बुधवार, 28 जून 2017

मालूम था, सप्ताह में दो-तीन दिन माली आता है बेटी शैली के घर और देखभाल करता है बागीचे की, लेकिन मैंने कभी देखा नहीं था उसे। बीस दिनों के प्रवास में वह आया न हो, ऐसा तो नहीं है, मगर वह जब भी आया, मैं घर के अंदर, गुसलखाने में, शेव करता हुआ, अखबार पढ़ता या टीवी देखता रहा। आमना-सामना कभी हुआ नहीं था उससे मेरा। आज सुबह मैं बिलकुल उसके सामने जा पड़ा। तब मैं बारामदे में बैठा पान बना रहा था। वह आया और मुझसे छह फीट की दूरी पर खड़ा हो गया। मुझे लगा, उसे कुछ कहना है मुझसे। मैंने आँख उठाकर देखा उसे, तो पाया कि वह मुझे ही एकटक देख रहा है। मेरी आँखें उससे जैसे ही मिलीं, वह मीठा मुस्कुराया। मैंने सोचा, मुस्कुरा लेने के बाद वह कुछ कहेगा, लेकिन वह चुप था और लगातार मुझे घूरने की हद तक देखता हुआ मुस्कुराता जा रहा था। यह मुझे कुछ अजीब-सा लगा। यह बात भी मन में उठी कि मानसिक रूप से वह स्वस्थ भी है या...

मुझे उम्मीद थी, वह नमस्ते कहेगा, 'गुड मार्निंग' बोलेगा, लेकिन वह तो मुस्कुराता हुआ 'मौनी बाबा' निकला। मन में आया कि कहूँ उससे, 'भले आदमी, जब कुछ कहना ही नहीं है तो जाओ, अपना काम करो।' लेकिन वह स्थायी भाव में था, अडिग था। अब क्या करूँ, कुछ समझ नहीं पाया। माली भाई तब ही सामने से हटे, जब मुझसे मेरी एक अदद विवश मुस्कान उन्होंने वसूल ली।...

आज ही लगे हाथ दूसरा-तीसरा हादसा भी हो गया। परसों की वापसी की यात्रा है मेरी। मैं, श्रीमतीजी और बेटी के साथ 'लुल्लू माॅल' चला गया। बचपन में महामूर्खतापूर्ण एक खेल खेला करता था--'लुल्लूपाला'। सिलाई के धागों में ढेला बाँधकर पेंच लड़ाना और प्रतिपक्षी के धागे को काटकर उसे परास्त कर सुख पाना। लगता है, उसी 'लुल्लू' नाम पर एशिया का बेस्ट माॅल उठ खड़ा हुआ है। क्या नहीं मिलता वहाँ! मैंने सोचा, कुछ मेवे-मसाले खरीद ले चलूँ, यहाँ बड़े अच्छे मिलते हैं। दोनों देवियाँ जानती हैं कि माॅल में बहुत हलकान होना मुझे प्रिय नहीं है और पान न मिलने से मेरे अस्तित्व का नेटवर्क भी 'वीक' हो जाता है, सो वांछित सामग्री खरीद लेने के बाद उन्होंने मुझे टरका दिया, कहा--'जाइये, कार में सामान सेट कीजिए और वहीं बैठकर पान खाइये, हम अभी आते हैं।'

मैंने उनकी बात मान ली, क्योंकि मेरा नेटवर्क भी कमजोर पड़ रहा था। पार्किंग में खड़ी कार में सामान रखकर मैं बैठ गया और पान बनाने लगा। तभी एक सम्भ्रांत व्यक्ति सामने से आते दिखे। पास आकर उन्होंने एक मीठी मुस्कान मेरी ओर फेंकी और जब तक जवाबी कार्रवाई में मैं अपनी चवनियाँ मुस्कुराहट उन्हें लौटा पाता, वह आगे बढ़ गये।

अभी पाँच मिनट ही बीते होंगे कि माॅल के गणवेश में चालीस के आसपास की एक महिला ट्राॅली समेटती दिखी। जिस ट्राॅली से मैंने सामान खाली किया था, उसे लेने वह कार के समीप आयी और पास पहुँचते ही उसने भी एक मीठी मुस्कान दी। एक बार तो भ्रम हुआ कि मुझमें कहीं कोई गड़बड़ी तो नहीं? लोग मुझे देख-देखकर मुस्कुरा क्यों रहे हैं आखिर? फिर मैंने तय पाया कि नहीं, गड़बड़ तो कहीं कुछ नहीं; अच्छा-खासा आधी बाहोंवाला श्वेत-स्वच्छ कुरता, वैसा ही धवल पायजामा, आँखों पर ऐनक और पाँवों में सैंडल--सब यथास्थान है, गड़बड़ क्या होगी भला? लेकिन इस दफ़ा मैंने देर नहीं की, लगे हाथ मैंने भी एक फीकी-सी मुस्कान लौटनियाँ उसे दे दी। विलंब करने में यह खतरा भी था कि कहीं वह भी मालीजी की तरह वहीं अँटक गयी और मुझे देखकर मुस्कुराती खड़ी रही, तो मेरा क्या होगा! लेकिन चिंतनीय कुछ नहीं हुआ और मेरी असहज मुस्कान लेकर वह चली गई। उसके चले जाने के बाद मन में खयाल आया कि काश, वह एक सम्भ्रांत विदुषी होती तो मैं भी, पान से पिटी और सड़ी हुई अपनी बत्तीसी बचाता हुआ, एक 'एक्सट्रा लार्ज' साइड की मुस्कान उसे दे ही देता।

मुझे फ़िक्र हुई, अपरिचित लोगों के इस तरह मुस्कान लुटाने के पीछे आखिर माजरा क्या है, यह मुझे बेटी से पूछना ही चाहिए। उसे यहाँ रहते हुए एक साल हो गया है, कुछ तो समझा ही होगा उसने, इस रहस्यमयी मुस्कान का राज़!

बेटी ड्राइव कर रही थी, मैं उसकी बगलवाली सीट पर था और उसकी माता पीछे। माॅल से लौटते हुए मैंने पूरी बात बेटी को बतायी। उसने कहा कि 'यह यहाँ का स्वाभाविक अभिवादन है। वैसे भी, मलियाली लोग वेशभूषा से भिन्न भाषा-भाषियों को चिह्नित कर लेते हैं, इसीसे वे एक स्माइल देकर ऐसे लोगों का स्वागत करते हैं।' बेटी की इस बात से मैं चकित हुआ।

दौड़ती कार मेें जब मैैं यही प्रसंग सुना रहा था और बात ट्राॅली समेटनेवाली महिला तक पहुँची थी, तभी श्रीमतीजी ने मेरी अतिभाषिणी जिह्वा थाम ली और कहा--'वह संभ्रांत विदुषी भी होती तो उससे आपको क्या फ़र्क पड़ता था?' पत्नी नामक प्रजाति में यही बड़ी ख़ामी होती है। वे मूलतः दोष-दर्शन और छिद्रान्वेषण की अधिकारिणी होती हैं। अगर मेरे मन में ऐसी कामना जगी भी थी, तो इसमें कोई दोष कहाँ था? बस, कामना-भर ही तो थी। मैैंने दबी जबान मेें कहा--'लेकिन, इसमें आपत्तिजनक क्या हैै?'

श्रीमतीजी ने जो कुुुछ कहा, वह रेेेखांकित करनेे योग्य हैै--'आपत्तिजनक तो कुुुुछ भी नहीं, बस आप यह नहीं समझ पा रहे कि यह आपका यूूूपी-बिहार नहीं, केेेेरल हैै, जहाँ शत-प्रतिशत साक्षरता है। सामान्य लोग भी अंंग्रेजी केे शब्द, वाक्य समझ लेेेेते हैैं, महिलाएँ स्कूटी चलाती हैं और पुरुष पिछली सीट पर बैठे होते हैं। यहाँ स्त्री-पुरुष का भेद ही मिट गया है। यदि पुरुष आपकी ओर देखकर मुस्कुरा सकता है और इसी रूप में आपका स्वागत-अभिनन्दन कर सकता है तो स्त्रियाँ भी ऐसा कर सकती हैं। आप अपना बिहारी चश्मा उतार कर देखेंगे, तभी यह फर्क भी समझ सकेंगे।'

श्रीमतीजी की बातों से मेरे ज्ञान-चक्षु हठात् खुल गये। मैंने अपनी स्मृति को कुरेदा तो मुझे याद आया कि तीन दिन पहले ही जब मैं अथिरापल्ली प्रपात से लौटते हुए पहाड़ की चढ़ाई चढ़ रहा था, तो सामने से आती हुई हर उम्र की कई महिलाओं और पुरुषों ने मुझे अपनी मधुर मुस्कान से नवाजा था और मैं संकुचित हो उठा था। और, मार्ग में, हम सबों ने एकसाथ ही तो देखा था, एक ग्रामीण युवती को, जो अपने छोटे-से बालक और संभवतः पतिदेव को स्कूटर पर पीछे बिठाकर आराम से चली जा रही थी।...
बेटी और श्रीमतीजी की बातों से अब समझ में आया, वह मुस्कान अकारण तो नहीं ही थी, असहज भी नहीं थी। मैं ही अपने अनुभवों और संस्कारों के शिकंजे में था और उससे मुक्त नहीं हो पा रहा था।

मैं तो खैर पकी उम्र का व्यक्ति हूँ, श्रीमतीजी की अहैतुकी कृपा से सँभल भी गया हूँ; लेकिन अपने समस्त मित्रों को सावधान करना अपना दायित्व समझता हूँ कि यहाँ आपको कोई देखकर मुस्कुराये तो आप भी भद्रतापूर्वक मुस्कुराकर उसके अभिवादन-अभिनन्दन का प्रत्युत्तर दें। भारत की इस पावन भूमि में यथासंभव नजरें झुका के चलें, कहीं ऐसा न हो कि किसी से आपकी आँख लड़ जाए और आपको कोई मुगालता हो या मुस्कुराने की विवशता से आप किसी द्विविधा में पड़े हिचकोले खाने लगें... ठीक मेरी तरह।...
(14-06-2017)

रविवार, 25 जून 2017

श्रीविष्णु प्रभाकर, जो चलते चले गये...(5)

(समापन किस्त)

सुधीजन जानते हैं, 'आवरा मसीहा' पुस्तक प्रभाकरजी के जीवन के चौदह वर्षों के अथक परिश्रम का प्रतिफल थी। मैं चाहता तो उसकी एक प्रति कहीं से भी खरीद सकता था, लेकिन उस प्रति पर प्रभाकरजी के हस्ताक्षर कहाँ से मिलते मुझे! उसकी एक प्रति मुझे उन्हीं के कर-कमलों से चाहिये थी, उनके आशीर्वाद के साथ। मैंने उसकी लंबी प्रतीक्षा भी की थी। अब वह अमूल्य प्रति मुझे हस्तगत हुई थी। मैं उपकृत हुआ उनके घर से पटना लौटा था।

लेकिन, यह मेरा दुर्भाग्य ही था कि कई वर्षों तक खूब जतन से रखी हुई वह प्रति मेरे चचेरे अनुज पढ़ने के लिए मुझसे माँगकर ले गये। तीन महीनों तक वह पुस्तक उन्होंने लौटायी नहीं तो मैंने उसकी माँग की। उन्होंने बहुत दुःखी होकर मुझे बताया कि 'भइया, मैं भी उसे पढ़ न सका। आपके यहाँ से लेकर जाते हुए ही वह साइकिल के कैरियर से राह में कहीं गिर गयी और मुझे पता भी न चला।' उनसे यह वृत्तांत सुनकर मैं बहुत आहत हुआ, ऐसा लगा जैसे कोई बहुमूल्य निधि मेरे हाथ से फिसल गयी है।... इतने महत्व की पुस्तक इतनी असावधानी से वह क्यों ले चले, यह समझना मेरे लिए कठिन था।... लोग पुस्तक-प्रेमियों की पीड़ा नहीं समझते शायद।

प्रभाकरजी से प्राप्त दूसरी पुस्तक 'अर्द्धनारीश्वर' की प्रति मेरे पास आज भी सुरक्षित है, उसके प्रथम पृष्ठ पर उन्होंने जो कुछ लिखा है, वह द्रष्टव्य है--
"प्रिय बंधु आनन्दवर्धन ओझा को
बहुत-बहुत स्नेह के साथ,
पुराने दिनों की याद में--
--विष्णु प्रभाकर
25-1-1997."
प्रभाकरजी के इस छोटे-से उद्गार में मुझे उनकी सहज प्रीति की सुगंध मिलती है और मेरा मन उनकी प्रणति को मचल उठता है!...

लेकिन उसके बाद लंबे  समय तक मेरा दिल्ली जाना हो न सका। पिताजी के दिवंगत होने के बाद परिस्थितियाँ विषम हो गयी थीं। पत्नी पटना से बहुत दूर चक्रधरपुर में थीं, आगे की पढ़ाई के लिए बेटियाँ दिल्ली चली गयी थीं और सबसे बड़ी बात, छोटी बहन रुग्ण होकर शय्याशायी थी। मैं पटना में कीलबद्ध होकर रह गया था, युद्ध-भूमि में अभिमन्यु-सा अकेला! सन् 1999 में छोटी बहन भी साथ छोड़ गयी।...

फिर लंबा अरसा गुजर गया। प्रभाकरजी से पत्राचार पर अचानक विराम लग गया। उनके अस्वस्थ होने की खबरें समाचार पत्रों से मिलीं भी, तो मैं अवश-निरुपाय था।...श्रीमतीजी के स्थानांतरण की चेष्टाओं, बिखरी हुई गृहस्थी के जाल-जंजाल को समेटने, बिहार हिन्दी ग्रंथ अकादमी द्वारा प्रदत्त दायित्वों को निभाने और एक लघु पत्रिका के संपादन में मैं ऐसा मशगूल हुआ कि बाहरी दुनिया से असम्पृक्त-सा हो गया। प्रभु ने प्रभाकरजी को दीर्घायु प्रदान की थी। दीर्घ आयुष्य किसी के भी कष्ट का कारण होता है और प्रभाकरजी भी अपने हिस्से आयी वार्धक्य की कष्ट-पीड़ाएँ भोगते रहे... और जीवन के 97 वसंत देखकर जाने कब चलते-चलते दुनिया की गलियाँ छोड़ (11-4-2009) गये...! सच मानिये, इस कड़वे सच से मैं कई दिनों तक अनजान ही रहा और जब मुझे पता चला तो आत्मा में एक हाहाकारी तूफान उठा था...! आह! अब वह मोहिनी सूरत मुझे कभी देखने को नहीं मिलेगी, जिसमें दिखते थे मुझे बाबूजी!... वे मृदु स्वर भी अब सुनने को न मिलेंगे, जिनमें बाबूजी के स्वरों की अनुगूँज थी।...

मुझे लगता है, अपनी जीवन-यात्रा में प्रभाकरजी निरंतर चलते ही रहे, कहीं रुके नहीं, कभी थके नहीं। 'ज्योतिपुंज हिमालय' की तराइयों से उत्तुंग शिखरों तक चलते चले गये, चौदह वर्षों तक 'आवारा मसीहा' के धुँधले पदचिह्न ढूँढ़ते रहे, वह 'गंगा-यमुना के नैहर में' गये, 'हँसते निर्झर, दहकती भट्ठी' को पद-दलित कर आये और इसी तरह अनिकेतन अथक यात्री बने रहे। और, अब तो वह अनन्त पथ के यात्री हो गये हैं...!


प्रभाकरजी की एकमात्र कविता-पुस्तक है--'चलता चला जाऊँगा'। नि:संदेह वह अपना सर्वस्व इस जगत् को सौंपकर चले गये...यहाँ तक कि अपनी कंचन-सी पार्थिव काया भी अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के हवाले कर गये...! उनकी मधुर-मनोहर स्मृतियों को मेरा साश्रु नमन है!...
(समाप्त)

[चित्र : पुस्तक 'चलता चला जाऊँगा' का आवरण और 'अर्द्धनारीश्वर' के प्रथम पृष्ठ पर अंकित प्रभाकर जी के अक्षर, 25 जनवरी,1997.]

शनिवार, 24 जून 2017

श्रीविष्णु प्रभाकर, जो चलते चले गये...(4)

पिताजी के प्रयाण के बाद भी प्रभाकरजी के पत्र आते रहे, लेकिन पत्राचार की गति शिथिल होती गयी। सन् 1997 के जनवरी महीने में कुछ ऐसी विवशता आ पड़ी कि मुझे दिल्ली जाना पड़ा। 'विवशता' इसलिए कह रहा हूँ कि घर पर बीमार छोटी बहन को छोड़कर जाना पड़ा था, श्रीमतीजी भी अपनी नौकरी के कारण पटना से बाहर थीं, छोटे भाई और बड़ी बेटी के भरोसे घर छोड़ आया था। दिल्ली पहुँचकर मैं काम की भीड़-भाड़ और भाग-दौड़ में लग गया था, फिर भी मन की यह ज़िद थी कि प्रभाकरजी के दर्शन अवश्य करने हैं।
मैं वक्त निकालकर सुबह-सुबह उनके घर, अजमेरी गेट के पास, कुण्डेवालान पहुँचा। प्रभाकरजी बैठके में अपनी शय्या पर अधलेटे मिले। क्लांत दिखे, थोड़े कृश भी। प्रणाम करके मैं उनके पास ही सोफ़े पर बैठ गया और बातें करने लगा। मुझे देखकर उनके मुख-मण्डल पर दो क्षण के लिए प्रसन्नता की चमक दिखी और फिर फीकी पड़ गयी। मैंने पूछा--'क्यों, तबीयत ठीक नहीं है क्या?'
उन्होंने बुझी हुई आवाज़ में कहा--'जैसा प्रभु ने रख छोड़ा है, वैसा ही हूँ। शरीर की शक्ति बहुत घट गयी है। अब तो ठीक से लिखना-पढ़ना भी नहीं हो पाता।'

सिद्ध लेखक कुछ लिख न सके, अध्यवसायी कुछ पढ़ न सके तो वह पीड़ित होता है; क्योंकि वही तो उसकी जीवनव्यापी साधना होती है और मनोरंजन भी। यह मैं अपने अपने अनुभव से जानता हूँ। तब पिताजी को गुजरे एक साल दो-ढाई महीने ही हुए थे, वह भी अपने अंतिम दिनों में कहने लगे थे--'अब लिखना-पढ़ना कुछ हो नहीं पाता तो जीने की इच्छा नहीं होती।'... लिहाजा, जीना है तो कार्यक्षम रहते हुए जीना है और उसकी अनिवार्य शर्त लिखना-पढ़ना है।

प्रभाकरजी के मुख से ठीक यही बात सुनकर मुझे उनमें पिताजी दिखे। मैंने उनसे कहा--'बाबूजी भी यही कहने लगे थे, जब उनके लिए लिखना-पढ़ना कठिन होने लगा था।'
प्रभाकरजी ने आर्त्त स्वरों में कहा था--'मैं भी उन्हीं की राह पर हूँ आनन्द!'
फिर तो हमारी बातें पिताजी की स्मृतियों में खो गयीं। प्रभाकरजी पिताजी को याद करते हुए उनके संस्मरण सुनाने लगे कि 'जब वह मेरे घर दो दिनों के लिए ठहरे थे तो ऊपरी माले पर अपने कमरे में जाते हुए भयभीत हो जाते थे; क्योंकि उन्हें आँगन के बीचो-बीच लगी लोहे की जाली को पार करना पड़ता था, जिससे नीचे का भू-भाग दिखायी पड़ता था।'

पिताजी से सम्बद्ध कई प्रसंग सुनाते हुए प्रभाकरजी की कंथा दूर हो गयी थी, वह मुखर हो उठे थे और बीच-बीच में हँस पड़ते थे। उन्हें प्रसन्न और प्रकृतिस्थ हुआ देखकर मुझे खुशी हुई थी।...

हमारी यह मुलाकात लंबी खिंच गई। इस बीच मैंने अंदर से आयी चाय पी ली थी और कुछ भोज्य पदार्थ भी ग्रहण कर लिया था। अब मुझे लौटकर कुछ काम निबटाने थे और पटना के लिए रात की गाड़ी पकड़नी थी। चलने के ठीक पहले मैंने प्रभाकरजी से कहा--"आवारा मसीहा' कई साल पहले ही मार्त्तण्ड बाबूजी की लाइबरी से लेकर मैंने पढ़ी थी, लेकिन मैं चाहता हूँ कि उसकी एक हस्ताक्षरित प्रति मैं अपने पास सुरक्षित रखूँ। बहुत पहले आपने उसकी एक प्रति मुझे देने का आश्वासन भी दिया था।"

प्रभाकरजी 'ठहरो' कहते हुए बमुश्किल उठ खड़े हुए और धीरे-धीरे चलते हुए घर के अंदर दाखिल हुए। पाँच मिनट बाद ही वह वापस आये। उनके हाथ में एक नहीं, दो पुस्तकें थीं। वह शय्या पर बैठे, कलम उठायी और पुस्तक की जिल्दें पलटकर उस पर कुछ लिखने लगे। मैं कुतुहल-जड़ित शिशु-सा उन्हें देखता रहा। लिख लेने के बाद दोनों प्रतियाँ मुझे देते हुए बोले--"आवारा मसीहा' ही नहीं, तुम 'अर्द्धनारीश्वर' नाम का यह उपन्यास भी ले जाओ, पढ़ना इसे, अकादमी से पुरस्कृत ग्रंथ है यह !"

मैंने पुस्तकों को सिर नवाया, प्रभाकरजी के चरण छुए और चलने को उठा खड़ा हुआ तो उन्होंने कहा--"फिर जब कभी दिल्ली आना तो जरूर मिलना।' मैंने स्वीकृति दी, करबद्ध हो पुनः प्रणाम किया और चल पड़ा।...
(क्रमशः)

[चित्र : 'आवारा मसीहा' की प्रति और उस काल-समय का मैं.]

शुक्रवार, 23 जून 2017

श्रीविष्णु प्रभाकर, जो चलते चले गये...(3)


साहित्य की हर विधा में प्रभाकरजी ने प्रचुर लेखन-कार्य किया। उन्होंने नाटक लिखे, उपन्यास लिखे, कहानियाँ और कविताएँ लिखीं, तो जीवनी और भ्रमण-वृत्तांत भी लिखा। वह सर्वप्रिय साहित्यकार थे, हर दीर्घा, हर प्रकोष्ठ, हर गोलबंदी में उनकी पैठ थी और सर्वत्र उन्हें समादर प्राप्त था। अलंकरण-उपाधियों-सम्मानों की उन पर वर्षा हुई थी, लेकिन वह अनासक्त भाव से सब ग्रहण कर आगे बढ़ चले। राष्ट्रपति-भवन में हुए दुर्व्यवहार से क्षुब्ध होकर उन्होंने 'पद्मभूषण' जैसी उपाधि लौटा दी थी और साहित्य जगत् में तहलका मच गया था। उनमें अभिमान लेश मात्र नहीं, किन्तु स्वाभिमान पर्याप्त मात्रा में था।

एक बार उन्हीं के पत्र से पता चला कि कोलकता के किसी आयोजन में सम्मिलित होकर वह अमुक ट्रेन से पटना होते हुए दिल्ली लौटेंगे, लेकिन पटना रुकेंगे नहीं। पटना के लिए एक दिन भी न निकाल पाने पर उन्होंने क्षोभ व्यक्त किया था। पत्र पिताजी को संबोधित था। मैंने पिताजी से कहा--'मैं स्टेशन जाकर ट्रेन में प्रभाकरजी से मिलना चाहूँगा।' पिताजी ने सचेत करते हुए कहा था--'ट्रेन तो थोड़ी देर ही रुकेगी और तुम्हें यह भी मालूम नहीं कि प्रभाकरजी किस कोच में सफ़र कर रहे होंगे। जब तक तुम उन्हें ढूँढ़ोगे, ट्रेन चल पड़ेगी।'

लेकिन, नियत तिथि को मैं सपत्नीक स्टेशन गया था और श्रीमतीजी के कहने पर प्रभाकरजी के लिए थोड़े फल और मिष्टान्न साथ लेता गया था। जैसा पिताजी ने कहा था, उस भीड़-भड़क्के में प्रभाकरजी को ढूँढ़ निकालने में थोड़ा वक्त तो जरूर लगा, लेकिन वातानुकूलित डब्बों की संख्या तीन-चार ही थी, हमने उन्हें खोज निकाला। अचानक मुझे सम्मुख उपस्थित देख प्रभाकरजी खिल उठे। वह सपत्नीक यात्रा कर रहे थे। हमने उन दोनों के चरण छुए। श्रीमतीजी चाचीजी के पास बैठकर बातें करने लगीं। प्रभाकरजी ने मुझसे कहा--'इतनी जहमत उठाने की क्या आवश्यकता थी? बस, दो घड़ी की मुलाकात के लिए तुम घर से इतनी दूर क्यों चले आये?' मैंने मुस्कुराते हुए कहा--'बहुत दिन हो गये थे, आपसे मिले हुए...और आप पटना से होकर गुजर रहे थे, मैंने सोचा, इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए।...और, मैं चला आया।'... मेरा उत्तर सुन प्रभाकरजी मुग्ध हुए और एक मीठी मुस्कान उनके अधरों पर खेल गयी।

हम दोनों की शक्लों पर मिल पाने का संतोष और स्वाभाविक प्रसन्नता मूर्त्त थी। श्रीमतीजी बातों में मशगूल, यह भूली बैठी थीं कि फल-मिठाई का पैकेट उन्हें देना भी है। मेरा ध्यान भी उस ओर नहीं गया। अचानक ट्रेन ने चलने के पहले सावधान करनेवाली सीटी बजायी। हम शीघ्रता से उतरने को तत्पर हुए और पुनः चरण स्पर्श को झुके, तब श्रीमतीजी को खाली हाथों की जरूरत पड़ी और उन्हें हाथ के पैकेटों का खयाल आया। उसे चाचीजी के सुपुर्द करते हुए उन्होंने कहा--'यह आपके लिए है!' तदनन्तर हड़बड़ी में प्रणाम कर वह आगे बढ़ीं और उनके पीछे मैं भी। पीठ पीछे से आती चाचीजी की आवाज हमें सुनाई पड़ी--'अरे साधना, तुम नाहक यह सब ले आयीं। कलकत्ता वालों ने इतना सारा खाने-पीने का सामान...!' और उनकी आवाज मद्धम होती हुई शोर-शराबे में विलीन हो गयी।...

स्नेहमयी चाचीजी से वही अंतिम मुलाकात थी हमारी। कालांतर में प्रभाकरजी की पुस्तक 'शुचि स्मिता' में उनकी मर्मस्पर्शी गाथा ही हमारे बीच रह गयी, जिसे पढ़कर मेरी आँखें सजल हो उठी थीं। वह ममतामयी माता भी संसार-सागर से विमुक्त हो गयी थीं।...

सन् 88 में अलीगढ़ में डाॅ. पाहवा से एक आँख की शल्य-चिकित्सा के उपरांत आँख पर हरी पट्टी बाँधे पिताजी दिल्ली गये थे और एक-दो दिनों के लिए प्रभाकरजी के अतिथि बने थे। सन् '95 में पिताजी के निधन के बाद प्रभाकरजी ने एक संस्मरणात्मक आलेख उन पर लिखा था, जो नवभारत टाइम्स की समस्त इकाइयों के संपूरक अंक में छपा था। वह अंक पटना में मुझे भी हस्तगत हुआ था, जिसे पढ़कर मैं भावुक हो गया था।...

पिताजी को लिखे उनके कई पत्रों की कतिपय पंक्तियाँ मर्मवेधी हैं। दरअसल, अपने उत्तर जीवन में उन्हें हृदयहीन व्यवसायियों से लोहा लेना पड़ा था जो उन्हीं के कुण्डेवालान स्थित घर के बाहरी परिक्षेत्र के पुश्तैनी किरायेदार थे। उनसे नाममात्र का किराया मिलता था और वे बहुत बड़े भू-भाग पर काबिज़ थे। कई निवेदनों-मनुहारों के बाद भी उसे खाली करने को वे तैयार नहीं थे। एक सहृदय साहित्यिक, एक संवेदनशील रचनाकार, एक भावुक कवि और एक कल्पनालोक में विचरण करनेवाले मसिजीवी के लिए यह जागतिक रस्साकशी प्राणांतक पीड़ा देने वाली थी। अपनी यह पीड़ा कई मुलाकातों में उन्होंने पिताजी के सम्मुख व्यक्त की थी और उनके पत्रों में भी इस पीड़ा के स्वर-संकेत उभर आते थे।...

पिताजी के निधन के बाद मेरे एक पत्र का उत्तर देते हुए उन्होंने 1 फरवरी 96 को लिखा था--"...काम तो मैं भी करता हूँ, पर अब थक गया हूँ। और कुछ समस्याएँ ऐसी, जिनका हल कब होगा, पता नहीं। भ्रष्टाचार के दावानल में इंसानियत तो समाप्त ही हो गयी। गुण्डा और पैसा दो ही साधन हैं। दोनों ही हमारी सीमा से बाहर हैं। अब जो होना होगा, हो जाएगा।
बस, एक ही बात है, मैं भी अब किनारे पर हूँ, पता नहीं कौन-सा क्षण अंतिम हो। बस यही चाहता हूँ, उस अंतिम क्षण तक जागृत रहूँ।..."

प्रभाकरजी के इस पत्र को पढ़कर मेरा मन व्यथित हुआ था। वह नितान्त सहृदय-निष्कलुष व्यक्ति थे, मैं नहीं जानता, प्रभु ने यह पीड़ा उन्हें क्यों दी थी। मैं यह भी नहीं जानता कि उनके जीवनकाल में उन्हें इस पीड़ा से मुक्ति मिली भी या नहीं।...
(क्रमशः)

[चित्र  : प्रभाकरजी का 1 फरवरी 1996 का वह मार्मिक  पोस्टकार्ड.]

गुरुवार, 22 जून 2017

श्रीविष्णु प्रभाकर, जो चलते चले गये...(2)

बहरहाल, वे सपनों-से दो दिन बीत गए, लेकिन मुझे प्रभाकरजी की सहज प्रीति और अविरल स्नेह की डोर से हमेशा के लिए बाँध गए। सन् '76 के उत्तरार्द्ध में अचानक स्थानांतरित होकर मैं पुनः दिल्ली पहुँच गया और '79 के अंत तक दिल्ली में ही रहा। इन तीन वर्षों में ऐसे अनेक अवसर मिले, जब प्रभाकरजी के दर्शन हुए, मिलना हुआ और सभा-समितियों में उनकी वाग्मिता से परिचित होने का मौका भी मिला। गाँधीवादी युग का पूरा प्रभाव उनके विचारों, उनके व्यक्तित्व और परिधान में दृष्टिगोचर होता था। खादी का मोटा कुरता-पायज़ामा, जिस पर शोभायमान खादी की बंडी, सिर पर दुपल्ली गाँधी टोपी, कंधे से लटकता खादी का झोला, आँखों पर ऐनक और गले से लिपटा मफ़लर--यही उनका परिधान आजीवन रहा। वह बहुत संतुलित, मधुर और सारगर्भित वचन बोलते थे।

मुझे याद है उस सभा की, जो दरियागंज (दिल्ली) से आनेवाली सड़क के चौराहे पर हुई थी--आसिफ़ अली गेट पर। उस सभा मेें प्रभाकरजी के साथ जैनेन्द्रजी भी पधारे थे। तब मैैैं राजकमल प्रकाशन के संपादकीय विभाग से संबद्ध था। भोजनावकाश में भागकर उस सभा में मैं सम्मिलित हो गया था। जब पहुँचा तो प्रभाकरजी बोल रहे थे। मैं ध्यान से सुनने लगा। एक दुरूह विषय पर वह बोल रहेे थे और इतनी सहजता से विषय का प्रवर्तन कर रहे थे कि मैैैं उसके सम्मोहन में बँधा रहा--मंत्रमुग्ध-सा! उनके बाद जैनेेेन्द्रजी माइक पर आये। वह तो ख्यात वाग्मी थे ही। उनकी वाग्मिता भी ऐसी थी कि मैं वहीं ठगा-सा खड़ा रह गया और मुझे दफ्तर लौटने की सुध न रही। शाम चार बजेे सभा समाप्त हुई तो मैैं भागा-भागा दफ़्तर पहुँचा और मुझे प्रबंध निदेशिका श्रीमती शीला संधुजी का कोपभाजन बनना पड़ा।...

मेरे स्मृति-कोश में ऐसे अनेक अवसरों की यादें सुरक्षित हैं, जिनमें प्रभाकरजी प्रमुखता से उपस्थित हैं; चाहे वे साहित्यिक गतिविधियों के कार्यक्रम रहे हों या पारिवारिक आयोजनों के; क्योंकि पिताजी के साथ मैं भी अनिवार्य रूप से हमेशा उनके साथ होता था। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदीजी के अवसान पर गाँधी शांति प्रतिष्ठान के प्रांगण में जुटे साहित्यिकों में प्रभाकरजी भी उपस्थित थे और सन् '79 में जब मार्त्तण्ड उपाध्यायजी का निधन हुआ था, तब भी अपने अग्रज मित्र को विदा करने के लिए प्रभाकरजी घर से श्मशान-भूमि तक हमारे साथ चले थे। उनकी मार्त्तण्डजी से पुरानी और पारिवारिक घनिष्ठता थी। सबके मुख-मण्डल पर अपने-अपने अंतर्संबंधों से उपजी शोक की छाया थी तब...!

जब दिल्ली छूटी और मैं हरद्वार में तीन वर्ष व्यतीत कर पटना लौटा, तब भी प्रभाकरजी से पत्राचार होता रहा। उनके ज्यादातर खत तो पिताजी के पास आते, लेकिन उन पत्रों में भी वह मेरी खोज-खबर लेते रहते थे। बड़े स्नेही थे प्रभाकरजी! मुझे ठीक याद नहीं कि वह किस सन् की बात है, लेकिन जब उन्हें बिहार सरकार के राजभाषा विभाग द्वारा सम्मान दिया गया था और वह उसे ग्रहण करने पटना आये थे, तब सम्मान प्राप्त करने के पहले मेरे घर पधारे थे। उन्होंने पिताजी को विनम्रतापूर्वक प्रणाम करते हुए कहा था--'मैंने सोचा, सम्मान ग्रहण करने से पहले आपका आशीर्वाद ले लूँ।' पिताजी और प्रभाकरजी की उस मुलाकात का दृश्य अपूर्व था। पिताजी कहते ही रह गये कि 'भाई, हम तो हमउम्र हैं' और प्रभाकरजी ने झुककर बाकायदा उनसे आशीर्वाद की याचना की थी। पिताजी प्रफुल्लित और हर्ष-गद्गद थे और प्रभाकरजी उपकृत! प्रभाकरजी सदल-बल पधारे थे--जिसमें उनकी अगवानी कर रहे सरकार के प्रतिनिधि तो थे ही, पत्रकारों की एक टोली भी थी। कई लोग तो घर के बाहर ही रुक गये थे। वह अधिक समय तक रुके नहीं, लेकिन जितनी देर ठहरे, हमारे छोटे-से घर में गहमा-गहमी बनी रही।...
(क्रमशः)

बुधवार, 21 जून 2017

श्रीविष्णु प्रभाकर, जो चलते चले गये...

[मित्रों, प्रख्यात साहित्यकार स्व. विष्णु प्रभाकरजी की आज जयन्ती है। सौभाग्य से मैं उनका स्नेहभाजन रहा हूँ। उन पर कुछ लिखने की इच्छा बहुत दिनों से मन में थी। जानता था, लिखने की बातें मेरे पास हैं, लेकिन यह स्मृति-लेख पूरा लिख न सका था। आज उस अकर्मण्यता से मुक्त होकर यह लंबा संस्मरण आप सबों के सामने रख रहा हूँ और इसी रूप में उनकी पावन स्मृतियों को स्मरण-नमन कर रहा हूँ।
--आनन्दवर्धन.]

श्रीविष्णु प्रभाकर, जो चलते चले गये...

सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रद्धेय विष्णु प्रभाकरजी के दर्शन का सौभाग्य पहली बार मुझे कब मिला था, यह स्पष्टतः स्मृति में अंकित नहीं है, फिर भी ऐसा लगता है कि सन् 1971 में जब मैं पहली बार दिल्ली-दर्शन के लिए पिताजी के साथ वहाँ गया था और पिताजी अपने एक पुराने मित्र (जो दो वर्ष बाद ही उनके समधी भी बने) मार्तण्ड उपाध्यायजी से मिलने उनके दफ़्तर 'सस्ता साहित्य मण्डल, कनाॅट प्लेस जाने लगे तो मैं भी उनके साथ गया था; सम्भवतः विष्णु प्रभाकरजी के प्रथम दर्शन मुझे वहीं मिले थे। उनके एक-दो नितांत औपचारिक प्रश्नों के उत्तर देने के अतिरिक्त मेरी और कोई बात उनसे नहीं हुई थी। तब उन्हें देखना, उनकी बातें सुनना और मेरा प्रणाम निवेेेेदित करना ही हुआ था। मार्त्तण्ड उपाध्यायजी, यशपाल जैनजी, विष्णु प्रभाकरजी और सम्मान्य वियोगी हरिजी के दत्तक सुपुत्र भगवद्दत्त 'शिशु'जी की प्रियवार्ता होती रही और मैं मूक श्रोता ही बना रहा।...

संयोग कुछ ऐसा बना कि सन् '74 में पिताजी को लोकनायक जयप्रकाशजी के आग्रह पर पटना छोड़ दिल्ली जाना पड़ा। कुछ महीने बाद, स्नातक की परीक्षा से निवृत्त होकर, मैं भी उन्हीं के पास पहुँच गया। दिल्ली की कई साहित्यिक सभाओं में विष्णु प्रभाकरजी के दर्शन और उनके व्याख्यान सुनने का अवसर प्राप्त होता रहा, लेकिन वह दूर का दर्शन ही था। कभी-कदाचित् उन्हें प्रणाम निवेदित करने का अवसर भी मिल जाता था, लेकिन उनकी आँखों में मुझे अपने लिए अपरिचय का भाव ही अधिक दिखता। सन् '75 के अगस्त महीने में मैं अपनी पहली नौकरी पर कानपुर चला गया और उनकी निकटता पाने से वंचित रह गया।...

21 जून 1912 को मुजफ्फरनगर (उ.प्र.) के मीरापुर ग्राम में जन्मे विष्णु प्रभाकरजी से पिताजी की पुरानी मित्रता थी--आकाशवाणी सेवा-काल की, 1955-56 की, जब वह बतौर नाट्य-निर्देशक दिल्ली में सेवारत थे। वह पिताजी से दो-ढाई वर्ष छोटे थे और पिताजी को वयोज्येष्ठता का पूरा सम्मान देते थे। उनका आरम्भिक जीवन संघर्षपूर्ण था। उन्होंने बहुत परिश्रम और स्वप्रयत्न से अध्ययन किया था, उपाधियाँ अर्जित की थीं, भाषाएँ सीखी थीं और अंततः सन् '57 में सेवा-मुक्त होकर स्वतंत्र लेखन को ही अपनी आजीविका के रूप में चुना था। यह जोखिम-भरा निर्णय था, लेकिन वह अपने निश्चय पर अडिग रहे और आजीवन लेखकीय दायित्वों का निर्वहन करते रहे। उन्होंने उत्कृष्ट गद्य-लेखन किया। वह गाँधीवादी युग के अप्रतिम रचनाकार थे। उनकी कृतियों में देश-प्रेम, राष्ट्रवाद और सामाजिक उत्थान की प्रबल भावना मुखरित हुई है।

कानपुर की नौकरी के दौरान ही मुझे विष्णु प्रभाकरजी के निकट आने तथा उनका स्नेहभाजन बनने का सुयोग प्राप्त हुआ था। स्वदेशी की सेवा के दौरान ही वहाँ मुझे मिले थे प्रभाकरजी के सुपुत्र--अमित भैया! लेकिन इसकी जानकारी मुझे बहुत बाद में हुई थी। वह मेरे खेल-मित्र थे और स्वदेशी के वरिष्ठ अधिकारी। हमारे बैचलर क्वार्टर के पीछे बने ऑफिसर्स क्वार्टर में सपत्नीक रहते थे। सुदर्शन युवा थे। उनसे सिर्फ क्लब में मिलना होता। मैं उनके साथ टेबल टेनिस खेलता। हमारी जोड़ी खूब जमती थी।

उन दिनों ही मैं अपने एक कृत्य के लिए बहुत प्रसिद्धि पा रहा था। वह कृत्य पराविलास था, जिसके लिए पिताजी की वर्जना मुझे मिलती रहती थी। एक दिन खेलकर हम दोनों पसीने-पसीने हुए कुर्सियों पर बैठ गए थे। थोड़े विश्राम के बाद घर जाते-जाते अमित भइया ने कहा--'मैं चार-पांच दिन क्लब नहीं आ सकूँगा। दिल्ली से मेरे माता-पिताजी आनेवाले हैं।' मैंने औपचारिकतावश उनसे पिताजी का नाम पूछ लिया। अमित भइया बोले--'वह जाने-माने साहित्यकार हैं। तुम तो हिंदी में रुचि रखते हो, तुमने उनका नाम अवश्य सुना होगा। उनका नाम है--श्रीविष्णु प्रभाकर।'
उनसे यह जानकार मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई थी कि वह स्वनामधन्य विष्णु प्रभाकरजी के सुपुत्र हैं। मैंने हुलसकर कहा--'वह तो मेरे पिताजी निकट मित्र हैं। १९७१ में उनसे मेरी एक मुलाकात भी हुई है--सस्ता साहित्य मण्डल कार्यालय में--कनॉट प्लेस में। संभव है, उन्हें इसका स्मरण न हो, लेकिन आप मेरे पिताजी का नाम लेंगे तो वह निश्चय ही पहचान लेंगे।'
अमित भाई ने मेरे पिताजी का नाम पूछा। मैंने पिताजी का पूरा नाम बताकर उनसे कहा--"आप उनसे सिर्फ 'मुक्तजी' कहेंगे तो भी वह पहचान लेंगे।"

इसके बाद दो दिन बीत गए। अमित भइया के क्लब में दर्शन न हुए। मैं समझ गया कि वह अपने माता-पिताजी के साथ व्यस्त होंगे। मेरे मन में यह इच्छा अवश्य थी कि एक बार फिर विष्णु प्रभाकरजी के दर्शन होते। दूसरे दिन शाम के वक़्त अमित भाई ने अपने सेवक को मेरे पास भेजा और सूचित किया कि पिताजी चाहते हैं, कल सुबह की चाय मैं उनके साथ पियूँ। मैं प्रफुल्लित हो उठा और सेवक से मैंने कल आने की स्वीकृति भेज दी।

सुबह तैयार होकर मैं पहली बार अमित भइया के घर पहुँचा। उस दिन विष्णु प्रभाकरजी से मिलकर परमानन्द हुआ। वह सौम्य-मूर्ति, संयत-सम्भाषी और अति स्नेही व्यक्ति थे। वह पिताजी का बड़े भाई की तरह बड़ा आदर-सम्मान करते थे। उस पीढ़ी के लोगों में आचार-व्यवहार की यह मानक परम्परा थी और लोग इसका पालन बहुत सावधानी से किया करते थे। यह पिताजी की घनिष्ठ मित्रता का ही प्रभाव था कि उस दिन वह बहुत प्रेम से मिले, पिताजी और मेरे काम-धंधे के बारे में पूछते रहे। इसी बीच अमित भाई बोल पड़े--'आनंद तो यहाँ बड़े साहस का काम कर रहे हैं। आत्माओं को बुलाते हैं और उनसे बातें करते हैं।'
विष्णु प्रभाकरजी ने ठीक पिताजी की तरह ही मुझसे कहा था--"मनुष्य को प्रकाश की तरफ बढ़ाना चाहिए, अंधकार की ओर नहीं। परालोक एक अँधेरी सुरंग की तरह है और एक अँधेरी दुनिया में भटकने का कोई लाभ नहीं है। संभव है, इससे किसी का हित हो जाए, किसी को मनःशांति मिले, लेकिन किसी की हानि भी तो हो सकती है। इस दुविधापूर्ण दिशा में बढ़ने का क्या लाभ?'

मैं संकोच से गड़ा जा रहा था, शांत था; लेकिन चाहता था कि किसी तरह बात की दिशा बदल जाए। तभी बड़ा अच्छा हुआ कि श्रीमती प्रभाकर (पूजनीया चाचीजी) अपनी बहूजी के साथ चाय-नाश्ता लेकर आयीं। मैंने उनके चरण छुए और उनका आशीष पाकर धन्य हुआ। अब बात की दिशा स्वतः बदल गई थी। चाचीजी बहुत मृदुभाषिणी महिला थीं। उन्होंने आग्रहपूर्वक मुझे बहुत कुछ खिलाया और चाय पिलाई। जब चलने को हुआ तो बोलीं--'तुम मेस का भोजन करते हो न, कैसा खाना बनता है वहाँ?' मैंने कहा--'ठीक-ठाक, उदर-पूर्ति हो जाती है।'
मेरे उत्तर से उन्होंने जाने क्या अभिप्राय ग्रहण किया कि तत्काल मुझसे कहा--'तो ठीक है, आज रात का खाना तुम हमारे साथ ही कर रहे हो--घर का भोजन ! तुम्हें खाने में क्या पसंद है, मैं वही बनाऊँगी, बोलो !' उनकी सहज और अनन्य प्रीति से मैं अभिभूत हो उठा था। मैंने कहा--'आप जो भी बनाएंगी, मैं प्रसन्नता से खाऊँगा।'

उनकी ममतामयी मूर्ति देखकर और उनकी बातें सुनकर मुझे अपनी माँ की याद आ रही थी।
अमित भइया के यहाँ रात के भोजन के वक़्त भी अमित आनंद हुआ। उन दिनों प्रभाकरजी की पुस्तक 'आवारा मसीहा' बहुत चर्चा में थी। वहाँ से परम तृप्त और आप्यायित हुआ जब लौटने लगा तो मैंने उनसे अपने लिए 'आवारा मसीहा' की एक प्रति मांगी तो बोले--'यहां तो प्रतियाँ हैं नहीं, तुम जब दिल्ली आओगे, तो उसकी प्रति तुम्हें अवश्य दूँगा। '

दो दिनों में श्रद्धेय विष्णु प्रभाकरजी के दो बार दर्शन पाकर और उनके सान्निध्य से मन बहुत प्रसन्न हुआ था, लेकिन उनकी वर्जना के शब्द कानों में निरंतर गूँज रहे थे--'मनुष्य को अन्धकार की ओर नहीं, प्रकाश की दिशा में बढ़ना चाहिए और…परालोक एक अँधेरी सुरंग की तरह है...!'
(क्रमशः)

मंगलवार, 13 जून 2017

'वो जो सुफैद-सा गुलाब वहाँ फूला था...' (4) पं. हंसकुमार तिवारी

रेल की देशव्यापी हड़ताल खत्म क्या हुई, सेवा-दान का वह अनुबंध भी समाप्त हो गया। हमें अपना बोरिया-बिस्तर बाँधकर गया से पटना लौट आना पड़ा। इतना भी वक्त नहीं मिला कि एक बार हंसकुमारजी से मिलकर बता आता कि पटना लौट रहा हूँ।

उसके बाद स्थितियों ने तेजी से करवट बदली। समय को पंख लगे। पिताजी दिल्ली जा बसे और कालांतर में मैं भी दिल्लीवासी बना। लेकिन, पटना छोड़ने से पहले, सन् 1975 के आरम्भिक महीने में, मैं बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् पिताजी के किसी काम से गया तो परिसर में ही एक अधिकारी महोदय से ज्ञात हुआ कि निदेशक के कक्ष में पं. हंसकुमार तिवारीजी विराजमान हैं। मैंने समझा, हंसकुमारजी निदेशक से मिलने आये होंगे। मैं हुलसकर निदेशक के कक्ष में प्रविष्ट हुआ तो देखा कि वह तो निदेशक के आसन पर बैठे हैं। बिहार सरकार राजभाषा विभाग में उन्होंने 'राजभाषा पदाधिकारी' के रूप में सन् 1951 में पद-भार सँभाला था और उसी विभाग से सेवा-मुक्त हुए थे। यह जानकर मुझे अतीव प्रसन्नता हुई थी कि शासन ने उन्हें राष्ट्रभाषा परिषद् का निदेशक (8-1-1975 से 31-12-1977) मनोनीत किया था। सुदर्शन व्यक्ति तो वह थे ही, श्वेत वस्त्र-परिधान में और भी आकर्षक व्यक्तित्व लग रहा था उनका। उनके आसपास एक प्रभा-मण्डल होता था। उस वक्त भी मैं इतना छोटा था कि उन्हें बधाई देने की मेरी योग्यता नहीं थी, मैंने चरण-स्पर्श कर अपनी प्रसन्नता व्यक्त की। मुझे देखकर वह खुश हुए, पिताजी और घर-परिवार की कुशलता पूछते रहे।...



हंसकुमार तिवारीजी राष्ट्रीय चेतना के अनूठे कवि थे, बांग्ला और हिन्दी दोनों भाषाओं पर उनका असाधारण अधिकार था। उन्होंने बांग्ला के श्रेष्ठ साहित्य को हिन्दी में यथावत् भाषान्तरित किया था। मुझे लगता है, उन्होंने बांग्ला के सर्वश्रेष्ठ साहित्यकारों की शताधिक कृतियों का अनुवाद तो अवश्य किया होगा। और, इस कार्य में उन्होंने अथक परिश्रम के साथ अपने जीवन का लंबा श्रमसाध्य वक्त व्यतीत किया था। उन्होंने कहानियाँ लिखीं, नाटक लिखे और आलोचनाओं-निबंधों की लंबी श्रृंखलाएँ रचीं। यह जानकर मुझे प्रसन्नता हुई थी कि 'साप्ताहिक बिजली' के संपादन में भी उन्होंने सन् 1938-39 में सहयोग किया था। कालांतर में 'किशोर' (पटना) और 'उषा' (गया) नामक पत्रिका का संपादन करते रहे। साहित्य की हर विधा में उनके हस्तक्षेप और परिश्रम की स्पष्ट छाप मिलती है।... नौवीं या दसवीं कक्षा में उनकी एक कविता पढ़ी थी। अब वह पूरी कविता तो स्मरण में नहीं रही, लेकिन उसकी कतिपय पंक्तियाँ याद आती हैं। छायावाद-रहस्यवाद के संधिकाल में लिखी गयी हंसकुमारजी की इस कविता ने रहस्यवाद को कैसा विस्मयकारी विराट् रूप दिया है, आप स्वयं देख लें--
"घर आये, मेहमान बने,
अब निष्ठुर प्राण बने जाते हो!...
अब तुम फूलों में हँसते हो,
रजत चाँदनी में मुस्काते,
अब तक तो तुम ही तुम थे,
अब भगवान बने जाते हो!!"

बलहरहाल, परिषद् में हुई उस मुलाकात के बाद मैं भी दिल्ली चला गया। देश में जब आपातकाल  की घोषणा हुई, उसी के कुछ महीने बाद पिताजी इण्डियन एक्सप्रेस से सेवा-मुक्त हुए और सन् 1977-78 में पटना आये। पटना-प्रवास में उनकी मुलाकात भी हंसकुमारजी से परिषद्-कार्यालय में हुई थी। फिर पिताजी दिल्ली चले आये। कुछ वर्षों बाद जीवन में व्यतिक्रम उपस्थित हुआ। मैं नयी नौकरी पर 1979 में दिल्ली छोड़ ज्वालापुर (हरद्वार) चला आया। कुछ महीने बाद पिताजी भी वहीं आ गये। दिन बीतते रहे।...

सन् 1981-82 में जब हम सपरिवार पटना लौटे, उसके डेढ़-दो वर्ष पहले ही मात्र 62 वर्ष की आयु में हंसकुमार तिवारीजी लोकांतरित (27-9-1980) हो गये थे।...

गया में हंसकुमारजी के घर का नाम 'मानसरोवर' था। पिताजी को संबोधित उनके जितने भी पत्र/पोस्टकार्ड आते, सबके शीर्ष पर तिथि के साथ लिखा होता--'मानसरोवर'। बहुत छुटपन में उनकी चिट्ठियाँ पिताजी को देते हुए मैं कहा करता--'बाबूजी! मानसरोवर से चिठ्ठी आयी है।' तब अक्षरों को टटोल-जोड़कर पढ़ लेने-भर की बुद्धि थी। अर्थ-अभिप्राय समझ पाने की योग्यता नहीं थी। मैं समझता था कि हिमालय की चोटियों पर तरंगित जिस किसी प्रशांत झील का नाम 'मानसरोवर' है, पत्र वहीं से आया है। यह तो कुछ वर्षों बाद समझ में आया कि 'मानसरोवर' से आये पत्र गया से हंसकुमारजी के भेजे हुए पत्र होते हैं। लेकिन, उनके निधन की सूचना प्राप्त होने के बाद गहरी वेदना के साथ कुछ ऐसी अनुभूति हुई थी कि गया के मानसरोवर का हंस अनन्त आकाश को लाँघता न जाने कहाँ चला गया है अब...!

मानसरोवर के प्रांगण में वो जो सुफैद-सा गुलाब खिला रहता था, वह काँटों की टहनी पर अंततः ईसा-सा झूल ही गया अपनी मधुर-मनोहार स्मृतियाँ और मुग्धकारी सुगंधि छोड़कर, ...जो साहित्य में सदा सुवासित रहेगी!...
(समाप्त)

(चित्र : 1. पं. हंसकुमार तिवारी 2. बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् का प्रांगण 3. परिषद्-निदेशक की सूची का काष्ठपट्ट।)
क्षेपक : संयोग से कल शाम (6 मई, 2017) पटना आ पहुँचा और आज बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् गया था। वहीं से प्रकाशित एक पुस्तक से मिल गयी है मुझे हंसकुमार तिवारीजी की एकमात्र छवि, जिसे आप मित्रों के सम्मुख रखकर मै संतोष का अनुभव कर रहा हूँ।--आनन्द.

शनिवार, 10 जून 2017

'वो जो सुफैद-सा गुलाब वहाँ फूला था...' (3) पं. हंसकुमार तिवारी

सत्ताइस दिनों के उस गया-प्रवास में बस एक बार और हंसकुमारजी के घर जाने का मौका मिला। जब उनके दरवाजे पहुँचा तो देखा कि हंसकुमारजी अहाते में ही पुष्प-पौधों के बीच, एक सेंटर टेबल पर अपने कागजात फैलाये, कुर्सी पर बैठे हैं और कुछ लिख रहे हैं। लौहद्वार खुलने की आहट से उनका ध्यान भंग हुआ। मुझे देखते ही उन्होंने हाँक लगायी--'आओ-आओ, इधर आ जाओ।' चरण-स्पर्श कर मैं उनके पास जा बैठा और बातें होने लगीं। बीच में ऊँची आवाज लगाकर उन्होंने मेरे आगमन की इत्तला के साथ चाय भेजने की हिदायत दी। थोड़ी ही देर में चाय आ गयी, बिस्कुट-नमकीन के साथ। हमने बातें करते हुए चाय पी।

चाय अभी खत्म ही हुई थी कि मैंने उनके कागजों की ओर देखा--फुलस्केप पृष्ठों पर अनूदित सामग्री के अक्षर मोती के दानों-से चमक रहे थे। हंसकुमारजी शिरोरेखाविहीन, थोड़े तिरछे-तिरछे, सुडौल अक्षर लिखते थे--कहीं काट-छाँट नहीं, शब्द-परिवर्तन नहीं, सर्वत्र एक समान, सधा हुआ सुंदर लेखन! तैयार प्रेसकाॅपी! उनके लिखे को देखकर मुझे पिताजी के अक्षरों और उनका लेखन याद आया, अनवरत एकाग्र परिश्रम याद आया। मैंने कहा--'आपके अक्षर बाबूजी के अक्षरों से बहुत मिलते-जुलते हैं, वह भी शब्दों पर शिरोरेखा नहीं डालते और उनका लिखा हुआ भी बहुत साफ-सुथरा होता है। वह भी आपकी तरह ही अनुवाद-कार्य में व्यस्त रहते हैं। बस, बाबूजी के अक्षर सीधे होते हैं और आपके थोड़े तिरछे।'

मेरी बात सुनकर वह मुस्कुराये और बोले--'कलम जितना घिसेगी, अक्षर उतने ही पुष्ट-सुडौल होंगे। मुक्तजी और मैंने भी जीवन-भर कलम घिसने के सिवा और किया भी क्या है?'
फिर, मेरे मुँह से बस इतनी-सी बात निकल गयी--'लेकिन यह परिश्रम, यह अध्यवसाय और ऐसी संलग्नता तो बड़ी कठिन साधना है। यह कष्ट-साधन कैसे कर लेते हैं आपलोग?'
मेरी बात सुनकर वह दो क्षण मौन रहे, फिर गम्भीरता से बोले--'मैंने पीछे जो जमीन छोड़ी है, वह तपता हुआ रेगिस्तान था और उसे मैंने पाँवों से चलकर नहीं, छाती के बल रेंगकर पार किया है। हमें राजकृपा का सुवर्ण रथ कभी प्राप्त नहीं हुआ। भीषण और निरंतर श्रम ही हमारे भाग्य का सुख है...और उसे ही हम सुखपूर्वक भोगते हैं!'...

मैं उनकी बात सुनकर सन्न रह गया। खुले बगीचे की आबोहवा में भी गम्भीरता तैरने लगी... तभी चाचीजी ने आकर हस्तक्षेप किया, बोलीं--'खाना तैयार है। आपलोग अंदर आ जाइये।' मैंने घड़ी देखी, डेढ़ बज रहे थे। बातों-बातों में खासा वक्त बीत गया था। सेंटर टेबल पर रखी पुस्तकें और कागजों को समेटने में मैंने हंसकुमारजी की मदद की और हम घर में दाखिल हुए। भोजन सुस्वादु था। हमने भोजनोपरांत मिष्टान्न की प्यालियाँ उठायीं और ड्राइंग रूम में आ बैठे और सामान्य बातें होने लगीं। पिछली बातों का अवसाद तो धुलने लगा, लेकिन हंसकुमारजी का वह वाक्य मेरे अंतर्मन में कहीं गहरे अंकित हो गया था हमेशा के लिए--'मैंने पीछे जो जमीन छोड़ी है, वह तपता हुआ रेगिस्तान था...'

मेरे लौट चलने का वक्त हो रहा था, लेकिन उन दिनों एक फितूर मेरे सिर पर सवार था, मैं जिन बड़े साहित्यिकों से मिलता, उनसे अपनी पाॅकेट डायरी में 'ज़िदगी क्या है', इस विषय पर उनके विचार लिख देने का आग्रह करता। यही आग्रह मैंने हंसकुमारजी से भी किया और अपनी जेब से डायरी निकाली। मेरा निवेदन सुनते ही हंसकुमारजी उठ खड़े हुए और अलमारी से एक छोटी-सी डायरी निकाल लाये। उसे मुझे देते हुए बोले--'इसमें ज़िंदगी पर लिखी हुई मेरी शत-सूक्तियाँ हैं, देख लो। जो तुम्हें पसंद होगी, वही लिख दूँगा।'

उस डायरी की सूक्तियाँ देखकर मुझे हैरत हुई। उसमें सूक्तियाँ नहीं, एक-से-बढ़कर एक नगीने जड़े थे--ज़िंदगी विषयक। उसमें से किसी एक का चयन करना आसान तो हर्गिज नहीं था। इसमें वक्त लगा, लेकिन मैंने अंततः जिस सूक्ति का चयन किया, वह मेरी स्मृति में ही अंकित रह गया; वह बहुमूल्य डायरी तो कानपुर शहर में मेरी साइकिल के कैरियर से राह चलते कहीं टपक गयी, जिसका अफसोस मुझे लंबे समय तक रहा। बहरहाल, जिस सूक्ति को मैंने पसंद किया था, उसे हंसकुमारजी ने मेरी डायरी में लिखकर हस्ताक्षर किये, तिथि डाली। मैं उपकृत होकर उनके घर से लौटा। वह सूक्ति थी--

'जो हुआ, सो हुआ समझो,
सुख-दुःख सब दया-दुआ समझो,
दाँव हारा कि जीत ली बाजी,
ज़िंदगी? ऐ मियाँ! जुआ समझो!!'
(क्रमशः)

रविवार, 4 जून 2017

'वो जो सुफैद-सा गुलाब वहाँ फूला था...' (2) : पं. हंसकुमार तिवारी

यह सन् '74 की बात है, जब देशव्यापी रेल-हड़ताल हुई थी। मैंने सिविल डिफेंस सेवा का प्रमाण-पत्र अर्जित कर रखा था। उन दिनों सिविल डिफेंस के प्रमाण-पत्रधारी नवयुवकों को बलात् सेवा-दान के लिए भेजा जा रहा था। मुझे भी गया जंक्शन के टेलीफोन एक्सचेंज पर तैनात कर दिया गया। मैं यह सोचकर सोत्साह इसके लिए राजी हो गया था कि बहुत दिनों के बाद चाँद से मिलूँगा और हंसकुमारजी के पुनर्दशन कर कृतार्थ होऊँगा। गया मैं चला तो गया, लेकिन वहाँ ऐसी अव्यवस्था फैली हुई थी कि पाँच-छह दिनों तक बिलकुल फुर्सत नहीं मिली। मैं प्रशिक्षण और सेवा-दान में लगा रहा। सातवें दिन फुर्सत मिली। मैं भागकर हंसकुमारजी के घर पहुँचा। वह बंगला के किसी विशाल ग्रंथ के अनुवाद-कार्य में व्यस्त थे, लेकिन मुझे देखकर प्रसन्न हो उठे। 'बैठो-बैठो' कहते हुए सामने पड़े कागज-किताब और कोश समेट कर वह एक किनारे रखने लगे तो मैंने कहा--'आप तो व्यस्त हैं, अपना काम न रोकिये। मैं तब तक चाँद से मिल लेता हूँ, कहाँ है वह?'

लेकिन उन दिनों चाँद गया में नहीं थे, किसी काॅलेज के छात्रावास में थे शायद। उनसे न मिल पाने की मुझे निराशा हुई। हंसकुमारजी ने अनूदित पृष्ठों को सहेजते हुए कहा--'यह तो महासमुद्र है, मेरे आसपास तरंगित होता रहेगा। तुम तो मुक्तजी का कुशल-क्षेम सुनाओ। कैसे हैं वह।' मैंने विस्तार से उन्हें घर-परिवार की कुशलता के समाचार दिये और गया में अपनी उपस्थिति का कारण-प्रयोजन बताया। वह सुनकर प्रसन्न हुए, बोले--'फिर तो तुम यहीं आ जाओ, यहीं से ड्यूटी पर चले जाना। स्टेशन पर जाने कैसा खाना मिलता हो। यहाँ कम-से-कम घर का भोजन तो मिलेगा।'

हंसकुमारजी से हमारे पारिवारिक संबंध थे--अत्यंत निकट के, आत्मीय! मेरे प्रति उनकी ऐसी प्रीति सहज स्वाभाविक थी, लेकिन मैंने स्थिति स्पष्ट करते हुए उन्हें बताया कि 'आकस्मिक सेवाओं के लिए स्टेशन पर ही बने रहने की अनिवार्यता है, अन्यथा मैं आपके पास ही आ जाता। हाँ, साप्ताहिक अवकाश पर अवश्य आ जाया करूँगा।'

फिर, बात को घुमाकर मैं उनकी कविता पर ले आया और उनकी उसी कविता की मैंने उन्हें याद दिलायी, जिसे मैंने उनके श्रीमुख से कवि-सम्मेलन में सुना था। मैं उस कविता की पंक्तियाँ उद्धृत करने लगा तो वह बड़े खुश हुए। कहने लगे--'अरे वाह! तुम्हें तो कई पंक्तियाँ याद हैं उस कविता की। तुममें आया यह परिवर्तन मुझे अच्छा लगा। आखिर जिस महावृक्ष की छाया में कई पीढ़ियों को साहित्यिक संस्कार मिले, उसी की छाया में पलते-बढ़ते उन्हीं के सुपुत्र को क्यों न मिलते?'...
उनकी इस बात से मैं प्रसन्न हुआ, यद्यपि उनका परोक्ष इशारा बचपन की मेरी दुष्टता-उद्दण्डता की ओर भी था। मैंने उनसे कविताएँ सुनाने का अनुरोध किया तो उन्होंने एक नहीं, कई कविताएँ सुनायीं। मैं मंत्रमुग्ध सुनता रहा।
वह गौर वर्ण के सुदर्शन व्यक्ति थे। उनकी खनकदार आवाज में एक प्रकार का भारीपन था, जो अलग प्रभाव छोड़ता था। कविता पूरी लयात्मकता के साथ प्रवाह में सुनाते थे--स्पष्ट शब्दोच्चारण के साथ। उनके काव्य-पाठ का श्रवण करते हुए श्रोता विभोर हो जाता था। उस दिन मेरी दशा भी कुछ ऐसी ही थी। उनकी कई कविताओं में एक कविता देश के विस्मृत बलिदानियों के प्रति थी--बहुत प्रेरक कविता; जिसकी आरंभिक तीन पंक्तियाँ मेरी स्मृति में स्थिर थीं, उसका एक और छंद मैं नेट से आपके लिए ढूँढ़ लाया हूँ--
'मिट्टी वतन की पूछती
वह कौन है, वह कौन है?
इतिहास जिस पर मौन है! वह कौन है?
जिसके लहू की बूँद का टीका हमारे भाल पर
जिसके लहू की लालिमा स्वातंत्र-शिशु के गाल पर
जो बुझ गया गिरकर गगन से, निमिष में तारा-सदृश
बच ओस जितना भी न पाया, अश्रु जिसका काल पर
जिसके लिए दो बूँद भी स्याही नहीं इतिहास को
वह कौन है?...'

सुबह के नौ-दस बजे मैं उनके आवास पर पहुँच गया था, लेकिन बातों-बातों में दिन के दो बज गये। भोजन का वक्त हो गया था। सुदर्शना और स्नेहमयी चाचीजी ने भोजन कराने के बाद ही मुझे लौटने की इजाजत दी और हंसकुमारजी बार-बार ताकीद करते रहे कि छुट्टी मिलते ही मैं उनके पास आ जाऊँ। उस पीढ़ी के लोगों के अंतर्मन में कितनी प्रीति, कितना स्नेह भरा पड़ा था, यह सोचकर मैं आज भी हैरान होता हूँ।...
(क्रमशः)


(चित्र : सन् 1968 में मेरी माता के निधन पर हंसकुमार तिवारीजी का शोक-संवेदना का पिताजी को संबोधित पत्र, दिनांक : 13-12-1968)

बुधवार, 31 मई 2017

'वो जो सुफैद-सा गुलाब वहाँ फूला था...' : पं. हंसकुमार तिवारी

जब बहुत छोटा और उद्दण्ड होने की हद तक चंचल बालक था, तब एक बार पिताजी सपरिवार गया गये थे और हंसकुमार तिवारीजी के यहाँ ठहरे थे। किस प्रयोजन से गये थे, यह तो याद नहीं, लेकिन स्मृति में स्पष्ट अंकित है कि हंसकुमारजी के घर में फल-फूलों के बहुत-से पेड़-पौधे थे, लताएँ थीं। उनके घर हमें बहुत सुस्वादु भोजन और मिष्टान्न मिला था और वहीं मुझे हमउम्र एक मित्र भी मिल गये थे--'चाँद', जो हंसकुमारजी के सुपुत्र थे--गोरे-सुंदर-से बालक। याद नहीं, फिर भी लगता है, वह एक-दो दिन का ही प्रवास था। मित्र रूप में मुझे चाँद मिले और मेरी बड़ी बहन को मिलीं 'ब्ल्यू' दी'। एक-दो दिनों में ही मैंने और चाँद ने मिलकर हंसकुमारजी के घर में हाहाकारी तूफान मचा दिया था। दरअसल, चाँद भी मेरे ही गुण-गोत्र के थे।

गया में पिताजी के दो मित्र थे--एक कनिष्ठ हंसकुमार तिवारीजी, दूसरे वरिष्ठ मोहनलाल महतो 'वियोगी'जी। हंसकुमारजी पिताजी से उम्र में आठ साल छोटे थे और पिताजी को 'गुरुजी'/'गुरुदेव' कहते थे। वियोगीजी पिताजी से आठ वर्ष बड़े थे, लेकिन मित्रता घनिष्ठतम थी। उसी प्रवास में पिताजी हमसबों के साथ वियोगीजी के हवेलीनुमा पैतृक घर भी गये थे उनसे मिलने।...

बहरहाल, मित्रवर चाँद ने भी उद्दण्डता की परीक्षा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण की और पटना के उसी आवासीय विद्यालय में प्रवेश पाया, जिसमें मुझे घर-निकाला देकर दाखिल किया गया था--'पंचशील छात्रावासीय विद्यालय', कुम्हरार, पटना। उस विद्यालय में डेढ़-दो साल में ही मैंने और चाँद ने मिलकर ऐसे कीर्तिमान स्थापित किये कि प्राचार्य महोदय को अभिभावकों से अंततः कहना ही पड़ा कि 'इस विद्यालय का कल्याण इसी में है कि आप अपने बच्चों को घर ले जायें।'... और हम दोनों ही छात्रावास रूपी उस बंदीगृह से मुक्त हो गये थे।

कुछ समय के बाद, उच्च शिक्षा के लिए हंसकुमारजी की ज्येष्ठ सुपुत्री ब्ल्यू दीदी पटना आयीं और कुछ महीने हमारे साथ ही रहीं। उनकी और मेरी बड़ी दीदी की खूब बनती थी। मेरी माँ भी ब्ल्यू दीदी से बहुत स्नेह करती थीं। घर में ब्ल्यू दीदी के आने से मुझे एक बड़ा लाभ यह हुआ था कि मुझे डाँट-फटकार कम मिलती थी और मुझे प्राप्त होनेवाले किसी भी दण्ड के बीच वह दीवार बनकर खड़ी हो जाती थीं। लेकिन लंबे वक्त तक यह सुख-लाभ भी मुझे मयस्सर न हुआ और ब्ल्यू दीदी को जैसे ही महाविद्यालय के छात्रावास में स्थान मिला, वह वहाँ चली गयीं। वक्त के इन छोट-छोटे टुकड़ों में साथ रहते-बिछड़ते हमारे बीच ऐसी घनिष्ठता हुई कि कभी यह खयाल ही न आया कि ब्ल्यू दीदी और चाँद का बाहर का नाम पूछकर जान लूँ; पुकार के इन्हीं नामों से वक्त का वह टुकड़ा व्यतीत हो गया और ऐसा व्यतीत हुआ कि फिर कभी जीवन में लौटकर नहीं आया।... बचपन के दिनों की तरह ही ब्ल्यू दीदी और चाँद भी अलभ्य हो गये।...

जब थोड़ा बड़ा हुआ, सुबुद्ध बना और अपने बुजुर्गों की महत्ता जानने-समझने लगा तथा अपने विद्यालय का कविता-पाठी छात्र बनकर प्रसिद्धि पाने लगा, तब की बात है--संभवतः 66-67 की। आकाशवाणी, पटना द्वारा आयोजित एक कवि-सम्मेलन में पिताजी की कृपा से मुझे अग्रिम पंक्ति में स्थान मिल गया था। सम्मेलन का संचालन पिताजी ने ही किया था। उन दिनों के कवि-सम्मेलनों की याद करता हूँ तो आज के ऐसे आयोजन फीके-से लगते हैं। इस कवि-सम्मेलन में नामी-गिरामी हस्तियाँ पधारी थीं, जिनमें हंसकुमार तिवारीजी भी थे। उन्होंने बड़ी प्रवाहपूर्ण कविता पढ़ी थी, जो मेरी स्मृति में अंकित होकर रह गयी :

'मीत !
आग के अक्षरों लिखा ये गीत
सुनो, चिनगी चाहे मत चुनो!'
कविता ने जैसे-जैसे विस्तार पाया, वैसे-वैसे वह अनूठी और अप्रतिम होती गयी। हाँ, सच है कि मैंने पूरे मनोयोग से वह कविता सुनी और उसकी चिनगी भी चुनी थी। उसी कविता का अगला टुकड़ा यह था :
'वो जो सुफैद-सा गुलाब वहाँ फूला था,
काँटों की टहनी पर ईसा-सा झूला था,
उस क्रूर पर वह सर्द-सा मुस्कुराया,
गूँगा दिल तड़पकर होंठों पर तिलमिलाया।'...
'सर्वसहा धरती का धीर आज डोला है,
तीर खाये कीर का ये पीर आज बोला है।'...
पूरी कविता एक मार्मिक बयान थी, जैसे कवि अपने ही मन की पीर शब्दों में बाँधकर बाँट रहा हो।
टुकड़ों में यह पूरी कविता प्रायः मुझे याद हो गयी थी, क्योंकि इसकी पंक्तियाँ मेरे अंतर्मन में गूँजती रहती थीं और मैं उनकी आवृत्ति करता रहता था। आज भी स्मरण से ही इन पंक्तियों को उद्धृत कर रहा हूँ। तब की स्मृतियाँ अधिक उज्ज्वल हैं। अब तो, अभी की बात, अभी भूल जाता हूँ।...
(क्रमशः)

(चित्र : मेरे पिताजी पं. प्रफुल्लचन्द्र ओझा 'मुक्त' और पं. हंसकुमार तिवारी की अत्यंत धुँधली-सी तस्वीर जो एक सम्मिलित चित्र से निकाली गयी है। आप स्वयं देख लें, हमारी आधुनिक दुनिया कितनी संवेदनशील है अपने देश के लेखकों-कवियों के प्रति! सारा नेट-तंत्र खँगाल डाला, कहीं हंसकुमारजी का एक चित्र भी नहीं, आवश्यक सूचनाएँ भी नहीं, पुण्य-तिथि तक का उल्लेख नहीं।... आश्चर्य होता है!)

रविवार, 30 अप्रैल 2017

वह एक अकेला दुर्लभ दर्शन...(2)

उन दिनों मेरी श्रीमतीजी साथ नहीं थीं। उन्होंने मेरी प्रथम कन्या को जन्म दिया था और वह अपने मायके में थीं। मैंने तब तक आचार्यश्री को शीतल जल ही पिलाया था और बातें सुनने में मशगूल हो गया था। अचानक पिताजी को ख़याल आया तो उन्होंने आदेश दिया-- 'वाजपेयीजी के लिए चाय-पान की कुछ व्यवस्था तो करो।' आदेश की पालना के लिए मैं उठने ही वाला था कि छोटे भाई लौट आये। आचार्यश्री के चरण-स्पर्श से उन्होंने भी वही प्रसाद पाया, जो मुझे मिला था। उन्होंने ही आचार्यश्री के जलपान और चाय की व्यवस्था की। मैं, आचार्यश्री और पिताजी की वार्ता का मूक श्रोता बना, वहीं, उन्हीं के आसपास रहा। बातें अनेक विषय-बिंदुओं का स्पर्श करती हुई फिर जयप्रकाशजी पर आ गयीं। पिताजी वाजपेयीजी को विस्तार से बताने लगे कि जब जयप्रकाशजी जसलोक अस्पताल, मुंबई में थे, तब अज्ञेयजी के अनुरोध पर वह उनके साथ मुंबई गये थे और लोकनायक से मिले थे।
पिताजी और जयप्रकाशजी की वार्ता भोजपुरी में शुरू होती, फिर अज्ञेयजी का ख़याल कर जे.पी. हिंदी में बोलने लगते और बातें हिंदी में होने लगतीं; किन्तु थोड़ी ही देर बाद पिताजी की ओर मुखातिब होकर जब जे.पी. कुछ कहने लगते तो भाषा स्वतः भोजपुरी हो जाती। ऐसा जब दो-तीन बार हुआ तो जे.पी. ने अज्ञेयजी से कहा-- 'मुक्तजी से मेरी बातचीत की भाषा वर्षों से भोजपुरी रही है, इसलिए...! आप कुछ ख़याल न कीजिएगा।' अज्ञेयजी ने प्रत्युत्तर में बस इतना कहा था--'भोजपुरी मैं बोल नहीं पाता, लेकिन समझता तो अच्छी तरह हूँ।...'
जयप्रकाशजी बड़े कष्ट में थे, लेकिन पिताजी-अज्ञेयजी को देखकर खिल उठे थे। उन्होंने कहा था--'कल तो डायलिसिस पर रहूँगा। परसों मिलकर ही जाइयेगा। आपलोग आ जाते हैं तो अच्छा लगता है।'...
आचार्यश्री पिताजी की बातें ध्यान से सुन रहे थे। पिताजी की बात पूरी हुई तो उन्होंने कहा--'बिल्कुल सत्य लिखा है आपने। जयप्रकाशजी तो दधीचि ही थे। देश और जनसेवा में उन्होंने सर्वस्व निछावर कर दिया--और तो और, अब निज देह भी अर्पित कर दी।'...
दो घण्टों की निरंतर वार्ता के बाद आचार्यश्री विदा लेने के लिए उठ खड़े हुए। मैंने विनम्रता से कहा--'कंपनी की गाड़ी आपको कनखल तक छोड़ देगी। मैं ड्राइवर को बुलाता हूँ अभी।' उन्होंने कहा--'रहने दीजिए, इसकी आवश्यकता नहीं। मैं पैदल चलने का अभ्यासी हूँ। जैसे आया था, वैसे ही चला जाऊँगा।'...और वह चले गये।

आचार्यश्री तो चले गये और मैं सोचता ही रहा कि प्राचीनकाल में ऋषि-कुल के तपी-तपस्वी, साधक तथा परम गुणी-ज्ञानी महापुरुष ठीक ऐसे ही रहे होंगे--आडम्बरविहीन, एकनिष्ठ, सरल-सहज, उदात्त! उन्होंने अपनी साज-सज्जा, वेशभूषा और प्रदर्शन-प्रियता से नहीं, अपनी प्रखर तेजस्विता और अनूठी-अगाध विद्वता से आचार्य-पद पाया था। उनका बाहरी आवरण और रूप-सज्जा चाहे जैसी रही हो, वह चाहे दीन-हीन, दरिद्र ही क्यों न दिखते हों, दुनिया उनकी चरण-वंदना में नतशिर रही। उन्होंने एक आलेख से पिताजी का पता पाया था और उस आलेख से इतने प्रसन्न-प्रभावित हुए थे कि स्वयं चलकर हमारे द्वार पर आ गये थे तथा हमें दर्शन और आशीर्वाद देकर कृतार्थ किया था।...
आचार्यश्री हिन्दी को शब्दानुशासन देने वाले 'हिन्दी के पाणिनी' थे। यह उपधि उन्हें उनके जीवनकाल में ही मिल गयी थी, जो सर्वस्वीकृत थी। 'हिन्दी, संस्कृत की नहीं, किशोरीदास की बेटी है'--यह गर्वोक्ति नहीं, आधिकारिक उद्-घोषणा थी आचार्यश्री की। और, ऐसी बात कहने का साहस सिर्फ वही कर सकते थे।
कुछ समय बाद पिताजी कनखल जाकर आचार्यश्री से
मिल आये थे, मैं ही अपनी कार्यालयीय व्यस्तताओं में उलझा रहा और पुनः उनके दर्शन का अवकाश न निकाल सका। आचार्यश्री के पुनर्दशन से लौट आने के बाद पिताजी ने बताया था कि "वाजपेयीजी 'काव्यानुशासन' नामक एक वृहत् ग्रंथ के प्रणयन की कार्य-योजना पर काम कर रहे हैं और उनकी समस्त चिंता यही है कि अपने जीवन काल में यह काम वह पूरा कर सकें। गजब जीवट के महानुभाव हैं वाजपेयीजी भी! लेकिन, मुझे नहीं लगता कि उम्र की इस दहलीज पर, आँखों की इस दशा में और शरीर की सीमित हो रही शक्ति से वह यह काम पूरा कर सकेंगे।" और हुआ भी यही। आचार्यश्री हिन्दी को 'काव्यानुशासन' दे न सके।... लेकिन जितना कुछ वह हिन्दी, हिन्दी-व्याकरण और ब्रजभाषा को दे गये हैं, उतना तो बड़ी-बड़ी संस्थाएँ भी अपने दीर्घ कार्यकाल में नहीं दे पातीं।...

छह महीने बाद प्यारी-सी बेटी के साथ श्रीमतीजी मायके से लौट आयीं। ज्वालापुर की आबोहवा पिताजी को अनुकूल नहीं पड़ रही थी। सन् 80 के जाड़ों में वह पटना लौट गये। मैं दफ़्तर के कामों, घर-गृहस्थी की उलझनों और बिटिया के लाड़-प्यार से आबद्ध रहा और आचार्यश्री के एक और दर्शन-लाभ की बात बस सोचता ही रहा। बात आज-कल पर टलती रही।...
सन् 1981 में, जब मैं दिल्ली गया हुआ था, एक दिन अकस्मात् समाचार पत्रों से ज्ञात हुआ कि आचार्य किशोरीदास वाजपेयी का 83 वर्ष की आयु में निधन (12-8-1981) हो गया है और अमुक समय और स्थान पर उनकी अंत्येष्टि होगी। जब उनकी जरा-जर्जर काया की झुर्रियों और लकीरों को, रग-रेशों को अग्नि की लपलपाती जिह्वा मिटा रही थी, मैं अपने मालिकों के साथ मीटिंग में व्यस्त था। आचार्यश्री के पुनः दर्शन न कर पाने का क्षोभ मुझे सालता रहा। वह एक अकेला दुर्लभ दर्शन ही अंतिम दर्शन सिद्ध हुआ।...
(समाप्त)
(चित्र : 1. प्रौढ़ावस्था के आचार्यश्री 2. मैं और मेरी ज्येष्ठ कन्या, उसी काल और परिसर की छवि, जहाँ आचार्यश्री पधारे थे।)

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

वह एक अकेला दुर्लभ दर्शन...

वह मेरी नयी नौकरी थी। वहाँ अकेले रहते हुए मुझे एक महीना भी पूरा नहीं हुआ था। मरे पास ज्वालापुर (हरद्वार) आने के लिए जिस रात (8 अक्तूबर, 1979) पिताजी ने दिल्ली से ट्रेन पकड़ी, उसी रात लोकनायक जयप्रकाश नारायणजी के अवसान की मार्मिक सूचना उन्हें मिली थी। उनकी यात्रा की वह रात कष्टप्रद बीती। उनका मानसिक उद्वेलन चरम पर था। उस रात वह डोर टूटी थी, जिससे पिछली आधी शती से पिताजी जयप्रकाशजी से अविच्छन्न रूप से जुड़े-बँधे थे।...
हरद्वार स्टेशन पर मैं उपस्थित था, उन्हें घर ले आया। पिताजी क्लांत थे--शरीर से और मन से भी! जयप्रकाशजी का विछोह उनके लिए बड़ा आघात था। स्नान-ध्यान और भोजनोपरांत यथानियम वह दिवानिद्राभिभूत हुए। मैं अपने दफ़्तर चला आया, जो मेरे आवास से बस इतनी ही दूरी पर था कि दफ़्तर में बैठे-बैठे जब चाहूँ, तब घर का मुख्यद्वार देख लूँ। शाम पाँच बजे मैं घर आया तो मैंने देखा पिताजी कुछ लिख रहे हैं। मैंने पूछा--'चाय पी ली आपने?' उन्होंने कहा--'हाँ, शम्भु चाय पिला गये हैं। कह गये हैं कि अभी आता हूँ।' मैंने पुनः प्रश्न किया--'क्या लिख रहे हैं आप? आज तो आराम कर लेते!'
उन्होंने किंचित् क्षोभ के साथ कहा था--'जयप्रकाशजी की स्मृतियाँ विचलित कर रही हैं। उन्हीं के बारे में लिख रहा हूँ।' जब वह आलेख सम्पन्न हुआ, मैंने उसे पढ़ा। वह जयप्रकाशजी पर लिखा पिताजी का अत्यंत मार्मिक संस्मरण था--'एक और दधीचि : लोकनायक जयप्रकाश नारायण'। प्रायः एक महीने बाद वह संस्मरण 'कादम्बिनी' या 'नवनीत' में प्रकाशित हुआ था। संस्मरण के अंत में लेखक का तत्कालीन नया पता भी छपा था। रजिस्टर्ड डाक से हमें उसकी प्रति प्राप्त हुई थी। जयप्रकाशजी के अवसान की मर्मंतुद पीड़ा और अवसाद को पिताजी ने अपनी लेखनी-चंचु से मूर्त्त कर दिया था उस संस्मरण में।...
जहाँ तक याद है, उस आलेख के प्रकाशन के दस-पन्द्रह दिन बाद (नवम्बर 1979 के अंत में) की ही बात है। दिन के दस-ग्यारह बजे होंगे, मैं दफ़्तर की अपनी कुर्सी पर था और कंपनी की खता-बही के किसी नीरस अंकगणितीय दायित्व से निबट रहा था। अनुज यशोवर्धन बाजार चले गये थे और घर में सिर्फ पिताजी और छोटी बहन ही थीं। तभी ऑफिस ब्वाय ने मेरे कक्ष में प्रवेश किया और कहा--'साब! कोई बूढ़ा आदमी आपके घर की घण्टी बजा रहा है और कोई दरवज्जा खोल नहीं रहा। मैं देखूँ क्या साब?'
मैंने दफ़्तर के शीशों से घर की ओर देखा। एक वृद्ध सज्जन द्वार पर खड़े थे और काॅलबेल का स्विच दबा रहे थे। प्रथमद्रष्टया वह मुझे किसी याचक-से लगे। मैंने सेवक को कक्ष के द्वार पर रुकने का आदेश दिया और स्वयं घर की ओर क्षिप्रता से बढ़ा। जब आगंतुक के थोड़ा निकट जा पहुँचा तो मैंने गौर से देखा उन्हें। वयोवृद्ध सज्जन थे--आँखों पर कमानीदार चश्मा था, कोटर में धँसी किशमिशी हो गयीं आँखें थीं, बेतरतीब छोटे-घने केश थे, बड़ी-बड़ी मूँछें थीं, मटमैली धोती, आधी बाँहों की गाँधीगंजी और एक बंडी, जिसका एक भी बटन बंद नहीं था तथा एक हाथ में लट्ठ धारण किये हुए वे कोई प्राचीनकाल के अपरिचत वृद्ध पुरुष लग रहे थे।
ये तो अच्छा हुआ कि मैं जब उनके सन्निकट जा पहुँचा तो मैंने नम्रता से ही पूछा--'किनसे मिलना है आपको?' मेरे प्रश्न का उत्तर न देकर उन्होंने थोड़े रोषपूर्ण स्वर में कहा--'घर जब अंदर से बंद है तो कोई खोलता क्यों नहीं? मैं कब से घण्टी बजा रहा हूँ।'
मैंने पुनः पूछा--'आपको मिलना किनसे है?'
वृद्ध अपनी टेक छोड़ने को तैयार नहीं थे, तपाक से बोले--'भई, मुझे तो यही घर बताया था गेटमैन ने मैनेजर का। यही है न?'
मैं कुछ कहता, उसके पहले ही प्रभु की बड़ी कृपा हुई कि पिताजी ने द्वार खोल दिया। पिताजी को देखने से ही स्पष्ट था कि वह स्नानागार से बाहर आये थे, उनके केश भीगे और बिखरे हुए थे तथा एकमात्र गीला तौलिया उन्होंने कमर में लपेट रखा था। लेकिन जैसे ही पिताजी की दृष्टि आगंतुक वृद्ध सज्जन पर पड़ी, वह प्रायः चौंक पड़े। तेजी से आगे बढ़कर पिताजी उनके पाँव छूने को यह कहते हुए झुके--'अरे, आचार्यश्री आप? क्षमा करें, मैं स्नानगृह में था।...'
लेकिन आचार्यश्री ने पिताजी को अपने चरणों तक पहुँचने नहीं दिया। उन्होंने बीच में ही उनकी बाहें थाम लीं। पिताजी ने मुझसे कहा--'तुम देखते क्या हो? आचार्य किशोरीदास वाजपेयीजी हैं, चरण-स्पर्श करो।' आचार्यश्री के मुझे कभी दर्शन नहीं हुए थे, लेकिन उनके नाम-गौरव से मैं खूब परिचित था। श्रद्धापूर्वक मैंने उनके चरण छुए और अपनी पीठ पर एक धौल का औचक आशीष पाया। पिताजी ने कहा--'मेरे ज्येष्ठ पुत्र हैं आनन्दवर्धन!'
आदरपूर्वक हम उन्हें घर के अंदर ले चले। छोटा-सा आँगन पार करते हुए पिताजी ने आचार्यश्री से कहा--'आपने क्यों कष्ट किया? मैं जब दिल्ली से चला था, तभी मैंने योजना बना ली थी कि आपके दर्शन करूँगा। मैं तो स्वयं आता आपके पास।'
इतनी बात कहते-कहते पिताजी के साथ हम दोनों बारामदे में पहुँच गये थे। पिताजी की बात सुनते ही वाजपेयीजी वहीं ठिठक गये और बोले--'लेकिन, मेरी योजना तो आपके जयप्रकाशजी वाले संस्मरण ने ही बना दी, फिर मैं रुक न सका। आपका पता उसी में था। मैं अपनी योजना को पूरा करने आज ही चल पड़ा। अद्भुत लिखा है आपने। जयप्रकाशजी की स्मृतियों के साथ वह संपूर्ण कालखण्ड जीवित रहेगा इस संस्मरण में।' आचार्यश्री के श्रीमुख से अपने संस्मरण की प्रशंसा सुनकर पिताजी ने शिष्टतावश विनम्रता से कहा--'वाजपेयीजी, मैं अकिंचन सामान्य मसिजीवी...!'
पिताजी का वाक्य अभी पूरा भी न हुआ था कि आचार्यश्री के लट्ठ की एक भरपूर चोट भूमि पर हुई--'धम्म!' और, वह बोल पड़े--'जिस व्यक्ति का नाम मैं पिछले पचास वर्षों से जानता-पढ़ता रहा हूँ, वह भला अकिंचन, सामान्य मसिजीवी कैसे हो सकता है? आप ऐसा तो न कहिये...।'
आचार्यश्री की बात के बाद कोई कुछ कह भी क्या सकता था? वह पिताजी से बारह वर्ष बड़े थे, अधीतशास्त्र थे, विख्यात व्याकरणाचार्य थे और उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध तथा पूरी बीसवीं सदी की समस्त साहित्यिक गतिविधियों के साक्षी भी थे। परिणत वय में संयोगवश मुझे उनके दर्शन का एकमात्र सौभाग्य मिला था। जब पिताजी के कमरे में व्यवस्थित होकर वह बैठे गये और पिताजी से उनकी वार्ता मेरी पहुँच के बाहर के गंभीर विषयों का आस्वाद लेने लगी, तो मैं मौन साधकर ध्यान से आचार्यश्री की बातें सुनने और उनको देखने लगा। उनका चेहरा झुर्रियों और लकीरों का सघन वन था। दीर्घकाल के संघर्षमय जीवन और अनवरत साहित्य-साधना ने उनकी काया पर इतने निशान छोड़े थे कि कुछ न पूछिये, लेकिन विद्याविलासी आचार्यश्री की वाणी में 81 वर्ष की अवस्था में भी वही खनक थी, वैदुष्य की गहरी छाप थी, प्रखर वाग्मिता थी। अपनी स्थापनाओं के पक्ष में वह तब भी पूरी दृढ़ता से खड़े थे। अक्खड़ और ठेठ देशज व्यक्तित्व था उनका। पहली बार दूर से देखकर मैंने ही उन्हें एक याचक समझने की भूल की थी। सज्जनता-सरलता भी ऐसी कि उन्हें अपनी ही वेशभूषा और दीन दशा की सुधि नहीं थी। अचानक मेरी नज़र उनके पुराने चश्मे पर पड़ी। चश्मे की एक कमानी नदारद थी, जिसे उन्होंने एक डोरी से कान पर बाँध रखा था।...
(क्रमशः)
(चित्र : 'दिनमान' का आवरण-चित्र : आचार्य किशोरीदास वापेयी.)

सोमवार, 10 अप्रैल 2017

वो शोला था, जल बुझा...'(2)

(वो गुज़रा हुआ ज़माना...)

याद आता है कि पाँच-छह वर्ष बाद पिताजी, अज्ञेयजी के साथ मिलकर, जब पटना से मासिक 'आरती' का संपादन-प्रकाशन कर रहे थे, तब भी किसी अन्य देश से भेजा हुआ सत्यनारायणजी का एक लेख 'आरती' में छपा था, जिस पर अज्ञेयजी और पिताजी की अलग-अलग कोष्ठकों में टिप्पणियाँ थीं। वह द्वितीय विश्वयुद्ध का काल था। विश्व-परिदृश्य पर अज्ञेयजी की टिप्पणी थी और लेखक के व्यक्तित्व-कृतित्व पर पिताजी की। द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका जब चरम पर पहुँची तो सत्यनारायणजी स्वदेश लौट आये थे और एक दिन आरती-कार्यालय (पटनासिटी) में पहुँचकर उन्होंने पिताजी को चकित कर दिया था। युद्ध की आग जब शांत हुई तो वह पुनः प्रवासी हुए।...
18 अगस्त 1945 को नेताजी सुभाषचंद्र बोस जब हवाई जहाज के साथ विलुप्त हो गये और ऐसी अपुष्ट खबरें रेडियो-अखबारों में आने लगीं तो सत्यनारायणजी बहुत मर्माहत हुए। उनके लिए इन समाचारों पर विश्वास करना कठिन था। नेताजी सुभाषचंद्र बोस के ऐसे रहस्यमय ढंग से गुम हो जाने से देश ही नहीं, पूरे विश्व में खलबली मची हुई थी। लेकिन सत्यनारायणजी के लिए मूक दर्शक बने रहना संभव नहीं था। वह उठ खड़े हुए इस संकल्प के साथ कि नेताजी के सत्य-सूत्र को खोजकर ही स्थिर होंगे। इस संकल्प-पूर्ति में उन्होंने अपने आपको झोंक दिया था। एक आग उनके अन्दर जल उठी थी। जाने किन प्रयत्नों से उन्होंने कई-कई देशों की यात्राएँ कीं, जंगलों-पहाड़ों की खाक छानी, जेल में डाले गये, यातनाएँ सहीं और अंततः फ्रांस पहुँचकर उन्होंने एक पुस्तक लिखी--'नेताजी इज़ वेरी मच एलाइव'।
पिताजी ने मुझे बताया था कि उन दिनों यह पुस्तक बहुत चर्चा में रही थी और हाथों-हाथ उसकी प्रतियाँ बिक गयी थीं। बाद में उसका अनुवाद फ्रेंच भाषा में भी हुआ था। जहाँ तक स्मरण है, पिताजी ने ही मुझसे कहा था कि एक बार किसी देश से पलायन के लिए वह एक को-पायलट को भ्रम में डालकर स्वयं उसके साथ हवाई जहाज ले उड़े थे। यह उनके पराक्रम की पराकाष्ठा थी।


सत्यनारायणजी जिन देशों में गये, वहाँ की भाषा जाने किस मनोयोग से उन्होंने सीख लीं। वह बहुभाषाविद् थे। अंगरेजी-हिन्दी तो पहले से ही उनकी आयत्त भाषाएँ थीं, विदेशों के प्रवास में उन्होंने जर्मन, फ्रेंच, रशियन भाषाएँ सीखीं और उन पर अधिकार प्राप्त किया।
जब देश स्वतंत्र हुआ तो सत्यनारायणजी स्वदेश लौटे। नेहरूजी ने उन्हें संसद में स्थान दिया। बहुत बाद में पटना के मारवाड़ी आवास गृह के स्वत्वाधिकारी श्रीविनोदकृष्ण कानोडियाजी ने मुझे बताया था कि जब ख्रुश्चोव-पुश्किन अपने शिष्टमण्डल के साथ भारत आये थे, तब नेहरूजी से उनकी वार्ता के बीच मध्यस्थता और दुभाषिये का दायित्व सत्यनारायणजी ने ही निभाया था।
1990-92 में सत्यनारायणजी पाँच-छह महीनों में दो-तीन बार पटना आये थे। वह जब भी आये, फ्रेजर रोड पर अवस्थित मारवाड़ी आवास गृह में ठहरे और उनकी दिन-भर की बैठक मेरे घर में पिताजी के पास लगती रही। एक दिन पिताजी ने मुझे उनके पास भेजा, कुछ आवश्यक प्रपत्र उन्हें सौंपने थे। मैं जब उनके कमरे में पहुँचा तो वह एक पुस्तक पढ़ने में तल्लीन थे। मुझे देखकर प्रसन्न हुए, बोले--'बैठो, तुम्हें एक महत्वपूर्ण प्रसंग सुनाता हूँ।' और बिना किसी भूमिका के उन्होंने उसी पुस्तक से पाठ शुरू कर दिया। मेरी ओर देखे बिना वह धाराप्रवाह जो कुछ पढ़ते जा रहे थे, उसका एक अक्षर भी मेरी समझ से परे था। एक पृष्ठ के पाठ तक मैंने धैर्य बनाये रखा, अंततः मुझे बोलना पड़ा--'आप जो पढ़ रहे हैं, उसे मैं बिलकुल समझ नहीं पा रहा हूँ।'
मेरे हस्तक्षेप से उनका ध्यान भंग हुआ। चौंककर बोले--'ओह, तऽ काँहें ना कहलऽ जी? साँचे तऽ, ई कितबिया तऽ फ्रेंच में बा, तोहरा समझ में आइत कइसे?' (ओह, तो कहा क्यों नहीं जी? सच में, पुस्तक तो फ्रेंच में है, तुम्हें समझ में आती कैसे?)
उसके बाद उन्होंने वह पुस्तक मुझे दिखायी। वह फ्रेंच भाषा की पुस्तक थी, जिसमें किसी का उनपर लिखा एक लंबा आलेख उनके चित्र के साथ छपा था। उस पुस्तक को उलट-पलटकर मैंने देखा। उनके चित्र को पहचान लेने के अलावा और मेरी समझ में क्या आने वाला था? उन्हें पुस्तक लौटाते हुए मैंने कहा--'आपने इतनी सारी भाषाएँ कैसे सीख लीं?'
वह मुस्कुराये और बोले--'परिश्रम, मनोयोग और लगन से। कुछ भी सीखने की पक्की लगन होनी चाहिए।' इतना कहकर वह गंभीर हो गए और मेरे पितामह का स्मरण करते हुए बोले--'लेकिन तुम्हारे बाबा ने मुझसे ठीक ही कहा था। यह सच है, मैंने कई भाषाएँ सीखीं, लेकिन संस्कृत से दूरी बनी ही रह गयी, उसपर मैं अधिकार नहीं पा सका। शास्त्रीजी देव-तुल्य व्यक्ति थे। उन्होंने बहुत पहले ही मुझे आगाह किया था कि संस्कृत मेरे अधीन नहीं होगी। बाद में विदेशों में भ्रमण करते हुए मुझे इसका अवसर भी नहीं मिला। संस्कृत मेरे लिए दुःसाध्य और दुरूह ही बनी रह गयी।'
सत्यनारायणजी का मुझे वही अंतिम दर्शन मिला था। उसके एक-दो वर्ष बाद ही वह संसार के लिए दुर्लभ-दर्शन हो गये थे। उनका तेजस्वी जीवन पराक्रमपूर्ण था। वह शोलों की तरह जले, धधके, चमके और अपनी प्रभा बिखेरकर अंततः अस्तंगत हो गये। उनके निधन का समाचार भी सुर्खियाँ नहीं बना। संभवतः उन्हीं के एक-दो वर्ष बाद पिताजी भी लोकांतरित हुए थे।...
सत्यनारायणजी पर कुछ लिखने की उत्कंठा-लालसा बहुत थी, लेकिन तथ्यों का नितांत अभाव था। उनके चौथेपन में मिले तीन-चार दर्शनों और थोड़ी-सी बातचीत की पूँजी ही तो थी मेरे पास। शेष सब पिताजी से जानी-सुनी बातें थीं, यत्किंचित् पढ़े हुए तथ्य भी थे! इसी पर आधारित है यह संस्मरण, जिसमें काल-क्रम और तथ्यों के उलटफेर से मैं इनकार नहीं कर सकता। सोचता हूँ, उन्हें निकट से जाननेवाले कोई महानुभाव उनका जीवन-चरित लिखते तो आनेवाली पीढ़ियाँ उसे पढ़तीं और अनुप्राणित होतीं।...
अब तो नेताजी की गुमशुदगी पर इतना कुछ लिखा और कहा गया है तथा नेट पर इतनी अधिक सामग्री उपलब्ध है कि उसकी भीड़ में सत्यनारायणजी के लेख और उनकी पुस्तक को ढूंढ निकालना असंभव हो गया है। सत्यनारायणजी, जो नेताजी समकालीन तो थे ही, उसी काल में विदेशों में भ्रमणशील भी थे। उन्होंने नेताजी की तलाश में लंबी दौड़ भी लगायी थी। उनका आलेख अथवा उनकी पुस्तक अधिक प्रामाणिक सिद्ध होती। सच है, कँगूरे दीखते है, नींव की ईंटें नहीं दीखतीं। इतना ही कह सकता हूँ कि वह धुन का धनी एक दहकता हुआ शोला था, जो जल बुझा।...
(समाप्त)

बुधवार, 5 अप्रैल 2017

'वो शोला था, जल बुझा...'

(वो गुज़रा हुआ ज़माना...)
[कभी-कभी बड़ा अजीब होता है न! बीस-पचीस वर्षों का वक्त गुजरता है और स्मृतियाँ इतनी धुँधली हो जाती हैं कि किसी की शक्ल याद आती है, बातें याद आती हैं, किसी अलबम के पन्नों-सी पलटती सम्मुख आती जाती हैं उसकी अनेक मुद्राएँ और चलचित्र-सा दमकने लगता है उसका पूरा व्यक्तित्व; लेकिन नहीं याद आता तो उसका नाम और मन विचलित हो उठता है। मेरे साथ ऐसा ही हुआ है इस प्रसंग में। मैंने अनेक प्रयत्न किये, पुराने कगज-पत्तर पलटे, कई-कई फोन किये, पूना में बैठे-बैठे कई लोगों को प्रेरित किया, पूछा; लेकिन सब व्यर्थ हुआ। पटना जाकर, स्वयं उत्खनन करके, 'बिजली' की पुरानी फाइल से, मैं खोज लाया हूँ उनका नाम--डाॅ. सत्यनारायण सिंह (सिन्हा); जिन पर मुझे लिखना था यह स्मृति-लेख। क्योंकि, नाम के बिना इस संस्मरण की राह खुलती भी तो कैसे?
(--आनन्दवर्धन.)]
स्वतंत्रता-सेनानी सत्यनारायण सिंह...
वह तो 'मुक्त-कुटीर' था। घर का मुख्य-द्वार सुबह एक बार जो खुल जाता तो देर रात तक खुला ही रहता। आगंतुक आते, बैठते, पिताजी मिलते, बातें करते, सुख पाते और लौट जाते। दोपहर का थोड़ा-सा वक़्त छोड़कर सारे दिन घर में हलचल बनी रहती और मेरी श्रीमतीजी चाय-जलपान के प्रबंधन में जुटी रहतीं।
यह 1990-92 की बात है। एक दिन सुबह के नौ बजे एक सज्जन बेधड़क उसी प्रवेश-द्वार से घर में प्रविष्ट हुए, जोरदार पुकार लगते हुए--"परफूल, घरवा में बाड़ऽ का हो? ए परफूल, केने बाड़ऽ हो?
'परफूल ?' पिताजी को 'प्रफुल्ल' कहकर पुकारनेवाले लोग तो दुनिया से जाने कब के कूच कर गये थे, फिर यह कौन सज्जन हैं जो इस तरह पिताजी को पुकार रहे हैं? मैं तेजी से द्वार की ओर बढ़ा, लेकिन आगंतुक तो प्रवेश करके अंदर आ चुके थे। पिताजी के हमउम्र थे और वैसे ही सुदर्शन भी--श्वेतकेशी, धवल धोती-कुरते और बंडी में सुशोभित! अपनी शक्ल पर प्रश्नचिह्न लिए मैंने कुछ पूछना चाहा, लेकिन इसका अवकाश उन्होंने मुझे नहीं दिया और यह पूछते हुए आगे बढ़ चले कि 'प्रफुल्ल कहाँ हैं भाई?'
अपने नाम की ऐसी पुकार सुनकर पिताजी भी सचेत हो गए थे। वह अपने आसान से उठकर खड़े हुए ही थे कि उनके कमरे के दरवाजे पर आगंतुक जा खड़े हुए। उन्होंने गर्मजोशी से पूछा--"का हो परफूल, चीन्हलऽ? हम सत्यनारायण !"
पिताजी पहचानने की चेष्टा में दो क्षण गौर से उन्हें देखते रहे, फिर हुलसकर गले जा मिले। मैंने देखी थी उन दोनों के मिलन की वह प्रसन्नता, उत्कट उछाह की वह विकलता! उन्हीं के बताने से इतना तो मैं जान ही चुका था कि वह बुजुर्ग कोई 'सत्यनारायणजी' हैं, लेकिन उनका इतिवृत्त कुछ ज्ञात नहीं था।
पिताजी के कक्ष में सत्यनारायणजी जो जमे तो सुबह से शाम हो गयी और वार्ता का अंत न हुआ। दोपहर का भोजन और शाम की चाय भी उसी कमरे में पहुँच गयी। रात आठ बजे सत्यनारायणजी यह कहकर घर से विदा हुए कि कल वह फिर आयेंगे। रात के भोजन के वक्त मैंने पिताजी से उनके बारे में जिज्ञासा की। उन्होंने थोड़े क्षोभ से कहा था--'सत्यनारायण तो बहुत तेजस्वी और पराक्रमी व्यक्ति रहे हैं, लेकिन लगता है, अब चुक रहे हैं और उनके मस्तिष्क में विचलन और चिंतन में विश्रृंखलन भी आने लगा है। वह सम्बद्ध-असम्बद्ध बातें बोलने लगे हैं और ये अच्छे लक्षण नहीं हैं।' इसके अतिरिक्त पिताजी ने जो कुछ बताया, उसे संक्षेप में कहूँ, तब भी कथा थोड़ी विस्तृत ही होगी। लेकिन यह कथा मुझे कहनी होगी, क्योंकि वह जितनी रोचक है, उतनी ही रोमांचकारी भी।...
सत्यनारायणजी पिताजी की किशोरावस्था के मित्र थे, लेकिन सत्तर वर्षों की दीर्घकालिक मित्रता के दौरान पाँच या छह बार ही वह पिताजी से मिले थे और रह-रहकर लंबे अंतराल के लिए अलभ्य हो जाते थे। वह पिताजी के समवयसी थे। उनका पूरा नाम था-- सत्यनारायण सिंह (सिन्हा)। बिहार के छपरा-सीवान के आसपास के रत्न थे। पहली बार मात्र पन्द्रह वर्ष की आयु में (सन् 1925) वह घर से विद्रोह करके इलाहाबाद, मेरे पितामह (साहित्याचार्य पं. चंद्रशेखर शास्त्री) के पास, संस्कृत-ज्ञान-लाभ की पिपासा लेकर आये थे। प्रायः एक महीने तक वह पिताजी के साथ ही रहे और पितामह को अपनी विद्या-बुद्धि से प्रभावित करने की हर संभव चेष्टा करते रहे। इन्हीं पचीस-अठाइस दिनों में उनकी पिताजी से ऐसी घनिष्ठता हुई जो आजीवन बनी रही।

मासांत होते-होते एक दिन पितामह ने सत्यनारायणजी को अपनी बैठक में बुलाया। पिताजी छाया की तरह उनके साथ ही थे। सत्यनारायणजी कौतूहल-जड़ित किशोर की तरह पितामह के सम्मुख करबद्ध आ खड़े हुए, जैसे कोई परीक्षा-फल घोषित होनेवाला हो। धीर-गम्भीर स्वरों में पितामह बोले--'सत्यनारायणजी! मैं अपनी बात स्पष्ट शब्दों में कहूँगा। संस्कृत देव-भाषा है। सबकी जिह्वा पर चढ़ती नहीं, मुख से कढ़ती नहीं। संस्कृत-ज्ञान-समुद्र में गहरे उतरने के योग्य नहीं है अभी आपकी जिह्वा। आप किसी दूसरी दिशा में बढ़ने का यत्न करें, यही उचित होगा।'
जिस आशा और उत्साह से सत्यनारायणजी पितामह के पास आये थे, उसे ठेस लगी थी। पितामह अपनी बात पूरी कर चुके थे, वहाँ खड़े रहने का कोई औचित्य नहीं था। क्योंकि पितामह अक्सर कहा करते थे--'रामो द्विर्नाविभासते'--राम दो बार नहीं बोलते। उनका रोबो-दाब भी ऐसा था कि किसी को उनसे आग्रह-दुराग्रह करने का साहस नहीं होता था। लेकिन जब सत्यनारायणजी वहीं स्थिर खड़े दिखे तो पितामह ने पूछा--'तब क्या विचार है, क्या करना चाहेंगे आप?'
सत्यनारायणजी ने दृढ़ता से उत्तर दिया--'मैं देश-सेवा के काम करना चाहूँगा।'
इतना कहकर सत्यनारायणजी पिताजी के साथ वहाँ से हट गये। रात बीती और सुबह हुई, लेकिन तब तक सत्यनारायणजी नदारद हो चुके थे। अनुमान किया गया कि वह मुँहअंधेरे उठकर कहीं चले गये थे। गये तो ऐसे गये कि वर्षों उनका कुछ पता नहीं चला। न कोई चिठ्ठी-पत्री, न संदेश, वह तो गायब ही हो गये!...
फिर बारह-तेरह साल बीत गए। इस बीच बहुत कुछ बदल गया। पितामह लोकांतरित हुए, पिताजी इलाहाबाद छोड़ पटना आ बसे और उन्होंने वहाँ से साप्ताहिक पत्रिका 'बिजली' निकाली। पत्रिका चल निकली। प्रतिदिन ढेरों डाक आने लगी।
यह संभवतः 1937 की बात होगी। द्वितीय विश्वयुद्ध की सुन-गुन शुरू हो गयी थी। एक दिन पिताजी 'बिजली' की डाक छाँट रहे थे कि एक मोटे-से लिफाफे पर उनकी नज़र ठहर गयी। वह लिफाफा जर्मनी से भेजा गया था। उस पर 'बिजली'-कार्यालय का पूरा पता लिखा हुआ था। पिताजी को आतुर जिज्ञासा हुई कि ये कौन सज्जन हैं जिन्होंने जर्मनी से पत्र भेजा है, वह भी इतना भारी-भरकम! उन्होंने शीघ्रता से लिफ़ाफ़ा खोला और यह देखकर चकित रह गये कि पत्र-प्रेषक और कोई नहीं, वर्षों के बिछड़े बंधु सत्यनारायण थे। पिताजी को परम आश्चर्य हुआ कि वह जर्मनी कैसे जा पहुँचे? युद्ध की विभीषिका के कई चित्रों के साथ सत्यनारायणजी का लंबा आलेख ('भयंकर बमवर्षा के बीच') संलग्न था। यह आलेख अबिसीनिया पर भीषण बमवर्षा का भयावह चित्र प्रस्तुत करता था। पिताजी ने चित्र-सहित वह आलेख 'बिजली' में यथावत् प्रकाशित किया था।
इसके बाद पाँच-छह वर्षों के लिए सत्यनारायणजी फिर गायब हो गये। उनका कुछ पता न चला।...
सत्यनारायणजी का परोक्ष रूप से जिक्र करते हुए एक आलेख में पिताजी ने लिखा है--"मेरे एक मित्र हैं। उनसे मेरी मित्रता लगभग 65 वर्ष पुरानी है। यद्यपि इस लंबी अवधि में केवल चार बार उनसे मेरा मिलना हुआ था, लेकिन मित्रता आरंभ में ही इतनी घनिष्ठ हो गयी थी कि समय के अंतराल का मुझे कभी अनुभव नहीं हुआ। पहले-पहल जब इलाहाबाद में वह हमारे यहाँ आये थे तो एक महीने तक हमारे यहाँ ठहरे थे।"...
(क्रमशः में, क्रमशः)
[चित्र : बिजली में प्रकाशित उस आलेख की क्लिपिंग और युवावस्था के सत्यनारायणजी, जिन्हें मैंने वृद्धावस्था में देखा था]

रविवार, 2 अप्रैल 2017

मिलिये 'मगन'जी से, जो 'नेपाली'जी बन गये...

वो गुजरा हुआ ज़माना...(3)
चीनी-युद्ध के बाद सन् १९६३ में मैंने गोपालसिंह 'नेपाली' के गीत गाकर अपने विद्यालय में खूब यश (और अपयश भी; यश नेपालीजी के गीत से और अपयश अपनी नादानी से) कमाया था। तब मैं छठी कक्षा का छात्र था। नेपालीजी का एक गीत उन दिनों खूब प्रसिद्ध हुआ था --
'शंकरपुरी में चीन ने सेना को उतारा,
चौवालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा।'
पटना के मिलर हाई स्कूल में प्रवेश पाते ही पहले दिन, प्राचार्य महोदय की ललकार पर मैंने अपना हाथ खड़ा किया था और उनके बुलावे पर मंच पर गया था। मेरे पास संगीत की कोई विधिवत् शिक्षा तो थी नहीं, लेकिन मैंने अपने एक कान पर हाथ रखकर, तन्मय भाव से, सच्चे सुरों में नेपालीजी का यही गीत गाया था। देश-भक्ति गीत था और उसने सम्मुखीन छात्र-समूह को और प्राचार्य महोदय को प्रसन्न कर दिया था। प्राचार्यजी तो इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने उसी समय मुझे 'तानसेन' की उपाधि देकर सम्मानित किया था। इस प्रसंग का उल्लेख मैंने बाल्यकाल के अपने एक संस्मरण 'तानसेन गवइया अठन्नी...' में किया है।
बहरहाल, जब मैं बड़ा हुआ तो नेपालीजी की रचनाओं को मैंने खोज-ढूँढ़कर पढ़ा और आनंदित हुआ।


इसी साल, जनवरी में पटना गया तो बिहार हितैषी पुस्तकालय, पटनासिटी में सन् १९३७ की 'बिजली' फाइल में उनका एक चित्र और उनकी एक कविता देखी। कविता मेरी पढ़ी हुई नहीं थी। मैं दोनों की क्लिपिंग ले आया हूँ। तब 'नेपालीजी' गोपालसिंह 'नेपाली' के नाम से ख्यात नहीं हुए थे और उन्होंने अपना उपनाम भी 'मगन' रखा हुआ था। 'बिजली' के एक अंक में, 'प्रभात' शीर्षक कविता के नीचे कवि के रूप में उनका नाम छपा है--"श्री बंबहादुर सिंह नेपाली 'मगन'। अपनी प्रारम्भिक रचनाओं की इस छोटी-सी कविता में ही नेपालीजी ने कैसे अनूठे रंग भरे हैं और एक चित्ताकर्षक चित्र खींचकर पाठकों के सामने रख दिया है। इसे आप स्वयं देख लें और मुदित हों। है न यह अतीत के आइने से झाँकता एक रोचक प्रसंग?...
(क्रमशः)
[चित्र : गोपालसिंह 'नेपाली' की युवावस्था का चित्र और उनकी कविता, 'बिजली' की क्लिपिंग]

सोमवार, 27 मार्च 2017

अनजाने-से दिनकर...

वो गुज़रा हुआ ज़माना...(2)
सन् 1972 में जब मैं 'दिनकर की डायरी' की पाण्डुलिपि पर काम कर रहा था और दिनकरजी के पूज्य चरणों में बैठने का मैंने सौभाग्य पाया था, उन्हीं दिनों की बात है। डायरी का काम पूरा होने में डेढ़ महीने लग गये थे। फिर, लोहे की चादर का एक बड़ा-सा बाॅक्स मैंने दिनकरजी के कमरे में रखा देखा था। मेरी जिज्ञासा पर उन्होंने एक शेर सुनाकर मुझसे कहा था--
"चंद तस्वीरें बुताँ, चंद हसीनों के ख़ुतूत
बाद मरने के मेरे घर से सामाँ निकला।'
'हम लेखकों-कवियों के पास और होता ही क्या है! अरे, इसमें बहुत-सी तस्वीरें हैं और पुरानी चिट्ठियों का ज़ख़ीरा है, लेकिन सब गड्डमड पड़ा है !"
मैंने उसे व्यवस्थित करने का जिम्मा स्वयं उठा लिया और दो दिनों के लिए दिनकरजी के कक्ष पर अपना आधिपत्य जमा लिया था। पूरे कमरे में चिट्ठयाँ-ही-चिट्ठयाँ फैल गयी थीं। उसी बक्स से निकली थीं पिताजी की सन् 1937 की तीन-चार चिट्ठियाँ, जिन्हें देखकर मैं रोमांचित हो उठा था। मैंने दिनकरजी को पिताजी के वे पत्र दिखाये तो उन्होंने मुझसे सहज ही कहा था-- "मेरी प्रारंभिक कई कविताएँ मुक्तजी ने ही 'बिजली' में प्रकाशित की थीं।"

पटना में 'बिजली' की पुरानी जिल्द देखते हुए मुझे दिनकरजी के कथन की सत्यता के दर्शन भी हुए थे, जब उनकी कई रचनाएँ मैंने सन् 37 की जिल्द में प्रकाशित देखी थीं । सन् 1937 से 2017-- अस्सी वर्षों का विशाल कालखण्ड, एक युग के अवसान की मार्मिक अनुभूति हुई! अपनी बाल्यावस्था से युवावस्था तक मैंने दिनकरजी को जैसा देखा-जाना था, उस अद्भुत और दिव्य स्वरूप से बिलकुल भिन्न युवावस्था के दिनकरजी मुझे 'बिजली' में मिले और मैं विस्मित-अभिभूत हो उठा। क्या आप बिजली-काल के दिनकरजी के दर्शन नहीं करना चाहेंगे? उनकी प्रकाशित तत्कालीन किसी कविता की क्लिपिंग तो मुझसे हड़बड़ी में छूट गयी है, लेकिन आपके साथ साझा करने के लिए उनकी तस्वीर मैं जरूर साथ ले आया हूँ। संभव है, इस चित्र में दिनकरजी आपको भी अजाने-से लगें। दिनकरजी की किसी पुस्तक, किसी चित्रावली में, कहीं यह चित्र मैंने देखा हो, यह मेरी स्मृति में तो नहीं है।...
(क्रमशः)
(चित्र : सन् 1937 के दिनकरजी, 'बिजली' की फाइल से।)

शुक्रवार, 24 मार्च 2017

'बिजली' और 'आरती' का वो गुज़रा हुआ ज़माना...

[पूर्वपीठिका]
सन् 1936 में पूज्य पिताजी (पं. प्रफुल्लचन्द्र ओझा 'मुक्त') 26 वर्ष के युवा थे। सन् 1934 में, इलाहाबाद में, पितामह के देहावसान के एक साल बाद पिताजी पटना आ गये थे। विद्यालय-महाविद्यालय की कोई डिग्री तो उनके पास थी नहीं, लेकिन कुछ कर गुज़रने का अदम्य उत्साह था उनके मन में। अपने पितृश्री की कृपा-छाया में और जीवन की पाठशाला में उन्होंने जो कुछ अर्जित किया था, विद्वज्जनों के आत्मीय सान्निध्य से जो प्रसाद पाया था, वह स्वाध्याय की आँच में पककर उबल रहा था और ज्ञान-पात्र के किनारों से तड़पकर बाहर आने को अधीर था। कथा-कविता के विशाल फलक पर तब तक 'मुक्त' नाम अंकित हो चुका था। इलाहाबाद के दिनों का अर्जित संपादन-अनुभव ही उनकी पूँजी था।
सन् 35 में जब वह पटना आये, उस समय तक साहित्यिक गतिविधियों के मामलों में बिहार मरुभूमि-समान था। पूर्ववर्ती काल में कलकत्ता ही हिन्दी की साहित्यिक गतिविधियों का केन्द्र बना हुआ था, जहाँ महादेव सेठ के 'मतवाला-मण्डल' में निरालाजी, नवजादिकलाल श्रीवास्तवजी और शिवपूजन सहायजी की तिकड़ी जमी हुई थी। जब यह तिकड़ी टूटी, तब 'मतवाला' के मंच पर पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र'जी अवतरित हुए, लेकिन सेठजी के अवसान के साथ ही 'मतवाला' का तिलस्म भी टूट गया और हिन्दी की गतिविधियों के तीन केन्द्रीय ध्रुव बन गये--इलाहाबाद, वाराणसी और लखनऊ। उन दिनों की याद करते हुए पिताजी ने निरालाजी के अपने संस्मरण "जुही की कली' के कवि : निराला" में लिखा है :
"...फिर बहुत समय बीत गया। हिन्दी के लिए कलकत्ता का वह महत्व न रहा, जो पहले था। उसकी जगह इलाहाबाद, काशी और लखनऊ ने ले ली। शिवपूजनजी काशी जा बसे। नवजादिकलालजी इलाहाबाद आ गये। निरालाजी प्रायः अपने गाँव में रहते, कभी-कभी लखनऊ आ जाया करते थे। उग्रजी अपनी जन्मभूमि में लौट आये थे, लेकिन वहाँ ज्यादा दिन टिके नहीं, बंबई चले गये। 'मतवाला' बंद हो गया और कुछ समय बाद सेठजी ने भी इह-लीला संवरण की।'
"मैं उन दिनों इलाहाबाद में ही था। इलाहबाद, वाराणसी और लखनऊ में हिंदी की गतिविधियाँ तीव्र हो गयी थीं। कलकत्ता की चमक-दमक अब इन त्रिपुरियों ने ले ली थी। बनारस में प्रसादजी और प्रेमचंदजी थे, इलाहबाद में पंतजी और महादेवीजी, लखनऊ का अखाड़ा निरालाजी ने संभाल रखा था। अब निरालाजी से मिलना-जुलना अधिक हो गया।...'
"काल-चक्र घूमता रहा। सन १९३४ में पिताजी का देहावसान हुआ। उसके एक साल बाद, पच्चीस वर्षों से सेवित प्रयाग छोड़कर मैं पटना आ बसा। लम्बे अंतराल के बीच यदाकदा निरालाजी के दर्शन तभी हुए, जब वह पटना या मुजफ्फरपुर के किसी साहित्यिक समारोह में पधारे। उस ज़माने में इलाहाबाद साहित्यिक और राजनैतिक गतिविधियों का केंद्र था--पटना में साहित्यिक गतिविधि नाम की कोई चीज़ नहीं थी। इलाहबाद छूटा तो साहित्यिकों के संपर्क से भी मैं वंचित हो गया।..."
बिहार की राजधानी पटना से भी कोई स्तरीय साहित्यिक पत्रिका निकले, इस प्रदेश में भी थोड़ी साहित्यिक हलचल हो और हिन्दी की एक मशाल तो जले; इसी अभिप्राय से पिताजी ने सन् 36 में पटना से 'बिजली' नामक साप्ताहिक पत्रिका का संपादन किया। वह पत्रिका शीघ्र ही चर्चित-समादृत हुई। पिताजी ने 'बजली' के माध्यम से बिहार के सहित्याकाश में ऐसी चपला चमकायी कि उसकी चकाचौंध से प्रभावित होकर उदीयमान लेखकों-कवियों की एक बड़ी जमात उनके साथ आ खड़ी हुई। पिताजी ने दो-ढाई वर्षों तक घोर परिश्रम किया और आर्थिक तंगी से जूझते हुए पत्रिका के प्रकाशन का दायित्व उठाते रहे।

पिछले दिनों मैं पटना गया तो पटनासिटी के बिहार हितैषी पुस्तकालय में मैंने 1936-37 की 'बिजली' की ज़िल्द देखी। आप कल्पना ही कर सकते हैं कि समय के इतने लंबे अंतराल के बाद 'बिजली' के अंकों का दर्शन करके मेरी मनोदशा क्या रही होगी! 1936 अर्थात् वह काल, जब मैं दुनिया से नदारद था। मेरे पास समय कम था और मेरी तलाश/ अनुसन्धान का लक्ष्य कुछ और...; फिर भी 'बिजली' से कुछ क्लिपिंग ले आया हूँ। आगामी कुछ किस्तों में उसी की चर्चा होती रहेगी, उसके अनंतर मासिक 'आरती' की भी।... और मुझे आशा है, उससे जुड़े रहना आपको प्रीतिकर लगेगा।...
(क्रमशः)
(चित्र : 'बिजली' का मुखपृष्ठ)

शुक्रवार, 17 मार्च 2017

नेत्र-दर्शन...

अधिक नहीं, महज़ चार वर्ष पुरानी बात है। पुणे के एक दैनिक पत्र 'लोकमत समाचार' में डाॅ.राजेंद्र प्रसाद पर मेरा एक छोटा-सा संस्मरण 28 फरवरी, 2013 को छपा था--'ताहि बिधि मस्त रहिये'। यह पत्र अपने नियम-विधान से ही लेखक का चित्र, परिचय, संपर्क-सूत्र, मोबाइल नंबर, मेल-एड्रेस आदि प्रकाशित करता था। मेरे इस आलेख में भी चित्र के सिवा मुझसे संबंधित सारी सूचनाएँ छपी थीं। छोटा-सा लेख चर्चित हुआ था और स्थानीय पाठकों के कई फोन कॉल्स मेरे पास आये थे। स्वभावतः मुझे प्रसन्नता हुई थी।
लेकिन, उनमें एक बंधु ऐसे भी थे, जिन्होंने मुझे कई बार फोन किया, बातें कीं। वह मुझसे मिलने को आतुर थे और संकुचित भी। लेख के प्रकाशन के तीन दिन बाद रविवार को वह तब आये, जब मैंने ही जोर देकर उनसे कहा कि 'मिलना हो आ जाइये, संकोच की क्या बात है बंधु?' वह मेरे तत्कालीन निवास से बहुत दूर भी नहीं थे। पुणे के बाम्बे सैपर्स के विशालकाय फौजी कैम्पस में थे, जो मेरे बेटी-दामाद के सरकारी बंगले से महज तीन-एक किलोमीटर की दूरी पर था। जब वह आये तो बँगला ढूंढ़ने में उन्हें दिशा-भ्रम हो रहा था, उन्होंने मुझे फ़ोन किया, मैं बँगले के गेट पर जा खड़ा हुआ और उन्हें दिशा-निर्देश देता रहा। वह जब प्रकट हुए तो उन्हें देखकर मुझे हैरत हुई। २२-२४ वर्ष के युवा थे--श्यामवर्णी! फ़ौज में भर्ती हुए नए रंगरूट की दुर्वह दशा में थे--कटोरा-कट कटे केश, भीषण परिश्रम से क्लान्त शक्ल-सूरत, पीठ लदा हुआ हैण्ड-बैग और जीन्स-पैंट-शर्ट धारण किये हुए। मेरे पास पहुँचते ही उन्होंने पूछा--'आप ओझाजी न ?' स्वीकृति में मेरा सिर हिलते ही वह उत्फुल्ल हुए और बड़ी श्रद्धा से झुककर उन्होंने मेरे पाँव छुए। मैंने उन्हें कंधे से पकड़ उठाया और अपने साथ बँगले में ले गया। उन्होंने अपना नाम 'उमेश बालाजी' बताया और कॉरिडोर में पड़ी आराम कुर्सियों पर जमकर बैठ गए।
बातों का सिलसिला शुरू हुआ। उनकी बोली-बानी से मुझे लगा था कि वह बिहार के ही रत्न हैं । मेरा अनुमान ठीक निकला, वह बिहार के भागलपुर जिले के किसी गाँव के रहने वाले ही निकले। इन दिनों फौजी ट्रेनिंग के लिए पुणे में थे और अत्यंत अनुशासनात्मक कठोर श्रम झेल रहे थे। तीन दिन पहले उन्होंने मेरा उपर्युक्त लेख पढ़ा था और तभी से मुझसे मिलने को व्यग्र-विकल थे।
उन्होंने मुझसे कहा कि बाबू राजेंद्र प्रसादजी को वह भारतीय राजनीति का सर्वाधिक श्रेष्ठ और निःस्वार्थ राजनेता मानते हैं और भक्ति की हद तक उन्हें पूजते हैं। उन जैसा देश-प्रेमी, सत्य-निष्ठ, सरल-निश्छल और पूर्णतः समर्पित व्यक्ति देश की राजनीति में कोई दूसरा हुआ ही नहीं। उनके संभाषण में बिहारी अंदाज तो था ही उच्चारण की अशुद्धियाँ भी बहुत थीं, लेकिन बातें वह कमाल की कर रहे थे। स्पष्ट था कि वह ग्रहणशील युवक थे और सार-तत्व को पकड़ने की छटपटाहट उनमें बहुत थी। मेरी बड़ी बेटी ने उमेशजी को नाश्ता करया और चाय पिलायी। जब वह आये थे, बहुत संकुचित थे, बँधे बैठे थे, लेकिन धीरे-धीरे उनका संकोच जाता रहा। वह मुखर हो उठे। उन्होंने बताया कि वह 'इण्डियन आइडल' की सांगीतिक प्रतियोगिता के प्रतिभागी भी बने थे, लेकिन सोलह प्रतिभागियों की चयनित सूची में प्रवेश पाने से वंचित रह गये थे। यह जानकर कि उमेश बालाजी आइडल-प्रतिभागी रहे हैं, पूरा घर उनके पास आ जुटा। सभी उनसे गाने का अनुरोध करने लगे। पहले तो वह बचने की राह ढूँढ़ते रहे, लेकिन जब एक बार शुरू हुए तो कई गीत सुना गए--फ़िल्मी भी और लोकगीत भी। सुर में थे, खुलकर गाते थे, पर शब्दों के उच्चारण में बड़ी गलतियाँ उनसे हो रही थीं, जो हमारे शुद्ध उच्चारण सुनने के अभ्यासी कान पर हथौड़े-सी बज रही थीं। मैंने उन्हें सचेत किया तो बोले--'यहीं तो मार खा गया बाबाजी!'
जाने क्यों, शुरू से ही वह मुझे 'बाबाजी' कहकर संबोधित कर रहे थे, जबकि मुझे ऐसा नहीं लगता था कि मैं इतना आयु-सम्पन्न हो गया हूँ कि मुझे 'बाबाजी' कहा जाए। लेकिन मैंने कोई आपत्ति दर्ज़ नहीं की और उनके लिए 'बाबाजी' बना रहा। उनकी प्रीति और मेरे प्रति उनकी श्रद्धा आत्यंतिक होने की सारी हदें लाँघ जाने को उन्मत्त थी। मैंने यह भी लक्ष्य किया कि ढाई-तीन घण्टों की बैठक में वह लगातार मेरी आँखों में आँखें गड़ाये मुझे घूरते रहे थे। प्रश्न किसी ने किया हो, उत्तर वह किसी और को दे रहे हों या संगीत सुना रहे हों अथवा अपनी कोई बात बता रहे हों या मेरी सुन रहे हों; देख वह मुझे ही रहे थे और निरंतर देख रहे थे--अपलक ! उनका यह दृष्टि-संयोग मुझे असहज भी लगा था, लेकिन इसके लिए उन्हें टोकना भद्रता नहीं थी। उस दिन जब तक वह मेरे सान्निध्य में रहे, मैं उनका तीक्ष्ण और विकल कर देनेवाला दृष्टि-प्रहार मौन रहकर सहता रहा।
तीन घण्टे बाद जब वह जाने को उठे तो जैसे उन्हें ख़याल आया हो, उन्होंने चौंकते हुए कहा--'अरे, मैं तो यह सब भी अपने साथ ही लिए चला जाता न?' और, इतना कहकर उन्होंने अपने हैण्ड बैग से मिठाई के दो डिब्बे, च्यवनप्राश और हॉर्लिक्स की दो शीशियाँ और बिस्कुट-नमकीन के कई पैकेट निकाले और विनम्रता से कहा--'बाबाजी, यह सब आपके लिए लाया हूँ।'
मैंने कहा--आपने नाहक तकलीफ़ की, इसकी क्या ज़रूरत थी?'
वह सरल-निश्छल युवक थे, बोले--'हमारी कैंटीन में यह सब थोड़ी कम कीमत में मिलता है न! और आपके स्वास्थ्य के लिए यह आवश्यक भी है बाबाजी! इसका रोज़ सेवन कीजियेगा और स्वस्थ रहकर खूब लिखा कीजियेगा। मैं तो अब प्रतिदिन 'लोकमत समाचार' देख लिया करूँगा और जिसमें आपकी रचना होगी, उसे खरीद भी लूँगा।'
उनकी श्रद्धा अप्रतिम थी और मैं उसके सामने निरुपाय था। जब उन्हें छोड़ने बंगले के गेट तक गया तो वहाँ रुककर उन्होंने मेरे पाँव पुनः छुए और आँखों में आँखें गड़ाकर बोले--" मैं फिर आऊँगा बाबाजी! आज आपलोगों से मिलकर मुझे बहुत अच्छा लगा--बिलकुल घर-जैसा! मुझे भूल मत जाइयेगा, अपना आशीर्वाद बनाये रखियेगा जरूर।"
मैंने कहा--"हाँ-हाँ उमेशजी, आप अवश्य आइयेगा, हम फिर मिलेंगे और मेरा आशीष तो हमेशा आपके साथ है ही !"
वह लौट जाने को चल पड़े और मैं बंगले में वापस जाने को मुड़ा। अभी दो कदम ही बढ़ा था की उमेश बालाजी की पुकार सुनकर पलटा। वह क्षिप्रता से मेरे पास आये और विकलता से बोले--"आपसे अभी बहुत-सी बातें करनी हैं, बहुत कुछ सीखना है आपसे बाबाजी! आज तो मैं सिर्फ उन आँखों को देखने के लिये आया था, जिन आँखों ने राजेन्द्र बाबू को देखा था।"
इतना कहकर वह पलटे और तेजी से चले गए। मैं वहीं ठिठका रहा और उन्हें जाता हुआ तब तक देखता रहा, जबतक वह मुख्य सड़क पर मुड़कर मेरी दृष्टि से ओझल नहीं हो गए।...


बाद के कई दिनों तक मैं उमेश बालाजी जैसे प्रेमी बालक के विषय में बस, सोचता ही रहा और उनकी कही यह बात तो मैं आज तक नहीं भूला कि 'मैं उन आँखों को देखने आया था, जिन आँखों ने...!' मेरे नेत्र-दर्शन से उन्हें क्या मिला, यह तो मैं नहीं जानता, लेकिन उनका यह कथन जब कभी याद आ जाता है, मैं विस्मित होकर सोचता रह जाता हूँ कि ऐसा अनूठा ख़याल उमेशजी के मन में उपजा भी तो कैसे? आज के युग में उमेश बालाजी-जैसे भाव-प्रवण और संवेदनशील युवा कितने होंगे?...
इस मुलाक़ात के बाद उमेशजी डेढ़ वर्ष पूना में रहे। उनसे संपर्क बना रहा। वह फ़ोन पर लंबी-लंबी बातें करते रहे। उनके हृदय की प्रीति-तरंगें कुछ ऐसी उन्मत्त हुईं कि वह मुझे किसी देवोपम आसन पर बिठाने को मचल पड़े, जिसकी योग्यता-पात्रता मुझमें थी ही नहीं। मुझे उन्हें वर्जना देनी पड़ी, लेकिन उनकी सज्जनता, विनम्रता और अनूठी प्रीति ने मुझे बाँधे रखा। हम कई बार मिले, हमने बातें कीं और निकट से निकटतर होते गए। हमने पटना से पूना तक की रेल-यात्रा भी अलग-अलग बाॅगियों में साथ-साथ की। अलग-अलग और साथ-साथ यूँ, कि वह अपनी बाॅगी मय-सरो-सामाँ छोड़कर अधिकांशतः मेरे पास ही बने रहे--अपने अनन्य प्रेम के वशीभूत! और, पुणे पहुँचकर जब वह विलग होने लगे तो उन्होंने प्लास्टिक का एक बड़ा-सा डिब्बा मेरी श्रीमतीजी को बलात् सौंप दिया, जिसमें, घर में माँ का बनाया हुआ, आम का अँचार था और जिसे वह अपने लिए घर से ले आये थे। यह उनकी अनूठी प्रीति का अवश कर देनेवाला हठ था।
डेढ़ वर्ष बाद अचानक वह अलभ्य हो गए और उसके भी साल-भर बाद अजमेर से उनका फोन आया, वहीं उनकी पदस्थापना हुई थी। गाँव में माता का निधन हो चुका था और वह बहुत मर्माहत थे। मैंने उन्हें ढाढ़स बँधाया। वक़्त का एक लंबा टुकड़ा फिर आँधी-सा गुज़र गया।...
पिछले वर्ष उनका एक फ़ोन मुझे फिर मिला था, जिससे ज्ञात हुआ था कि अब वह जम्मू-कश्मीर में हैं--हमारी सीमाओं की रक्षा में सन्नद्ध! जिस नंबर से उनका फ़ोन आया था, उसे मैंने सुरक्षित कर लिया था।
अभी दस-पंद्रह दिन पहले मेरे माँगने पर किसी नए नंबर से एक चित्र मेरे पास आया। सैन्य-गणवेश में वह चित्र किसी अपरिचित व्यक्ति का-सा लगा। मैंने अज्ञात नंबर से पूछा--'क्या आप उमेश बलाजी हैं और क्या यह चित्र तथा नंबर आपका ही है? यदि हाँ, तब तो आप बहुत बदल गए हैं बंधु! पहचान में नहीं आते।' लगे हाथ उनका संवाद मिला--"बाबा, आपने ठीक पहचाना, पर मैं आज भी पहले की तरह हूँ, बिलकुल नहीं बदला।"
सच में वह बिलकुल नहीं बदले, देश की सेवा के गौरव ने उन्हें जो संतोष दिया है, वही उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व पर परिव्याप्त हो आया है।
आज भी जब कभी उमेश बालाजी की याद आती है, उनकी कही बात मेरे मन में कौंध जाती है और मैं विचार-मग्न हो जाता हूँ। दरअसल, मेरे उस छोटे-से आलेख में ऐसा कुछ था भी नहीं, सिवा राजेन्द्र बाबू के एकमात्र दर्शन की चर्चा और एक गम्भीर दार्शनिक सन्देश के उल्लेख के। बात तो उमेश बालाजी के मन पर उस आलेख के अप्रत्याशित प्रभाव की है, उस उत्कंठा-विकलता की है जो मेरे 'नेत्र-दर्शन' से जाने क्या अलभ्य पा लेना चाहती थी। उनकी भाव-प्रवणता, ग्रहणशीलता मुझे आज भी चकित-विस्मित करती है, लगता है, आजीवन करती रहेगी।...
आज देशपूज्य डॉ. राजेंद्र प्रसाद की ५४वीं पुण्य-तिथि है, उनकी पावन स्मृतियों को मेरा नमन है!
[चित्र : 1) सैन्य गणवेश में श्रीउमेश बालाजी का सद्यःखचित चित्र। 2) लोकमत समाचार : 28 फरवरी, 2013 की कतरन.]