शनिवार, 17 अक्तूबर 2015

मेरी परलोक-चर्चाएँ... (१०)



[वह डाली तो अभी हरी थी....]
सप्ताहांत समीप आ गया था और मैं तीन दिनों के रतजगे और लेखा-विभाग में दिन के वक़्त आँखफोड़ अंक-व्यापार से क्लांत हो गया था। शनिवार की शाम की आतुर प्रतीक्षा थी, वह आ पहुँची। मैंने अपना बुद्धिजीवी झोला उठाया, उसमें सिल्क की धोती और अखबार की तह में लपेट कर शीशे की छोटी गिलासिया रखी। बोर्ड आकार में झोले से बड़ा निकला, उसे भी एक पेपर में पैक किया और साइकिल के करियर में दबा दिया। यथापूर्व मुझे श्रीलेखा और मधुलेखा दीदी के घर जाना था। मन में उत्साह था, चाहता था कि शीघ्र उनके पास पहुँचकर अपनी इस नयी उपलब्धि और नवीन अनुभवों के किस्से सुनाऊँ और यदि उनकी सहमति हो तो उनके सम्मुख पराजगत से सम्पर्क करके उन्हें आश्चर्यचकित कर दूँ।
शाम सात बजे तिलकनगर स्थित उनके निवास पर पहुँचा। दोनों दीदियाँ मेरी प्रतीक्षा करती मिलीं। मुझे देखते ही बड़ी दीदी ने कहा--'आज तुमने आने में देर कर दी आनंद! कब से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही हूँ कि तुम आ जाओ तो हम सब एकसाथ चाय पियें। मैं तो छह बजे ही कोर्ट से आ गई थी।' ऐसी ही अनन्य प्रीति करनेवाली थीं बड़ी दीदी! मधुलेखा दीदी ने मेरी हिमायत करते हुए कहा--'अच्छा, बैठने तो दो उसे। देखती नहीं, साइकिल चलाकर थक गया है।' उन्होंने चाय के लिए अपनी मेड को आवाज़ लगाई।
झोला तो मेरे कंधे पर टंगा घर में प्रविष्ट हो गया था, लेकिन बोर्ड मैं साइकिल के करियर पर ही संकोचवश छोड़ आया था। चाय का दौर चला, बातें हुईं और बैठक में मेरी चुहल पर हंसी के फव्वारे फूटे। शनिवार की रात का खाना बड़ी-छोटी दीदी मेरी पसंद का बनवाती थीं। कानपुर के मशहूर 'ठग्गू के लड्डू' ख़ास मेरे लिए मँगवा के रखे जाते थे। मेरे बड़े मज़े थे वहाँ। उनके घर के मध्य में लंबवत एक बड़ा-सा डायनिंग टेबल था, जिस पर आठ-दस लोग एक साथ भोजन कर सकते थे। उसी टेबल पर रात का भोजन हुआ। उसके बाद मधु दीदी ने अपनी पान की पुड़िया निकाली, पान-व्यवहार हुआ, फिर बातों का दौर शुरू हुआ। मैंने दोनों दीदियों के सम्मुख अपनी बात रखी, पिछले कुछ दिनों के अपने अनुभव बताये और कहा--'आप दोनों की इच्छा हो तो मैं मनचाही किसी भी आत्मा का आह्वान कर आपकी बात करवाने की कोशिश कर सकता हूँ। मैं पूरी तैयारी से आया हूँ।'
मुझे उम्मीद थी कि दोनों दीदी मेरे इस प्रस्ताव को सुनकर उछल पड़ेंगी, आश्चर्यचकित होंगी और किसी आत्मा के आह्वान के लिए उत्सुक-अधीर होकर मुझे इस अनुष्ठान की स्वीकृति देंगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। दोनों की शक्ल पर आश्चर्य का कोई भाव भी नहीं था। उन्होंने धैर्यपूर्वक मेरे सारे अनुभव सुने थे। मधु दीदी ने तो बीच-बीच में कुछ जिज्ञासाएँ भी प्रकट की थीं, लेकिन बड़ी दीदी गंभीरता से सारा वृत्तांत सुनती रहीं, कुछ बोलीं नहीं। मैं संकोच में पड़ा सोचने लगा कि मैंने नाहक ही अतिउत्साह में यह प्रसंग उन दोनों के सम्मुख छेड़ दिया। तभी श्री दीदी ने मधु दीदी से कहा--'मधु, वह पेंटिंग तो लाओ, उसे आनंद को दिखाऊँ तो सही…!' मैं सोचने लगा, मेरे प्रस्ताव से किसी पेंटिंग का भला क्या सम्बन्ध हो सकता है…?
मधु दीदी पल भर में कार्डबोर्ड का एक आयताकार टुकड़ा लेकर लौटीं। श्रीदीदी ने वह पेंटिंग मुझे दिखाकर पूछा--'देखो, कितनी सुन्दर कलाकृति है यह।' मैं सम्भ्रम में पड़ा था, थोड़ा अंटकते हुए बोला--'हाँ, अच्छी तो है, किसने बनायी है?' मेरा उत्तर सुनकर दोनों दीदियाँ हँसने लगीं। मैंने इस अकारण हँसी का कारण पूछा तो बड़ी दीदी ने कार्डबोर्ड का पृष्ठभाग मेरे सम्मुख कर दिया, जिसे देखकर मैं आश्चर्यचकित रह गया। वह तो प्लेनचेट बोर्ड था। उस पर वही सब लिखा था, जो मेरे बोर्ड पर अंकित था। मैं दीदियों को चकित करने का इरादा लेकर गया था और खुद चकरा गया। मैं लपककर बारामदे में गया और साइकिल के करियर से अपना बोर्ड निकाल लाया। उसे मैंने दीदियों को दिखाया। मधु दीदी बोलीं--'फिर तो आत्माओं के आह्वान की हमारी-तुम्हारी पद्धति एक ही है।'
श्री दीदी और मधु दीदी ने मिल-जुलकर मुझे बताया कि वे दोनों तो बहुत समय से आत्माओं से संपर्क करती रही हैं। मधु दीदी ने पूछा--'तुमने ये गुर कहाँ से सीखा?' उनके इस प्रश्न पर मुझे मौन ही रहना था या झूठ बोलना था; लिहाज़ा मैंने चुप रहना ही उचित समझा। थोड़ी और बातों के बाद मैंने श्री दीदी से यह जानना चाहा कि उन्होंने पराजगत में प्रवेश करना कैसे सीखा, तो उन्होंने भी सीधा उत्तर न देकर बस इतना कहा--अरे, मैं और मधु तो बहुत समय से यह संपर्क-साधन कर रहे हैं। चलो, आज तुम्हारे साथ भी प्लेनचेट करते हैं।'... अपने-अपने मौन में हम तीनों समझ गए थे कि कोई भी गुरु-भेद का रहस्य खोलना नहीं चाहता।
बहरहाल, रात के बारह के बाद ही हम तीनों हाथ-पैर-मुँह धोकर बोर्ड पर बैठे। आत्मा का आह्वान हुआ। मधु दीदी माध्यम बनीं, सबसे पहले उन्होंने अपने पिताजी (स्व. हरिशंकर विद्यार्थीजी) को आवाज़ें दीं, फिर अपनी माताजी (श्रीमती रमा विद्यार्थीजी) को। बारी-बारी से दोनों आये और लम्बी बातें हुईं। उस रात करुणा, भावुकता और विह्वलता की ऐसी त्रिवेणी बही कि हम तीनों उसमें डूबते-उतराते रहे--एक दूसरे को ढाढ़स बंधाते, सांत्वना देते, संतुलित करते हुए। श्री दीदी अत्यधिक कोमल मन की थीं--सरल, सहृदया। मधु दीदी अपेक्षया अधिक सबल थीं, लेकिन बातें करते हुए बड़ी दीदी का कातर हो जाना मधु दीदी से देखा नहीं जाता था, वह भी भाव-विगलित हो जाती थीं। बिछुड़े हुए प्रियजनों से संवाद सचमुच हमें निरीह बना देता है। और उस रात यही हुआ था।
यह बैठक रात के तीन बजे तक चली। हम सभी अपने-अपने बिस्तर पर गए, नींद किसी को नहीं आ रही थी। बड़ी दीदी यह पूछते हुए कि 'मधु, तुम सो गईं क्या?' ड्राइंग रूम के सोफे पर आकर बैठ गईं। मधु दीदी भी उठकर वहीं आ गईं और बोलीं--'अरे, नींद कहाँ आ रही है!' दोनों दीदियों की बात सुनकर मैं भी उनके पास जा बैठा। श्री दीदी पुराने किस्से सुनाने लगीं और माता-पिता की चर्चा करते हुए फिर उद्विग्न होने लगीं। मधु दीदी ने उन्हें वर्जना देते हुए कहा--'अब तुम फिर शुरू मत हो जाना।' बड़ी दीदी ने उन्हें रोक दिया--'खैर, तुम तो रहने ही दो, जानती हूँ कितनी बहादुर हो तुम।' मधु दीदी चाय बनाने किचन में चली गईं। सुबह की चाय हमने साढ़े चार बजे पी और तबतक हमारी बातें परलोक चर्चा की परिधि में ही घूमती रहीं।मेरी इन चर्चाओं में दोनों दीदियों का भी बहुत बड़ा हिस्सा है। वे दोनों मुझसे अधिक अनुभवी थीं। उन्होंने दीर्घकाल तक ध्यान-साधन कर इसमें अच्छी गति पायी थी। उनसे भी इस विधा का मैंने यथेष्ट ज्ञान प्राप्त किया था। चालीस दुकान वाली आत्मा की हठधर्मी की बात सुनकर श्री दीदी ने ही मुझे सावधान किया था कि ऐसी आत्माओं दूरी बनाकर रखूं और यदि वे बलात आ धमकें तो यथाशीघ्र उन्हें वापस भेजने का यत्न करूँ। मेरे यह पूछने पर कि 'और अगर वह न जाना चाहे तो…?' बड़ी दीदी ने कहा था--'ऐसी स्थिति में माध्यम को अपने शरीर को कष्ट पहुँचाना होता है, जैसे दीपक की लौ पर अपनी हथेली रखना अथवा प्रज्ज्वलित अग्नि के अंगारे से शरीर को दाग देना।'
बाद के दो वर्षों में ये सिलसिला कुछ यूँ चल निकला कि पाँच दिनों तक मैं अपने बैचलर क्वार्टर पर धूनी रमाता और सप्ताहांत के एक दिन तिलक नगर में दीदियों के आवास पर, उनके सान्निध्य में, अलख जगाता। दीदियाँ इतना स्नेह करनेवाली महिलाएं थीं कि उनके अप्रतिम स्नेह को शब्दों में बाँधना मेरे लिए निःसंदेह कठिन है। बड़ी दीदी के पास कचहरी का बहुत सारा काम होता, वह व्यस्त रहतीं। सोमवार की सुबह मुंशी, पेशकार, टंकक उनके घर के दफ्तर पर फाइलें लेकर आ जाते और बड़ी दीदी मसरूफ हो जातीं; लिहाज़ा सप्ताहांत की बैठक ज्यादातर शनिवार की रात होतीं। मधु दीदी अपने महाविद्यालय से लौटतीं तो किसी भी बंधन से मुक्त होतीं। वह मुझसे थोड़ी ही बड़ी थीं। प्रांजल गद्य और छंदमुक्त नयी कविताएं लिखतीं। उन्हें मैं अपनी रचनाएं सुनाता और वह अपनी। अध्ययन, अध्यापन और लेखन उनकी आजीविका भी था और गहरी रूचि का हिस्सा भी। हम दोनों भाई-बहन तो थे ही, अच्छे मित्र भी बन गए थे। कानपुर -प्रवास के वे दो वर्ष अविस्मरणीय हैं। अविस्मरणीय है उनका स्नेह-सान्निध्य, प्रगाढ़ आत्मीयता और अनन्य प्रीति।
वक़्त कितनी तेजी से निकल जाता है, मौसम के रंग कब, कैसे बदल जाते हैं, नेह के बंधन अचानक टूट क्यूँ जाते हैं, इसे समझना कठिन है। संभव है, आज मेरी वे दोनों दीदियाँ स्वयं मेरी पुकार की प्रतीक्षा में हों कि मैं एक आवाज़ तो दूँ उन्हें! और, वे आ जाएँ मेरे बोर्ड पर, उतर आएँ मेरे शीशे के ग्लास में और मुझसे कहें अपने दुःख-शोक…! मैं हूँ कि अब किसी को आवाज़ नहीं देता। स्वयं समझ नहीं पाता कि अब निष्ठुर हो गया हूँ या बेज़बान ....!
इसे विधि का विधान कहूँ या दुर्योग की काली छाया, समझ नहीं पाता। सात वर्ष पहले एक दिन अचानक मुझे मधुलेखा दीदी के अवसान (११-६-२००८) की सूचना मिली थी। मैं पटना से कानपुर गया था और शोक-संतप्त श्रीदीदी से मिलकर भारी मन से लौट आया था। छोटी बहन का विछोह श्रीदीदी का कोमल और भावुक मन सह न सका। मधु दीदी को गुज़रे अभी एक वर्ष पूरा होने में दो दिन बचे ही थे कि श्रीदीदी के निधन (११-६-२००९) का मर्मन्तुद समाचार मिला। वह भी अपनी छोटी बहन के पास चली गईं, जिनमे उनके प्राण बसते थे। मनुष्य ऐसी मारक पीड़ा आजीवन सहने को कितना अभिशप्त है ? कितना विवश? अपनी किसी कविता में मैंने लिखा था--
"तुम उस डाली के फूल
जिसके नीचे बैठ कभी
मैंने अपनी थकन मिटाई
और कभी छाती में अपनी
शुद्ध-सुगन्धित हिम-शीतल-सी
वायु भरी थी,
जाने विधि की क्या इच्छा थी
औचक क्यों टूटी वह डाली
अभी हरी थी.....!"
[क्रमशः]
{चित्र-परिचय : 1. श्रीलेखा विद्यार्थी, 2. मधुलेखा विद्यार्थी]

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