सोमवार, 29 अगस्त 2016

ब्रह्मदेव नारायण सिंह : कबीर गाते-गुनते हुए 'कबीर'... (२)

आज देश-दुनिया में संगीतसेवियों की क्या कमी है ? एक-से बढ़कर-एक फ़नकार हैं, जानदार-शानदार गाते-बजाते हैं, मुरकियाँ-तानें, आरोह-अवरोह के करतब दिखाते हैं, संगीत की अधुनातन उपलब्धियों से उन्हें सजाते-सँवारते हैं और पूरी कायनात में एक शोर बरपा करते हैं; लेकिन संगीत के इस शोर-शराबे में गीत की आत्मा कहीं दबी-कुचली-सी लगती है मुझे। मुझे लगता है, ब्रह्मदेव चाचा एक ऐसे संगीतज्ञ थे, जो शब्दों की गहरी समझ रखते थे--एकः शब्द: शुष्ठु ज्ञातः !' वह शब्दों के प्राण-तत्व को समझकर संगीत की आत्मा को गाते थे, जो श्रोताओं की अंतरात्मा में सिहरन भर देती थी, भाव-विभोर कर देती थी उन्हें। उनका गाया हुआ कबीर का निर्गुण 'झीनी-झीनी बीनी रे चदरिया...' सुनकर मैं आज भी सिहर उठता हूँ।...

एक दिलचस्प वाक़या याद आता है। १९८२ में मेरे अनुज यशोवर्धन का विवाह हुआ था। नाते-रिश्तेदारों और हित-मित्रों से घर भरा हुआ था। छोटे चाचा भी दिल्ली से आये हुए थे। आगंतुकों के लिए हमारा घर छोटा पड़ रहा था। स्थानाभाव के कारण सड़क के पार, ठीक सामनेवाले ब्रजकुमारजी के मकान में, दो कमरों की व्यवस्था पिताजी ने कर ली थी, जिसमें एक बड़ा-सा हॉल था और एक कमरा! जिस दिन बरात को दूसरे शहर के लिए प्रस्थान करना था, उसकी पूर्व-संध्या में ब्रह्मदेव चाचा छोटे चाचा से मिलने की ललक लिए आ पहुँचे। उन्हें भी सामनेवाले घर के हॉल में पहुँचा दिया गया, जहाँ छोटे चाचाजी ठहरे हुए थे। दोनों पुराने मित्र हुलसकर मिले और बातें चल निकलीं। परिवार के बहुत-से लोग हॉल में एकत्रित थे, शोर-गुल था, हलचल थी। तभी पिताजी वहाँ प्रकट हुए। उनकी उपस्थिति से थोड़ी शान्ति स्वयं व्याप गयी। पिताजी ने उच्च स्वर में कहा--'भई, क्या करते हैं आपलोग ? पुत्र-परिणय का मांगलिक अवसर है और ब्रह्मदेवजी उपस्थित हैं, मधुर स्वर में इनका भजन सुनिये, ऐसा मौका फिर कब मिलेगा ?' इतना कहकर पिताजी ब्रह्मदेव चाचा से मुखातिब हुए, भोजपुरी में बोले--"काँहें, एक-दू गो भजने हो जाए दS !" (क्यों, एक-दो भजन ही हो जाने दीजिये।)
संभवतः ब्रह्मदेव चाचा को ऐसे किसी आमंत्रण की आशा नहीं थी। वह अकचकाये और बोले--"दँतवा तS घरे छूट गइल बा, गाइब कइसे ?" (दाँत तो घर पर ही छूट गया है, गाऊँगा कैसे ?)
पिताजी विनोद में बोले--"हम तS ईहे जानत रहीं जे गला से गावल जाला, ई तS विचित्र बात पता चलल कि रउआ दाँत से गाइले!" (मैं तो यही जानता था कि गले से गाया जाता है, यह तो विचित्र बात चली कि आप दाँत से गाते हैं।)
हॉल में जोरदार हँसी के स्वर गूंजे। ब्रह्मदेव चाचा दो क्षण चुप रहे, फिर बोले--"ना, ई बात नइखे। गाइब तs हमहूँ गले से, लेकिन शब्द के उच्चारण स्पष्ट ना होई !" (नहीं, ये बात नहीं है। गाऊँगा तो मैं भी गले से ही, लेकिन शब्दों के उच्चारण स्पष्ट नहीं होंगे।)
पिताजी ने कहा--"ठीक बा, रउआ अस्पष्टे गायीं, हम सब ओकरा स्पष्ट करिके सुनब जा !" (ठीक है, आप अस्पष्ट ही गायें, हम सभी उसे स्पष्ट करके सुन लेंगे।)

उस दिन पिताजी ने ब्रह्मदेव चाचा को भजन सुनाने को विवश कर दिया था। उन्होंने थोड़ी मुश्किल से ही सही, कई भजन सुनाये थे उस दिन! उन्होंने ठीक कहा था, कई शब्द उलझे-से उच्चरित जरूर हो रहे थे, लेकिन उन स्वरों की मधुरता के क्या कहने! उनके स्वरों का आलोड़न वैसा ही मोहक था। स्वरों की उस भाव-धारा में वहाँ उपस्थित सभी लोग बह चले--अत्यंत मुग्धकारी थी स्वरों-शब्दों की वह संयोजना--अत्यंत प्राणवान... !
सन १९८५ में ब्रह्मदेव चाचा आकाशवाणी, पटना से संगीत प्रोड्यूसर के पद से सेवा-निवृत्त हुए, लेकिन संगीत-सेवा से कभी मुक्त नहीं हो सके। उनके ऊपर सरस्वती की असीम कृपा थी।

मेरी श्रीमतीजी (साधना अवस्थी) आकाशवाणी की सुगम-संगीत की सुमधुर गायिका रही हैं। वह १९७६ से ही आकाशवाणी, छतरपुर से सम्बद्ध रहीं, लेकिन १९७८ में विवाहोपरांत उनके गायन और अभ्यास में व्यतिक्रम आ गया था। १९८२ में पटना में स्थापित होने के कुछ साल बाद उन्होंने पुनः गायन की शुरूआत की, लेकिन दो-तीन वर्षों के आकाशवाणीय प्रसारणों के उपरान्त उनकी संगीत-बद्ध गीत-भजनों की झोली खाली हो चली थी। तभी एक दिन पिताजी से मिलने ब्रह्मदेव चाचा घर आये--वह १९९२ का साल था। पिताजी ने उन्हें साधिकार आदेश दिया कि वह साधनाजी को संगीत की शिक्षा दें...! ब्रह्मदेव चाचा बोले--"राउर हुकुम बा तS हम ना तS कहिये ना सकीं, लेकिन हमरा पहिले ओकर परीक्षा लेबे दीहीं।" (आपका आदेश है तो मैं ना तो कह ही नहीं सकता, लेकिन पहले मुझे उसकी परीक्षा लेने दें।) उन्होंने साधनाजी की परीक्षा ली और पिताजी से कहा था--"ई लईकिया तS गावहीं खातिर जनम लेले बिया भइया !" (इस लड़की ने तो गाने के लिए ही जन्म लिया है भइया !)

उस दिन के बाद से ब्रह्मदेव चाचा दो वर्षों तक लगातार, सप्ताह में तीन दिन, साधनाजी को संगीत की शिक्षा देने घर आते रहे। उन्होंने ही प्रसिद्ध तबला-वादक पंडित भोलाप्रसाद सिंह को भी संगत के लिए बुला लिया था। जब वह पहले दिन मेरे घर आये थे, मैंने ही द्वार पर चरण-स्पर्श कर उनका स्वागत किया था। चाचाजी ने जब हारमोनियम लेकर पहला सुर साधा--"राम कहो, राम कहो, राम कहो बावरे, अवसर न चूक प्यारे पायो बड़ो दाँव रे....", मैं स्वयं को रोक नहीं सका, यंत्रवत उठ खड़ा हुआ और आगे बढ़कर मैंने चाचाजी के चरण पुनः छुए! चाचाजी को मेरे इस कृत्य पर हैरानी हुई, मेरी ओर आश्चर्य से देखते हुए बोले--"का भइल हो? फेरु काँहें गोड़ लाग तारs ?" (क्या हुआ? फिर क्यों पैर छू रहे हो ?) मैंने कहा--"मेरा ये प्रणाम तो आपके गले में विराजनेवाली देवी सरस्वती को है !" मेरी बात सुनकर उनके मुख पर एक मीठी मुस्कान खेल गयी ! उनकी वह आश्चर्य-मिश्रित मधुर मुस्कान वाली मुद्रा मैं कभी भूल न सका।
साधनाजी मधुरकंठी तो थीं ही, सुघड़ शिष्या भी थीं। ब्रह्मदेव चाचा के शिक्षण का परिणाम यह हुआ कि बाद के दिनों में उनके गायन में भी कबीर के निर्गुण और रैदास, नानक, विद्यापति के भजनों में चाचाजी के स्वरों की बारीकियाँ प्रकट होने लगीं, वही मनमोहक अनुगूँज सुनाई देने लगी। चाचाजी ने दो वर्षों में साधनाजी के स्वरों में भी नए और मर्मबेधी रंग भर दिए थे, यह कहने में मुझे संकोच नहीं है। सप्ताह में तीन दिन मेरा घर साहित्य और संगीत की जुगलबंदी का मुग्धकारी मंच बनता रहा--एक कमरे में ब्रह्मदेव चाचा के स्वर गूंजते तो दूसरे कक्ष में पिताजी की साहित्यिक गोष्ठियों की मर्मर ध्वनियाँ! हाय, वे मनहर दिन पलक झपकते बीत गए...!

एक शाम ब्रह्मदेव चाचा संगीत-शिक्षण के लिए घर पधारे, वह साधनाजी का जन्म-दिन था। जब उन्हें खाने के लिए केक और मिठाइयाँ दी गयीं और बताया गया कि आज साधना का जन्म-दिन है, तो उन्होंने यूँ ही पूछ लिया--'आज कौन-सी तारीख है ?' उन्हें बताया गया कि आज ४ अप्रैल है तो उल्लसित होकर बोले--'फिर तो आज मेरा भी जन्म-दिन है।" उसी दिन यह राज़ फ़ाश हुआ कि गुरु-शिष्या की जन्म-तिथि एक ही है। लेकिन, यह निरासक्ति उनके स्वभाव की अनूठी विशेषता थी।

१९९५ में साधनाजी के नौकरी पर पटना से दूर, दूसरे शहर, चले जाने से और पिताजी के दुनिया से कूच कर जाने से साहित्य और संगीत का वह नशेमन ध्वस्त हो गया, लेकिन मेरी श्रीमतीजी आज भी श्रद्धानमित होकर ब्रह्मदेव चाचा का स्मरण-नमन करती हैं ! आज भी, कभी-कभी, उनके निर्गुण और भजनों के स्वर गूँजते हैं हमारे मन में, मेरे घर-आंगन में... !

ब्रह्मदेव चाचा ने अपने जीवन में पर्याप्त लोकप्रियता अर्जित की थी, यथेष्ट सम्मान पाया था, जन-जन की प्रीति प्राप्त की थी, किन्तु इसी ज़िन्दगी ने उन्हें गहरे आघात भी दिए थे। सबसे बड़ा आघात वह था, जब काल-मूसल ने उनके युवा कनिष्ठ पुत्र को एक दिन औचक ही कुचल दिया था। वह विक्षिप्त कर देनेवाला वज्राघात था! ऐसे कठिन काल में भी कबीर के शब्दों और उनके स्वरों ने ही उन्हें सहारा दिया था, सम्हाला था उन्हें और उनके कण्ठ से फूट पड़े थे कबीर के शब्द--"रहना नहिं देस बिराना है...!"
जीवन के चौथेपन में ब्रह्मदेव चाचा को अपनी सहधर्मिणी के विछोह की पीड़ा भी सहनी पड़ी थी। दुःख की उस घडी में (श्राद्ध के दिन, शाम के वक़्त) मैं वहाँ उपस्थित हुआ था--देखा, ब्रह्मदेव चाचा निर्लिप्त भावेन दायित्व-पूर्ति में व्यस्त हैं, उनके चेहरे पर फ़िक्र की एक भी वक्र रेखा नही, बस, हल्की शोक-छाया थी; लेकिन जानता था, उनकी मन-वीणा का कोई तार चटख कर टूट गया था...!

ब्रह्मदेव चाचा ने ८६ वर्षों का दीर्घ जीवन जिया था--अपनी ही शर्तों पर, अपने ही अंदाज़ में। पिताजी कहा करते थे--"दीर्घ आयुष्य सहनशीलता की पराकाष्ठा है। यह समझना कठिन है कि दीर्घ जीवन प्रभु का वरदान है या अभिशाप!" ब्रह्मदेव चाचा के सभी निकट मित्र संसार से विदा हो गए थे--अभिन्न मित्र भालचंद्र चाचा, सहपाठी मित्र काश्यप चाचा और पिताजी भी। विछोह की यह आतंरिक पीड़ा उन्हें भी सहनी पड़ी थी। कालान्तर में वह अपने ज्येष्ठ सुपुत्र विनोदनारायण सिंह के पास राँची चले गए थे। मैं जब कभी पटना में उनके अनुज-मित्र कविवर केदारनाथ सिंह (राष्ट्रकवि दिनकर के कनिष्ठ पुत्र) के राजेंद्र नगर स्थित आवास पर जाता, तो उन्हीं से ब्रह्मदेव चाचा के कुशल-क्षेम की जानकारी मुझे मिल जाती।

दिन पर दिन बीतते रहे। मैं श्रीमतीजी की नौकरी के साथ शहर बदलता रहा--पहले नोएडा, फिर पूना। पटना पीछे छूट गया और ब्रह्मदेव चाचा का कुशल-समाचार पाना भी दुस्तर होता गया। तभी, एक दिन (२-२-२०१३ को) पता चला कि शब्दों का मर्म समझनेवाला, भजनों और निर्गुण की आत्मा को गानेवाला, स्वरों का वह चितेरा चला गया। मर्मन्तुद समाचार था। मैं अवसन्न रह गया। रांची में ही उनका देहावसान हो गया था। जाने कितनी पुरानी यादें मन में तैरने लगीं और मस्तिष्क में गूंजने लगे उनके स्वर--"पिया की हवेली, मैं तो चली रे अकेली...!"

संगीत के आसमान में अपने सुरों की जो इंद्रधनुषी छटा ब्रह्मदेव चाचा बिखेर गए हैं, उसके रंग कभी धूमिल नहीं होंगे ! वह ऐसा इंद्रधनुष है जो सदैव आकाश में चमकता ही रहेगा...! शरीर तो मरणधर्मा है, विनष्ट हो जाता है, किन्तु कीर्ति जीवित रहती है--'कीर्तस्य स जीवति....!' ब्रह्मदेव चाचा के स्वरों की यशःकाया हमेशा हमारे बीच रहेगी, हमें अनुप्राणित और सम्मोहित करती हुई...!
(समाप्त)

[चित्र-परिचय : ब्रह्मदेव नारायण सिंह, साधनाजी और मैं... संगीत-शिक्षण के दौर की दुर्लभ छवि...।

शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

ब्रह्मदेव नारायण सिंह : कबीर गाते-गुनते हुए 'कबीर'... (१)

वे मेरे छुटपन के दिन थे, लेकिन इतने भी बालपन के नहीं कि विस्मृति के गर्भ में समा जाएँ ! मुझे याद है, तब मैं तीसरी कक्षा में पढ़ता था और पटना के एक पुराने मोहल्ले कदमकुआँ में किराये के मकान में रहता था--मुख्तार साहब के मकान में ! मुख्तार साहब रोज़ कचहरी जाते थे--दो घोड़ोंवाली बग्घी से। अवकाश के समय में और छुट्टी के दिनों में बग्घी आहाते में खड़ी रहती थी और घोड़े अस्तबल में ! मैं बग्घी की झूठी सवारी खूब करता और अपनी कल्पना के घोड़ों को हाँक लगता, चाबुक फटकारता उनपर। तब, परिवार अपेक्षया बड़ा था--दादी थीं, छोटे चाचा (भालचंद्र ओझा) थे और बड़े चाचा (कृष्णचन्द्र ओझा) की ज्येष्ठ कन्या (गीता ओझा) थीं तथा हम चार भाई-बहन तो माता-पिता के साथ थे ही। दुमंजिला बड़ा-सा मकान था। निचले तल पर हमलोग थे और ऊपर मुख्तार साहब--सपरिवार ! मेरे घर के सामने ही एक विशालकाय कदम्ब का पेड़ था, जिसके चौतरफे चबूतरा बना हुआ था। मैं बग्घी पर या उसी चबूतरे पर मँडराता रहता और किसी भी आगंतुक के प्रथम दर्शन का सौभाग्य प्राप्त करता।
छोटे चाचा के मित्रों की टोली बड़ी थी, उनमें शिवसागर मिश्र, रामेश्वर सिंह काश्यप, केशव पाण्डेय, काशीनाथ पाण्डेय तथा ब्रह्मदेव नारायण सिंह प्रमुख थे ! ये सभी मित्र 'कोहराकशी' (धूमपान) के अभ्यासी थे, किन्तु वे सब पिताजी के दफ्तर चले जाने की बेसब्र प्रतीक्षा किया करते और उनके विदा होते ही बातों का सिलसिला शुरू हो जाता, सबों के ठहाके गूँजते और कदम्ब के पेड़ का चबूतरा गुलज़ार हो जाता तथा कदम्ब का विशाल वृक्ष पीता रहता सिगरेट के धुएँ का उठता गुबार--लगातार ! मैं छोटे चाचा की महफ़िलों का आज्ञाकारी सेवक था--चाय-पानी, सिगरेट-सलाई, पान-तम्बाकू लाने-पहुँचानेवाला और पिताजी के पदार्पण की अग्रिम सूचना देनेवाला भी।

ब्रह्मदेव नारायण सिंहजी छोटे चाचा जैसे ही सुदर्शन व्यक्ति थे। वह जब कभी अकेले मेरे घर आ पहुँचते, मेरी दादी को प्रणाम करना कभी न भूलते। छोटे चाचा से कहते--"चलो, ज़रा माई को प्रणाम कर लूँ।" दादी उन्हें पकड़ बिठातीं और उनसे कहतीं--"ब्रह्मदेव, ऊ वाला गनवाँ सुनावs ना ! ओकर सूर मनवाँ से छूटत नइखे !" (ब्रह्मदेव! वही गाना सुनाओ न! उसके सुर मन से उतरते नहीं हैं।) ब्रह्मदेव चाचा को उनसे पूछना नहीं पड़ता कि वह कौन-सा गीत सुनना चाहती हैं। वह दादी की पसंद जानते थे, गाने लगते--"गंगा नहाये हो रामा सुरुज मिलन के बेरिया...!" (शब्द तो ठीक-ठीक स्मरण में नहीं रहे, लेकिन ऐसा ही कुछ था वह गीत, जिसकी धमक-महक आज भी कहीं मन-प्राण में बसी हुई है)। उनके स्वरों के बाण छूटते ही पूरा घर दादी के कमरे में सिमट आता। दादी तो तन्मय होकर सुनतीं ही, हम सभी मंत्रमुग्ध हो जाते। ब्रह्मदेव चाचा की दानेदार आवाज़ में गजब की खनक थी, पुरअसर कशिश थी, विचित्र सम्मोहन था, अद्भुत आकर्षण था। कई बार ब्रह्मदेव चाचा एक हारमोनियम लेकर भालचंद्र चाचा के साथ कदम्ब की छाया में घंटों बैठे रहते और किसी कविता, किसी पद, किसी गीत को स्वरों में बांधने में लगे रहते। छोटे चाचा काव्य-पक्ष की मीमांसा करते और ब्रह्मदेव चाचा स्वरों की पेचीदगियों का निवारण करते हुए उसकी धुन बनाते। इस तरह दोनों मित्रों के आपसी विमर्श में रचनाएँ स्वर-बद्ध होतीं। मेरी माँ, चचेरी बड़ी दीदी बार-बार उनके लिए चाय बनातीं और चाय की हर प्याली के बाद दोनों मित्र कोहराकशी करते हुए चिंतन-मग्न हो जाते। मेरे बचपन की शरारती आँखों ने देखे थे वे दिन !
सन १९५७ में जब आकाशवाणी, रांची की शुरुआत हुई, तो छोटे चाचा अपने दो मित्रों शिवसागर मिश्र और केशव पाण्डेय के साथ वहाँ उद्घोषक के रूप में नियुक्त हुए थे। मुझे याद है, आकाशवाणी, रांची के उद्घाटन के अवसर पर पिताजी ने एक अभिनन्दन-गीत लिखा था, जिसके शब्द कुछ इस तरह थे--
"एक और स्वर बोला अम्बर की वाणी का अभिनन्दन !
....... ....... जन-जन-कल्याणी का अभिनन्दन !!"
ब्रह्मदेव नारायण सिंहजी १९४८ से ही आकाशवाणी, पटना से बहैसियत 'कैजुअल आर्टिस्ट' जुड़े हुए थे, लेकिन १९६० में संगीत-संयोजक में रूप में वह भी रांची में पदस्थापित हुए। छोटे चाचा की मित्रों की टोली का एक बड़ा टुकड़ा अब रांची में जा बसा था। मित्रता प्रगाढ़ होती गयी और यावज्जीवन यथावत बनी रही। छोटे चाचा और ब्रह्मदेव चाचा में अद्भुत समानता थी--कद-काठी, नाक-नक्श और पहिरावे की भी। दोनों आजीवन खादी का सफ़ेद कुरता-पायजामा पहनते रहे। दोनों एक साथ चल पड़ें तो किसी को भी उनके सगे भाई होने का भ्रम हो सकता था। वैसे, वे सहोदर भ्राता न होकर भी, सगे भाई से कम न थे। आज ब्रह्मदेव चाचा के बारे में लिखते हुए छोटे चाचा के बिना उन्हें स्मरण कर पाना मेरे लिए कठिन हो रहा है। मेरी यह मुश्किल समझी जा सकती है।
४ अप्रैल, १९२७ को ग्राम जैर, जिला नालंदा में जन्मे ब्रह्मदेव नारायण सिंहजी ने अपने पिता के लिए नियुक्त संगीत-शिक्षक से अनायास ही संगीत की शिक्षा पायी थी, लेकिन उनमें संगीत की प्रभु-प्रदत्त असामान्य प्रतिभा थी और संगीत-ज्ञान की उत्कट पिपासा भी। आकाशवाणी, रांची से जुड़ने के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा, उत्तरोत्तर आगे बढ़ते गए। पद की गरिमा से नहीं, अपनी सांगीतिक-प्रज्ञा से और गायन-प्रतिभा से संगीत-जगत में उन्होंने अपना वह स्थान बनाया, जिसकी कामना कोई भी संगीतज्ञ करेगा।
दो वर्ष बाद ही सन १९६२ में ब्रह्मदेव चाचा पदोन्नति पाकर पटना स्थानांतरित हुए। छोटे चाचा से प्रतिदिन का संपर्क बाधित हुआ, लेकिन १९६६ में छोटे चाचाजी भी राँची छोड़कर दिल्ली जा बसे और आकाशवाणी की सेवा करते हुए आजीवन वहीं रहे।
भिन्न-भिन्न विधाओं और दिशाओं के प्रतिभा-पुरुषों की उस टोली में सबने अपने-अपने क्षेत्र में खूब नाम कमाया, कीर्ति-पताकाएं फहराईं--किसी ने लेखन के क्षेत्र में, किसी ने काव्य-फलक पर, किसी ने व्यंग्य-विनोद-अभिनय के मंच पर, तो किसी ने राजकीय सेवा के उच्चतम पदों पर पहुंचकर; लेकिन सुरों की जीवनव्यापी साधना करते हुए ब्रह्मदेव नारायण सिंहजी ने जरा-मरण के भय से अपने आपको ऊपर उठा लिया था। उनके स्वरों का सम्मोहन श्रोताओं को बाँध लेता था और एक सच्चे सुर-साधक की तरह उन्होंने अपने आपको बंधन-मुक्त कर लिया था।....
सन १९५० से १९८० के तीन दशकों का काल-फलक रेडियो-प्रसारणों के नाम रहा। तब दूरदर्शन का आविर्भाव नहीं हुआ था, समाचार से मनोरंजन तक सबकुछ रेडियो-प्रसारणों से मिलता था। हर घर में तीन से सात बैंड का एक रेडियो-सेट होता था और उन्हीं से समाचार, संगीत, ज्ञानप्रद वार्ताएँ और रेडियो-नाटक सुनने को मिलते थे। रेडियो के उस स्वर्ण-काल में आकाशवाणी, पटना से पिताजी के लिखे नाटक, रामेश्वर सिंह काश्यप का लिखा तथा अभिनीत हास्य-व्यंग्य प्रधान नाटक 'लोहा सिंह', विंध्यवासिनी देवी के गाये लोकगीत और ब्रह्मदेव नारायण सिंहजी का गायन बहुत लोकप्रिय हुआ। श्रोता आतुरता से इन कार्यक्रमों की प्रतीक्षा करते थे। मेरी दादी ने ठीक ही कहा था--ब्रह्मदेव चाचा के सुर मन से उतरते नहीं थे, मन-प्राण में कहीं बस जाते थे।
मेरे पिताजी आकाशवाणी, पटना के स्थापना-काल (१९४८) से ही हिन्दी सलाहकार के रूप में जुड़े हुए थे। जब १९६२ में ब्रह्मदेव चाचा स्थानांतरित होकर पटना चले आये, तो आकाशवाणी में पिताजी से उनका प्रतिदिन का मिलना-जुलना होने लगा। पिताजी से उनका सम्बन्ध तो पुराना था, लेकिन प्रतिदिन के संपर्क से हुआ यह कि चाचा के सभी मित्रों में एक वही थे जो उनके मुँहलगे अनुज थे। अपनी बात साहस करके वही पिताजी से कह सकते थे, अन्यथा सभी मित्र पिताजी से दूरी बनाये रखते थे और सहज संकोच के एक अदृश्य आवरण के पीछे रहना पसंद करते थे।
सन १९६९-७० से मैं भी अपनी कविताओं के ध्वन्यांकन के लिए रेडियो जाने लगा था। वैसे भी, किसी-न-किसी काम से मुझे पिताजी के पास प्रायः वहाँ जाना पड़ता था। 'मुक्त'जी का पुत्र होने के कारण वहाँ सभी मुझसे स्नेह करते थे--पिताजी का कक्ष सम्मिलित रूप से शेयर करनेवाले उर्दू सलाहकार सुहैल अजीमाबादी, फणीश्वरनाथ रेणु, सत्या सहगल, विंध्यवासिनी देवी, पुष्पा आर्याणी, मधुकर गंगाधर और ब्रह्मदेव नारायण सिंह आदि! इन सबों की प्रीति पाकर मैं फूला न समाता था। अक्सर ऐसा होता कि जब मैं 'युववाणी' कार्यक्रम में अपनी कविताओं की रिकॉर्डिंग के लिए स्टूडियो में जाता तो देखता, किसी अन्य कक्ष में ब्रह्मदेव चाचा वादकों की मण्डली के साथ गायन में मशगूल हैं। ध्वन्यांकन कक्ष में तो प्रवेश वर्जित था, लिहाज़ा मैं द्वार पर लगे शीशे के पास ठहर जाता, कक्ष स्वर-अवरोधी था, सुन तो कुछ पाता नहीं, बस, उनके गायन की तन्मय मुद्रा निहारता रहता। जब वह बाहर आते, मैं चरण-स्पर्श करता। वह खिल उठते, कुशल-क्षेम पूछते, खासकर भालचंद्र चाचा की कुशलता के समाचार लेते, आशीष देते मुझे। और मैं उनकी सहज प्रीति पाकर प्रसन्नचित्त हो जाता।
बाद के वर्षों में ब्रह्मदेव चाचा ने गायन के अनेक कीर्तिमान स्थापित किये थे। मेरा संगीत-ज्ञान तो नगण्य है, फिर भी एक मुग्ध और सजग श्रोता होने की हैसियत से कह सकता हूँ कि उनके स्वरों का सम्मोहन, आवाज़ का अनूठापन और अदायगी का अंदाज़ अपने प्रभा-मंडल में श्रोताओं को बाँध लेता था। उन्होंने भक्ति-पदों का गायन इतनी भाव-प्रवणता से किया कि श्रोतागण उसके स्वर-लोक में आबद्ध हो जाते थे। उन्होंने देश के दिग्गज रचनाकारों के गीतों को संगीतबद्ध कर उनका गायन किया, जिनमें दिनकर, बच्चन, वीरेन्द्र मिश्र, शम्भुनाथ सिंह आदि प्रमुख थे। वह संगीत के सच्चे शिल्पकार थे। ऐसे सच्चे सुर लगाते जो हृदय पर सीधा असर करते थे। मुझे लगता है, उनके गायन में एक अजीब-सा बाँकपन भी था, जो दूसरे गायकों से उन्हें अलग खड़ा करता था। वह अपने समय के सर्वाधिक लोकप्रिय सुगम-संगीत गायक थे। मोमिन का एक शेर है--
'उस गैरत-ए-नाहीद की हर तान है दीपक,
शोला-सा लपक जाय है, आवाज़ तो देखो !'
उनकी हर तान की बात ही कुछ अलहदा थी। उन्होंने ग़ज़ल गायन का अपना अलग ही अंदाज़ विकसित किया था, जिससे मलिका-ए-ग़ज़ल बेगम अख्तर भी बहुत प्रभावित हुई थीं और उन्होंने उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की थी।
उनमें अभिमान लेशमात्र नहीं था, किन्तु स्वाभिमान प्रचुर मात्रा में था। खरे आदमी थे, खरी बात बोलते थे--पीठ पीछे नहीं, मुंह पर बोलते थे। भालचंद्र चाचा से ही सुना था, मुम्बई की मायानगरी ने भी उन्हें कई बार पुकारा-बुलाया था, कई प्रलोभन दिए थे उन्हें, लेकिन अपनी जड़-ज़मीन से जुड़े ब्रह्मदेव चाचा ने ऐसे आमंत्रणों-प्रलोभनों को कभी महत्त्व नहीं दिया। जब मित्रों ने उन्हें बहुत समझाने की कोशिश की तो एक दिन खीझकर बोले--"मैं यहीं खुश हूँ, उस जन-समुद्र में कौन जाए अपना कंधा छिलवाने? जिसको गरज़ पड़ी हो, आये और मुझे पकड़ ले जाए।"... लेकिन इस सुविधाभोगी दुनिया में किसको फुर्सत थी, उन्हें पकड़ ले जाने की और ब्रह्मदेव चाचा थे कि अपने ही स्वरों की दुनिया में मग्न थे, पूरी बेफ़िक्री के साथ...।
जीवन-भर संगीत की साधना करते हुए ब्रह्मदेव चाचा ने निर्गुण-गायन की ऐसी झड़ी लगायी कि उस संगीत-वर्षा में कई-कई पीढ़ियाँ भीगती रहीं, अनुप्राणित होती रहीं। उन्होंने विद्यापति, मलूकदास, रैदास, नानक आदि के भजनों को ऐसी निपुणता से स्वर-बद्ध किया और इतनी तन्मयता से गाया कि उसका प्रभाव आज भी यथावत बना हुआ है। उन्होंने तुलसीकृत रामचरित मानस का गायन किया था, जिसका प्रसारण आकाशवाणी के सभी केंद्रों से प्रातःकालीन कार्यक्रम के प्रारम्भ में 'मानस-पाठ' के रूप में होता था। मैंने कई बार उन स्वरों के साथ ही सुबह-सबेरे अपनी आँखें खोली थीं। संभव है, उसका प्रसारण आज भी आकाशवाणी के सभी केंद्रों से होता हो, लेकिन उसे सुननेवाले श्रोता अब नहीं रहे। उन्होंने बिहार की तीन आँचलिक भाषाओं--मैथिली, भोजपुरी और मगही-- में अप्रतिम लोकगीतों का गायन भी किया। कबीर के निर्गुण पद गाते-गाते और गुनते-गुनते उनका अपना अंदाज़ और रहन-सहन भी कबीराना हो गया था--बेफिक्र, अलमस्त और सूफ़ियाना !.... कबीर उनकी अंतरात्मा पर कुछ इस क़दर छा गए थे और ऐसी शिद्दत से स्वरों में उतर आये थे कि लोग-बाग उन्हें 'संगीत का कबीर' ही कहने लगे थे! कबीर के निर्गुण उनके श्रीमुख से सुनकर ऐसा लगता था कि कबीर स्वयं अलमस्त भाव से अपना ही पद गाते हुए चल पड़े हैं--'साहब हैं रंगरेज कि चुनरी मोरी रंग डारी'...!
(अगली क़िस्त में समापन)
[चित्र : स्वर-साधक ब्रह्मदेवनारायण सिंह की युवावस्था की एक छवि]

गुरुवार, 18 अगस्त 2016

देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद का एक बहुत पुराना पत्र...

देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद का पिताजी के नाम लिखा यह पत्र, आपके सामने रख रहा हूँ। पत्र जर्जर हो चुका है, लेकिन पिताजी के कागज़ों में पिछले ७५ वर्षों से बिना करवट लिए यह कैसे सानंद विश्राम कर रहा था, यही आश्चर्य का विषय है ! आज इसे जगत-सम्मुख रखकर मैं प्रसन्न हूँ। जय हिन्द!!
(--आनन्द.)


मूल प्रति का टंकित प्रारूप :
बजाजवाड़ी, वर्धा. ३०-१०-१९४१
प्रिय प्रफुल्लजी ,
आपके सब पत्र मिलते गए। पुस्तक का तीसरा फर्मा भी पहुँच गया। दो तो पहले ही पहुँच चुके थे। मेरे भाषण का वह अंश जो 'आरती' में उद्धृत होने जा रहा है, वह भी मिल गया। मुझसे जहाँ तक हो सकता है, मैं करने के लिए तैयार हूँ। इस पर भी अगर सफलता न मिले, तो हमारा दुर्भाग्य है। तौ भी, हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। 'आरती' के विशेषांक के लिए मेरी इच्छा है कि मैं कुछ स्वतंत्र लिख भेजूँ। पुस्तक से उद्धरण विशेषांक के योग्य नहीं है। अभी समय है। मैं आशा करता हूँ कि कुछ लिख सकूँगा। अगर कोई चलता विषय जिस पर लिखने के लिए पढ़ने की ज़रूरत न हो, मिल जाता तो आसानी होती।
और सब आनंद है।
गान्धीजी ने नियम बना लिया है। वे पत्र-पत्रिकाओं के लिए न लेख लिखते हैं और न सन्देश भेजते हैं। इसलिए उनकी आशा तो छोड़ ही देनी चाहिए।
आपका--
ह०-- राजेन्द्र प्रसाद.
[पुनः : सन १९४०-४२ में पिताजी के सम्पादन में पटना से निकलनेवाली पत्रिका मासिक 'आरती' के सम्मान्य संरक्षक थे राजेन्द्र बाबू; उसी सन्दर्भ का है यह पत्र!]

शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

'लोहासिंह' की अंतर्कथा : रामेश्वर सिंह काश्यप (२)

बहरहाल, बचपन के दिन तो आशियाना बदलते बीत गए। सन १९६०-६१ में काश्यपजी फिर हमारे पड़ोसी बने। पटना के श्रीकृष्ण नगर मुहल्ले के २३ संख्यक मकान में हम जा बसे और काश्यपजी सपरिवार ७ संख्यक मकान में आये! हमारे घरों की दूरी दो बाँस से अधिक नहीं थी। काश्यपजी के परिवार से पुरानी घनिष्ठता तो थी ही, उनके कनिष्ठ सुपुत्र विपिनबिहारी सिंह मेरे अभिन्न बाल-सखा वहीं बने! बचपन की उस मित्रता का रंग ही निराला था ! रात के शयन का वक़्त छोड़कर हम दोनों प्रायः साथ-साथ रहने को विकल रहते। स्कूल का साथ तो था ही, शेष समय भी विपिन या तो मेरे घर में होते या मैं उनके घर में। वह अपने गाँव से आया गुड़-चूड़ा मेरे लिए ले आते, मैं उसे अपनी हॉफ पैंट की दोनों जेबों में भर लेता और मज़े से खाता-चबाता रहता। मेरी शामत तब होती, जब माँ मेरे कपड़ों की धुलाई करतीं। पैंट की जेब से चूड़े के कण और गुड़ का मटमैला रंग निकलकर बहने लगता और मुझे उनकी डाँट खानी पड़ती। हम दोनों मित्र आम-अमरूद के बगीचे में साथ जाते, खेलते, खाते और मटरगश्तियां करते ! बाल्य-काल की मेरी नाट्य प्रस्तुतियों में विपिन मेरे सहभागी भी होते और प्रतिद्वन्द्वी भी।
काश्यपजी के घर में सर्वत्र मेरा निर्बाध प्रवेश था, लेकिन केवल उनका ही कमरा इसका अपवाद था। उनके कमरे में किसी भी बाहरी व्यक्ति के प्रवेश की सख़्त मनाही थी, फिर भी विपिन की आड़ में मैं उनके कमरे में भी यदा-कदा चला ही जाता था। उस कक्ष में कागज़-पत्तर का अम्बार था, पुस्तकों से भरी-ठुंसी आलमारियाँ थीं और एक अदद ऊँची पलँग, जिसका अर्धांश फाइलों और पुस्तकों से भरा रहता था। वहाँ विश्वविद्यालय की उत्तर-पुस्तिकाओं के गट्ठर होते और ऐश-ट्रे के बगल में रखा होता 'पाशिंग शो' सिगरेट का टिन-पैक या 'गोल्डन फ्लैक' की सुनहरी डिब्बी ! हम सबकी आँखें बचाकर उसी डिब्बी से दो सिगरेट निकाल लेते और धूमपान की कला में निष्णात न होते हुए भी निर्जन वन-वीथियों में जाकर उसका धुआँ उड़ाते और फिर नींबू के पत्ते चबाकर मुँह की दुर्गन्ध मिटाने चेष्टा करते। अजीब सपनीले बेफ़िक्री से भरे दिन थे वे भी।...
उन दिनों श्रीकृष्णनगर लेखकों-कावियों-नाटककारों-संगीतज्ञों और प्रबुद्ध-प्रखर व्यक्तित्वों से भरा पड़ा था। पिताजी से मिलने सभी आया करते, लेकिन काश्यपजी तभी आते, जब छोटे चाचाजी राँची से पटना आते, जो आकाशवाणी, राँची में उद्घोषक के पद पर नियुक्त हो चुके थे। काश्यप चाचा आते भी, तो पिताजी से नज़रें बचाते हुए, हम बच्चों को घर के बाहर ही पकड़ने की फ़िराक़ में रहते। अधिकतर मैं ही उन्हें बाहर खेलता, उधम मचाता मिल जाता। वह धीमी आवाज़ में मुझसे कहते--"पंडितजी कहाँ हैं? उन्हें बुला दो।" हमें मालूम था, 'पण्डित' कहने से उनका अभिप्राय क्या होता था। मैं उनके आदेश पर चाचाजी को घर के बाहर बुला लाता और फिर वे दोनों मित्र कहीं और विचरण के लिए निकल जाते।
मैंने हमेशा उन्हें पिताजी से कन्नी काटते देखा। संभवतः युवावस्था से छोटे चाचाजी के साथ पिताजी का लिहाज़ और सम्मान का अभ्यास इस संकोच का कारण रहा हो, अन्यथा भद्र समाज में काश्यप चाचा स्वयं बहुत सम्मानित-समादृत व्यक्ति थे, गरिमामय भव्य मूर्ति तो वह थे ही। लेकिन पिताजी के प्रति उनका यह संकोच अंत तक बना रहा।...
काश्यप चाचा अधिकतर पैंट-शर्ट पहनते, जाड़ों में कोट धारण करते और गले में एक मफलर डाल लेते। कभी उनके सिर पर एक फेल्ट कैप होती, कभी टोपी भी। आँखों पर पॉवर का चश्मा। कभी सिगरेट पीते, कभी पाइप ! वह पान-प्रणयी भी थे, लेकिन पान खाकर महाविद्यालय जाना पसंद नहीँ करते थे। भरी-पूरी देह थी, स्थूल होने से बची हुई। वह बाहर से गुरु-गम्भीर दिखते, लेकिन अत्यंत विनोदी और स्नेही थे। उनका मित्र-मण्डल बड़ा था, वह जब अपने निकट मित्रों (ब्रह्मदेव नारायण सिंह, केशव पांडेय, शिवसागर मिश्र और भालचंद्र ओझा आदि) के बीच होते तो व्यंग्य-विनोद की ऐसी-ऐसी फुलझड़ियाँ छूटतीं, इतने ठहाके फूटते कि मत कुछ मत पूछिए ! विपिन के साथ मिलकर की गयी मेरी बाल्यकाल की उद्दंडताओं के लिए उन्होंने कभी डाँटा-फटकार नहीं मुझे। मैं चकित होकर सोचता हूँ, ऐसे गंभीर व्यक्ति की कलम से हँसी के फव्वारे छुड़ा देनेवाले संवाद कैसे उपजते थे ? उस ज़माने में पटना में इतना जन-कोलाहल और इतनी भीड़-भाड़ नहीं थी, रिक्शा शान की निरीह सवारी समझी जाती थी, जब जहाँ मन हो, रिक्शा रुकवा लीजिये, सड़क-किनारे खड़े मित्र से जी-भरकर बातें कीजिये, पान की दूकान पर पान खाइये और फिर उस पर सवार होकर आगे चल पड़िये। मैंने काश्यप चाचा को ज़्यादातर रिक्शे की सवारी करते देखा, सिगरेट का धुआँ उड़ाते-चलते। प्रतिदिन महाविद्यालय जाने के लिए उनकी प्रिय सवारी रिक्शा ही थी !
प्रायः पाँच साल श्रीकृष्ण-नगर के आशियाने में सुख से बीते। वहीं मेरी माँ ने विपिन की माँ के साथ मिलकर छठ-व्रत का अनुष्ठान आरम्भ किया था। छठ के दिनों में हम दोनों का घर सम्मिलित परिवार-जैसा हो जाता। छठ जैसे पावन पर्व के दिन गहरी आस्था और उत्साह-उमंग में व्यतीत होते। दोनों व्रती माताएँ घर-परिवार की बेटियों के साथ मिलकर छठ के गीत गातीं, मिष्टान्न बानाये जाते, बाज़ार से खरीद-फ़रोख़्त होती और सर्वत्र पवित्रता का साम्राज्य होता। गुड़-मिश्रित गन्ने के रस में जो खीर मिट्टी के पात्र में 'खरना' (लोहण्डा) के दिन बनायी जाती, उसके अनूठे स्वाद को मेरी जिह्वा आज तक नहीं भूली। वैसी अमृतोपम रसना फिर जीवन में कभी नहीं मिली। वे जीवन के अविस्मरणीय दिन थे।
मैं अपने आपको सौभाग्यशाली मानता हूँ कि इन्हीं पाँच वर्षों में मुझे 'लोहासिंह' की दो-तीन मंच-प्रस्तुतियाँ देखने का अवसर मिला था। उन दिनों रेडियो का वार्षिक उत्सव मनाया जाता था, जिसे 'रेडियो-वीक' के नाम से जाना जाता था। पूरे सप्ताह एक-न-एक आयोजन होता, कभी किसी रंगशाला (भारतीय नृत्य-कला मन्दिर अथवा रवीन्द्र भवन) में या कभी आकाशवाणी के विशाल प्रांगण में मंच बनाकर और शामियाने-कनात लगाकर। 'लोहासिंह' का मंचन और कवि-गोष्ठी, सम्पूर्ण आयोजन का मुख्य आकर्षण होती थी। पिताजी की वज़ह से अपने परिवार के अन्य सदस्यों के साथ मुझे अग्रिम पंक्ति में बैठने का सुअवसर मिलता था। चीनी आक्रमण के बाद के वर्ष में 'लोहासिंह' की नाट्य प्रस्तुति की याद मैं कभी भूल न सका, उसमें देश-प्रेम की, दुश्मनों के दाँत खट्टे कर देने की जैसी ललकार और हुंकार भरी थी, वह मेरी चेतना में लंबे समय तक निरंतर गूँजती रही थी।
भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद काश्यपजी की एक भोजपुरी कविता किसी पत्रिका में छपी थी, उसे मैंने पढ़ा था। उस कविता की पहली कड़ी मेरी स्मृति में आज तक सुरक्षित है :
"मति भभकS भुट्टो बुतइब तूँ !
चाऊ-माऊँ के छौना तूँ,
बावन अँगुरी के बौना तूँ,
देखत बानी फुदकत बाड़S
माटी के रंगल खेलौना तूँ;
जब काम परी तरुआरन के
पानी पड़ते गलि जइब तूँ !
मति भभकS भुट्टो बुतइब तूँ !!"
सन १९६५-६६ में माताजी की नयी नौकरी के साथ परिवार श्रीकृष्णनगर से उखड गया और जीवन-दिशा बदल गयी। हम सभी उसके बाद नए नीड़ का निर्माण ही करते रहे--पटना सिटी, दिल्ली, ज्वालापुर और फिर वापस कंकड़बाग, पटना। इस बीच काश्यपजी और उनके परिवार से बहुत-बहुत दूरियाँ रहीं। इस दीर्घ कालावधि में माँ कहीं बीच राह में छोड़ गयीं, छोटे चाचा दिल्ली जा बसे। मेरे बाल-सखा विपिन मेरी बचपन की यादों में सिमटकर रह गए।...
मुझे अस्सी के दशक की याद है, पिताजी के अस्वस्थ होने की सूचना पाकर उनसे मिलने भालचंद्र चाचा पटना आये हुए थे। एक दिन दरवाज़े पर दस्तक हुई। मैंने द्वार खोला तो देखा, काश्यप चाचा सामने खड़े हैं ! उनका वही सम्भ्रम, वही हिचकिचाहट, वही झिझक और वही प्रश्न--"पण्डित हैं क्या, बुला दो उन्हें!" बचपन के दृश्य आँखों में तारे-से छिटके। लेकिन चाचाजी घर पर नहीं थे, वह किसी से मिलने बाहर गए हुए थे, यह सूचना जैसे ही मैंने उन्हें दी, वे लौट जाने को तत्पर हुए ही थे कि पीछे से पिताजी प्रकट हुए और उस दिन उन्होंने काश्यप चाचा की खूब खबर ली, बोले--"ददन (छोटे चाचा का घर नाम) नहीं हैं तो क्या हुआ, मैं तो हूँ! कभी मेरी भी खोज-खबर ले लिया कीजिये काश्यपजी !" और आश्चर्य, काश्यप चाचा सिर झुकाये बड़े भाई की फटकार चुपचाप सुनते रहे, फिर चाय पीकर लौटे ! वह अनन्य प्रीति की फटकार थी और काश्यप चाचा के विनयावनत होने की पराकाष्ठा।
बात दरअसल यह थी कि उन दिनों पिताजी, पितामह की अनूदित कृति वाल्मीकीय रामायण के पुनर्प्रकाशन की वृहत योजना पर काम कर रहे थे! इसके लिए उन्होंने अपने तमाम मित्रों, अनुजों और सम्बन्धियों से सहायता की याचना की थी। उन्होंने काश्यप चाचा को भी दो-तीन पत्र लिखे थे, लेकिन पत्र अनुत्तरित रहे। सेवा-मुक्त होकर काश्यप चाचा सासाराम चले गए थे। वह कभी वहाँ होते, कभी पटना में और इन्हीं व्यस्तताओं में पिताजी के पत्र का उत्तर न दे सके थे। पिताजी को यह बात नागवार गुज़री थी और वह काश्यप चाचा से नाखुश थे।
फिर कुछ वर्ष बीत गए। वह १९९२ का अक्टूबर महीना था, एक दिन पिताजी मेरी मोटर साइकिल पर बैठकर एक सभा में शिरक़त करने गए थे, वहीं नाटककार डॉ. जितेंद्र सहाय से उन्हें यह सूचना मिली कि पिछली रात काश्यप चाचा का निधन (24-10-1992) हो गया है। वह मधुमेही थे, प्रतिदिन नियम से इन्सुलिन का इंजेक्शन लिया करते थे, इसी कारण अन्य व्याधियों ने भी उन्हें घेर लिया था। यह सूचना पाकर पिताजी का मर्म आहत हुआ, मुझे भी गहरा धक्का लगा। सभा की समाप्ति पर लौटते हुए पटना रेलवे स्टेशन के महावीर-मन्दिर के पास फूलों की एक दूकान पर रुकने का आदेश पिताजी ने दिया। वहाँ से उन्होंने थोड़े-से फूल लिए और मुझसे कहा--'मुझे श्रीकृष्ण नगर ले चलो, काश्यपजी को अन्तिम प्रणाम तो कर आऊँ ! दीर्घ आयुष्य की यह पीड़ा भोगने के लिए मैं ही तो अभिशप्त बचा हूँ।"
हम ७, श्रीकृष्णनगर पहुँचे। दिन के २-२.३० बज रहे थे और काश्यपजी के आवास पर गहरा सन्नाटा पसरा था। प्रवेश-द्वार से अंदर तक फूलों की पंखुड़ियाँ बिखरी थीं। पड़ोसी से पूछने पर ज्ञात हुआ कि सुबह १०-११ बजे ही घरवाले पार्थिव शरीर को लेकर सासाराम चले गए हैं। पैतृक ग्राम में ही उनका अंतिम-संस्कार होगा। यह खबर और भी मर्माहत करनेवाली थी। पिताजी की मुख-मुद्रा देखकर मैं चिंतित हो रहा था। पिताजी ने प्लास्टिक की थैली से फूल अपनी अँजुरी में लिए और मुख्य द्वार पर उन फूलों को रखकर उठ खड़े हुए--करबद्ध, बंद नेत्र थोड़ी देर वहीं स्तम्भित खड़े रहे, मैंने भी पिताजी का अनुसरण किया। दो क्षण बाद पिताजी लौट चलने को पलटे और लड़खड़ाये, मैंने उन्हें सहारा दिया। मोटरसाइकिल के पास पहुँचकर पिताजी ने कहा--'थोड़ी देर कहीं रुकना होगा... ।'
मैं समझ गया, यह आघात पिताजी के लिए असहनीय हो उठा है। मैंने मोटरसाइकिल वहीं छोड़ दी और पिताजी को धीरे-धीरे सड़क के पार ले गया, जहाँ श्रीराधाकृष्ण प्रसादजी का आवास था---१७, श्रीकृष्णनगर ! राधाकृष्णजी पिताजी के अनुज मित्र तो थे ही, पुराने सहकर्मी भी थे। पिताजी वहीं बैठे, राधाकृष्णजी से बातें कीं, प्रकृतिस्थ हुए। उसके बाद हम घर लौट आये। उस दिन एक यशस्वी जीवन-दीप बुझ गया था और परिवार-जनों, परिजनों, निकटस्थों, आत्मीयों के बीच छोड़ गया था एक बड़ी रिक्तता और गहरा अवसाद...!...
इस साल सावन में जब मेघ मल्हार गा रहे हैं, मेरे मन में उमड़-घुमड़ रही हैं काश्यपजी लिखी एक भोजपुरी कविता की कुछ पंक्तियाँ, जो उन्होंने वीर कुँवर सिंह के जीवन पर लिखी थीं--'गदर सत्तावन के, महीना रहे सावन के' :
"गदर सत्तावन के,
महीना रहे सावन के,
सुराज के लड़ाई में भारत के पहिला सिंह गरजन,
बनल रहे आसमान धरती के दरपन.
नीचे धरती पर रहे गोली सनसनात.
घोड़ा भागत रहे हिनहिनात,
छूटत चिनगारि रहे टाप के रगड़ से,
खा के महावत के गजबाँक, हाथी चिंघारत रहे.
तोप के दहाना से दनादन आग बरसे,
मइया से असीस ले के,
तिरिया के पीठ ना देखावे के वचन दे के,
जबकि भोजपुरिया जवान,
रख तरहत्थी पर जान, निकल पड़ले घर-घर से
गदर सत्तावन के,
महीना रहे सावन के !"
काश्यप चाचा के गुज़र जाने के सवा साल बाद भालचंद्र चाचा (२४-२-१९९४) और उसके प्रायः दो वर्ष बाद पिताजी (२-१२-१९९५) भी इस दुनिया से चले गए। पिताजी ठीक कह गए थे कि अनुजों के जगत से विदा होने की पीड़ा भोगने के लिए वे ही अभिशप्त थे।....
(समाप्त)

[चित्र : आकाशवाणी, पटना के ५० वर्ष पूरे होने पर 'दि हिंदुस्तान टाइम्स', पटना ने २५ जनवरी १९९८ को सम्पूर्ण रविवारीय पृष्ठ तत्कालीन उत्कृष्ट कलाकारों की चर्चा को समर्पित किया था। इस पृष्ठ पर काश्यपजी का चित्र और उनकी चर्चा है। मेरे व्यक्तिगत अनुरोध पर भाई विनोद नारायण सिंहजी ने उसकी क्लिप मुझे भेजने की कृपा की है। तदर्थ आभार उनका--आनंद.]

बुधवार, 3 अगस्त 2016

'लोहासिंह' की अंतर्कथा : रामेश्वर सिंह काश्यप ... (१)

पटना का एक पुराना मुहल्ला है चिरैयाटाँड़। इसी मुहल्ले में वैद्यनाथ आयुर्वेद की फैक्ट्री और प्रमुख कार्यालय है। कार्यालय परिसर जहाँ ख़त्म होता है, उससे थोड़ा आगे बढ़ते ही पूर्व दिशा की ओर एक सड़क जाती है। इसी सड़क पर एक वकील साहब का दुमंज़िला भवन था। इसी भवन के निचले तल पर ५ नवम्बर १९५२ की सुबह मैंने अपनी आँखें खोली थीं और इस जगत में फैला प्रकाश पहली-पहली बार देखा था। इसी भवन के प्रथम तल पर सपरिवार रहते थे रामेश्वर सिंह काश्यप। रोहतास जिले के सेमरा गांव में जन्मे (16 अगस्त, 1927) काश्यपजी मेरे छोटे चाचा (भालचंद्र ओझा) के घनिष्ठ मित्र थे। एक ही भवन में रहते हुए दोनों का दिन-रात का साथ तो था ही, पारिवारिक निकटता भी थी।
जिस ज़माने की बात कह रहा हूँ, काश्यपजी ने पटना विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी और उसी के बी.एन. कॉलेज में हिन्दी के प्राध्यापक के रूप में नियुक्त हुए थे। मेरे छोटे चाचा कहानी-लेखक के रूप में प्रसिद्धि पा रहे थे। दोनों की उम्र में ख़ासा अंतर तो था, लेकिन दोनों पिताजी से बहुत छोटे थे। दोनों धूमपान के व्यसनी थे और उन्हें पिताजी का इतना लिहाज़ था कि छोटे चाचा रह-रहकर ऊपरी मंज़िल पर काश्यप चाचा के पास जा बैठते थे अथवा चिरैयाटाँड़ के चौराहे तक टहलते चले जाते तथा चौराहे की खपरैलवाली एक चाय की दूकान में जा बैठते, चाय पीते और धूमपान कर लौट आते।

उन दिनों चिरैयाटाँड़ का पुल निर्माणाधीन था। चाय की दूकान का छप्पर अपेक्षया कुछ अधिक झुका हुआ था, जिसमें बैठकर चाय या सिगरेट पीते हुए पुल के निर्माण का अर्धांश ही देखा जा सकता था। मेरे छोटे चाचाजी ने वहीं देखा था उन मज़दूरों को सिर पर बोझ ढोते हुए, जो एक पतली पगडण्डी पर पंक्तिबद्ध चलते थे; लेकिन छप्पर की ढलान के कारण मज़दूरों के पाँव ही दिखते थे, सिर नहीं। ऐसा लगता था, सिर्फ पाँव चल रहे हैं--कतारबद्ध! चाचाजी को अपनी एक कहानी का प्लॉट यहीं, इन्हीं मुद्राओं को देखकर मिला था। उनकी उस प्रसिद्ध कहानी का शीर्षक था--'क़तार के पैर'। आकाशवाणी, पटना के 'पुस्तक-चर्चा' कार्यक्रम में चाचाजी की इस कहानी की भूरि-भूरि प्रशंसा आचार्य नलिनविलोचन शर्माजी ने की थी।
बहारहाल, जब मैं डेढ़-दो साल का बालक था, माँ-पिताजी से सुना है, थोड़ा श्यामवर्णी था--ईषत स्थूल, घुंघराले बालोंवाला चंचल बालक ! काश्यप चाचा जब महाविद्यालय से लौट आते, तो मुझे अपनी गोदी में उठा लेते, हवा में उछालते और भोजपुरी में कहते--"ई लइकवा तS लोहासिंह हS भाई!' 'का हो लोहा सिंह, कइसन मिजाज बा ?" वगैरह...! काश्यपजी के इस लाड़-दुलार का मुझे तो बिलकुल स्मरण नहीं, लेकिन पिताजी बताते थे कि रोज़-रोज़ की इस पुकार से ही उन्हें 'लोहासिंह' नामक हास्य-नाटक लिखने की प्रेरणा मिली थी और वह नाटक इतना मकबूल हुआ था कि वर्षों तक उसका प्रसारण आकाशवाणी, पटना से साप्ताहिक रूप से होता रहा। विशेष बात यह थी कि हास्य-नाटिका में प्रमुख पात्र 'लोहासिंह' की भूमिका स्वयं काश्यप चाचा निभाते थे। संवाद की आदायगी का उनका अंदाज़ निराला था। उनके बोले हुए हर वाक्य श्रोताओं को कुछ इस तरह गुदगुदाते कि वे ठठाकर हँस पड़ते थे।
जब मैं थोड़ा बड़ा हुआ और सोचने-समझने की मेरी बुद्धि किंचित विकसित हुई, तब की ठीक-ठीक याद है मुझे, पूरे बिहार में, गाँव-देहात और जनपदों में लोग 'लोहासिंह' नाटक के प्रसारण के पहले ही अपने-अपने रेडियो-सेट ऑन करके एकत्रित हो जाते थे और पूरा नाटक सुनकर खूब आनंदित होते थे। वे अगले सप्ताह की आतुर प्रतीक्षा किया करते थे। टी.वी. सीरियल 'रामायण' और 'महाभारत' के लिए घर-मुहल्ले और जनपदों में तो लोग बाद में एकत्रित हुए थे, उसके बहुत पहले 'लोहासिंह' के लिए गाँव-गाँव के चौपालों में रेडियो-सेट के पास पूरे गाँव के पुरुष जमा होते थे और रेडियो-नाटक का श्रवण कर आनंद-विभोर हो जाते थे। इस नाटक में पात्रों की बहुलता नहीं थी, बहुत कम पात्रों के बीच कथा का ऐसा ताना-बाना बुना जाता था कि श्रोता मंत्र-मुग्ध हो जाते थे। इस रेडियो-नाटक से काश्यपजी को यथेष्ट प्रसिद्धि मिली थी। कहने का तात्पर्य यह कि 'लोहासिंह' नाटक का प्रेरक-शिशु मैं ही था, यह मुझे बहुत बाद में ज्ञात हुआ था।...
'लोहासिंह' ब्रिटिश काल की सेना के एक अवकाश-प्राप्त सैनिक थे। उनकी पत्नी थीं--खदेरन को मदर (खदेरन की माँ), खदेरन (बाबू लोहा सिंह के सुपुत्र), बुलाकी [बाबू लोहा सिंह के साले साहब जो कुछ-कुछ मन्दबुद्धि थे और जिनकी शक्ल का चौखटा महिलाओं की तरह साफ़-सुथरा ('मेहरारूवन जइसन सफाचट) था], भगजोगनी (खदेरन की माँ की सेविका, जो मालिक और मालकिन, दोनों की मुँहलगी थी), फाटक बाबा (बाबू लोहा सिंह के पुरोहित)। इन पात्रों के अलावा कई पात्र स्क्रिप्ट की माँग के अनुसार आते-जाते रहते थे, जैसे--खोभारी (पीकर 'धुत्त' रहनेवाला गाँव का एक व्यक्ति), बंगाली डॉक्टर (परिवार नियोजन विषय पर आधारित हास्य नाटिका का एक पात्र)।
लोहा सिंह के मुँह से जब 'काबुल का मोर्चा पर सार्जेण्ट का मेमिन' का ज़िक्र आता, तो लोग हँसते-हँसते लोटपोट हो जाते थे। पटना आकाशवाणी से जब 'लोहासिंह' नाटक का प्रसारण होता तो पूरा बिहार थथम जाता और दूसरे दिन से हफ्ता भर उसके संवादों की गूँज सर्वत्र होती रहती। 'लोहसिंह' हास्य-नाटक के संवाद की एक बानगी देखना आनंददायी होगा--
"लोहा सिंह--'फाटक बाबा ! काबुल का मोरचा पर हम एक से एक करनैल का मेम आउर एक से एक जरनैल का मेमिन देखा, बाकी खदेरन को मदर का डिजैन का एक्को नहीं था. बुझाता है, जे बिधाता इसको बनाके ऊ सँचवे तूर दिया, जे मे कि इसको डिजैन का दोसर जनाना पैदे जन होखे।'
खदेरन की माँ--'आ मार बढ़नी रे ! जब देख त काबुल के मोरचा, जब देख त मेम आ मेमिन ! ई 'मेम' आ 'मेमिन' का होला जी?'
लोहा सिंह (ठहाका लगाते हुए)--'तुम मेम आ मेमिन का फरक नहीं बूझा ? अरे, मेम आ मेमिन में ऊहे फरक होखता है, जे 'जनाना' आ 'जनानी' में होखता है. का कहते हैं फ़ाटक बाबा ?'
फाटक बाबा--'जजमान ! तूँ चल्हाँकी के चीलम, काबीलियत के कनस्तर, अकिल के अलमारी आ बुधी के बटलोही हवS. तहार बराबरी केहू कर सकेला का ?'
लोहा सिंह'-'चाबस ! चाबस !"
कालान्तर में 'लोहसिंह' नामक एक फिल्म भी बनी थी, जो बिहार के बाहर बहुत नहीं चल सकी।
(अगली पोस्ट में समापन)
[चित्र : खेद है, नेट पर बहुत खोजने पर भी प्रो. रामेश्वर सिंह काश्यपजी का कोई चित्र मुझे नहीं मिला। अंततः उनकी कार्य-स्थली बिहार नेशनल कॉलेज का एक चित्र रखकर आलेख की पहली कड़ी पोस्ट कर रहा हूँ।]

शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

'कील गुर्रों' उर्फ़ काठ का घोड़ा...

मेरे घर के सामने ही उनका घर था--भिन्न-मुखी ! मेरा घर पश्चिमाभिमुखी तो उनका उत्तराभिमुखी ! १२ वर्ष का चंचल बालक मैं क्षण-भर में २० फ़ीट की सड़क लाँघकर उनके घर पहुँच जाता था। उस घर में निवास करती थीं दक्षिण-भारतीय एक सुघड़ ब्राह्मणी! ३५-३६ की उम्र रही होगी, दुबली पतली थीं, नासिका में अपेक्षाकृत बड़ा-सा सोने का आभूषण पहने रहती थीं--सामान्य रूप-स्वरूप की हंसमुख महिला! तेलुगुभाषिणी थीं, लेकिन वर्षों उत्तर भारत में व्यतीत करते हुए साफ़-सुथरी हिंदी भी धाराप्रवाह बोलने लगी थीं। आज इतनी मुद्दत बाद उनका स्मरण करता हूँ तो यादों के आसमान में उभरता है उनका मुस्कुराता हुआ गोरा चेहरा और मन में एक अजब-सी कसक उठती है ! उन्हें मैंने हमेशा एक रंगीन सूती साड़ी में देखा, जिसे वह दक्षिण भारतीय महिलाओं की तरह धारण करती थीं। मैंने जब कभी उनके घर की साँकल बजाई, वह फुर्ती से आयीं--किसी काम से हाथ छुड़ाकर, द्वार खोला, आँचल से मुँह पर आया पसीना पोंछा और 'तुम बैठो, मैं अभी आयी' कहती हुई लौट गयीं। अत्यन्त स्नेहमयी थीं वह ! हम उनके स्नेह के वशीभूत उन्हें 'चाचीजी' कहते थे !
चाचीजी का परिवार सुदर्शन लोगों का परिवार था। उनके दो प्रवासी बच्चे, एक बेटी और एक बेटा, अपने दादा-दादी के पास किसी दूसरे शहर में रहते थे और गर्मी की छुट्टियों में ही अपनी माँ के पास आया करते थे ! वे जब आते, हमारा खेल खूब जमता--आइस-बाइस, चोर-सिपाही, कैरम-लूडो...! घर के बरामदे में सेफ्टी पिन से परदे डालकर हम बाल-नाटक भी खेला करते थे। उस कच्ची उम्र में मैंने अति उत्साह में एक लघु-नाटक भी लिखा था--'अमर शहीद भगत सिंह'! मेरे लिखे उस बचकाने नाटक का बार-बार हमने मंचन किया था और उसे मोहल्ले की महिलाओं की खूब सराहना मिली थी।
चाची के पतिदेव निर्लिप्त व्यक्ति थे--घर से भी, अपने बच्चों से भी और आस-पड़ोस, टोले-मुहल्ले-समाज से भी। उन्हें अपने दफ़्तर से कभी फुर्सत ही नहीं होती थी। सुबह के निकले देर रात, जाने कब घर आते। हमें तो कभी-कभार ही उनके दर्शन होते। उम्र की चालीसवीं पायदान के आसपास ही थे वह भी।
चाचीजी की बड़ी बेटी मेरी बड़ी दीदी की हमउम्र थीं औेर सुपुत्र मेरी उम्र के। हमारी गहरी मित्रता थी और गर्मी की छुट्टियों के दिन बड़ी मौज-मस्ती में व्यतीत होते ! लेकिन ऐसा तो वर्ष में एक ही बार होता, एक-सवा महीने के लिए। जब वे चले जाते, तब भी हमारा अड्डा चाचीजी का घर ही होता ! स्कूल से लौटकर हम सीधे उनके घर चले जाते, वहाँ हमारा निर्बाध प्रवेश था। हमारा स्वागत करते हुए बेध्यानी में कई बार उनके मुँह से तेलुगु में एक वाक्य निकल जाता--'रा बाई कूरचो!' (आओ बच्चों बैठो)। अर्थ के साथ वह वाक्य मैं आज तक नहीं भूला। चाची हमेशा मुस्कुराती मिलतीं। वह हमारे साथ कैरम खेलतीं, लूडो खेलतीं, खूब बातें करतीं और मुग्ध कर देनेवाली कहानियाँ सुनातीं।
ऐसी ही सम्मोहक और विमुग्धकारी एक कहानी उन्होंने हम बच्चों को धारावाहिक रूप में सुनाई थी--'कील गुर्रों' अर्थात~ काठ का घोड़ा ! लम्बी कथा थी, सात-आठ दिनों में ख़त्म हुई थी। उस कहानी की अगली कड़ी की हम सभी व्यग्र प्रतीक्षा करते थे और रातों की नींद में उसी कथा के पात्रों को स्वप्न में देखा करते थे ! यह बाल-मन पर कहानी का सहज प्रभाव था या कथा की अतुलनीय सम्मोहक शक्ति--यह मैं कभी सुनिश्चित नहीं कर सका ! लेकिन इतना तय है कि कथा-वाचन की अद्भुत कला चाचीजी के पास अवश्य थी।
मुख़्तसर में कहूँ तो कथा यह थी कि एक राजकुमार अपनी प्रेमिका की तलाश में राजमहल से निकलता है। उसी प्रेमिका से उसका विवाह होनेवाला था, लेकिन उसके पहले ही वह विलुप्त हो गयी थी। बहुत भटकने के बाद बीहड़ वन में उसे एक तांत्रिक से प्राप्त होता है--काठ का घोड़ा और खोयी हुई राजकुमारी का संभावित सूत्र ! काठ का वह घोड़ा आकाश-मार्ग में विचरण करनेवाला जादुई घोडा था। राजकुमार उसी घोड़े पर बैठकर उड़ चलता है। फिर तो वह अनेक लोकों में जाता है, अनेक बिघ्न-बाधाओं-संकटों से जूझता है, नदी-पहाड़-समुद्र लाँघता है, नगर-द्वीपों पर युद्ध करता है और इंद्रजालिक तिलस्मी नगरों के तिलस्म तोड़ता है; लेकिन अंततः वह अपनी राजकुमारी को ढूँढ़ लाने में सफल हो जाता है।
इस कथा का हम सभी बच्चों पर विस्मयकारी जादुई असर था। हम उसके सम्मोहन में ऐसे बँधे थे कि मत पूछिये। आज ५५ वर्षों बाद भी, कथा का सिलसिलेवार क्रम चाहे मन से मिट गया हो, मूल कथा अच्छी तरह याद है मुझे ! चाचीजी ने अपने बचपन के दिनों में यह कहानी तेलुगु में पढ़ी थी कभी !

सन् १९६०-६१ में उस मुहल्ले में स्थापित होने के कुछ समय बाद ही मेरी माताजी ने वहाँ की महिलाओं के सहयोग से भजन-कीर्तन की एक मण्डली बना ली थी। मेरी माता प्रभु-भक्त महिला थीं। अब सप्ताह में दो दिन (मंगल और शनिवार) कीर्तन की तेज आवाज़ मुहल्ले में गूँजने लगी थी। कीर्तन में ढोलक-वादन का दायित्व चाचीजी निभाती थीं। जब हमने उन्हें पहली बार पूरी दक्षता से ढोलक बजाते हुए देखा था, तो हमें आश्चर्य हुआ था। हंसमुख महिला तो थीं ही, मग्न-भाव से वादन करतीं और साथ ही कीर्तन में अपना मधुर तेजस्वी स्वर भी मिलाती जातीं। मेरी माताजी उनके सुमधुर व्यवहार, सद्भाव और उनकी प्रतिभा से बहुत प्रभावित थीं। शीघ्र ही दोनों में प्रगाढ़ मैत्री-सम्बन्ध स्थापित हो गये थे, लेकिन मेरी माताजी उम्र में चाची से बड़ी थीं। लिहाज़ा, चाची मेरी माँ का बड़ी बहन-सा बहुत आदर-मान किया करती थीं।
साल के दस-ग्यारह महीने, दिन के वक़्त, चाची घर में तनहा रहतीं। एक अपने लिए उन्हें क्या-कितना भोजन बनाना होता? किचन से घण्टे-भर में फारिग हो जातीं और उसके बाद हम बच्चों के स्कूल से लौट आने की आतुर प्रतीक्षा करतीं। हम भी उनके पास पहुँचने की व्यग्रता में रहते। घर से जल्दी-जल्दी कुछ खा-पीकर चाची के पास पहुँच जाते। फिर जमता हमारा खेल या शुरू हो जाती चाची की कथा-कहानी ! मैंने हमेशा उन्हें मुस्कुराते, गुनगुनाते, दौड़ते-भागते देखा--सदैव प्रसन्नचित्त! प्रायः दो वर्ष उनके सान्निध्य में सुखपूर्वक बीत चुके थे।
एक दिन उनके पास अकेला ही पहुँचा और कैरम की गोटियाँ बोर्ड पर बिछा लीं, लेकिन चाची 'अभी आती हूँ' कह तो रही थीं, आती नहीं थीं ! मैंने उन्हें आवाज़ें लगनी शुरू कीं। बहरहाल, थोड़े अधिक विलम्ब से वह आयीं और खेल शुरू हुआ। मैंने देखा, उनका मुख कुछ मलिन है, कांतिहीन है। चेहरा भी कुछ धुला-धुला-सा; जैसा बहुत रो लेने के बाद होता है। एक गहरी उदासी से घिरी हैं वह ! यह मेरे लिए अप्रत्याशित था। मैंने पूछा--'चाची, आप उदास क्यों हैं?'
उन्होंने कहा--'नहीं, कुछ नहीं, आज तबीयत ठीक नहीं है !' मैं निरुत्तर हो गया। बेमन से खेल तो हुआ, लेकिन चाचीजी की उदासी का सबब मेरे दिमाग में प्रश्न बनकर घूमता रहा ! उनकी ऐसी दशा कई दिनों तक रही और मेरी बाल-बुद्धि यही मानती रही कि आज भी उनकी तबीयत ठीक नहीं है शायद। लेकिन जब एक पखवारा बीत गया और वह सामान्य मनोदशा को प्राप्त नहीं हुईं, तो मैं उदास रहने लगा। उनके दुःख का कारण जानने के लिए उनसे बार-बार प्रश्न करने लगा। मेरे निरन्तर और आकुल प्रश्न पर अंततः वह भाव-विगलित हो उठीं और एक दिन तो फूट-फूटकर रोने ही लगीं। मेरा किशोर-मन बहुत आहात हुआ। मेरी आँखों में भी आँसू भर आये। मुझे विह्वल होता देख उन्होंने अपने आप को संयत किया, मेरी सजल हो आयी आँखों को पोंछा, लेकिन अपने कष्ट के बारे में कुछ भी नहीं बताया।
उस शाम जब घर आया तो मेरा मलिन मुख देखकर माताजी ने कारण पूछा। मुझे कुछ पता तो था नहीं, क्या कहता ? मैं माँ से बोल--'आजकल चाची मेरे साथ खेलती नहीं, कहानियाँ भी नहीं सुनातीं और बहुत उदास रहती हैं। लेकिन आज तो वह रोने ही लगीं ! उन्हें रोता देखकर मैं भी रो पड़ा अम्मा !'
माँ ने मुझे समझाया कि 'हो सकता है, वह बीमार हों, उन्हें कोई तकलीफ हो, जिसे वह तुम्हें बताकर परेशान न करना चाहती हों! तुम दुखी मत हो, मैं पूछूँगी उनसे।'
फिर कुछ महीने बीत गए। एक दिन माँ ने मुझे साथ चलने को कहा। दोपहर का वक़्त था, मैं उनके साथ हो लिया। उन दिनों उनकी दन्त-चिकित्सा चल रही थी, वह प्रायः डॉ. एम.वाई. च्यांग के क्लिनिक जाया करती थीं और ऐसे अवसरों पर मुझे साथ ले जाती थीं। मैं भी उनके साथ जाने को तत्पर रहता, क्योंकि डॉ. च्यांग उन्हें आइसक्रीम खाने की सलाह देते और वहाँ से लौटते हुए माँ के साथ मुझे भी आइसक्रीम का लाभ हो जाता। हम रिक्शे पर बैठे और चल पड़े। ४०-४५ मिनट की यात्रा के बाद रिक्शा जहाँ रुका, वहाँ डॉक्टर का क्लिनिक तो था नहीं, तिमंजिले भवनों की श्रृंखला थी। मैंने माँ से पूछा--'तुम कहाँ जा रही हो अम्मा?' माँ ने इशारे से मुझे चुप रहने को कहा। रिक्शेवाले को उसका मेहनताना देकर माँ ने मेरा हाथ पकड़ा और एक तिमंजिले मकान के पहले माले पर ले गईं। मैं समझ गया कि आज की मेरी आइसक्रीम पर पानी फिर गया।....
माँ जिस दरवाज़े पर जा रुकीं, वह फ्लैटनुमां घर था। माँ ने कॉल बेल बजायी। क्षण-भर की प्रतीक्षा के बाद एक महिला ने द्वार खोला। माँ बोलीं--"....आपका ही नाम है? गृहस्वामिनी ने स्वीकृति में सिर हिलाया। माँ ने कहा--'मुझे आपसे ही कुछ बात करनी है, बस दो मिनट का वक़्त लूँगी !' वह महिला दृढ़ता से द्वार पर खड़ी रहीं और तत्काल बोलीं--'हाँ, कहिये!'
माँ ने कहा--'यहाँ बात करना ठीक न होगा। हम क्या बैठकर बातें नहीं कर सकते?'
अब उन्हें द्वार का अवरुद्ध मार्ग छोड़ना पड़ा और कहना पड़ा--'जी, आइए न !' हम उनके फ्लैट के ड्राइंग रूम में पहुँचे। माँ सोफ़े पर बैठ गयीं और अपनी बात की भूमिका बनाने लगीं। अभी वह मुद्दे की बात पर आने ही वाली थीं कि एक गौरांग महाप्रभु कक्ष में औचक आ धमके। उनकी गोद में रोता हुआ एक नवजात शिशु था। मैंने खड़े होकर उन्हें प्रणाम करते हुए कहा--'प्रणाम अंकल !' उन्हें पहचानने में मुझे कोई दिक़्कत नहीं हुई--वे तो मेरी चाचीजी के जीवन-सहचर थे ! उन्होंने सफ़ेद धोती तहमद की तरह बाँध रखी थी। उन्हें देखते ही त्वरित गति से मेरी माँ उठ खड़ी हुईं! उन्होंने आग्नेय नेत्रों से चाचाजी की ओर देखा। अग्नि-वर्षा करती माँ की तीक्ष्ण दृष्टि का ताप वह सह न सके, उल्टे पाँव लौटे। माँ ने भी मेरी कलाई पकड़ी तथा मुझे बलात खींच ले चलीं--बाहर!
मेरी बाल-बुद्धि समझ न सकी कि मेरे पड़ोसी चाचाजी वहाँ क्यों, कैसे विराज रहे थे और वह भी घर के वस्त्रों में! माँ के साथ फिर रिक्शे से लौटा। रास्ते-भर मैं माँ से सवाल-पर-सवाल पूछता रहा, लेकिन वह मौन रहीं--गम्भीर मुख-मुद्रा थी उनकी! अपनी जिज्ञासा के अंतहीन प्रश्रों पर अंततः मुझे माँ की डाँट खानी पड़ी और मौन धारण करना पड़ा ! लेकिन यह घटना मेरी स्मृति से कभी मिटी नहीं, धुँधली नहीं हुई...!

इस घटना के बाद के छह महीनों में मैंने चाचीजी को क्रमशः घुटते-घुलते देखा। अब न वह सरस कहानियाँ सुनातीं, न प्रसन्नचित्त होकर हमारे खेलों में सहभागी होतीं! उनकी प्रसन्नता कहीं विलुप्त हो गयी थी, चिंताओं का न जाने कौन-सा विषैला कीड़ा उन्हें अंदर-ही-अंदर खोखला किये जाता था। लेकिन, मैंने प्रतिदिन उनके पास जाना नहीं छोड़ा, विगत वर्षों में उनसे जो प्रेम-स्नेह मिला था, उससे मैं आबद्ध था ! वह एक फीकी मुस्कराहट के साथ मिलतीं, मुझसे पूछतीं--'कुछ खाकर आये हो?' मैं हामी भरता और उन्हें हँसाने, प्रसन्न करने के सौ जतन करता, लेकिन वह सूनी आँखों से जाने कहाँ देखती रहतीं!...
दिन बीतते रहे, लेकिन छह महीने बाद ही मेरे परिवार में बड़ी उथल-पुथल हुई। माँ अपनी नौकरी के सिलसिले में राँची के पास खूँटी में जा बसीं और मैं भी अपने दो छोटे भाई-बहन के साथ वहीं चला गया। उस मुहल्ले में बसा-बसाया नीड़ बिखर गया। और, चाचीजी से प्रतिदिन का सम्पर्क विच्छिन्न हो गया, लेकिन वह मेरी स्मृति में बसी रहीं।
बाल्य-काल से किशोरावस्था की दहलीज़ लाँघते हुए मैं लगातार सोचता ही रहा कि वे कौन-से कारण थे, जिन्होंने चाचीजी को जीवितावस्था में ही निष्प्राण बना था...! लेकिन मेरी अविकसित बुद्धि में इसके कारण-तत्व समाते नहीं थे।
ज़िन्दगी अपनी राह बढ़ चली। कई वर्ष गुज़र गए। जब मैं महाविद्यालय की पढ़ाई की पहली-दूसरी पायदान पर था, वर्षों बाद उस पुराने मुहल्ले में जाने का मौका मिला। सहज जिज्ञासा से चाचीजी के घर के सामने पहुँचकर मैं ठिठक गया और मन्त्र-मुग्ध-सा उसके दरवाज़े की कॉल बेल मैंने बजा दी। एक अपरिचित व्यक्ति ने द्वार खोला। उनसे थोड़ी-सी बात करके जब मैं लौटा तो पूरा आसमान चीलों की तरह मेरे सिर पर मँडरा रहा था। उस अपरिचित से मिली सूचना के अनुसार कई वर्ष पहले ही चाचीजी मौत की डोर पकड़कर इस निगोड़ी दुनिया से चली गयी थीं। मेरी आँखों में आँसू थे और मन में तूफ़ान! मैं पैदल ही दूर तक चलता चला गया।
एक ही ख़याल मन में बार-बार उठ रहा था--क्या चाचीजी को भी दूसरी दुनिया में जाने के लिए काठ का वही जादुई घोड़ा मिला होगा? क्या उस पर सवार होकर वह खोज सकी होंगी अपना सच्चा जीवन-सहचर, अनन्य प्रेमी, निश्छल प्रेम और अपने लिए परम शान्ति का देश ?.... जबकि मैं समझदार हो चुका था। जीवन के उलझे धागों को सुलझाने का हुनर आ गया था मुझे।...

शनिवार, 9 जुलाई 2016

हिन्दी पर सवार अँगरेज़ी...

'हिन्दी पर सवार अँगरेज़ी...' --प्रफुलचन्द्र ओझा 'मुक्त'

[पिताजी की एक अप्रकाशित पुस्तक है--'सिर धुनि गिरा लागि पछितानी'। यह पुस्तक 'साहित्य और समय' विषयक मुक्त-चिन्तनों का संग्रह है। इन दिनों मैं उसका प्रूफ पढ़ रहा हूँ। एक लेख पर ठहर गया हूँ। आनन्ददायी आलेख है, पुराना है-- ११.५.१९७९ का, लेकिन आज की दशा पर करारी चोट करता है। लेख में उठाया गया प्रश्न तब भी प्रासंगिक था, आज कुछ ज्यादा ही हो गया है। नयी दिल्ली से प्रकाशित होनेवाले दैनिक पत्र 'नवभारत टाइम्स' में छपा था। पठनीय है, इसीलिए आपके सामने भी रखने का मन हो आया है। --आनन्द]

अँगरेज़ी बड़ी अच्छी भाषा है। वह बड़ी समृद्ध है। उसमें बड़ा ऊँचा साहित्य है। वह हमारे पुराने मालिकों की भाषा है। हम कृतघ्न नहीं हैं। अपने गए-गुज़रे मालिकों की भाषा से इसीलिए हम पिछले सत्ताइस वर्षों से चिपके हुए हैं। अँगरेज़ी भले ही हमसे अपना दामन छुड़ाना चाहती हो, हम उसे किसी तरह नहीं छोड़ना चाहते। आखिर दुनिया को पता कैसे चलेगा कि हम दो सौ वर्षों तक अँगरेजों के गुलाम रह चुके हैं? अतीत को भुला देना, अतीत से अपने को काट लेना, क्या अपनी नींव को कमज़ोर बनाना नहीं है ?
अँगरेजों ने हमें सिर्फ गुलामी नहीं दी। उन्होंने वह सारी तड़क-भड़क भी दी, जिसे हम आज अपनी आँखों के सामने देखते हैं। आराम-आसाइश के ये तमाम साधन, यह दोगली सभ्यता, यह नयी संस्कृति--यह सब तो हमें अँगरेजों ने ही दिया है और फिर उन्होंने हमें वह भाषा भी दी है, जो आज दुनिया के कई देशों में बोली-पढ़ी-लिखी जाती है। अगर हमने उस भाषा को तरजीह दी है तो ज़ाहिर है, हम अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया की बराबरी में आ खड़े हुए हैं।
मुश्किल यह है कि इसके बावजूद हम अपनी भाषा को भुला नहीं पाते। अगर किसी तरह ऐसा हो सकता कि रातों-रात हिन्दुस्तान की तमाम भाषाएँ ख़त्म हो जातीं और सारा देश अँगरेज़ी में ही हँसता, रोता, गाता, सोचता और लिखता-बोलता तो कितनी अच्छी बात होती ! लेकिन ऐसा शायद होना नहीं है। सत्ताइस वर्षों में नहीं हुआ तो अब क्या उम्मीद की जा सकती है ?
लेकिन कोई बात नहीं। हिन्दी है तो हुआ करे, हमने उसके सीने पर अँगरेज़ी को सवार कर रख है। हम हिन्दी या संस्कृत शब्दों को रोमन अक्षरों में लिखकर पढ़ते हैं। इससे उसका उच्चारण अँगरेज़ी ढंग का बन जाता है। फिलहाल हमें इतने से ही संतोष करना पड़ रहा है।
आजकल 'आर्यभट्ट' की बड़ी शोहरत है। पुराने ज़माने में इस नाम के एक बहुत बड़े गणितज्ञ और खगोलशास्त्री हमारे यहां हो गए हैं। भारत ने जब अपना पहला उपग्रह तैयार किया तो स्वभावतः उसका नाम 'आर्यभट्ट' रखा। अब चूँकि सरकारी कामकाज की भाषा अँगरेज़ी है, इसलिए उसे लिखा गया रोमन अक्षरों में 'ARYABHATA' । आज के ज्यादातर लोगों ने तो शायद रोमन लिपि में लिखे इस नाम को पहली बार ही पढ़ा-सुना होगा, इसलिए अखबारों यह नाम 'आर्यभट' या 'आर्यभटा' के रूप में चल निकला। जो लोग अँगरेज़ी अखबार ही पढ़ते हैं, उन्होंने अगर इसे 'अर्यभट' या 'आर्यभाटा' भी पढ़ा हो तो क्या अचरज ?
अभी उस दिन बच्चे कोई रेडियो प्रोग्राम सुन रहे थे। अचानक मेरे कान में एक शब्द पड़ा--'जटाका कथाएं'। मैं चौकन्ना हो गया। लिखते-पढ़ते पचास साल का अरसा गुज़र गया, 'जटाका' शब्द मेरे लिए अनजाना था। वक्ता रेडियो के ही कोई कारीगर थे। जब उन्होंने बार-बार 'जटाका कथाओं' का उल्लेख किया तो मुझे लगा कि हो-न-हो, ये जातक कथाओं की बात कर रहे हैं। बेचारे ने अँगरेज़ी में कहीं 'JATAKA' पढ़ लिया होगा और वे 'जटाका' उच्चारण ले उड़े। उन्हें दोष भी कैसे दिया जा सकता है ? आप खुद चाहें तो रोमन में लिखे इस शब्द को 'जटक', 'जटाका', या 'जाटाका' पढ़ लें, कोई आपका क्या करेगा ?
मुझे एक पुरानी बात याद आ रही है। पटना रेडियो के ग्रामीण प्रोग्राम में एक स्थायी कार्यक्रम का शीर्षक था--'धान से धन'। ज़ाहिर है कि प्रोग्राम रोमन में टाइप होता था; क्योंकि उसे मीटिंग में पढ़कर सुनानेवाले कभी बंगाली होते, कभी दक्षिण भारतीय और कभी पंजाबी। अब वे बेचारे 'DHAN SE DHAN' को 'धन से धन', 'धान से धान', 'धन से धान' और 'धान से धन' पढ़ते थे, तो इसमें उनका क्या कसूर था?

लेकिन 'आर्यभट' या 'जटाका' कोई एकलौते उदाहरण नहीं हैं। हिंदी के बहुसंख्यक पत्रों, पोथियों और बोलचाल में हिन्दी के सीने पर सवार अँगरेज़ी का यह अपरूप आप देख सकते हैं। सारी दुनिया जानती है कि विश्व-कवि रवींद्रनाथ ठाकुर 'टैगोर' हो गए। रोमन लिपि ने जब 'ठाकुर' को चबाकर 'टैगोर' उगला, तो विश्व-कवि स्वयं अपने को 'टैगोर' लिखने लगे थे।
लेकिन यह सब चाहे जो भी हो, अँगरेज़ी बड़ी अच्छी भाषा है, बड़ी समृद्ध है, उसमें ऊँचे दर्ज़े का साहित्य है, उसमें अभिव्यक्ति की जो ताकत है, उसका जवाब नहीं है। अपनी गुलामी की स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए हमें अँगरेज़ी को हिन्दी के सीने पर सवार रखना ही पड़ेगा। हमारे देश में बड़े-बड़े दिमागवालों का यही ख़याल है। यह ख़याल ग़लत कैसे हो सकता है।
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