रविवार, 29 अक्तूबर 2017

समंदर की शिल्प-सृष्टि...

[दक्षिण की यात्रा से लौटकर...(6)]

पूवर के रिसाॅर्ट पर पहुँचते ही शंकाएँ निर्मूल हो गयीं। हम बहुत ऊँचाई से, सँकरे, सर्पिल और अनगढ़ मार्ग से यह सोचते उतरते गये कि जाने कहाँ जाकर ठहरेंगे हम! लेकिन विस्तृत भू-भाग पर आते ही हमारे सामने एक ऐसा अलभ्य गवाक्ष खुल गया, जो मरकत मणि-द्वीप-समान था। दो-दो प्रवेश-द्वारों को पार कर जब हम 'ईस्चुअरी आईलैण्ड' के अन्दर पहुँचे तो हमारे सम्मुख था एक संपूर्ण आनन्द-लोक! देव-भूमि के निर्जन में बसा दिव्य-लोक! स्वच्छ मार्ग, शान्त और उल्लसित वातावरण, सर्वत्र हरीतिमा, नील जल से भरा तरण-ताल, बैक वाटर पर तैरता रेस्टोरेंट, दृश्यावलोकन के लिए बनाई गयी ऊँची अटारियाँ, मोटर बोट तक ले जानेवाली लाल टाइल्स की शोभायमान पगडंडियाँ और समुद्र का परित्यक्त प्रचुर जल--हरित क्रांति मचाता हुआ!

वहाँ पग धरते ही मन प्रफुल्लित हो गया। तीन घण्टों की अनवरत कार-यात्रा की थकान छूमन्तर हो गयी। बैक वाटर की बोट-यात्रा को ऋतज मचलने लगे। रिसाॅर्ट के दो अंतःसंबंधित सुसज्जित कक्ष पहले से ही सुरक्षित थे और हमारे आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे। हमने वहाँ अपना सामान डाला, मुंह-हाथ धोकर प्रसन्न-मन हुए और निकल पड़े नौकायन का आनन्द लेने। नारियल के फल से लदे वृक्षों के बीच से गुज़रते हुए हम बोट के पास पहुँचे, सवार हुए और बोट बैक वाटर में तैरती चल पड़ी उस पार! अमित आनन्द हुआ।

यह देखकर आश्चर्य हुआ, आनन्द भी कि समुद्र स्वयं अपने परिश्रम से बनाता है टीले, तालाब और तंग गलियारे और लौट जाता है अपनी सर्वभौम सत्ता के हृदप्रदेश में। जब कभी उसे लगता है कि उसके द्वारा निर्मित तालाब का जल कम हो रहा है, वह रात्रिकाल में यत्नपूर्वक तंग गलियारों से पुनः आता है, तालाब में जल भरता और चला जाता है नि:शंक। प्रकृति और पर्यावरण में हस्तक्षेप, निर्माण और विध्वंस तथा पुनर्निर्माण, पुनःसृजन उसका परिश्रम है, प्रमोद भी; क्रीड़ा है, व्यायाम भी। हम सृजन देख प्रसन्न होते हैं, मुग्ध-विस्मित और रोमांचित होते हैं तथा विध्वंस देख क्षुब्ध होते हैं, दुखी होते हैं, विकल होते है; लेकिन समंदर तो समंदर है, वह अपनी अनवरत क्रीड़ा में मग्न रहता है, हित-अनहित की चिंता से निर्लिप्त!
मनुष्य भी तो अपने जीवन में यही सब करता है न? बनाता है, मिटाता है; मिटाता है, बनाता है और एक दिन खुद मिट जाता है; क्योंकि वह भी स्वयं प्रकृति की निर्मिति ही है...!

बैक वाटर को पार कर जब हम दूसरे छोर पहुँचे तो हमने देखा, समुद्र ने अपने निरंतर श्रम से पीली रेत का लंबवत् एक टीला बना दिया है, जिसके उस पार घहराता समुद्र तरंगित है। उसकी लहरें दौड़-दौड़कर किनारे पर आती हैं और टीले को सैंकत-कणों की सौगात सौंप जाती हैं। वहाँ हमने बहुत देर तक आनन्द-भजन किया, नारियल का मीठा जल पिया, अनानास के मीठे टुकड़े खाये, जल-क्रीड़ा की, ऋतज ने अपने पितृश्री के साथ मल्लयुद्ध किया, तस्वीरें खींचीं-खिंचवायीं और सूर्यास्त के पहले ही बोट से लौट आये। समुद्र और बैक वाटर के बीच की रेतीली जमीन पर टिके रहने की समय-सीमा निर्धारित थी। हमने नियमों का पालन किया।

रिसाॅर्ट लौटकर मैंने और श्रीमतीजी ने तैरते हुए शानदार रैस्टोरेंट में दो कप चाय पी और जब देयक सामने आया तो मैं चकराया। दो कप चाय के 180 रुपये देने होंगे? पटना में दो रुपये की कुल्हाड़वाली चाय पीने का अभ्यासी मैं, विस्मित था! इतने वर्षों में वहाँ मूल्य बढ़ा भी होगा तो पाँच-दस तक पहुँचा होगा। लेकिन इतनी चिंतना का अवकाश नहीं था, देयक भुगतान की प्रतीक्षा में था। मन मारकर मैं दायित्व से मुक्त हुआ और अपने कमरे में लौट आया।

शाम सात बजे हम सभी तरण-ताल में उतरे और करीब एक घण्टे तक जल-विहार करते रहे। श्रीमतीजी के पास पूल में प्रवेश का मानक और निर्धारित वस्त्र नहीं था, लेकिन बड़ी का उत्साह देखिये, वह पन्द्रह मिनट में परिसर की एक दुकान से अपनी माँ के लिये न सिर्फ स्विमिंग ड्रेस खरीद लायी, बल्कि उस नवीन परिधान में उन्हें लेकर पूल में प्रविष्ट हुई। मैं अपनी ही भार्या को देखकर पहचानने की चेष्टा करता रहा... वह तो एक आधुनिका देवीजी-सी दीख रही थीं--नितांत अपरिचिता। वह भी ससंकोच पूल में प्रविष्ट हुईं और ऋतज के साथ मिलकर यह भूल गयीं कि वह मुझ वृद्ध की वृद्धा हैं। स्विमिंग पूल का सर्वाधिक आनन्द हमारे छोटे सरकार ऋतज ने उठाया। वह तो पूल से बाहर आना ही नहीं चाहते थे। उन्हें समझा-बुझाकर बाहर निकाला गया। स्नानोपरान्त हमारी सारी कंथा दूर हो गयी, हम सज-धजकर तैयार हुए और थोड़ी तफ़रीह करते हुए प्रकृति की उद्दाम सुन्दरता का आनन्द-लाभ करते रहे।...

जब रात के साढ़े नौ बज गये, हम रात्रि-भोजन के लिए रैस्टोरेंट में पहुँचे। रात्रिकाल में बैक वाटर भी समुद्र-सा प्रतीत हो रहा था। चंचल वायु थी और रौशनी में नहाते हुए रैस्टोरेंट के प्रकाश की प्रतिच्छाया जल की सतह पर तैर रही थी। अद्भुत आनन्द और अप्रतिम सौन्दर्य की सृष्टि थी वहाँ। हम सबों ने अपनी-अपनी पसंद के व्यंजनों का आदेश वेटर भाई को दे दिया। शानदार माहौल की मादकता और सुन्दरता को निहारते हुए हमने भोजन ग्रहण किया। हम रेस्तराँ से बाहर आये और उसके बाद तेज समुद्री हवाओं का आनन्द लेते बैक वाटर के किनारों की सैर करते रहे। वहाँ 'मैं' तो था ही, सर्वत्र आनन्द ही आनन्द पसरा हुआ था।







कई बार मोद-मग्न शरीर को थकान की अनुभूति नहीं होती। वह किये जाता है श्रम... और श्रम, रहता है उल्लसित--आनन्द के पालने में झूलता हुआ दिग्भ्रमित; किन्तु शरीर का रसायन सहेजकर रखता जाता है तद्जन्य क्लांति का गणित। जब हम अपने-अपने कक्ष में शयन के लिए शय्याशायी हुए तो गहरी नींद आयी। अब तो सुबह शीघ्र जागरण की विवशता भी नहीं थी। मैं सात बजे जागा, लेकिन श्रीमतीजी और बिटियारानी छह बजे ही जागकर वैक-वाटर के किनारों का एक चक्कर लगा आयीं। आनन्ददायी सुबह में पलकें खुलीं, तो हाथ-पाँव और कंधों में ख़ासा दर्द था। संभवतः वर्षों बाद स्विमिंग पूल में तैरने और उधम मचाने के कारण। ऋतज जब जागे, ताजगी और स्फूर्ति से भरे हुए हुए थे। वह मुझे ललकार रहे थे--'नानजी! चलिए, चलते हैं पूल में।' वह पूल में तैरने-स्नान करने का स्वप्न लेकर ही शायद सोये थे पिछली रात! मैंने उन्हें बताया कि 'पूल में तैरने की वजह से ही मेरे शरीर में दर्द हो रहा है। मैं तो बाथरूम में ही स्नान करूँगा बच्चू!' उन्होंने एक बुजुर्ग की तरह मुझे समझाया--'नानजी, आप पूल में दुबारा तैरेंगे तभी दर्द दूर होगा, नहीं तो और ज्यादा होगा। सच में।' उनकी ज़िद पर मुझे फिर पूल में उतरना पड़ा। वह बार-बार मेरे पास तैरते हुए आते और दर्द-निवारण की नयी-नयी युक्तियाँ बताते। इतना तो सच है कि पूल में तैरना-स्नान करना आनन्ददायी लगा, लेकिन पूल से बाहर आकर मैंने जाना कि शरीर के दर्द में ख़ासी कमी भी आ गयी है। ऋतज भी लगातार मुझसे पूछते ही रहे--'नानजी, अब ठीक हो गया न दर्द?' इस तरह दर्द की बात सबको ज्ञात हो गयी, जिसे मैंने पोशीदा रखा था सुबह से...।

सुबह का जलपान यहाँ भी रिसाॅर्ट की ओर से ससम्मान 'काॅम्प्लीमेंटरी' था। जब हम रेस्तराँ में पहुँचे तो वहाँ भी विविध व्यंजनों की बहुत बड़ी नुमाइश लगी हुई थी, लेकिन वो कहावत है न, दूध का जला...! मैंने मन को संयम का पाठ पढ़ाया और व्यंजनों की ओर संयत भाव से बढ़ा। लेकिन, जब एक-एक व्यंजन ब्राह्मण की रसना को तृप्ति देने लगा तो वह सारे बंधन भूल गया और उसने फिर उदर को आकण्ठ भर लिया। तृप्त होकर हम सब वहाँ से दस बजे उठे। अब हमारे पास दो घण्टे का वक़्त था, हमें बारह बजे रिसाॅर्ट से कोचीन की यात्रा पर निकलना था--260 किलोमीटर की अनवरत यात्रा पर!...

हमने सामान समेटा। अंतिम भुगतान के लिए जब हम 'रिसेप्शन' पर पहुँचे तो हमें लंबा-चौड़ा देयक थमा दिया गया और लेकिन हम इस बात से संतुष्ट और प्रसन्न थे कि सुबह के 'कम्पलीमेंट्री ब्रेकफास्ट' में हमने हिसाब बराबर कर लिया है।...

उसके बाद द्रुत गति से सड़क पर दौड़ चली रविजी की कार। बीच राह में रुक-रुककर नारियल-जल पीते हुए हम चलते ही रहे--अंतहीन रास्ता। न राह खत्म होती, न दामाद सा' की हिम्मत घटती। सम्पूर्ण मार्ग की शोभा तो वर्णनातीत है। हमारे साथ-साथ समुद्र भी दौड़ रहा था, लेकिन विपरीत दिशा में। बारह बजे के पूवर से चले हुए हम रात आठ बजे बेटी के घर पहुँचे। आठ घण्टों का अबाधित परिचालन--यह दामाद साहब के ही वश की बात थी, उन्हीं का हियाव था। यात्रा की थकान तो थी, लेकिन हमें इसकी अत्यधिक प्रसन्नता थी, संतोष था कि हम अपने कलेजे में समेट लाये थे ज़िन्दगी से भरी हुई ढेर सारी ताज़ा हवाएँ और मस्तिष्क में अविस्मरणीय, अनमोल यादें।

हँसी-खुशी का बस, एक दिन और शेष था। बेटी-दामाद-ऋतज से बहुत सारी बातें हुईं, चित्रों का आदान-प्रदान, प्रसाद का बँटवारा हुआ और उसके अगले ही दिन, मात्र डेढ़ घण्टे में वायुयान हमें ले आया कोची से बहुत दूर--पूना के भीड़-भरे शहर में और हमें छोड़ गया यहाँ तन्हा-तन्हा!...
[इति वार्ताः]

--आनन्द.
3-10-2017.

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (30-10-2017) को
"दिया और बाती" (चर्चा अंक 2773)
पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'