गुरुवार, 19 अक्तूबर 2017

अविस्मरणीय रहेगा वह सूर्योदय... आजीवन...

[दक्षिण की यात्रा से लौटकर...(4)

होटल पहुँचकर, सद्यःस्नान-समापनांतर, हम सभी रात्रि-भोजन के लिए पास के एक भोजनालय में गये। अच्छे आहार से तृप्त होकर, उनींदी आँखें, थकान से बोझ बनी देह लिये जब होटल के शानदार, गुदगुदे और मुलायम बिस्तर पर गिरे तो बेहोशी की नींद आयी। पार्श्व में घहराते समुद्र की गर्जना भी निद्रा में बाधक न बन सकी। मुझे लगा, सुदूर दक्षिण के समुद्री-तट पर समुद्र अपेक्षया शांत और संयमित है, वैसा उद्विग्न, उच्छृंखल और आक्रामक नहीं, जैसा मुंबई, कोलकाता अथवा जगन्नाथपुरी के तटबंधों पर है--हाहाकारी! तभी स्मरण में कौंधा, यहीं कहीं प्रभु श्रीराम ने समुद्र का दर्प-मर्दन किया था और उसे संतुलित होकर मार्ग देने के लिए विवश किया था। मुझे याद आयीं कवि भूषण की पंक्तियाँ--

"बिना चतुरंग संग वनरन लै के बाँधि वारिधि को लंक रघुनन्दन जराई है/ पारथ अकेले द्रोन भीषम सों लाख भट, जीत लीन्हीं नगरी विराट में बड़ाई है/ भूषन भनत भट गुसलखाने में खुमान अबरंग साहिबी हथ्याय हरि लाई है/ तौ कहाँ अचम्भो महाराज सिवराज, सदा वीरन के हिम्मतै हथ्यार होत आई है।"

हाँ, तभी तो कन्याकुमारी के समुद्री कछार पर लहरें किंचित् मंथर गति से आती हैं और पद-प्रक्षालन कर लौट जाती हैं, किंतु रात्रिकाल में थोड़ी स्वतंत्रता लेकर मुदित होती हैं और इसी मोद में उनका रोर कुछ बढ़ जाता है। भूषण की उपर्युक्त पंक्तियों के स्मरण मात्र से पौराणिक पात्र आँखों के सामने प्रकट होने लगे। माता सीता के वियोग में विकल प्रभु राम वन लाँघते हुए इसी भूमि-भाग में कभी आये होंगे। श्रीराम-भक्त हनुमानजी ने यहीं कहीं से लगायी होगी लंबी छलाँग। समुद्र के सुस्थिर हो जाने पर वानर-सेना ने उस पर बाँधा होगा सेतु...! मस्तिष्क सोचने लगा, यहाँ से कितनी दूर होगा रामेश्वरम्! पूछने पर ज्ञात हुआ, बहुत दूर--प्रायः तीन सौ किलोमीटर! इस जानकारी ने मेरे अतिचिंतन पर विराम लगाया।...

होटल के कमरे की खिड़कियों से हमने बाह्य परिदृश्यों का अवलोकन किया, तस्वीरें उतारीं; फिर तो निद्राभिभूत आँखें स्वयं ही बंद होने लगीं। हम शय्याशायी हुए। निद्रा देवी ने तत्काल हमें अपने आगोश में ले लिया। हम बेसुध सो गये।...

सुबह 5 बजे ही श्रीमतीजी ने झकझोर कर जगाया। यह शरीर पर अत्याचार-सा ही था, लेकिन तेजोराशेजगत्पते दिवाकर के दर्शन के लिये, उनकी अगवानी के लिए हमें जागना ही था। समय से तैयार होकर होटल के चार कमरों से चारों परिवार निकलकर लाॅबी में एकत्रित हुए--मैं सपत्नीक, दामाद साहब सपरिवार और उनके दो मित्र अपने-अपने परिवारों के साथ। अब हमें सूर्योदय दर्शन के लिए उपयुक्त स्थान पर पहुँचना था। होटल के स्वागत काउंटर पर जो संभ्रांत, सुदर्शन युवक खड़े थे, उन्होंने अंग्रेजी में पूछा--'आपलोग कहाँ जायेंगे?' दामाद साहब ने कहा--'सनराइज देखने।' स्वागतकर्ता ने सलाह दी कि 'सनराइज देखने के लिए सर्वोत्तम स्थान तो होटल के सातवें माले की छत ही है। आपलोग वहीं चले जायँ।' लिफ्ट से पूरा कुनबा तत्क्षण भवन की छत पर पहुँचा। तब तक घनान्धकार ही था--सर्वत्र। भूमि-भाग पर आसपास के जितने भवन-मन्दिर थे, वे रौशनी से जगमगा रहे थे--जल के बीच बना 'स्वामी विवेकानन्द राॅक मेमोरियल' और तिरुवल्लुवरजी की विशालकाय मूर्ति! वहाँ तक ले जानेवाली बोट का लंगर और जेटी तथा सम्मुख था दृष्टि-सीमा के परे तक बहता अनन्त सागर। यह अद्भुत-अकल्पनीय और मनोहारी दृश्य था। हमारी टोली मंत्रमुग्ध, ठगी-सी खड़ी थी!

छत पर और भी कई लोग थे। सूर्यदेव का कहीं पता नहीं था। सभी अपने सेल और कैमरे से प्रकाश तथा अंधकार के मिश्रण को कैद कर रहे थे। हमने भी वही किया। 5.30 पर हम छत पर पहुँच गये थे। गूगल सर्च ने हमें बताया था 6.08 पर प्रकट होंगे सूर्यदेव! हमारी अधीरता बढ़ती जा रही थी और लगता था, पल ठहर गये हैं, खिसकते नहीं। लेकिन, यह हमारा भ्रम था--हमारी बेकली का असर था...क्षण को अतीत का ग्रास बन जाना ही था और बिना हमें सचेत किये वह बनता जा रहा था अतीत का निवाला...!

छह बजते ही क्षितिज का रंग बदलने लगा। अंधकार परास्त होता स्पष्ट दिखा। हम सचेत-सावधान हो गये। अपनी-अपनी धुरी पर जड़, स्थिर! पहले उदयाचल का रंग धूसर हुआ, फिर पीला और फिर टुह लाल--रक्तिम! इसी लालिमा में, सुदूर आकाश में बादल का एक त्रिकोण रक्ताभ हो उठा। ऐसा लगा, सूर्यदेव ने आगमन के पहले विजय पताका फहरायी है। अचानक रवि-रश्मियों ने क्षितिज से झाँकना शुरू किया, सर्वत्र गहरा पीला रंग पुत गया क्षितिज के छोर पर। और, तभी दिनकर प्रकट होते दिखे। मुझे राष्ट्रकवि दिनकर याद आये और याद आयी बालकवि बैरागी की पंक्ति, जो राष्ट्रकवि के निधन पर उन्होंने लिखी थी--
'क्या कहा कि दिनकर अस्त हो गया,
दक्षिण के दूर दिशांचल में?'

ऐसा प्रतीत हुआ, मानो अथाह समुद्र में एक गहरी डुबकी मारकर जगतपति दिनकर बाहर आ गये हैं अभी-अभी।... आत्मा सिहर उठी। लगने लगा, कवि दिनकर अपनी अनन्त काव्य-रश्मियों के साथ लौट आये हैं भारत की भूमि पर।... दिशाएं आलोकित होने लगीं। क़ायनात का गोशा-गोशा रौशन हो उठा और तभी सैलानियों का प्रसन्नता से भरा एक शोर उठा--तुमुल नाद-सा। सैलानी, जो देश-विदेश से आकर वहाँ एकत्रित थे और देव दिवाकर के प्रातःदर्शन से हर्षोन्मत्त हो उठे थे। सातवीं मंजिल की छत से हम उन्हें भी देख रहे थे और सुन पा रहे थे वह जन-कोलाहल। वह सूर्योदय-दर्शन अद्भुत, अविस्मरणीय है और रहेगा आजीवन...!






लेकिन, यह क्या? मैंने लक्ष्य किया कि सूर्योदय उसी पश्चिम दिशा से हुआ, जहाँ कल सायंकाल सूर्यास्त हुआ था--यहाँ से ठीक डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर ! तो क्या दक्षिण भारत में सूर्योदय और सूर्यास्त पश्चिम दिशा में होता है? परमाश्चर्य ! पूछने पर ज्ञात हुआ कि यही एकमात्र ऐसा स्थल है, जहाँ ऐसा विभ्रम होता है; लेकिन मेरी शंका का समूल समाधान नहीं हुआ। जो प्रत्यक्ष घटित हुआ था, उसे नकारता कैसे?

इन दिनों मेरी दोनों बेटियों ने आपस में कुछ मंत्रणा कर अपने माता-पिता को सुख पहुँचाने का निश्चय किया है शायद! पिछले दिनों छोटी बेटी संज्ञा ने सदी के महानायक श्रीअमिताभ बच्चन से मिलवाकर मेरा एक सपना सच किया था और अब बड़ी बेटी कल्याणीया शैली और दामाद आयु. रवि ने यह दुर्लभ दर्शन का असीम सुख दिया। उन दोनों को मेरा आशीर्वाद कि उन्होंने यह संयोग बनाया, निमित्त बने, अन्यथा मैं अपने कागज़ों के अंबार का दीमक ही बना रह जाता...!

--आनन्द.
02-10-2017.

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (21-10-2017) को
"भाईदूज के अवसर पर" (चर्चा अंक 2764)
पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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दीपावली से जुड़े पंच पर्वों की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

आभार शास्त्रीजी ! मेरा प्रणाम भी स्वीकार करें...!