बुधवार, 24 दिसंबर 2014

[पूज्य पिताजी की १९वीं पुण्य-तिथि (२ दिसंबर) के दिन मैं पटना में था। घर में विवाह का आयोजन था और वहाँ नेट भी काम नहीं कर रहा था। लिहाज़ा, उस दिन उन पर न कुछ लिख सका, न कुछ पोस्ट कर सका। घर में ही उनके चित्र पर माल्यार्पण कर उन्हें स्मरण-नमन किया और फिर लौट आया...! पटना से जो सामग्री उठा लाया हूँ, उसमें उनका उपन्यास 'पुलिना के पत्र' भी है और डॉ. श्रीरंजन सूरिदेवजी के दो संस्मरणात्मक आलेख भी। एक उनके जीवन-काल में लिखा गया था, दूसरा मरणोपरांत। आपके सम्मुख रखते हुए मैंने लेख का क्रम बदल दिया है, बादवाला लेख पहले रख रहा हूँ। चाहता हूँ, इसे आप भी पढ़ें और दिसंबर बीतने से पहले मेरे स्मरण-नमन में मेरे साथ आ खड़े हों.--आनन्दवर्धन.]
हिन्दी के मुक्त-पुरुष मुक्तजी
--डॉ. आचार्यश्री श्रीरंजन सूरिदेव
अपने नाम-गुण के अनुसार सदा प्रफुल्ल रहनेवाले थे प्रफुल्लचन्द्र ओझा 'मुक्त'जी। वह साहित्यिक संस्मरणों के शब्द-निधि थे। साहित्येत्तिहासिक घटनाओं और परिस्थितियों का सजीव शैली और सप्राण भाषा में वर्णन की उनकी रीति की द्वितीयता नहीं है। उन्होंने अपने संस्मरणों में समय के इतिहास को रेखांकित करने की चेष्टा की है, साथ ही उन्हीं स्थितियों का वर्णन किया है, जिन्होंने उन्हें प्रभावित किया है या उनके जीवन-क्रम को संचालित या नियंत्रत किया है।
मुक्तजी तब बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद् के कार्यालय में यदा-कदा आया करते थे। उस समय कदाचित पं. हंसकुमार तिवारी परिषद् के निदेशक थे। उन दोनों के वार्तालाप में एक अद्भुत सारस्वत आनन्द मिलता था। बातचीत में वह अपने 'सेक्रेटरी' की चर्चा अवश्य करते थे, जो उनके जीवन के दुःख-सुख में बराबर साथ देता था। यह सेक्रेटरी उनका उनका 'आध्यात्मिक सेक्रेटरी' था।
जैसा उन्होंने कहा था--एक बार वह परदेश-वास के क्रम में रात में सोये हुए थे। बरसात का दिन था। उस रात में इतनी वर्षा वर्षा हुई कि कमरे में सहसा पानी भर आया। कमरा बंद था। निकलने का कोई उपाय नहीं था। इस साँसत की घड़ी में उनको 'सेक्रेटरी' याद आने लगा। तभी अचानक कमरे की बंद खिड़की खुल गई, जिससे पानी कमरे से बाहर निकल गया और उनकी जान बच गई। वह जब भी मिलते, मैं उनके साथ घटी इस रोमांचकारी घटना का स्मरण अवश्य दुहराता था।
मुक्तजी से मेरी पहली मुलाकात तब हुई, जब लोहानीपुर (पटना) में, एक सामान्य मकान में किराये पर रहते थे। उसके बाद तो कई मुलाकातें हुईं, जब वह पटना रेडियो में हिंदी-वार्ता के प्रभारी के रूप में प्रतिष्ठित हुए थे। एक बार मैं वार्ता-प्रसारण के क्रम में रेडियो स्टेशन गया। उस समय मुक्तजी हिंदी-वार्ता के प्रभारी थे। मैंने जो आलेख वार्त्ता के लिए लिखा था, उसमें एक जगह कुछ संशोधन की आवश्यकता उन्होंने बतायी। मैंने उनसे अपेक्षित संशोधन कर लेने को कहा और ख़ुशी जताई कि इससे मुझे गौरव-बोध होगा। लेकिन, उन्होंने मुझे ततोSधिक गौरवान्वित तब कर दिया, जब यह कहा--"पाण्डुलिपि आपकी है, आप स्वयं उसका संशोधन करें।" संशोधन का प्रसंग तब आया, जब उन्होंने पाण्डुलिपि का निरीक्षण कर बताया कि इसमें कुछ ऐसी बात लिख गई है जो रेडियो नीति के अनुकूल नहीं है। मैंने उनके इच्छानुसार अपनी पाण्डुलिपि में संशोधन कर दिया। इस प्रकार, मैं उनकी सारस्वत प्रसन्नता अर्जित करने में सफल हो गया।
मुक्तजी जितने प्रभावशाली कथाकार थे, उतने ही अच्छे काव्यकार भी थे। पहले रेडियो स्टेशन में कवि-सम्मलेन का आयोजन प्रायः होता था। एक बार यथायोजित कवि-सम्मलेन के श्रोताओं में निर्मम समालोचक आचार्य नलिनविलोचन शर्मा भी सम्मिलित थे। उस सम्मलेन में मुक्तजी ने अपनी जिस कविता को उदात्त आवर्जक स्वर में प्रस्तुत किया, उसकी प्रसंशा नलिनजी ने भी की। यद्यपि उनके-जैसे तत्त्वभिनिवेशी आलोचक की प्रसंशा अर्जित करना सबके लिए संभव नहीं हो पाता था।
मुक्तजी पान खाने के शौक़ीन थे। पनडब्बा साथ रखते थे, बीच-बीच में पान की गिलोरियां बनाते और सेवन करते। मुझे भी एकाध बार उनकी बनायी गिलौरियों के आस्वाद का सौभाग्य सुलभ हुआ था। मैं इस अर्थ में बड़भागी हूँ कि मुझे अपने से छोटे और बड़े सभी साहित्यकारों का सहज स्नेह सुलभ रहा है।
मुक्तजी की कथा-शैली अपने ढंग की है। कथा में कथानक के साथ चरित्र भी होते हैं। मुक्तजी द्वारा प्रस्तुत कथानक और चरित्र इस प्रकार गुँथे हुए हैं कि उन्हें अलग-अलग नहीं किया जा सकता। कथानक के बंधन में बांधकर चरित्र को विकृत करने की प्रवृत्ति मुक्तजी में कभी नहीं रही। यद्यपि उन्होंने मनोविज्ञानं के आधार पर अपने कथा-चरित्रों की सर्जना की है। मैंने मुक्तजी की कृतियाँ--'पुलिना के पत्र' (पत्र-शैली लिखित उपन्यास) और 'अतीतजीवी' (संस्मरण) पढ़ी हैं और इन दोनों ही कृतियों ने मुझे प्रभावित किया है। इन दोनों में मुक्तजी द्वारा उपन्यस्त आकर्षक कथावस्तु की मनोहारिता, चरित्र-चित्रण की कुशलता, संवाद या कथोपकथन द्वारा यथाकल्पित पात्रों में सजीवता की संचारिता, शैली की सुकुमारता और मनोज्ञता आदि औपन्यासिक तत्त्वों एवं संस्मरणात्मक उपादानों के युतपद विनियोग की निपुणता प्रबुद्ध पाठकों को रिझाये विना नहीं रहती है। मुक्तजी ने अपनी सामान्य रेखाओं द्वारा ही भावाभिव्यंजक शब्द-चित्रों को उरेहा है। उनकी यह कथा-शैली हिंदी के कई अन्य कथाकारों की शैली में परिलक्षित होती है।
मुक्तजी स्वभावतः कविहृदय थे। उनके लिखे 'पुलिना के पत्र' जैसे रूमानी उपन्यास में यथाचित्रित कथा का स्वरूप काव्य के उपकरणों के माध्यम से निरूपित हुआ है। अतएव, मुक्तजी की कथाओं में कवित्वपूर्ण और भाव-मधुर वातावरण भी बना रहता है। इस प्रकार, मुक्तजी को रोमांतिक कथाकारों में पांक्तेय माना जा सकता है।
संस्मरणकार के रूप में मुक्तजी प्रौढ़ निबंधकार थे। इसलिए, स्मृति के आधार पर व्यक्ति-विशेष पर लिखित उनके निबंध संस्मरण बन गए हैं, जिनमें विभिन्न पात्रों का कोमल और सजीव चित्रण हुआ है। बिहार के शिवपूजन-युग के संस्मरणकारों में मुक्तजी अग्रिम पंक्ति में परिगणनीय हैं। महादेवी वर्मा के 'अतीत के चलचित्र', 'वातकी' संस्मरणात्मक कृति के सादृश्य पर नामित 'अतीतजीवी' में मुक्तजी की संस्मरणात्मक गद्य-रचनाएँ संगृहीत हैं। इस कृति से अवश्य ही हिंदी का गद्य-साहित्य समृद्ध हुआ है।
मुक्तजी सच्चे अर्थ में उन्मुक्त विचारों के परिग्रह-मुक्त पुरुष थे। संसार से उनकी असामयिक विमुक्ति से हिंदी-जगत की अपूरणीय क्षति हुई है। भद्रता और विद्वत्ता का उनमें मणि-कांचन संयोग सुलभ हुआ था। स्वाभिमान के धनी, मनीषी-मनस्वी मुक्तजी अपने जीवन में अनैतिक कभी नहीं हुए। वह बहुत ही स्पष्टवादी थे। अपने नैतिक बल पर वह मानव-समाज में निर्द्वन्द्व विचरते थे। मनुष्य-जीवन के लिए स्वार्थ की जितनी आवश्यकता होती है, उतना ही मूल्य वह स्वार्थ को देते थे। अन्यथा, उनका समग्र जीवन परमार्थ का अनुकरणीय उदाहरण जैसा है।
मुक्तजी ने व्यवहारिक वैदुष्य और शास्त्रीय प्रज्ञा दोनों को सामान रूप से उपार्जित किया था। वह स्वार्जन को जितना मूल्य देते थे, परार्जन को उतनी ही हेय दृष्टि से देखते थे। योग्यों की योग्यता को परखने की उनमें अपूर्व क्षमता थी। एक-दो बार उन्होंने अपने सुयोग्य पुत्र आनन्दवर्धनजी के साथ अपने महनीय पदार्पण से मेरे किराए की कुटिया को मूलवान बनाया था।
आज उनके नहीं रहने से मैं सारस्वत अनाथता का अनुभव करता हूँ। हिंदी-जगत में हिंदी के वयोवृद्ध सारस्वत पुरुषों की संख्या बड़ी तेजी से कम हो रही है। मुक्तजी तो संस्कृत के भी अधीती थे। बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद् से प्रकाशित प्रसिद्ध ऐतिहासिक संस्कृत-कथाग्रन्थ 'कथासरित्सागर' का सरल प्रांजल हिंदी-भाषा में अनुवाद उनकी गम्भीर संस्कृतज्ञता की आक्षरिक उद्घोषणा करता है। उनके अकालिक निधन से संस्कृत और हिंदी दोनों राष्ट्रीय भाषाएँ अधनता का अनुभव करती हैं।
[चित्र-परिचय : पूज्य पिताजी का यह चित्र १९४९ में प्रकाशित उनके उपन्यास 'पुलिना के पत्र' में छापा था, वहीँ से लिया गया है.]

1 टिप्पणी:

Dilbag Virk ने कहा…

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 25-12-2014 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1838 में दिया गया है
धन्यवाद