सोमवार, 23 अक्तूबर 2017

दिव्य-भूमि से देव-भूमि पर...

[दक्षिण की यात्रा से लौटकर...(5)]

आकाश में अपने आगमन की पूर्व सूचना देते हुए जो रक्ताभ तिरंगा दिवाकर की रश्मियों ने फहराया था और जो अपूर्व दृश्य हमें दिखलाकर दिन-भर की अनवरत यात्रा पर चल पड़े थे, उसी से हर्षोन्मत्त हुए हम सब होटल से पाँच किलोमीटर दूर 'हिडन ट्विन बीच' चले गये। बाल-गोपाल की ज़िद थी, सुबह का वक्त था और खुशनुमा माहौल था। 'बीच' पर पहुँचने के लिए बलुआई खड़ी ढलान से नीचे उतरना था। मुझे तो नींद पूरी न होने की थकान थी, चित्त पर खिन्नता सवार थी, सिर में हल्का दर्द था और बीच पर उधम मचाने का वैसा कोई शौक भी मुझे नहीं था। दरअसल, 29 सितम्बर से हम निरन्तर यात्रा ही तो कर रहे थे और रैन बसेरों में अधकच्ची निद्रा लेकर आगे बढ़ते जा रहे थे। चार दिनों में थकान बढ़ते-बढ़ते चरम दशा में पहुँच गयी थी।... लिहाज़ा, मैं तो 'उच्चस्थानेषु पण्डिता' ही बना रहा, लेकिन युवक-युवतियाँ बच्चों सहित बीच पर जा पहुँचे। आश्चर्य की बात कि घुटनों के दर्दवाली मेरी श्रीमतीजी भी ऋतज की पुकार की अनसुनी न कर सकीं और सँभल-सँभलकर पग बढ़ाते, सहारा लेते हुए नीचे उतर ही गयीं और मैं काफी दूरी से उनकी तस्वीरें उतारता रहा।..

लेकिन, घण्टे-भर में धूप तीखी हो गयी और मेरे शरीर का रसायन तत्व बिगड़ने लगा, मस्तिष्क का नेटवर्क भाग चला; क्योंकि मैं अपना पान-तम्बाकू का थैला होटल के कमरे में ही छोड़ आया था। वह तो प्रभु भास्कर की कृपा हुई कि जल-क्रीड़ा करनेवाले दल को भी उनकी प्रखर रश्मियाँ चुभने लगीं और वे ऊपर आ गये। 'बीच' से होटल की राह निर्जन, कितु आकर्षक थी। दल के प्रायः सभी सदस्यों ने मध्य-मार्ग की एक छोटी-सी दुकान में चाय पी और होटल लौट आये।

होटल-प्रबंधन ने अपने सम्मानित अतिथियों के स्वागतार्थ निःशुल्क स्वल्पाहार (काॅम्प्लिमेण्ट्री ब्रेकफास्ट) का समय निर्धारित कर रखा था--8.30 से 10। हम नौ बजे के आसपास ही होटल पहुँच गये थे। पूरा दल शीघ्रता से स्नान-ध्यान में जुटा। 'बीच' से साथ लायी बालुका-राशि से पूर्णतः मुक्ति पाकर हम सभी होटल के बेसमेण्ट में पहुँचे, जहाँ नाश्ते का बढ़िया प्रबंध था। भोज्य-पदार्थ जब मुफ़्त का मुहय्या हो तो चित्त प्रसन्न हो जाता है और 'मेनू' देखने की आवश्यकता नहीं होती। दातव्य के अन्न पर रीझ जानेवाला विप्र तो मन्त्रमुग्ध-सा ठीक उसी तरह व्यंजन की ओर बढ़ता है, जैसे गुड़ की ढेली की ओर पंक्तिबद्ध बढ़ते हैं चींटे। युग बदला है, युग-धर्म बदला है, रोजी-रोजगार के लिए घर से निकले हैं विप्र-बंधु भी, बड़ी संख्या में; लेकिन सनातन परम्परा के गुण-तत्व रक्त-मज्जा से जाते कहाँ हैं? वे रह जाते हैं वृत्ति बनकर स्थायी भाव में...!

बेसमेण्ट के बड़े-से हाॅल में विभिन्न प्रकार के दक्षिण भारतीय व्यंजन तो थे ही, पूरी-भाजी, टोस्ट-बटर, गर्मागरम बनता ऑमलेट-दोसा, चाय-काॅफ़ी, कटे हुए फलों और जूस के काउंटर भी सजे हुए थे और हमें हसरत भरी निगाहों से तक रहे थे; जैसे हमलोगों से ही कह रहे हों--'आओ भाई, हमें खा-पी लो।' उनका यह प्रीत-पगा आमंत्रण बहुत लुभावना था। हम सभी भूखे व्याघ्र की तरह व्यंजनों पर टूट पड़े। हमने उन स्वादिष्ट पदार्थों को अल्पाहार की तरह नहीं, बल्कि संपूर्ण भोजन से भी अतिरिक्त मात्रा में ग्रहण किया। बच्चों ने आहार के साथ फल खाये, तरबूज का मीठा रस पिया, फिर मिल्कशेक भी गटक गये। हम भी अभी कहाँ बूढ़े हो गये थे अच्छी तरह? उदर में अधिकाधिक जितना कुछ डाल सकते थे, भविष्य की चिंता किये बिना, डालते गये। अधेड़ उम्र का मेरा पेट भी 'कन्फ्यूज़' हो गया कि यह सब क्या हो रहा है उसके साथ! उसे पायज़ामे के जारबंद का बंधन भी अप्रिय लगने लगा था।... अत्याचार किसी के भी साथ हो, वह नाराज़ जरूर होता है।





वहीं नाश्ते की टेबल पर बेटी-दामाद सा' ने तय किया कि हम कन्याकुमारी से कोचीन की यात्रा एकमुश्त न करके, बीच में एक रात का विश्राम लेंगे और तत्पश्चात् कोचीन के लिए प्रस्थान करेंगे। मध्य मार्ग का हमारा विश्रामालय होगा पूवर का 'बैक वाटर का रिसाॅर्ट'। दामाद साहब के दोनों मित्रों को भी सपरिवार अलग-अलग दिशाओं में जाना था। वे दोनों 10 और 10.30 पर गन्तव्य के लिए प्रस्थान कर गये। हमने डेढ़ घण्टे तक होटल में ही विश्राम कर शरीर और उग्र हुए उदर को शांत होने का अवकाश दिया। लेकिन डेढ़ घण्टे में उदर शांत-संयमित होनेवाला था नहीं, वह मुँह फुलाये रहा।...एक-दो बार वह मुँह तक आया भी, जैसे कुछ कहना चाहता हो। मैंने बलपूर्वक उसे यथास्थान बने रहने को बाध्य किया।

दिन के ठीक बारह बजे हम 70 किलोमीटर के सफ़र पर होटल से चल पड़े--पूवर के लिए। इकहरी सड़क थी, ढाई-तीन घण्टे का सफ़र था, लेकिन राह के दोनों किनारों के दृश्य चित्ताकर्षक थे। नारियल और ताड़ वृक्षों की अनन्त श्रृंखला सर्वत्र थी--शोभायमान! यह यात्रा अपेक्षाकृत शांति से सम्पन्न हो रही थी। ऋतज की आवाज़ के अलावा सिर्फ बेटी के स्वर सुनने को मिल रहे थे, वह भी तब, जब राह बताने की आवश्यकता होती; क्योंकि जीपीएस का नियंत्रण उन्हीं के अधीन था। कसे हुए पेट से सभी परेशान थे और नींद के झटके खा रहे थे। दिन के भोजन का तो प्रश्न ही नहीं था।...

अपने शरीर पर अगर किसी का पूरा नियंत्रण था, तो वह थे दामाद सा', जबकि सबसे अधिक श्रम उन्हें ही करना पड़ रहा था। तमिलनाडु की सीमा लाँघने के पहले दामाद सा' ने सड़क-किनारे कार रोकी। उतरकर कुछ कदम पीछे गये, जहाँ छोटी-सी मड़ैया में ताड़-नारियल के फलों का अंबार लिए एक वृद्ध बैठे थे। बड़े-बड़े शीशे के गिलासों में वह शर्बत जैसा पेय पदार्थ ले आये। उन्होंने बताया कि यह 'ताड़ी-मुंजु' है। इसे पीने के बाद तंद्रा भंग होगी और उदर की उथल-पुथल शांत हो जाएगी। उनके जोरदार समर्थन के कारण हम सबों ने शर्बत पिया, जिसमें श्वेत-पनीले और अतिमधुर टुकड़े मिश्रित थे। उसका पान कर जब हम आगे चले तो रविजी ने विस्तार से बताया कि वे श्वेत-पनीले टुकड़े दरअसल ताड़-वृक्ष के फल के अंदर के कोए थे।...और, आश्चर्य की बात कि उस पेय को ग्रहण करने के आधे घण्टे में ही उदर की उग्रता शांत हुई और हम बोलते-हँसते बढ़ते गये।...

बारह बजे के चले हुए हमलोग ढाई बजे पूवर के 'ईस्चुअरी आईलैण्ड' (केरल) पहुँच गये और वहाँ की निराली शोभा देखकर दंग रह गये।... वह तो पृथ्वी पर स्वर्ग के समान सुन्दर भूमि-भाग था।...हम दिव्य-भूमि से देव-भूमि पर आ गये थे।...

--आनन्द.
02-10-2017.

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (25-10-2017) को
"प्रीत के विमान पर, सम्पदा सवार है" (चर्चा अंक 2768)
पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'