रविवार, 12 अक्तूबर 2014

मेरे पुण्य-प्रसून...


समय के साथ
बहता रहा जीवन
हम अनजाने ही
बोते रहे अपनी ज़मीन पर
यश-अपयश...!
ऊर्जा क्षीण हुई तो ज्ञात हुआ
यश उपजानेवाले बीज तो
अंकुरित हुए ही नहीं
जाने कहाँ, किस मरु में
जा पड़े थे वे
कि कुंद हो गए...!
अपयश के बीजों ने
उर्वर या बंजर की परवाह न की,
वे तो पूरी उमंग से उठ खड़े हुए
विशाल कंटीली झाड़ियों-से
जिसमें चक्रवाती हवाओं-सी
उलझी पड़ी है ज़िन्दगी...!
कब तक पुकारूं तुम्हें
कि आओ, सुलझा दो जीवन,
संवारो उसे,
खोजो उन यशदायी बीजों को
मेरे साथ--
क्या पता,
तुम्हारे फूल-से हाथों लग जाएँ
वे बीज और--
उन्हें उर्वर भूमि मिले तो
वे फिर से
हो उठें अंकुरित
और कभी-न-कभी
उनकी कोमल टहनियों पर
खिल उठें मेरे पुण्य-प्रसून....!

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (13-10-2014) को "स्वप्निल गणित" (चर्चा मंच:1765) (चर्चा मंच:1758) पर भी होगी।
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चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'