गुरुवार, 5 जनवरी 2012

खरामा... खरामा...

धूप का एक टुकड़ा
मेरे आँगन में मुस्कुराया,
मैंने सजदे में सिर झुकाया और--
खुद को समझाया--
चलो, एक उजाला
मेरी गिरफ्त में है;
लेकिन शाम से पहले ही
धूप का वह टुकडा
आँगन से नदारद था !
मैं मायूस तो था,
फिर भी मुस्कुराया था--
धूप-छाँव की यह ज़िन्दगी
यूँ ही कटेगी--
खरामा... खरामा ..... !!

7 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

चलो, एक उजाला
मेरी गिरफ्त में है;

क्या बात है !!!!

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

वाह!! बहुत सुन्दर.

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

एक ही कमेंट दो बार पोस्ट हो गया था. इसलिये एक हटा दिया है.

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

अपनी ही मुठ्ठी को बंद कर
कहता है धूप को पकड़ लिया
दिखने लगीं जब अपनी झुर्रियाँ
कहता है ये कोई और है!
...अहसास जगे..खरामा खरामा।

singhSDM ने कहा…

मैंने सजदे में सिर झुकाया और--
खुद को समझाया--
चलो, एक उजाला
मेरी गिरफ्त में है;

और

धूप-छाँव की यह ज़िन्दगी
यूँ ही कटेगी--
खरामा... खरामा ..... !!
ज़िन्दगी के उतर चढाव को बयान करती प्रभावी रचना.

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

आप सबों का आभारी हूँ !
--आ.