रविवार, 18 फ़रवरी 2018

नहीं तो शामत सिर पर आई...!

[एक अनावश्यक कविता]

ये जो पत्नियाँ होती हैं न,
मुझे लगता है,
कठिन सामग्रियाँ होती हैं;
इसी वजह से मैं
अपनी गृहलक्ष्मी को
'तथाकथित पत्नी' कहता हूँ ।
लोग कहते हैं, इसलिए 'पत्नी',
अन्यथा वह तो हवा की एक
ख़ुशनुमां बयार-सी है
जो मेरे साथ-साथ चलती है,
मेरे मिज़ाज के हिसाब से
अपना रंग बदलती है।

जनाब! यह भी आसान
कलाबाज़ी नहीं है
कि मुस्कान देखकर
मुख-कमल खिल उठे
या बिगड़े हों मेरे तेवर
तो मुख-चन्द्र मलिन हो जाये;
जैसे पूर्ण चन्द्र पर आ जाता है
टुकड़ा-टुकड़ा काला बादल,
लेकिन यह दृश्य तभी तक स्थिर
या गतिमान होता है,
जबतक घर में कोई विकट गतिरोध नहीं होता
कोई भी अपना आपा पूरी तरह नहीं खोता!

हुई असावधानी जरा-सी
घटना घटी बड़ी-सी,
और ऐसे में--
जब कभी उनका भेजा पलटता है
हवाओं का रंग बदलता है,
सुरमई शाम भी
स्याह रात में ढल जाती है
जो सोना चाहूँ तो
नींद नहीं आती है।

स्वाभिमान का दीपक बुझाकर
आँखों में नकली नमी का सुरमा लगाकर
करनी पड़ती है मनुहार मुझे
फिर भी दी जाती है
लानत और फटकार मुझे।...

सब सहना होता है मुझको
ताकि अगली तिमाही तक
शांति से चलता रहे मेरा शासन,
मेरी भाव-भंगिमा और
भृकुटी के संचालन से
रहे काँपता घर का आँगन ।...

भई, सीधी-सी बात है
ये तनी हुई अभिमानी गर्दन भी
ठीक वहीं पर झुकती है
जहाँ शिवाला है कोई
या शक्तिपीठ की ड्योढ़ी है।
जग्गजननि के सम्मुख क्या
कोई तनकर खड़ा रह सकता है
जगत्-प्रवाह में बहता तिनका
कब तक थिर रह सकता है?
इन सिद्धपीठों पर जाकर
जो बावला ऐंठा ही रह जाता है,
वह जीवन के महासमर में
हतबुद्ध खड़ा रह जाता है।...

इन फूलों का क्या है बंधु,
जंगल-जंगल खिल जाते हैं,
उपवन में वे ही तो आखिर,
नया गुलाब ले आते हैं।
नतशिर होना होता है भाई
नहीं तो शामत सिर पर आई...!..

[चित्र : हमारा, : व्यथा बगल के किरायेदार की]
--आनन्द, 19-12-2017

शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2018

एकाकी होगी अन्तर्यात्रा...

जब, जहाँ से उठूँगा,
वहीं से चल दूँगा...!
जरूरी नहीं होता
चलने के लिए सड़कें नापना;
अन्तःप्रदेश के विभिन्न रास्तों पर भी
दौड़ा जा सकता है--बेधड़क!
मन के चंचल अश्व की भी
की जा सकती है सवारी,
चहुँओर दौड़ाया जा सकता है उसे,
विभिन्न लोकों की
हो सकती है सैर निर्विघ्न;
लेकिन, जरूरी है, बेहद जरूरी है,
अपने अंकुश में रखा जाए मन के घोड़े को
यह तुरंग बहुत वेगवान होता है,
बेलगाम हुआ तो
तुम्हें न जाने कहाँ ले जाए,
किस दलदल में पटक दे
या किस गर्त्त में गिरा दे
अथवा किस नरक में पहुँचा दे, नामुराद!

मानता हूँ,
मेरे-तुम्हारे मन का एका है
गहरा जुड़ाव है,
अटूट संपृक्ति है हमारी;
लेकिन, तुम चाहो भी तो इस यात्रा पर
मेरे साथ नहीं चल सकते प्रिय !
यह अन्तर्यात्रा तो होती है एकाकी--निःसंग
और वह अधिकतर होती तभी है
जब निष्क्रिय होकर शय्याशायी हो जाना पड़े
प्रायः एक पखवारे के लिए..!

हाँ, यह हो सकता है,
तुम अपनी यात्रा पर निकलो
मैं अलग, निःसंग अपनी यात्रा पर,
लेकिन देखना--
अपने विवेक-बल के सबल हाथों में
कसकर थामे रहना लगाम
उस उद्दण्ड
और चंचल मन के अश्व की,
निरंकुश मत होने देना उसे।
जो लोग ऐसा नहीं कर सके हैं
देखो, अपने आसपास
कितने लोग अपना अर्जित यश
धूमिल कर पकेपन में
यातनाएं भोगने और
सिर धुनने को विवश हैं!

अगर तुम ऐसा कर सके,
तब देखोगे--
लंबी दूरियाँ तय करके
हम लौट आये हैं वहीं,
जहाँ से उठकर चल दिये थे--हठात्!

इसी भाव-भूमि पर,
स्वप्न के सत्य से छूटकर
हम फिर मिलेंगे जरूर
एक दिन... प्रिय...!

[--आनन्द. 24-01-2018.]

रविवार, 11 फ़रवरी 2018

लालटेन का शीशा साफ हुआ...

पुराने ज़माने में गाँव-देहात में देर शाम होते ही जो लालटेन बुझने लगती थी, लोग उसे बुझाकर एक किनारे रख देते थे। कौन उसके शीशे साफ करे, मिट्टी का तेल भरे? ये जहमत उठाने से सो जाना लोग बेहतर समझते थे, लेकिन अब वक़्त बदल गया है। लालटेनें अब प्रचलन में रहीं नहीं। शहर तो शहर अधिकांश गाँवों से भी गायब हो गयी हैं लालटेनें।

लेकिन, ज़िन्दगी की राहों को रौशन करने के लिए नासिका के ऊँचे टीले के दोनों ओर जलती-बुझती रहती हैं दो-दो लालटेनें। किन्तु इन लालटेनों का विधान कबीर की उलटबांसियों की तरह ही उलटा है। दिन के उजाले में ये जलती हैं और रात होते ही स्वयमेव बुझ जाती हैं। इन्हें जलाना-बुझाना नहीं पड़ता। इन लालटेनों को हम आँख, नयन, नेत्र आदि कहते हैं। वैसे, यह भी कहा गया है--'नयन जरै दिन रैन हमारे'। सच है, ये लालटेनें जलती तो रहती हैं दिन-रात, लेकिन इनका जलना-बुझना स्वचालित है। इन लालटेनों का स्विच होती हैं हमारी पलकें। पलकें बंद हुईं और स्वतः बुझ गयीं लालटेनें। पलकें खुलीं तो रौशन हो उठीं लालटेनें।

नयनों के अत्यधिक उपयोग से या अनियमित शयन-जागरण से या अनुचित खानपान से इन लालटेनों पर कालिख-सी पुत जाती है, जिसे आंग्ल भाषा में कहते हैं कैटरेक्ट और देसी भाषा में मोतियाबिंद! सैंतीस वर्षों से मैं भी तम्बाकू का सेवन करता रहा हूँ और अक्षरों से खूब फोड़ी हैं आँखें, रात-रात-भर जागकर। भोजन की अनियमितता मेरी जीवनचर्या रही थी। मेरी लालटेन पर कालिख तो आनी ही थी, आयी। जब बहुत परेशानी होने लगी तो मैंने शल्य क्रिया का निर्णय लिया।

मुझे याद आया, यह कष्ट पिताजी को भी हुआ था। मैंने जब से उन्हें देखा था, चश्मे में ही देखा था। अपने चौथेपन में उन्होंने अपनी एक आँख की शल्य क्रिया अलीगढ़ अकेले जाकर प्रख्यात चिकित्सक डाॅ. पाहवा से करवायी थी। पन्द्रह दिन अस्पताल में रहे थे और अनेक कष्ट उठाये थे। पन्द्रह दिनों के बाद एक आँख पर हरी पट्टी बँधवाये वह दिल्ली गये थे और अपने अभिन्न मित्रों सर्वश्री बच्चन, जैनेन्द्र कुमार और अज्ञेयजी से मिलकर पटना लौटे थे। तीन महीने के औषधोपचार के बाद उनकी आँख काम करने लायक हुई थी, मोटा पावर ग्लास लगाकर...!

अब, जब मेरी बारी आई तो मैंने भी अपने बच्चों को अपनी-अपनी व्यस्तताओं से हाथ खींचकर भाग-दौड़ करने से मना कर दिया और श्रीमतीजी के साथ पुणे के रूबी हाॅस्पिटल पहुँच गया। 17 जनवरी की सुबह वहाँ डाॅक्टर नरियोसन एफ. ईरानी ने मेरी बाईं आँख का लेजर ऑपरेशन किया और मात्र 20 मिनट में मुझे फ़ारिग कर दिया। दो घण्टे अपनी निगरानी में रखने के बाद उन्होंने मेरी आँख की पट्टी भी हटा दी और काले चश्मे में घर भेज दिया। 21 दिनों की औषधियों और तमाम परहेजों-सावधानियों के बाद पावर का नया चश्मा मुझे मिल गया है और दुनिया फिर से रौशन हो गयी है।

बदलते वक्त के साथ यह आॅपरेशन बहुत आसान हो गया है। सौभाग्य से मुझे युवा डाॅक्टर ईरानी भी ऐसे मिले, जो मित्रवत् व्यवहार करते थे। पूरी शल्य क्रिया के दौरान वह मुझसे बातें करते रहे और मुझे तनिक भी पीड़ा नहीं हुई। मेरी नासिका के बायीं ओर रखी लालटेन का शीशा उन्होंने ऐसा चमकाकर साफ कर दिया है कि दुनिया रौशन हो उठी है, दृश्य उछलकर नेत्र-पट पर नृत्य करने लगे हैं और अक्षर अब स्थिर भाव में खड़े मिलते हैं; उनमें लेशमात्र का कंपन नहीं होता। दीन-दुनिया का तो पता नहीं, लेकिन लगता है, मेरे तो अच्छे दिन आनेवाले हैं!... खूब लिखूँगा-पढ़ूंगा और स्पष्ट दूर-दर्शन करूँगा।

एतदर्थ, मृदुभाषी आत्मीय चिकित्सक डाॅ. ईरानी का बहुत-बहुत आभार!
--आनन्द. 10 जनवरी, 2018.

[चित्र : डा. नरियोसन एफ. ईरानी के साथ मैं. 7-11-2018]

शनिवार, 3 फ़रवरी 2018

'दोनों के बीच मैं ही फाड़ा जाऊँगा'...?

हम एक ही वर्ष में, लेकिन दो अलग-अलग शहरों, परिवारों और परिवेश में जन्मे थे। हमारा पालन-पोषण और पठन-पाठन भी भिन्न शहरों में हुआ था। युवावस्था की दहलीज़ पर पाँव रखते ही संयोगवश हम मिले, मित्र बने और हमारी गहरी छनने लगी। मित्रता घनिष्ठ से घनिष्ठतर होती गयी। लेकिन हमारी रुचियाँ भिन्न थीं। हम अलग पथ के पथिक थे। न बोध-विचार का साम्य था, न प्रकृति समान थीं। दो अलग धारा में बहनेवाले प्राणी थे हम दोनों।...
वह गम्भीराचार्य था, मैं मुक्त मन का मुखर युवा! वह बाॅडी बिल्डर था, मैं कोमल मन का संवेदनशील युवा-कवि! लिखने-पढ़ने और साहित्य से उसका कोई वास्ता नहीं था। हमारी मनोरचना में भिन्नता बहुत थी। लेकिन, मित्रता शायद शर्तों पर नहीं होती, वह होती है; क्योंकि उसे होना होता है--विधिवशात्। हमारा साथ-संग दीर्घकालिक नहीं रहा, लेकिन मित्रता अक्षुण्ण रही और आज भी यथावत् है। जब तक मैं उसके साथ रहा, शाम होते ही मैं टेबल टेनिस खेलने क्लब चला जाता और वह वर्कआउट करने के लिए जिम। लौटता तो वह भर-कटोरा अंकुरित चना खाता और मैं अपने लिए काॅफ़ी बना लेता।

वह मित्रता का धर्म निभानेवाला शेरदिल इंसान था--मुंहफट, लेकिन स्वच्छ हृदय का। मुंहफट तो था, मगर जो बात उसे न बतानी होती, उसे उसकी ज़बान से कोई उगलवा भी नहीं सकता था। अपने मान-स्वाभिमान की बहुत फ़िक्र थी उसे। अभिमान उसमें बिल्कुल नहीं था, लेकिन स्वाभिमान प्रचुर मात्रा में था। उसका गठीला बदन और आकर्षक व्यक्तित्व हमारे लिए आदर्श बना रहा। मुख़्तसर में कहूँ तो वह एक अत्याधुनिक सुदर्शन पहलवान सरीखा नवयुवक था।...

साथ रहते दो वर्ष भी न गुज़रा था कि हम दोनों के परिवारों में हमारे विवाह की चिंता और चर्चा होने लगी। तब विवाह के लिए न मैं तैयार था, न मेरा पहलवान मित्र। लेकिन घर के बड़े-बुजुर्गों को रोकनेवाला भला कौन था? वे अपनी मनमर्जी चलाते रहे और हम उनकी आज्ञा मानने को विवश बने रहे। मेरे पट्ठे मित्र ने तो अपने घरवालों को दो टूक कह दिया था--'अभी नहीं करनी शादी-वादी...!' लेकिन विधि को यह मंजूर नहीं था। एक कन्या के पिता को अपनी पढ़ी-लिखी योग्य बिटिया के लिए मेरे पहलवान मित्र बहुत पसन्द आ गये थे। वह उसके पिताजी के घर के चक्कर लगाने लगे। बात बढ़ी तो बढ़ती चली गयी। नतीजा यह हुआ कि मित्रवर को न चाहते हुए भी कन्या-निरीक्षण के लिए घर जाना पड़ा। वह बड़ों की आज्ञा की अवहेलना न कर सके। वह ज़माना ऐसा था भी नहीं। जब वह लौटा तो मेरे बार-बार पूछने पर बमुश्किल इतना ही कह सका--'लड़की तो ठीके है।' उसका इतना कहना ही काफी था, मेरे चिकोटी काटने के लिए। मैं उसे जब ज्यादा परेशान करता तो एक रहस्यमयी मुस्कान उसके अधरों पर खेल जाती। कुछ महीने और बीत गये, अंतिम निर्णय का कुछ पता न चला। लेकिन बीतते वक्त के साथ अंदेशा होने लगा था कि बात यहीं बनेगी। चुप्पा पहलवान इस विषय पर ज्यादा कुछ बोलता ही नहीं था।...

एक दिन शाम के वक़्त, जिम जाने के ठीक पहले, जब वह मेरे सामने पड़ा तो शुभकामना-संदेश का एक कार्ड मेरी तरफ बढ़ाते हुए बोला--'ये देखो!'
मैंने पूछा--'क्या है?'
अनासक्त भाव से बोला पहलवान--'खुद ही देख लो, उसी लड़की की शुभकामनाएँ हैं।' इतना कहकर हल्की मुस्कान के साथ वह जिम चला गया और उत्सुकता से भरा मैं लिफ़ाफ़ा खोलकर देखने लगा। उसमें एक मुद्रित कार्ड था और हस्तलिखित एक छोटा-सा पत्र! कन्या का प्रथम पत्र पढ़कर मेरी पहली प्रतिक्रिया यही हुई कि कन्या तो सुबुद्ध है!

अब संकट पहलवान के पाले में था। मैं रोज उससे पूछता--'पत्र का उत्तर दिया?' वह मुस्कुरा कर प्रश्न टाल जाता, लेकिन उसकी मुस्कुराहट में ही उसकी पसंदगी का रहस्य छिपा था। एक दिन मैं उसके पीछे ही पड़ गया। मैंने कहा--'कमाल करते हो तुम भी यार! वह लड़की होकर तुम्हें शुभकामनाएँ भेजने और पत्र लिखने का साहस दिखा सकती है और तुम उत्तर देने की हिम्मत भी नहीं जुटा रहे, कितनी गलत बात है। तुम्हें भी तो कुछ लिखना चाहिए न!'
उसने खीझकर कहा--'ये चिट्ठी-पत्री मुझसे न होगी।' बहुतेरी जिरह के बाद, आखिरश मैंने उसे मना ही लिया कि उत्तर मैं लिख दूँगा और वह उसे अपनी हस्तलिपि में यथावत् उतार कर पोस्ट कर देगा। और, यह राज़ मेरे-उसके बीच पोशीदा ही रहेगा ताज़िंदगी।...

जिस शाम उसकी स्वीकृति मिली, उसी रात मैं पत्र लिखने बैठा और सोचता रहा क्या लिखूँ, कैसे लिखूँ? किसी दूसरे के लिए ख़त लिखना कठिन था और वह भी ऐसे बनते हुए नवीन संबंध के नाम! किसी के लिए प्रेम (जैसा)-पत्र लिखने का मेरे जीवन में भी यह पहला ही अवसर था। क्या कहूँ, कठिन परीक्षा थी। बहुत देर तक चिंतन करने के बाद भी एक शिष्ट और स्नेहिल संबोधन के अतिरिक्त मैं कुछ न लिख सका। कागज़-कलम मेज़ पर छोडक़र मैंने शय्या की शरण ली।...
मैं लेटकर निद्रादेवी का आह्वान करने लगा, लेकिन नींद थी कि आती नहीं थी। मैं सोचने लगा कि अगर ऐसा ही एक पत्र मुझे अपनी भावी पत्नी को लिखना होता तो मैं क्या लिखता? इस विचार ने शब्द देने की शुरूआत की और उन शब्दों से वाक्यों का निर्माण होने लगा। मैं बिस्तर छोड़कर पुनः टेबल पर आ गया और लिखने लगा। भावी पत्नी को संबोधित करते हुए जो भाव-विचार मन में उपजने लगे, जितने रंग मनःलोक में भरने लगे, उन्हें शिष्ट शब्दों में पिरोकर मैं काग़ज पर फैलाता गया। और, देखते-देखते एक सुन्दर शब्द-चित्र तैयार हो गया, जिसे पढ़कर मैं स्वयं संतुष्ट हुआ।... उसी की प्रतिलिपि मेरे बलशाली मित्र ने अपनी भावी पत्नी को प्रथम पत्र के रूप में लिख भेजी।

कुछ दिनों के बाद कन्या का उल्लास से भरा दूसरा ख़त आ पहुँचा। पहलवान ने दूसरा ख़त भी मेरी ओर उछालते हुए कहा--'लो, यह नंबर टू है। अब झेलो।'... दूसरे ख़त में रस-माधुर्य अधिक था। पत्र पढ़कर मुझे आनन्द-लाभ हुआ। पत्र, मेरे लिखे पत्र के आलोक में लिखा गया था और उसमें मेरे लिखे शब्दों की प्रशंसा भी थी। मन पुलकित हुआ।...
मैंने दूसरे ख़त का भी अपने जानते ख़ासा अच्छा उत्तर लिखा--तब जितनी विद्या-बुद्धि थी, सबका उपयोग करते हुए। पन्द्रह-अठारह दिनों बाद तीसरा ख़त भी आ पहुँचा, जिसे मेरी ओर बढ़ाते हुए दबंग मित्र को अंततः कहना ही पड़ा--'अरे यार, तुमने तो मेरी बड़ी अच्छी इमेज बना दी है वहाँ...।'

लेकिन तीसरे ख़त का उत्तर देते ही मुझे बलवान मित्र की संगत से रुख़सत हो जाना पड़ा। इसके साल-भर बाद दिल्ली में मेरा विवाह हुआ और उसके कई महीनों बाद पहलवानजी का भी--उसी कन्या के साथ, जिसे मैं तीन प्रेमपूर्ण पत्र लिख आया था।...

हम संघर्षपूर्ण जीवन जीते हुए अपनी-अपनी राह लगे। वर्षों बीत गए। हम दोनों बाल-बच्चेदार हुए और शहर-दर-शहर भटकते रहे। जब मेरे बच्चे 3-5 साल के हो गये थे, तब एक दिन श्रीमतीजी ने मुझसे पूछा--'सुनिये, आप इतना पढ़ते-लिखते हैं। आपने विवाह के पहले कभी कोई पत्र क्यों नहीं लिखा मुझे? बस, दीपावली पर एक कार्ड भेजा था, जिसे मैंने आज तक सँजो रखा है।'
असावधानी में मेरे मुंह से बेसाख़्ता निकल गया--'मैंने पत्र लिखा तो था, पोस्ट कहीं और हो गया।'
मेरे इस उत्तर से श्रीमतीजी चकित रह गयीं और अन्तर्कथा बताने की ज़िद करने लगीं। विवश होकर मुझे सबकुछ खोलकर बताना पड़ा उन्हें। इस तरह मित्र के प्रति 'ब्रीच ऑफ़ ट्रस्ट' अनचाहे ही हो गया मुझसे। पूरी कथा सुनकर श्रीमतीजी ने ठंढी आह भरते हुए कहा था--'काश, वे ख़त कभी देखने को मिलते मुझे, आखिर लिखे तो थे मेरे लिए न...!'

कई वर्षों बाद प्यारे पहलवान मित्र से मिलने की राह मिली। हम मिले तो पुराने किस्से याद आये। मैंने मित्र से पूछा--'वह प्रारंभिक पत्राचार की बात अब तक परदे में ही है न?' अक्खड़ पहलवान बोला--'वह राज़ तो परदे चीरकर बाहर आ गया यार!'
मैंने पूछा--'वह कैसे? आख़िर तुमने भाभी को बता ही दिया न? जबकि हमारे बीच तय हुआ था, राज़ राज़ ही रहेगा।'
उसने कहा--'छोड़ो भी, जो हुआ, अच्छा हुआ। राज़ खुद ही फ़ाश होने को आमादा हो गया तो मैं क्या करता।' मैं समझ गया यह अकड़ू इसके आगे कुछ बतायेगा नहीं। दूसरे दिन मैं भाभी की शरण में गया और अचानक उनसे पूछ बैठा--'भाभी, वे शुरूआती चिट्ठयाँ कहाँ छुपा रखी हैं आपने, जो इसने लिखी थीं आपको? मैं भी तो देखूँ, क्या लिखा था इस दुष्टात्मा ने।'
भाभी तो जोरदार और निःसंकोची निकलीं। उन्होंने रहस्यमयी मुस्कान के साथ कहा--'छोड़िये भी... मुझे न बनाइए। मैं सब जानती हूँ, किसने लिखे थे वे ख़त।'
मैंने कहा--'जब आप जानती ही हैं तो अब संकोच कैसा? खोजकर दीजिए न चिट्ठयाँ।'
भाभी बोलीं--नहीं, संकोच कैसा? लेकिन, अब चिट्ठयाँ मैं दे नहीं सकती आपको।'
मैंने पूछा--'क्यों?'
वह बोलीं--'क्योंकि मैंने उन्हें फाड़कर नष्ट कर दिया है।'

उन प्रारम्भिक चिट्ठियों के नष्ट होने की जो कथा भाभी ने सुनायी, वह मुख़्तसर में यूँ थी कि गृहस्थी के किसी छोटे-से विवाद में बात बढ़ जाने पर भाभी ने उलाहना देते हुए पहलवान से गुस्से में कहा था--'अब आप मुझ पर चिल्लाने भी लगे हैं? पहले तो बड़े मीठे-मीठे पत्र लिखा करते थे...!'
क्रोध के वशीभूत पतिदेव भी तपाक में बोल पड़े--'अरे, उन चिट्ठियों की बात रहने भी दो। मैं थोड़े ही लिखता था चिट्ठयाँ! हऽ हहा, वो चिट्ठयाँ तो 'ओझा' लिखता था। मैं तो सिर्फ़ उसकी काॅपी करके भेज देता था तुम्हारे पास।'

इस उत्तर से भाभी को बड़ा क्रोध आया और उसी दिन उन्होंने चिट्ठयाँ फाड़कर फेंक दी थीं। इस तरह, सर्वप्रथम मेरे हृदय में उपजनेवाली कोमल भावनाओं का यह हश्र हुआ था, जो सूर्य की पहली किरण सरीखी नर्म थीं। ओह, वे आत्मीय उद्गार अब कभी पढ़ने को न मिलेंगे मुझे!... इस पीड़ा के साथ जब मैं सोने लगा तो पूर्व प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह की एक क्षणिका अन्तर्मन में स्वयं ध्वनित होने लगी, जिसका शीर्षक था-- 'लिफ़ाफ़ा' :
'मजमून तुम्हारा और पता उनका,
दोनों के बीच मैं ही फाड़ा जाऊँगा।'
--आनन्द. 1 फरवरी 2018.

सोमवार, 29 जनवरी 2018

अपने घर का दर्शन...

अपने घर की खिड़की से
दीखते हैं दूसरों के घर,
ऊपरी मंजिल पर हों तो
सड़कें भी दीखती हैं,
जंगल भी दीखते हैं
और माचिस के डिब्बे-से
रेंगते वाहन भी,
मजमे भी;
लेकिन अपना घर तो क्या,
उसकी खिड़कियाँ भी बस,
अंदर से ही दिखती हैं।

अपना घर देखना हो तो
घर से निकलकर थोड़ी दूर
जा खड़ा होना होता है--
तटस्थ भाव से--
असंलग्न!

क्या तुम्हारा भी मन होता है कभी
अपने घर को देखने का?
मेरा तो होता है;
लेकिन क्या करूँ?
अपना घर छोड़कर
बाहर जाया नहीं जाता,
तटस्थ हुआ नहीं जाता,
असंपृक्त रह नहीं पाता;
आज भी वहीं रह गया हूँ
जहाँ छोड़ गये थे तुम;
वहीं मोहाविष्ट रहता हूँ,
दुःख-सुख घर में रहकर सहता हूँ।

कैसे निकलूं घर से, बतलाओ
यह मोहावरण किस तरह हटाऊँ,
तुम्हीं समझाओ,
है कोई युक्ति तुम्हारे पास?
(--आनन्द.)
====


पुनः --
नयनों ने ली है अँगड़ाई
पहली शल्य-क्रिया है भाई!
अस्पताल में जाना होगा,
क्षुद्र मोतिया हटवाना होगा।

दस दिन का अवकाश चाहिए,
दुआएं सबकी पास चाहिए!
--आ. 17-1-2018.

शुक्रवार, 26 जनवरी 2018

।। सर्वत्र नारायणो हरिः ।।

(27 जनवरी : पूज्य पिताजी की 108वीं जयन्ती पर विशेष)

[याद आती है मुझे पिताजी की उदारता और चर्मशिल्पी की कृतज्ञता ...]

पटना की कंकड़बाग काॅलनी की एक व्यस्त सड़क पर बने 'मुक्त कुटीर' के मुख्य द्वार से बाहर निकलते ही दायीं तरफ बिजली के खम्भे के नीचे नियम से रोज़ आ बैठते थे एक बूढ़े बाबा, अपने थैले-झोले के साथ और दिन-भर करते रहते थे मरम्मत जूते-चप्पलों की। हमलोग तो उन्हें 'बाबा' ही कहते थे, लेकिन पिताजी जानते थे उनका नाम--'हरिनाथ'। उनका यह नाम भी पिताजी ने अपनी सुविधा के लिए स्वयं रख लिया था। कहते थे, 'इसी बहाने हरि-स्मरण भी हो जाता है। प्रभु श्रीहरि का अंश ही तो प्रत्येक प्राणी में है न!' बाबा का नाम कोई नहीं जानता था, लेकिन वह इसी नाम से चल निकले। मज़े की बात, 'हरि' संबोधन सुनकर बाबा भी प्रतिक्रिया देने लगे थे। कभी बाबूजी घर से बाहर निकलते और बिजली के खम्भे के पास पहुँचकर 'हरिजी' पुकारते तो बाबा झट मुखातिब होते और पिताजी से विनयपूर्वक कहते--'हँऽ बाबा, कहूँ न, की करिऐ?' (हाँ बाबा, कहिये न, क्या करूँ?)

बाबूजी की जूती तला छोड़ देती या चट्टी के बेल्ट की कीलें निकल आतीं तो वह मुझे ही पुकारते और चट्टी, जूता या चप्पल देते हुए कहते--'ले जाओ इसे, हरिजी को दे दो। वह सुधार दें तो ले आना थोड़ी देर में। पूछते आना, कितने पैसे हुए।' 1980-90 के जमाने में पैसों में कोई काम होता कहाँ था, बात रुपयों तक आ पहुँची थी; लेकिन पिताजी की याद से पैसे मिटे नहीं कभी। कोई उनसे किसी काम के लिए रुपये माँगता तो बड़ी सरलता से पूछते--'कितने पैसे दूं?'

कभी-कभी अपनी पीकदान पलटने के लिए पिताजी बाहर तक चले जाते तो हरिजी से उनकी कुशलता पूछते, दो मीठी बातें करके लौट आते, लेकिन उन्हें पुकारते 'हरिजी' ही। और, हरिजी उत्तर देने को प्रस्तुत हो जाते। एक दिन मैंने बाबा से पूछा--'जब आपका नाम हरिनाथ है ही नहीं तो बाबूजी की पुकार पर आप उत्तर क्यों देने लगते हैं?' हरिजी मुस्कुरा के बोले--'का कहते हैं मुन्ना बाबू! बाबा बड्ड अमदी हैं, जैसे पुकारें, उनकर आसिरबादे न है! हम भी मान लिये हैं कि हमरा नाँव हरिए है।' (क्या कहते हैं मुन्ना बाबू! बाबा बड़े व्यक्ति हैं, जैसे पुकारें, उनका आशीर्वाद ही न है। मैंने भी मान लिया है कि मेरा ना 'हरि' ही है।)

कोई सामान बगल के बनिये की दुकान से लाना हो, सड़क पार की दवा-दुकान से कोई औषधि लानी हो, किसी को आवाज़ देनी हो या रिक्शावाले को रोकना हो, हरिजी हमेशा तैयार, सेवा को तत्पर!

एक बार हरिजी बीमार पड़े। इलाज के लिए पैसे नहीं थे उनके पास। पिताजी को पता चला तो बाहर गये। देखा, शक्लो-सूरत से ही हरिजी ख़ासे बीमार लगे। उनसे पूछा हाल और सब जानकर बोले--' जब तबीयत इतनी खराब है तो यहाँ आकर धूप में क्यों बैठते हो? कुछ दिन घर पर रहकर आराम क्यों नहीं करते?'
हरिजी विकल हो गये, आर्त्त स्वर में बोले--'घर बईठ के केना चलतई काम बाबा? खैबई की? कमवा तऽ करहीं पड़तई !' (घर बैठकर कैसे काम चलेगा बाबा? क्या खाऊँगा? काम तो करना ही पड़ेगा।)
पिताजी चिंतातुर हुए और बोले--'ऐसे तो तबीयत और बिगड़ती जाएगी।'
हरिजी कातर स्वर में बोले--'रामजी के रक्खे के होतई तऽ धीरे-धीरे ठीके कर देथिन बाबा!' (रामजी को रखना होगा तो धीरे-धीरे ठीक ही कर देंगे बाबा!)
पिताजी ने पूछा--एक दिन के खाने का कितना खर्च है तुम्हारा?'
हरिजी बोले--'30-40 रोपया तऽ खरचा होइए जा हई बाबा। एतना तऽ कमाहीं पड़ऽ हई।' (30-40 रुपये तो खर्च हो ही जाते हैं। इतना तो कमाना ही पड़ता है।)
पिताजी कुछ नहीं बोले। सीधे अपने कमरे में लौट आये। मुझे रोककर उन्होंने पर्स से 350/ रुपये निकाल कर मुझे दिये और कहा--'जाओ, हरिजी को ये रुपये दे आओ और उनसे कह दो कि सात दिनों तक वह यहाँ दिखाई न दें मुझे।'

मैं आदेशानुसार रुपये लेकर हरिजी पास पहुँचा। दोपहर का वक्त था। भोजनावकाश में घर गये दुकानदारों की दुकानें बंद थीं, एक दुकान के ओटे पर मेहराये हुए बैठे थे हरिजी! तीन सौ पचास रुपये उनकी ओर बढ़ाते हुए मैंने कहा--'लीजिये, बाबूजी ने भेजे हैं ये रुपये और कहा है कि सात दिन घर पर रहकर आराम कीजिये।'
उस दीन-हीन बीमार वृद्ध का स्वाभिमान देखिये कि रुपये लेने से उन्होंने साफ इन्कार कर दिया। कातर होते हुए उन्होंने मुझसे कहा था--'बाबा काँहे एतना फिकिर करई छथिन, हम दु-चार दीन में अपने ठीक हो न जैबई मुन्ना बाबू ! रोपया ले लेबई तऽ लौटइबई केना?' (बाबा इतनी फ़िक्र क्यों करते हैं, मैं दो-चार दिनों में अपने-आप ठीक हो जाऊँगा मुन्ना बाबू! रुपये ले लूँगा तो लौटाऊँगा कैसे?)

पिताजी के पास जाकर मैंने रुपये लौटाते हुए हरिजी का कथन दुहरा दिया। पिताजी को आश्चर्य नहीं हुआ। यह कहते हुए वह उठ खड़े हुए--'कमाल करता है, यह भला आदमी! दातव्य के रुपये भी मिलें तो पहले लौटाने की फिक्र करेगा।' पिताजी ने पाँव में चट्टी डाली और चल पड़े बाहर, पीछे-पीछे मैं चला। बिजली के खम्भे के पास पहुँचकर थोड़े उच्च स्वर में पिताजी ने आवाज़ लगायी--'हरिजी! ये क्या तमाशा है? आपने रुपये लौटा क्यों दिये?' हरिजी घबराकर उठ खड़े हुए। हाथ जोड़कर कहने लगे--'नैय बाबा, नैय! ई बात नईं। हम तऽ कहलिइऐ जे दु-तीन दीन मऽ अपने ठीक होइए जैबे।' (नहीं बाबा, नहीं! ये बात नहीं, मैंने तो बस यही कहा कि दो-तीन दिन में मैं खुद ही ठीक हो जाऊँगा।)

पिताजी बोले--'नहीं, आप घर जाकर आराम कीजिये और स्वस्थ होकर काम पर आइये। आपके सात दिनों के खाने-खर्चे के लिए 350 रुपये मैंने भिजवाये थे। ये लीजिए और सात दिनों तक यहाँ आने की आपको कोई जरूरत नहीं है।'
पिताजी के जोर देकर कहने पर भी हरिजी के हाथ रुपये लेने के लिए बढ़ नहीं रहे थे। पिताजी ने खीझकर कहा--'अब क्या है?' हरिजी की तो जैसे घिग्घी बँध गयी, रुक-रुक कर कठिनाई से बोले--'ले तऽ लेबै बाबा, लौटैबए कैना?' (ले तो लूँगा बाबा, लौटाऊँगा कैसे?)
पिताजी ने हरिजी को डपटते हुए कहा--'मैंने कहा क्या कि इतने दिनों में रुपये लौटाने होंगे आपको? पैसे लीजिए और घर जाकर विश्राम कीजिए। ये रुपये लौटाने के लिए नहीं दे रहा हूँ। लीजिए।'

पिताजी के आदेश के आगे हरिजी अवश हो गये। दोनों अंजुरी जोड़कर उन्होंने रुपये ले लिये। और, पूरी श्रद्धा-भक्ति से अपने जुड़े दोनों हाथों को उठाकर उन्होंने मस्तक से लगाया, लेकिन उनकी यह कृतार्थता देखने के लिए पिताजी वहाँ नहीं थे, वह रुपये देते ही पलटकर घर में जा चुके थे।

उसके बाद सात नहीं, दस दिनों तक हरिजी दिखाई नहीं दिये। ग्यारहवें दिन वह प्रकट हुए। बिजली के खम्भे के नीचे बैग-झोला रखकर उन्होंने घर की काॅल बेल बजायी। मैंने द्वार खोला तो हरिजी ने कहा--'बाबा के दरसन भेंटैत?' (बाबा के दर्शन होंगे?) मैं उल्टे पाँव लौटा और बाबूजी के पास जाकर बोला--'हरिजी आये हैं, मिलना चाहते हैं।'
पिताजी दरवाज़े तक गये, हरिजी को देखकर बोले--'अब कैसी तबीयत है?'
हरिजी ने अतिशय विनम्रता से कहा--'अब एकदम ठीक भै गेलौं बाबा! पूरा जिनगी बीत गेल, कब्बो दस दीन आराम न केलौं! अपने के बड्ड किरपा... बाबा!' (अब एकदम ठीक हूँ बाबा! पूरी ज़िंदगी बीत गयी, कभी दस दिन आराम नहीं किया। आपकी बहुत कृपा...बाबा!)

पिताजी के चेहरे पर संतोष की लकीरों को आसानी से पढ़ सकता था मैं। हल्की मुस्कराहट के साथ उन्होंने कहा--'हाँ, ठीक है। तबीयत ठीक है तो अब काम करो।'

हरिजी आजीवन पिताजी की सेवा करते रहे और जूते-चप्पल की छोटी-बड़ी मरम्मत के लिए पैसे न लेने की ज़िद करते रहे, लेकिन शुरूआत में ही पिताजी की एकमात्र कठोर वर्जना के बाद यह सिलसिला थम गया।...

1995 में पिताजी गुज़र गये। हरिजी बदस्तूर उसी बिजली के खम्भे के नीचे बैठते रहे--उदास। 2009 में पटना छोड़ जब मैं दिल्ली चला गया, तब तक उम्र की अशक्तता ने उन्हें बहुत कमज़ोर बना दिया था। लंबे अंतराल पर जब कभी मैं पटना जाता, उनका कुशल-क्षेम पूछना न भूलता और हरिजी पिताजी का स्मरण करते हुए उनके औदार्य का उल्लेख करना न भूलते...!

एक बार की ऐसी ही पटना-यात्रा में हरिजी के स्थान पर एक युवक बैठे मिले। मैं चकराया। उस युवक से मैंने बाबा के बारे में पूछा तो उत्तर मिला--'बाबा तऽ चलि गेला।' (बाबा तो चले गये।) सुनकर बुरा लगा। और, कानों में गूँजने लगा हरिजी का वाक्य--'पूरा जिनगी बीत गेल, कब्बो दस दीन आराम न केलौं!...'


रात्रि-शयन और एक घण्टे की दिवा निद्रा के अलावा मैंने पिताजी को भी कभी विश्राम करते नहीं देखा--आजीवन लिखते-पढ़ते और किताबों-पाण्डुलिपियों के अंबार में डूबे हुए ही मिले वह !... कहते भी थे--'परिश्रम करना जीवन-यात्रा का आध्यात्मिक नियम है...!'

अब पिताजी और हरिजी दोनों आराम में हैं।... दोनों को नमन हमारा...! 🙏

[--आनन्द. 27-1-2018]
[चित्र : 1. 'मुक्त कुटीर' के आँगन में पिताजी, सुबह की चाय और अखबार के साथ 2. हरिजी (काल्पनिक चित्र), अपने अड्डे पर.]

गुरुवार, 25 जनवरी 2018

मेरे बुद्धिजीवी झोले में दस दिनों का जीवन...

[अंतिम क्षेपक]

मेरे कंधे पर युवावस्था से रहा है बुद्धिजीवी झोला। पुणे में मेरे पास दो झोले थे--एक कहीं छूट गया, दूसरा बहुत पुराना और जर्जर हो गया। मैं झोले के बिना ही यात्रा पर निकल आया। अनुज हरिश्चंद्र दुबे के सुपुत्र अविजित ने विदा होते वक़्त खादी ग्रामोद्योग से मेरे पसंदीदा दो झोले मुझे खरिदवा दिये थे। ऐसे झोले पुणे में नहीं मिलते न!...भाई सुनील तिवारी के घर जब शाम होने को आयी, चाय पीने का मन था; लेकिन श्रेया विद्यार्थी बिटिया का फोन बार-बार आ रहा था--'कब आओगे मामा? यहीं आकर चाय पीना। बस, अब चले आओ।'

यह इस प्रवास की अंतिम कनपुरिया शाम थी। दूसरे दिन हमें लखनऊ से पकड़नी थी पुणे की फ्लाइट। जब कानपुर की सड़कों पर दौड़ती कार में अपने नये खरीदे झोले के साथ चला तो याद आया--इन्हीं सड़कों को तीन वर्षों तक कितना धाँगा है मैंने साइकिल से। तब भी कंधे से लटकता था ऐसा ही झोला, लेकिन तब उसमें होता नहीं था पनडब्बा, सुपारी-सुरती की झन-झन बजती टिन की डिब्बियाँ और कविता की एक अदद डायरी; बल्कि उसमें होता था प्लेनचैट का बोर्ड, शीशे की छोटी गिलसिया--नर्म-मखमली कपड़े की तहों में लिपटी हुई और सिल्क की स्वच्छ धोती। सोचने लगा, कितना बदल गया है वक़्त और कितना बदल गया हूँ मैं। आईने के बिना अपनी ही शक्ल तो देखी नहीं जा सकती न! लेकिन, मन हुआ, देखूँ अपना चेहरा, पहचानूं, वही हूँ न, जो वहाँ जा रहा हूँ; जहाँ होती थीं मेरी स्नेहमयी दो-दो दीदियाँ! स्वदेशी-सेवा के ज़माने में जिनके पास प्रति सप्ताह शनिवार की शाम पहुँच जाता था मैं। दफ़्तर से छुट्टी पाते ही बुद्धिजीवी झोला कंधे से लटकाकर मैं मित्रवर ध्रुवेन्द्र के साथ चल पड़ता अपनी-अपनी साइकिलों से। आर्यनगर में ध्रुवेन्द्र ठहर जाते अपने बड़े पापा के घर, मैं वहाँ से आधा किलोमीटर आगे बढ़ जाता तिलक नगर तक, जहाँ हुतात्मा पूज्य गणेशशंकर विद्यार्थीजी की बड़ी-सी कोठी थी, विशालकाय परिसर में। जिसमें रहती थीं मेरी दोनों दीदियाँ--श्रीलेखा और मधुलेखा विद्यार्थी--गणेशशंकरजी की पौत्रियाँ!

यह गणेशशंकर विद्यार्थीजी से चला आ रहा हमारी चौथी पीढ़ी का स्नेह-संबंध था। अपने जीवनकाल में गणेशशंकरजी जब-जब प्रयाग जाते, मेरे पितामह 'शारदा'-संपादक साहित्याचार्य पं.चन्द्रशेखर शास्त्री से मिलना न भूलते। पितामह के दारागंज स्थित आवास पर उनसे मिलकर और एक लंबी बैठक के बाद ही प्रयाग से लौटते। 'प्रताप' पत्र में गणेशशंकरजी ने पिताजी की कई कहानियां छापी थीं और पिताजी भी 'प्रताप'-कार्यालय में कई बार गणेशजी से मिले थे। वह युग तो बीत गया, लेकिन उसी संपर्क-सूत्र को मैंने अपने तीन वर्षों के प्रवास में थाम लिया था और दोनों बहनों का अनुगत भ्राता बना था।

प्रति सप्ताह शनिवार की रात बिछ जाता था हमारा बोर्ड और शुरू होतीं हमारी परा-शक्तियों से लंबी-लंबी वार्ताएं! जिसमें रोना-गाना और यदा-कदा हँसना भी होता था। कई बार तो सुबह के वक़्त पक्षियों का कलरव सुनकर हम बोर्ड से उठते और शय्याशायी होते। रविवार विश्राम का दिन बन जाता।...फिर सोमवार की सुबह मैं वहीं से स्वदेशी के लिए निकलता, आर्यनगर से ध्रुव को लेता हुआ। यही क्रम अबाध चलता रहा...

मन में स्मृतियों के कितने स्फुलिंग कौंध रहे थे उस शाम, जब पत्नी के साथ मैंने उसी परिसर में प्रवेश किया, जिसमें अपनी माताओं के साथ श्रेया को बित्ते-भर का देखा था कभी...! अब वह बड़ी और समझदार बेटी बन गयी है। हमारे पहुँचते ही उसने हमें चाय पिलायी, मुझसे और अपनी मामी से बातें कीं, फिर हमारे लिए बाटी-चोखा बनवाने में जुट गयी। मामीजी भी उसी के साथ हो लीं।...

मैं उस भवन के हर कमरे में गया--बड़ी दीदी और मधु दीदी के शयन कक्ष में, श्रीदीदी के ऑफिस में, बैठक में--सर्वत्र। घर के गोशे-गोशे से मेरी अटूट संपृक्ति थी। मैंने और मधु दीदी ने मिलकर कभी पुराने गट्ठर खोले थे, प्राचीन काल के बक्से खोलकर गणेशशंकरजी के महत्वपूर्ण साहित्यिक अवदानों को सहेजा था। एक गहरा सन्नाटा पसरा था वहाँ! बड़ी दीदी के जिस दफ़्तर में हाली-मुहाली लगी रहती थी कभी, आज वहाँ अस्त-व्यस्तता और धूल का साम्राज्य था। विधि-न्याय की पुस्तकों का अंबार शेल्फ में उदास पड़ा था। मधु दी' की साहित्यिक पुस्तकें भी गुमसुम थीं--यह सब देखकर मन दुखी हो गया, अवसाद से भर आया, एक अव्यक्त बेचैनी मेरी संपूर्ण सत्ता पर छाने लगी और मैं बीच के डायनिंग हाॅल में एक सोफ़े पर ख़ामोश बैठ गया। सच है, जगत् का सारा कार्य-व्यापार व्यक्ति के होने से चलता है। जब वही नहीं होता तो लगता है, वक्त वहीं ठिठक-सहमकर रुक गया है। एक वर्ष के अंतराल पर दोनों दीदियाँ जगत्-मुक्त हुईं--पहले छोटी, फिर बड़ी दीदी! मैं उस शाम जहाँ, जिस सोफ़े पर बैठा था, उसके पीछे दोनों दीदियाँ मालाएं धारण किये शीशे के फ्रेम में कैद थीं, फिर भी मुस्कुरा रही थीं और मुझसे जी-भरकर रोया भी न जा रहा था। ऊपर दीवार पर उन दोनों के पूज्य पिता स्व. हरिशंकर विद्यार्थीजी का चित्र था। मैं इन सारी विभूतियों से नज़रें मिलाने से बचता पीठ दे बैठा रहा। जाने कब श्रीमतीजी कमरे में आयीं और उन्होंने पीछे से इसी भाव-भंगिमा की मेरी एक तस्वीर उतार ली।

श्रेया की पुकार पर हम सबों ने मिल-बैठकर बाटी खायी, बातें कीं और जब लौटने को उद्यत हुए तो श्रेया खादी के दो बुद्धिजीवी झोले मुझे देते हुए बोली--'ये लो मामा! मैं ले आयी तुम्हारे लिए झोले!' मैंने कहा--'मैंने तो आज ही खरीद लिया है बेटा! इस सर्दी में तुमने नाहक दौड़ लगायी।'... लेकिन उसने मेरी एक न सुनी और दोनों झोलों के साथ ही मुझे विदा किया। मुझे ऐसा प्रतीत हुआ, जैसे दोनों दीदियों ने एक-एक झोला मुझे श्रेया के हाथों दिलवाया है।... अब बुद्धि चाहे जितनी हो मेरे पास, झोले बहुत हो गये थे--चार-चार।...

31 दिसम्बर की रात कठिनाई से बीती। पुरानी स्मृतियाँ चैन से सोने न देती थीं। दूसरे दिन सुबह ही हम कानपुर से विदा हुए और एक अभिन्न बाल-सखा का अनुसंधान करते हुए लखनऊ से पुणे की हवाई यात्रा पर चल पड़े। 1 जनवरी की मध्य रात्रि में हम पुणे पहुँच गये।...






अब तो यात्रान्त हुए दस दिन बीत गये हैं, लेकिन मन उन्हीं दस दिनों की सुधियों में खोया हुआ है। इस संक्षिप्त यात्रा में मैंने दुनिया की भीड़ में गुम हुए भाई को खोज निकाला, दीर्घकाल से बिछड़े मित्रों और आत्मीय अनुज से मिला--समझिये, परमानंद हुआ! इसे मैं वर्ष 2017 की उपलब्धि मानता हूँ और इसका सारा श्रेय अपनी गृहलक्ष्मी को देता हूँ; क्योंकि उन्होंने ही नौ वर्षों के मेरे एकरस जीवन को देखकर इस कार्यक्रम की सहर्ष स्वीकृति दी थी मुझे।... जैसे किसी चलचित्र में पिता ने पुत्री से कहा था न--'जा सिमरन, जा, जी ले अपनी ज़िंदगी!'... यह सुनकर सिमरन बेतहाशा दौड़ चली थी और भागती ट्रेन में चढ़कर अपने प्रेमी की बाँहों में झूल गयी थी।... मैं भी श्रीमतीजी की स्वीकृति पाकर दौड़ चला, लेकिन सिमरन की तरह मैं अकेला नहीं था, मेरे साथ तो मेरी जीवन-संगिनी थीं ही; लिहाज़ा मैंने मित्रों को अपनी बाहों में बाँध लिया।... पिता का आदेश पाते ही कलानेत्री 'सिमरन' तो जीवन-भर के लिए भाग चली थी, लेकिन मुझे सिर्फ दस दिनों का जीवन जीने की मुहलत मिली थी।...
(--आनन्द. 31-12-2017.)

[चित्र : 1) श्रेया विद्यार्थी 2) उद्विग्न-मन--मैं 3) बड़ी दीदी के वीरान दफ़्तर में 4) मैं, जब दोनों दीदियों की ओर देखने की हिम्मत न रही 5) मैं और साधनाजी, जब प्रस्थान के लिए उठ खड़े हुए 6) बुद्धिजीवी झोलों के साथ वापसी के गलियारे में 7) कोठी के द्वार पर...।