! दादाजी कहाँ है, जबसे आया हूँ, दिखे नहीं।'
उन्होंने थोड़ी उदासी से कहा--'वह शांत हो गये अंकल!'
मैं कुछ समझा नहीं। यह मेरे लिए एक नव्य प्रयोग था। मैंने तत्काल पूछा--'क्यों? पक्षाघात वगैरह कुछ हुआ क्या? वह शांत क्यों हो गये?'
मेरे प्रश्न पर उन्हें आश्चर्य हुआ, बोले--'नहीं-नहीं, मेरा मतलब है, वह पूरे हो गए।'
मैं कुछ बोला तो नहीं, लेकिन मन में ये ख़याल आया कि वह अधूरे कहाँ थे कि पूरे हो गये? लेकिन 'पूरे हो गये' शब्दों के प्रयोग से इस आशंका ने सिर उन्नत किया था कि कहीं उन्हें कुछ हो तो नहीं गया? तभी दीदी आयीं, उन्होंने बालक से आने का कारण पूछा और मैंने उनसे दादाजी के बारे में जिज्ञासा की। दीदी ने कहा--'अब तो कई महीने हो गये उनको गुजरे।' दीदी के कथन से 'शांत होने' का अर्थ अब मेरी समझ में आया। इस  सूचना से मन व्यथित हुआ। वह युवक जब अपना प्रयोजन सिद्ध करके चले गये और मेरे मर्म की व्यथा कुछ शांत हुई तो मस्तिष्क इस 'शांत' होने का मर्म समझने में व्यस्त हो गया।

मैं ठहरा बिहारी आदमी, सीधी बात सीधे समझता हूँ, टेढ़ी बातें अव्वल तो समझ में आती नहीं और अगर आ गयीं तो फिर टेढ़ी ही करता हूँ। किसी के शांत हो जाने से कैसे मान लूँ कि वह गुज़र ही गया?
 'वक्ता अपना भाषण देकर शांत बैठ गये।' क्या इसका अर्थ यह निकालूँ कि वक्ता अपना भाषण देकर बैठे और मर गये।

कक्षा में बच्चे जब बहुत शोर मचाते हैं तो मेरी श्रीमतीजी उन्हें अक्सर आदेश देती हैं--'बच्चों, शांत हो जाओ।' और बच्चे शांत हो जाते हैं। इस कथोपकथन का क्या अर्थ-अभिप्राय लूँ?
एक अन्य उदाहरण पर गौर करें--'डॉक्टर परिचर्या में लगे हैं और मरीज शांत लेटा है।' अगर मरीज शांत ही हो गया है, तो फिर डॉक्टर परिचर्या क्यों और किसकी कर रहे हैं? बिहारी होकर ऐसा अनर्थ मैं तो कदापि नहीं निकाल सकता। वाक्य जो सीधा अर्थ प्रकट कर रहा है, उसे ही ग्रहण करूँगा।

बात पीड़ादायक थी, लेकिन उस दिन, देर रात तक, 'शांत होने' को लेकर नये-नये शगूफ़े बनते रहे और जीजाजी-दीदी-बच्चों के साथ घर में हँसी के फव्वारे छूटते रहे। बात यहाँ तक आ पहुँची कि तय हुआ कि अब हमें शांत नहीं रहना है, बोलते-बतियाते, चलते-फिरते रहना है। दीदी की छोटी बिटिया गुन्नू तब बहुत छोटी थी, अचानक उसने पूछ लिया--'लेकिन मामा, जब रात में हमलोग सो जायेंगे, कैसे बोल सकेंगे, तब तो सबको शांत होना ही पड़ेगा न?' वह छोटी थी, पर उसने बात पते की पूछी थी। मैं भी चक्कर में पड़ा, क्या उत्तर दूँ उसे? हँसी-हँसी में कैसी गलत धारणा उसके मन में बद्धमूल हुई जा रही है। मैंने सोच-विचार कर उससे कहा--'जब हम सो जाते हैं तो भगवान् हमें शांत नहीं होने देता, वह हमें स्वप्न देता है, करवटें लेने, खर्राटे लेने को बाध्य कर अशांत रखता है।'

मैंने गुन्नू को तो समझा दिया, लेकिन अपने मन का ही समाधान नहीं हुआ। जब सोने गया तो इस चिन्ता ने देर तक सोने न दिया कि कहीं सोते ही मैं शांत हो गया तो? इस 'तो' का उत्तर देने वाला वहाँ कोई नहीं था।

हमारी बोलचाल में भाषा और शब्द-प्रयोग की ऐसी-ऐसी व्यंजनाएँ हैं कि सुनकर बड़ी उजलत और कोफ़्त होती है। यहाँ पुणे में मेरी मेड अक्सर मुझसे पूछती है--'पापा, आपको चाय बना दूँ?' और कई बार उत्तर में मैं उससे कह चुका हूँ कि मुझे चाय मत बनाओ, चाय को बना दो।' मेरा उत्तर सुनकर वह बात समझती और हँसती भी है, लेकिन हर बार प्रश्न यही करती है। यहाँ आप किसी के घर जाइये, आपसे कुछ यूँ पूछा जाएगा--'चाय चलेगी आपको?' मन में आता है, कहूँ मेजबान से--'आप चाय से ही पूछ लीजिए न, क्या वह चलेगी मुझको?'

खैर, पुणे तो अहिन्दीभाषी क्षेत्र है, यहाँ मराठी का बोलबाला है, हिन्दी पर भी उसी का प्रभाव-प्रभुत्व है; लेकिन सुदूर पश्चिम चले जाइये, जहाँ खड़ीबोली हिन्दी का वर्चस्व है, वहाँ भोजन करते वक्त आपसे पूछा जाएगा--'आपको एक रोटी डाल दूँ?' इच्छा होती है, मेजबान से कहूँ--'नहीं, कुत्ते को डाल दीजिए, वह बाहर ही दुम हिलाता बैठा होगा।' लेकिन मुझे शांत रहना पड़ता है।...

हिन्दी में ऐसे शब्द-प्रयोगों की कमी नहीं है। शब्दों से मनचाहे अर्थ निचोड़ लिए जाते हैं और वे सर्व-स्वीकृत होकर प्रचलन में स्थायी भाव में रहते हैं। ऐसे अनेक उदाहरण और दिये जा सकते हैं, जिन्हें सुन-सुनकर सिर धुनने की इच्छा होती है और कभी-कभी तो 'शांत' हो जाने की भी।...

सोमवार, 6 फ़रवरी 2017

स्वप्नानुवाद...

कल रात गहरी नींद सोया। अमूमन मैं देखता नहीं हूँ स्वप्न।लेकिन कल रात तो स्वप्न में ऐसा मोहाविष्ट हुआ कि लगा, स्वप्न ही जीवन-सत्य है।

कल दिन-भर पिताजी की एक पुरानी पुस्तक के काम में कम्प्यूटर पर जुटा रहा, वह पिताजी के संस्मरणों का संग्रह है। उसी में कुछ ऐसे स्वर-संकेत मिले कि रात जब बिस्तर पर गया तो पितामह की अनूदित कृति श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण का पहला खण्ड साथ लेकर लेटा। पिताजी ने अपने अंतिम दिनों में इस संपूर्ण ग्रंथ का परिश्रमपूर्वक संपादन और प्रकाशन किया था। बालकाण्ड की भूमिका 'प्रभु का आदेश' में पिताजी लिख गये हैं कि अमुक रात स्वप्न में प्रभु ने उन्हें आदेश दिया कि 'तुम अपने पिता के अंतिम काम को अपना अंतिम काम बना लो और उसे पूरा करो।' पिताजी ने प्रभु के आदेश का अक्षरशः पालन किया। दस वर्षों में जब पूरी रामायण छपकर घर आ गयी, उसी के दस महीने बाद उन्होंने जगत् से प्रयाण किया।
यही प्रसंग पढ़कर मैं सो गया। बालकाण्ड की प्रति मेरे सिरहाने पड़ी रही।...

गहन निद्रा में डूबते ही मैंने देखा स्वप्न! देखा कि मैं अनुवाद कर रहा हूँ, वह भी संस्कृत से। संस्कृत, जिससे मेरी कभी मित्रता हुई नहीं। पिताजी जीवन-भर ललकारते ही रहे--'आओ, बैठो मेरे पास, संस्कृत, बांग्ला और गुजराती-- ये तीन भाषाएँ सीख लो।' और हम थे कि भागे-भागे फिरते थे। लेकिन परमाश्चर्य, स्वप्न में मैं क्षिप्र गति से कर रहा था वाल्मीकीय रामायण का हिंदी-अनुवाद। तभी स्वप्न में एक नये पात्र का आविर्भाव हुआ। वह विश्वविद्यालय से प्रायः घर आने वाली कन्या है, जो पिताजी की कहानियों पर शोध-कार्य कर रही है। वह सुघड़ और दक्ष है, त्वरित गति से काम करती है। मैं आग्रहपूर्वक उसे अपने साथ पकड़ बिठाता हूँ। अब मैं अनुवाद बोलकर लिखवा रहा हूँ उसे।
शोधकर्त्री कन्या अचानक कहती है--'कम्प्यूटर पर और तेजी से काम होगा अंकलजी! उसी पर करूँ क्या?'
मेरी स्वीकृति पाकर वह कम्प्यूटर पर बैठ जाती है। मैं धारा प्रवाह अनुवाद बोलता जाता हूँ और वह टाइप करती जाती है।

मज़े की बात कि मैं स्वप्न में भी जान रहा हूँ और विस्मित हो रहा हूँ कि मुझे संस्कृत तो आती नहीं, जाने किस अजानी शक्ति से यह काम करता जा रहा हूँ।
और देखते-देखते अनुवाद पूरा हो जाता है। मैं आप्तकाम, प्रसन्नचित्त हो अपने कमरे में टहलता हुआ सोच रहा हूँ, जिस काम को करने में पिताजी ने दस वर्ष लगा दिये थे, उसे मैंने रात-भर में ही कर डाला। कैसे? मैं उनका स्मरण करते हुए मन-ही-मन उनसे कह भी रहा हूँ और साश्चर्य पूछ भी रहा हूँ कि 'यह कैसे संभव हुआ बाबूजी? आप संस्कृत सीखने को बुलाते रहे और तब मैंने संस्कृत तो सीखी नहीं; फिर यह अनुवाद मैं कैसे कर गुज़रा? यह कैसा चमत्कार है?' पिताजी जाने किस महामौन में हैं, उनकी ओर से कोई उत्तर नहीं मिलता मुझे और मैं टहलता जाता हूँ कमरे में निरंतर!

तत्क्षण स्वप्न का परिदृश्य बदलता है। मैं घर की देहरी पर निर्विकार खड़ा हूँ। तभी देखता हूँ, वही शोधार्थी कन्या एक गाड़ी में मेरे अनुवाद की प्रकाशित प्रतियाँ लादे चली जा रही है, जोर-जोर से गाती हुई--'हीर-हीर ना आँखों अड़ियो, मैं ते साहिबा होई, डोली ले के आवे, ले जावे...' मैं हतप्रभ निर्निमेष उसे जाता हुआ देखता रहता हूँ, बोलता कुछ नहीं।

और तभी मेरी नींद टूट जाती है। जागकर भी आश्चर्य में पड़ा हूँ और सोच रहा हूँ कि संस्कृत से अनुवाद मैंने किया तो किया कैसे!
थोड़ा चैतन्य होते ही किचन की खटपट सुनता हूँ। मुँहअँधेरे जागकर और सबके लिए नाश्ते का प्रबंध कर विद्यालय जाना श्रीमतीजी की दिनचर्या है। मैं श्रीमतीजी को आवाज़ लगाकर चाय बनाने को कहता हूँ। मेरी पुकार सुनकर वह तेजी से मेरे पास आती हैं और उलाहने के स्वर में कहती हैं--'कैसे सो रहे हैं जी? आधी तकिया पर आप, आधी पर आपकी किताब! मैंने तो इस मुद्रा की तस्वीर खींच ली है। उठिये, मुँह धोइये और चित्र देखिये। मैं चाय बनाती हूँ।'

मैं शय्या त्याग कर उठता हूँ। वाशरूम से लौटकर अपनी आँखों को ज्योति-दान देता हूँ अर्थात चश्मा लगाता हूँ, फिर देखता हूँ चित्र और स्पष्ट हो जाता है, स्वप्न के अनुवाद का सारा रहस्य यकायक!


तब तक चाय ले आती हैं कल्याणी...!

बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

सूरज सपने में आया...

"सूरज आया फिर ज़द में,
मैंने भी देखी सुबह उसकी अंगड़ाई
वह बदल रहा था करवट
मैंने दूर से ही पूछा उससे--
'नयी सुबह ले आये क्या तुम,
इसीलिए मुस्काये क्या तुम?'
कुछ तो उसने कहा जरूर,
कुछ सुन न सका मैं,
था उससे बहुत-बहुत दूर।...
फिर तो चढ़ आया सूरज
आसमान की छाती पर,
लेकिन थोड़ा निष्प्रभ ही था
मेहराया-सा, ताप-विहीन!
मैंने विनोद में पूछा उससे--
'क्या हुआ रे दिनकर!
कहाँ गया तेरा वह तीखा तेवर
तप्त ताप और तेज प्रखर?
क्यों तू ऐसा निस्तेज खड़ा है
नभ के बीच निस्पंद पड़ा है?'
बहुत मीठा मुस्काया सूरज,
बोला मीठे स्वर में सूरज--
'अभी-अभी ली है अंगड़ाई,
दम धर ले तू मेरे भाई!
मई-जून तो आने दे
मुझको खुलकर गाने दे,
फ़िक्र बहुत है तुझको मेरी,
और लगी है मुझको तेरी!
मैं निस्तेज नहीं होता
धीरज कभी नहीं खोता
अनन्त काल से जलता हूँ
निर्धारित पथ पर चलता हूँ।
मेरा तेज नहीं घटता
और प्रदाह नहीं बढ़ता
मैं समभाव में रहता हूँ
विश्रांति बाँटता रहता हूँ।
नर्म लिहाफ़ का सुख ले ले
थोड़ा और सबर कर ले।
फिर बरसेगी अग्नि प्रखर
तू देखेगा मेरा तेवर।
फिर, जैसे ही हुई रात
भूल गया मैं दिन की बात
और लिहाफ़ में दुबक गया
सुख-सपनों में बहक गया।
तब सपने में आया सूरज
ग्रीष्म-ताप लाया सूरज!
छोड़ बिछावन, फेंक कंबल
औचक जागा, आँखें मल-मल,
कपड़े स्वेद से भीग गए थे
व्याकुलता के भी लक्षण थे,
जब स्वप्न-ताप से हुआ विकल
तब क्या होगा ना जाने कल।
नाहक सूरज से भिड़ आया
शीत में, ताप से लड़ आया!...
(तेजस्वी सर्य जब उत्तरायण हुए थे... 15 जनवरी, 2017)

रविवार, 8 जनवरी 2017

वो गुज़रा ज़माना याद आया...

[मित्रों, एक साल और बीत गया है। वक्त मुसलसल इसी तरह व्यतीत होता हुआ अतीत का हिस्सा होता जाता है। जो व्यतीत हुआ, सो अतीत हुआ। 2017 के प्रवेश-द्वार पर ठिठककर और पलटकर मैं सुदूर अतीत में झाँकना चाहता हूँ और उस काल-खण्ड को देखना चाहता हूँ, जहाँ तक स्मृति, दृष्टि नहीं जाती। किंतु, मुझे एक ऐसा अलभ्य वातायन मिला है, जिसके माध्यम से दृष्टि-धार को उस कालखण्ड तक ले जाया जा सकता है। एक नज़र उस अतीत को देख-दिखाकर लौटता हूँ, नव-वर्ष का अभिनन्दन करने, इजाज़त है न?

मालूम है, इस अतीत-कथा, परिवार-कथा, निजी-कथा में बहुतों की रुचि तो खैर क्या और क्योंकर होगी, फिर भी इसे लिखकर मैं दायित्व-मुक्त और निवृत्त होना चाहता हूँ। --आनन्द वर्धन.]

।। गत-कथा।।
वो गुज़रा ज़माना याद आया...

ज़माना कितनी क्षिप्रता से बदलता है, वक़्त कितनी तेज़ी से फिसलता है, स्थितियाँ कितनी शीघ्रता से स्वरूप बदल लेती हैं--सहसा, यक़ीन नहीं होता।

एक ज़माना ऐसा भी था, जब पटना में मेरे परनाना (पं बैद्यनाथ प्रसाद शर्मा) की तूती बोलती थी। वह मेरी माता के दादाजी थे। कलक्टरी घाट से पुनपुन के कछार तक उनका साम्राज्य था। इस सम्पूर्ण सम्पदा के वह एकछत्र स्वामी थे। ब्रिटिश काल में अंग्रेजों के ट्रेजरर (खजांची) थे--बड़े जमींदार थे। बड़ा रौबो-दाब था उनका। चार घोड़ोंवाली बग्घी पर चलते थे, आगे-पीछे घोड़ों पर अंगरक्षक होते थे। उनके कोचवान की शान भी निराली थी, वह अपनी सफ़ेद पोशाक और कलगीदार साफे में सीना तानकर ऊँचे तख़्त पर बैठता था, जैसे तख्ते-ताऊस पर बैठा हो। ऐसा प्रतीत होता था कि खजांची बाबू की शाही सवारी को वही मनचाही दिशा में ले जा रहा हो।...





पटना के मुख्य बाजार में पटना मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल (पी.एम.सी.एच.) के प्रवेश-द्वार के ठीक सामने एक सड़क है, जिसका नाम आज भी 'खज़ांची रोड' है। वह सड़क आगे बढ़कर पीपल के एक विशाल वृक्ष और शिवालय के पास पहुँचकर बल खाती हुई आगे बढ़ जाती है और मछरहट्टा जानेवाली सड़क में समाहित हो जाती है। खज़ांची रोड जहाँ एक अदद सर्पिणी-सी बल खाती है और जहाँ शिवाला है, वहीं एक विशाल कोठी थी, जिसमें परनाना का निवास था। वह वहीं अपने चार पुत्रों (अनन्त प्र. शर्मा, बसन्त प्र. शर्मा, यशवंत प्र. शर्मा (मेरे नानाजी) और हनुमंत प्र. शर्मा) के साथ बड़ी शानो-शौक़त से रहते थे। आज उस भवन की शिनाख़्त भी नहीं हो सकती। जनसंख्या की बाढ़, घनी आबादी और नवनिर्माणों ने उस प्रक्षेत्र की शक्ल बदल दी है।

खज़ांची रोड (बाँकीपुर) से, राजपथ पकड़कर पूर्व दिशा की ओर, ५-६ कि.मी. आगे बढ़ने पर पटनासिटी है। पटनासिटी-चौक से जो सड़क रेलवे स्टेशन (पटना साहिब) जाती है, उसी सड़क पर एक विशाल परिसर में 'खज़ांची कोठी' है। ब्रिटिश-काल में वह मेरे परनाना की ट्रेजरी थी। अंग्रेजों के तत्कालीन क़ायदे-क़ानून के मुताबिक कर-वसूली से जो राजस्व प्राप्त होता था, उसे वहीं कड़े पहरे में सुरक्षित रखा जाता था। उसी खज़ांची कोठी में राग-रंग की महफिलें भी जमती थीं। बाँकीपुर से परनानाजी पूरी सज-धज के साथ खज़ांची कोठी जाते थे और इन महफ़िलों की मेजबानी करते हुए उनकी शान बढ़ाते थे, जिसमें सेठ-साहूकारों, धन्नासेठों और मशहूर हस्तियों का जमावड़ा होता था। उन महफ़िलों में उस ज़माने के नामचीन फ़नकार शिरक़त करते थे, जिनका बसेरा उन दिनों पटनासिटी में ही था। खान-पान, इतर-सुगंध और हुक्कों की सिगड़ी से उठता सुगंधित तम्बाकू का धुआँ महफ़िलों में मदहोशी का आलम पैदा करता था। क्या रंगो-नूर का ज़माना रहा होगा वह!

फिर वक़्त बदला। वतन आज़ाद हुआ। नया स्वदेशी निज़ाम स्थापित हुआ और जमींदारी के उन्मूलन की घोषणा हुई। राज-के-राज पलट गए, जमींदारी के साथ ही प्रभाव और प्रभुत्व ख़त्म हो गया। आनन-फानन में पटनासिटी की खजांची कोठी को 'मदन मोहन की ठाकुरवाड़ी ट्रस्ट' घोषित किया गया, जिसमें कालान्तर में पूरा ख़ानदान जा समाया। मेरे परनानाजी के वंशज आज भी वहीं रहते हैं--मेरे मामाजी के बुज़ुर्ग हुए बच्चे, मेरे ममेरे भाई वगैरह लोग--सपरिवार।

मैंने अपने नानाजी पं. यशवंत प्रसाद शर्माजी और उनके ज्येष्ठ भ्राता बसन्तप्रसादजी के दर्शन तो किये हैं, लेकिन उनकी पूर्व पीढ़ी के दर्शन का सौभाग्य मुझे प्राप्त नहीं हुआ; क्योंकि तब तो मैं दुनिया में प्रकट ही नहीं हुआ था! हाँ, अपनी बाल्यावस्था में मैंने उस शानो-शौकत के अवशेष जरूर देखे हैं, जब मेरी माँ अपने पिताजी की सेवा के ख़याल से उन्हीं के पास रहने लगी थीं। मेरी बाल्यावस्था ननिहाल में ही बीती थी--खज़ांची कोठी में। पेड़-पौधों और बाग़-बगीचों से भरे उस विशाल परिसर में एक लोहा गोदाम था, जिसके एक कोने में मुँह के बल भू-चुम्बन करती त्यक्त पड़ी थी वह बग्घी, जो गुज़रे ज़माने की याद दिलाती थी! उस बग्घी पर चढ़कर अपने ममेरे-मौसेरे भाई-बहनों के साथ मैंने खूब खेल-तमाशे किये थे। दो घोड़े और एक साईस की याद भी मेरी स्मृति में सुरक्षित है, जो लिसोढ़े के पेड़ के नीचे बँधे रहते थे। लोहागोदाम में झाड़-झंखाड़, टूटे-फूटे फर्नीचर और लोहे-पीतल के ढेर पड़े थे। हम वहीं 'झंखड़वा में भूत' नामक एक डरावना लुक्का-छिपी का खेल खेलते थे, और रातों में स्वप्न देखकर डर जाते थे, पेड़ पर चढ़कर शहतूत तोड़ते थे, तितलियाँ पकड़ते थे, मीठी 'भटकुंइयाँ' तोड़-धोकर खाते थे।...

दिन कभी एक-सा नहीं रहता, वह रह-रहकर रंग बदलता है। वे दिन भी सपनों-से बीत गए। पुराने खजांची कोठी को आज ढूंढ़ने जाऊँ, तो उसकी भी बस निशानदेही ही मिलती है। व्यापक परिवर्तन और विकास हुआ है वहाँ भी, और वह शायद बेहतरी के लिए ही हुआ है, लेकिन मेरी आँखें आज भी उस स्वर्णिम अतीत को ढूँढ़ती हैं, जो बचपन की नूर-भरी मेरी आँखों ने देखे थे कभी।... वह मुझे नहीं दीखता कहीं।... कारवाँ गुज़र जाने के बाद जो गुबार मैंने देखा था, वह गुबार भी समय के साथ बह गया है।...

आज की पीढ़ी तो जानती भी नहीं कि पटना में आज तक जिस सड़क का प्रचलित नाम 'खज़ांची रोड' है, वह किस हस्ती के नाम पर रखा गया है। बस, नाम भर रह गया है, जो चलता जाता है। स्मृतियाँ थाती होती हैं, उन्हें सहेजकर रखना नहीं होता, वे मन-प्राण में सिहरती रहती हैं; लेकिन प्राण-हीन हो जाने पर भी स्मृतियाँ आनेवाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रह जाएँ, यह काम मेरी माँ ने अवश्य किया था।

माँ के पुराने अलबम से मिली एक तस्वीर ने मुझे उस गौरवशाली अतीत की एक झलक फिर दिखायी है, जिसमें मेरे नानाजी स्वयं एक अबोध बालक-से (5 संख्यक) बैठे हैं, जिनका जन्म ही संभवतः १८वीं शताब्दी के अंतिम चरण में कभी हुआ होगा। मैं उस अतीत को कैसे देखता भला? लेकिन, यह चित्र उस युग का आभास-भर देता है मुझे। क्या आप भी एक नज़र उसे देखना नहीं चाहेंगे ?
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[चित्र-परिचय : 1) पितामह--पं बैद्यनाथ प्रसाद शर्मा के चार सुपुत्र--सर्वश्री अनन्त प्र. शर्मा, बसन्त प्र. शर्मा, यशवंत प्र. शर्मा (मेरे नानाजी) और हनुमंत प्र. शर्मा का परिचय चित्र पर अंकित क्रमानुसार प्राप्त करें। चित्र में दोनों किनारों पर बैठे हुए ६ और ७ संख्यक महानुभावों को मैं नहीं जानता और उनका परिचय पाने का काल-समय जाने कब का गुज़र गया है। संभव है, ये दोनों मेरे परनानाजी के भाई-भतीजे हों।
2) मेरी माँ ने अपने अलबम में स्वयं लिख रखा है अपने पितामह, ताऊजी, पिताजी और चाचाजी का नाम तथा चित्र पर डाली है क्रम संख्या।]
३) खज़ांची कोठी के  प्रांगण में मेरे नानाजी पं. यशवंत प्र. शर्मा, वृद्धावस्था का चित्र, मेरा लिया हुआ, १९७२।
४) परनाना के बाद की पीढ़ी : 'पौराणिक कोश' के अमर रचयिता मेरे बड़े मामाजी पं. राणाप्रसाद शर्मा, सबसे पीछे खड़े हुए।
5) माँ के हस्तलिखित चित्र-विवरण से जानें।

शनिवार, 24 दिसंबर 2016

'ज़मीं खा गयी आस्माँ कैसे-कैसे' ...

उस साल शरद ऋतु आयी नहीं थी, लेकिन वर्षा विगत-कथा हो चुकी थी। उसी समय की बात है--संभवतः 1981-82 की। पटना के दैनिक पत्र 'आर्यावर्त्त' के लब्ध-प्रतिष्ठ संपादक पं. हीरानंद झा शास्त्रीजी की उत्प्रेरणा से पिताजी को एक साहित्यिक विमर्श के लिए दरभंगा जाना था। पहले यह निश्चित हुआ था कि शास्त्रीजी पिताजी को अपने साथ लेकर दरभंगा जायेंगे और राजकुमार शुभेश्वर सिंह (संभवतः नाम-स्मरण में गफ़लत नहीं कर रहा हूँ) से मिलेंगे और विमर्श के बाद साथ ही पटना लौट आयेंगे। उन्होंने इस मुलाकात और विमर्श के लिए राजकुमार साहब से तिथि और समय की स्वीकृति भी ले ली थी, लेकिन यात्रारम्भ के ठीक दो दिन पहले शास्त्रीजी ने अपना जाना अपरिहार्य कारणों से स्थगित कर दिया था और इसकी सूचना पिताजी को देने घर पधारे थे।
पिताजी ने उनकी बात सुनकर कहा--'शास्त्रीजी, जब आप ही नहीं जायेंगे तो मैं वहाँ अकेला जाकर क्या करूँगा ? लिहाज़ा, मान लेता हूँ कि पूरा कार्यक्रम ही स्थगित हो गया।'

शास्त्रीजी पिताजी की बात सुनकर विचलित-व्याकुल हो उठे, बोले--'नहीं-नहीं, मैं इसीलिए तो स्वयं आपके पास आया हूँ। अगर पूरा कार्यक्रम ही स्थगित करना होता, तो इसकी सूचना मैं फ़ोन पर ही आपको देकर निश्चिन्त हो जाता। राजकुमार साहब ज़्यादातर बाहर-बाहर रहते हैं। मुश्किल से तो उनसे समय मिला है, सारी बातें दूरभाष पर हो चुकी हैं और विमर्श का विषय भी पत्र द्वारा उनके सामने मैं रख चुका हूँ। बस, आप एक बार उनसे मिलकर बातें कर आइये, बाकी सब मुझ पर छोड़ दीजिये।'
पिताजी इसके लिए राज़ी नहीं हो रहे थे। उन्होंने अपनी विवशता उन्हें बतायी--'शास्त्रीजी, उम्र की इस दहलीज़ पर, अशक्तता की इस दशा में, इन आँखों से मुझ अकेले से यात्रा संभव नहीं हो सकेगी। आप तो मुझे क्षमा ही करें। अगली बार जब कभी संयोग बनेगा, आपके साथ ही वहाँ जाऊँगा।'

लेकिन गरज़मंद तो सहस्रबाहु होता है। शास्त्रीजी की आन भी कहीं अटकी पड़ी थी शायद। बोले--'हाँ, तो अकेले मत जाइये, किसी को साथ ले लीजिये।' पिताजी कहने ही जा रहे थे कि 'किसे साथ ले जाऊँ', तब तक मैंने चाय की ट्रे के साथ कक्ष में प्रवेश किया। शास्त्रीजी झट मेरी ओर इशारा करते हुए बोले--'इनके साथ ही चले जाएँ न। आने-जाने में जितना भी वक़्त लगे, बैठक तो घंटे भर में समाप्त हो जायेगी। फिर पटना लौट आइयेगा।'

चाय पीकर और दो खिल्ली पान, सुपारी-तम्बाकू के साथ खाकर शास्त्रीजी जब विदा हुए, तब पिताजी ने चिंतित स्वर में मुझसे कहा--'लगता है, शास्त्रीजी ने मेरी स्वीकृति-अस्वीकृति के पहले ही कुमार साहब से कह दिया है कि मैं मीटिंग के लिए वहाँ पहुँचूँगा। अब क्या करूँ, जाना तो पड़ेगा, अन्यथा शास्त्रीजी संकट में पड़ेंगे। मित्र हैं, उनकी अवमानना हो, यह मैं नहीं चाहूँगा।'
मैंने कहा--'हाँ, तो चलिए न, मैं साथ चलता हूँ, इसमें चिंता की क्या बात है।' मेरी बात सुनकर पिताजी कुछ बोले नहीं, लेकिन मैंने लक्ष्य किया कि उन्हें शास्त्रीजी यह बात रुचिकर नहीं लगी थी।

दो दिन बाद पिताजी के साथ मैंने भी सुबह-सुबह दरभंगा के लिए प्रस्थान किया। घर से निकलने के पहले पिताजी ने मुझसे कहा--'तुम सड़क तक पहुँचो, मैं आता हूँ।' मैंने बिना कुछ कहे बैग उठाया और चल पड़ा। जानता था, वह ऐसा क्यों कह रहे हैं । दरअसल पिताजी थे तो अत्याधुनिक विचारों के, लेकिन कई पुरानी मान्यताओं का मान भी रखते थे। उन्हीं के श्रीमुख से बारहाँ सुना था--
'पिता पुत्रौ न गच्छेत्, न गच्छेत ब्राह्मण त्रयं !'
अर्थात पिता-पुत्र को और तीन ब्राह्मणों को अदिन में एक साथ यात्रा नहीं करनी चाहिए। इस पंक्ति में दी गयी वर्जना का वह ध्यान रखते और कहीं की भी यात्रा की तिथि निश्चित करते हुए दिशाशूल का विचार भी करते थे। अत्यावश्यक न हो तो दिशाशूल में भरसक यात्रा नहीं करते थे और यदि विवशता ही आ पड़े, तो विधि-निषेधोपचार के बाद ही यात्रा पर निकलते थे।

उन दिनों दरभंगा जाने का एक ही मार्ग था--गंगा नदी को बच्चा बाबू के स्टीमर से अथवा सरकारी जहाज से पार करके पहलेजा पहुँचना, फिर रेल या बस से दरभंगा। तब तक निर्माणाधीन गाँधी-सेतु बनकर तैयार होने की दशा में तो था, लेकिन लोकार्पित नहीं हुआ था। हमने सरकारी जहाज से ही यात्रा करना तय किया। घण्टे-डेढ़ घण्टे में हम पहलेजा पहुँचे, फिर दरभंगा के लिए चल पड़े।

निश्चित समय पर हम दरभंगा-राजप्रासाद पहुँचे। वह विशाल प्रासाद था--उन्नत द्वार और मेहराबदार परकोटों से घिरा हुआ। हम वहाँ पहुँचे, जहाँ राजकुमार शुभेश्वर सिंह का निवास था। उस भवन को देखकर ही अनुमान किया जा सकता था कि कभी वहाँ का श्री-वैभव कैसा विलक्षण रहा होगा। काल ने उसे श्रीहीन कर दिया था, रंग-रोगन के बिना दीवारें उदास लग रही थीं, लेकिन वैभव और सम्पन्नता अन्दर विद्यमान थी। हमें एक सेवक ने बहुत बड़े कक्ष में सादर बिठा दिया और कुमार साहब को सूचित करने अंदर चला गया। शीघ्र ही कुमार साहब पधारे और नमस्कारोपरांत बोल पड़े--"बैठिये, मैं आपकी ही प्रतीक्षा कर रहा था।" युवावस्था की दहलीज़ लाँघ जाने की कगार पर खड़े कुमार साहब बहुत कद्दावर और सुदर्शन व्यक्ति थे। वह पिताजी से किसी गंभीर विषय पर विमर्श में निमग्न हो गए और मैं चुपचाप बैठा-बैठा कक्ष की एक-एक चीज़ को निहारता रहा। सोचता रहा कि संगीतप्रेमी राजा साहब के युग में वहाँ कैसी रौनक रही होगी, कैसी चहल-पहल और राग-रागिनियों का कैसा आनन्द-विलास होता रहा होगा !

मैंने कई पुस्तकों में दरभंगा राज-परिवार के संगीत-प्रेम के बारे में पढ़ा भी था कि संगीतकारों की एक सुदीर्घ परम्परा महाराजाधिराज की कृपा-छाया में पुष्पित-पल्लवित होती रही है, उनका भरण-पोषण होता रहा है वहाँ। धुरपद (ध्रुपद) के प्रख्यात गायक पं रामचतुर मल्लिक तो हमारे ज़माने के वयोवृद्ध फ़नकार रहे हैं, लेकिन पुराने वक़्त की पढ़ी-जानी कथाओं की बात करूँ तो मुझे बौराही कनीज़ (बड़ी कनीज़) की याद आती है। उसकी तानों में गज़ब की तड़प थी, कहन में अपूर्व कशिश थी, तासीर थी और वह मन्त्र-मुग्ध कर देनेवाला ठुमरी-गायन करती थी। उसकी समकालीन गानेवालियाँ थीं--अल्लाजिलाई, मोहम्मद बाँदी और ज़ोहराबाई पटनावाली। ये सभी अपने ज़माने की सरनाम गायिका थीं। ठुमरी, दादरा, टप्पा और ग़ज़ल-गायन में इनका कोई सानी नहीं था। राज्याश्रय में ही ज़ोहराबाई का गायन परवान चढ़ा था। महाराज कामेश्वर सिंह के राज्याभिषेक के अवसर पर अपनी गायकी से उसने दिग्गज उस्तादों को भी हैरत में डाल दिया था। उसने बड़े-बड़े दंगल जीते थे और दरभंगा-राज का वर्चस्व क़ायम रखा था। पटनावाली ज़ोहरा की मौत पर महाराज बहुत दुखी हुए थे। पटनासिटी में उसे दफ़्न किया गया। उसकी कब्र की शानोशौकत बरकरार रखने के लिए राजा साहब ने सस्ती के उस ज़माने में अपने कोष से ग्यारह हज़ार रुपयों की धन-राशि देकर चुनार के लाल पत्थरों से उसकी मज़ार की शोभा बढ़ायी थी।

लेकिन, बड़ी कनीज़ की कहानी बहुत पीड़ादायी है। उसकी विक्षिप्त मनोदशा के कारण ही लोग उसे बड़ी कनीज़ की जगह 'बौराही' कनीज़ पुकारने लगे थे। किसी छोटी-सी बात पर उसके मन को गहरी ठेस लगी थी और उसने राज-दरबार का मोह त्याग दिया था। कुछ वर्षों तक उसका कुछ पता ही नहीं चला कि वह कहाँ चली गयी। महाराज उसके इस आचरण-व्यवहार से दुखी थे, उन्होंने कुछ समय तक उसकी तलाश की चेष्टाएँ कीं; फिर उसकी तरफ से विमुख हो गए।

वर्षों बाद बड़ी कनीज़ पटनासिटी की बदनाम गलियों में देखी गई। उसकी मानसिक दशा बिगड़ गयी थी। गलियों-सड़कों पर वह बदहवास गाती-गुनगुनाती और सुरों की मारक तान लगाती निकल जाती। चलते-फिरते लोग ठगे-से खड़े रह जाते और मन्त्रमुग्ध-से उसे सुनने लगते। उसके सुरों में बला की तासीर थी और कण्ठ का नाद ऐसा कि वह दूर-दूर तक गूँजता, जैसे हवा की तरंगों पर तिरता सुरों का बाण चारो दिशाओं में बिखर रहा हो। अपने इन्हीं सुरों के कारण वह पहचानी भी गयी और बात कानों-कान महाराज तक पहुँची। उन्होंने उसे मनाने-बुलाने के लिए के लिए दूत भेजे, लेकिन वह तो अपनी सुध-बुध खो चुकी थी, संसार से उसका सरोकार प्रायः समाप्त हो गया था। सरोकार रह गया था, तो सिर्फ़ सुरों से। उसने कहीं भी जाने से इनकार कर दिया।
कालान्तर में मुफ़लिसी और दुरावस्था में पटनासिटी में ही उसकी मौत हुई। पटनासिटी की जाने किस गली में उसे सुपुर्दे-ख़ाक किया गया। जब तक राजा साहेब को उसके इंतकाल की ख़बर मिली, तब तक कई महीने गुज़र गए थे। राज-वैभव और विलासितापूर्ण जीवन का त्याग कर ख़ाक में मिल जानेवाली बड़ी कनीज़ की कहानी मेरे ज़ेहन से कभी मिटी नहीं और दिमाग में गूँजते रहे ये शब्द--'ज़मीं खा गयी आसमाँ कैसे-कैसे !'

(समापन अगली किस्त में)