मंगलवार, 13 नवंबर 2012

यह मंगल-दीप जले...



आलोकित हो जीवन-पथ
जन-मन में उल्लास पले,
यह मंगल-दीप जले !

आँगन-आँगन हो उमंग,
मुदित मोद नाचे अभंग,
आशाओं की बगिया में
सुरभित पुष्प खिले ! यह मंगल-दीप जले !!

एक दीप अकेला मदमाये,
अंतर उजास से भर जाए--
ज्योतित होकर आकाश-दीप
धरा अम्बर के मिले गले ! यह मंगल-दीप जले !!

यह दीप्ति अनोखी न्यारी है,
इस प्रभुता की बलिहारी है,
तिमिर-दुर्ग का हो विनाश
जब इक बाँकी किरण चले ! यह मंगल-दीप जले !!

अभ्यंतर में जब हो प्रकाश
सघन तिमिर का हो विनाश,
आलोक-पर्व पर ज्योति-दान
जन-जन को बहुत मिले ! यह मंगल-दीप जले !!

[चित्र वंदना अवस्थी दुबेजी से साभार, उनकी अनुमति के बिना, क्षमा-याचना सहित]

6 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

दीपावली की शुभकामनाएँ!

ई. प्रदीप कुमार साहनी ने कहा…

आपके इस प्रविष्टि की चर्चा कल बुधवार (14-12-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी । जरुर पधारें ।
सूचनार्थ ।

वन्दना ने कहा…

मन के सुन्दर दीप जलाओ******प्रेम रस मे भीग भीग जाओ******हर चेहरे पर नूर खिलाओ******किसी की मासूमियत बचाओ******प्रेम की इक अलख जगाओ******बस यूँ सब दीवाली मनाओ

दीप पर्व की आपको व आपके परिवार को ढेरों शुभकामनायें

mahendra mishra ने कहा…

दीपोत्सव पर्व के अवसर पर हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं ....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

दीवाली का पर्व है, सबको बाँटों प्यार।
आतिशबाजी का नहीं, ये पावन त्यौहार।।
लक्ष्मी और गणेश के, साथ शारदा होय।
उनका दुनिया में कभी, बाल न बाँका होय।
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(¯*•๑۩۞۩:♥♥ :|| दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें || ♥♥ :۩۞۩๑•*¯)
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वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

अभ्यंतर में जब हो प्रकाश
सघन तिमिर का हो विनाश,
आलोक-पर्व पर ज्योति-दान
जन-जन को बहुत मिले ! यह मंगल-दीप जले !
बहुत सुन्दर गीत है. लयबद्ध करने लायक. और हां, इस चित्र को यहां स्थान मिला, ये मेरा सौभाग्य है. क्षमायाचना कर के मुझे शर्मिंदा न करें.