गुरुवार, 7 अक्तूबर 2010

दोस्ती की दरारें...

गहरा प्रेम प्रदर्शित करते हुए
उसने मुझे अपने पास बुलाया,
मेरा हाथ अपने हाथों में लिया,
फिर अपने तेज़ औज़ार से
मेरे नाखून काट डाले।
शायद वह प्रेम के बीच
कोई अंकुश नहीं रहने देना चाहता था ।

मैंने कोई विरोध नहीं किया,
काल-चक्र से लिपटे
प्रेम की गति तीव्रतर होती गई,
हंसते-हँसते
उसने मेरी उंगलियाँ काट दीं,
फिर मेरे हाथों पर भी
अपने औजारों का जंग छुडाया,
मैं हाय-हाय कर उठा !

पास ही प्रगतिशील विज्ञान खड़ा था,
मुस्कुरा कर
उसने मुझे पास बुलाया,
कहा,
अरे रे ! रोता क्यों है ?
'ला, मैं प्लास्टिक के हाथ
लगाए देता हूँ ...'

मैं चिल्लाता हुआ
भाग खड़ा हुआ--
'नहीं, नहीं,
अब और दोस्ती नहीं .... !'

9 टिप्‍पणियां:

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

शायद वह प्रेम के बीच
कोई अंकुश नहीं रहने देना चाहता था ।

क्या बात है आनंद भैया !
हालात की सार्थकता को सिद्ध करती हुई ये कविता बहुत कुछ सोचने को विवश कर देती है ,
भैया ,आप की कविताओं को समझना मेरे लिये तो बहुत कठिन होता जा रहा है कई बार पढ़ना पड़ता है लेकिन जब समझ में आ जाती है तो कुछ पा लेने का एहसास होता है
इस साहित्यिक कृति के लिये धन्यवाद

अनिल कान्त ने कहा…

सशक्त कविता के माध्यम से आप बहुत कुछ कह गए सर .

'उदय' ने कहा…

... भावपूर्ण व शिक्षाप्रद !

Kishore Choudhary ने कहा…

दुनिया के विकास की कहानी

इसमें मनुष्य की भावनाओं के आक्रामक होते हुए तेवर जो पागलपन जैसे हैं, दिखाई दे रहे हैं. मानवीय अनुभूतियों के बाजारीकरण पर कड़ा प्रहार है. क्या हम आदम से मशीन होते जा रहे हैं ?
गंभीर और चिंतनीय.

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

ओझा जी...
ये रचना काफ़ी देर तक सोचने पर मजबूर करती है...
टिप्पणी में अपना बस ये एक शेर अर्ज़ है-
ख़ंजर था किसके हाथ में ये तो पता नहीं
हां दोस्त की तरफ़ से मैं ग़ाफ़िल ज़रूर था.

डिम्पल मल्होत्रा ने कहा…

इस शहर में दुश्मन तो मेरा कोई नहीं था,फिर किसने मुझे क़त्ल किया सोच रहा हूँ..

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

अपना अर्थ खोते इन्सानी रिश्तों, पर ऐसी गम्भीर चिन्ता!! पता नहीं कितने अर्थ निकल रहे हैं कविता से... जितनी बार पढती हूं, एक नया अर्थ सामने होता है.

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

आप सबों का आभार ! शाहिद भाई, महरोत्राजी, मैंने ही कभी ये पंक्तियाँ लिखी थीं :
'दोस्त पूछने लगे खैरियत मेरी,
मुझे मेरी खैरियत का इंतज़ार है !'
वह प्रतीक्षा आज भी है... !
साभिवादन--आ.

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

पास ही प्रगतिशील विज्ञान खड़ा था,
मुस्कुरा कर
उसने मुझे पास बुलाया,
कहा,
अरे रे ! रोता क्यों है ?
'ला, मैं प्लास्टिक के हाथ
लगाए देता हूँ ...'

मैं चिल्लाता हुआ
भाग खड़ा हुआ--
'नहीं, नहीं,
अब और दोस्ती नहीं .... !'

सुभानाल्लाह .....!!
आनंद जी आज तो बेलफ्ज़ हूँ .....
अभी कई बार पढनी पड़ेगी ......