शुक्रवार, 13 नवंबर 2015

मेरी परलोक-चर्चाएँ... (१८)

[जब मूर्तिमान अवसाद आँसुओं से धुल गया था ... ]

२०-२५ दिनों से प्लैन्चेट का बोर्ड उदास पड़ा था। मैं भी शाही की इच्छा-पूर्ति में चाहे-अनचाहे उनका साथ दे रहा था। लेकिन कई बार मन बेचैन हो उठता था, लगता था एक समूची दुनिया के व्यग्र लोग मेरी प्रतीक्षा में होंगे और मैं अपने द्वार बंद किये बैठा हूँ। ख़ास तौर से चालीस दुकानवाली की फिक्र मुझे हलकान करती। मैं जानता था, वह मुझसे बहुत नाख़ुश होगी और बोर्ड के बिछते ही आ धमकेगी और खूब झगड़ेगी। कभी-कभी रात में सोते हुए अचानक पूरे शरीर में सिहरन होती, कभी लगता कोई मुझे झकझोर कर जगा रहा है। इन विचित्र अनुभवों के बाद भी मैंने मन को बांधे रखा था, लेकिन अब तो उठ खड़े होने का समय आ गया था। अगले रविवार के पहले ही शाही को मुझे अपने प्रभाव और विश्वास में लेना था। यह बहुत मुश्किल तो नहीं था, लेकिन चाहता था, शाही साथ हों और उनकी सहमति भी; क्योंकि शैलेन्द्र के मित्र तो वही थे।
एक शाम मैंने बात उनके सामने पसारी, लेकिन उसे आवरण में भी रखना था और यही कठिनाई थी। रविवार की शाम के लिए अंततः मैंने उन्हें मना ही लिया, बिना विस्तृत विवरण दिए। वह महज़ इतना ही जान सके कि शैलेन्द्र की किसी समस्या के समाधान के लिए मुझे वहाँ प्लैन्चेट करना है। उन्होंने इतना भर कहा--'देखो, पूरी रात का इंतज़ाम मत कर देना। ११ बजे शुरू करना और घंटे-भर में उसका काम निबटा देना, ताकि रात में सोने का वक़्त मिले। कल दफ़्तर भी तो है।' मैंने उन्हें विश्वास दिलाया कि ऐसा ही करूँगा।
दो दिन बाद रविवार भी आ पहुंचा। मैंने अपना झोला तैयार किया और शाही के साथ आर्यनगर पहुंचा। शैलेन्द्र व्यग्रता से प्रतीक्षा करते मिले। मिलते ही उत्साह से बोले--'तुम तैयारी से आये हो न?' मेरे हामी भरते ही बोले--'मैंने भी घरवालों को राज़ी कर लिया है किसी तरह, लेकिन पिताजी का पता नहीं कि वह इसे स्वीकार करेंगे या नहीं! हाँ, छोटे भाई का एक पासपोर्ट साइज का चित्र भी खोज निकाला है मैंने!'
मैंने कहा--'ठीक है, मेरा झोला ले जाओ और अपने घर में सुरक्षित रख दो। अभी वक़्त है, उचित समय पर चलेंगे तुम्हारे घर!'
मेरा झोला लेकर शैलेन्द्र अपने घर गए। आर्यनगर के मुख्य मार्ग पर तिराहे के एक कोनेवाले दुमंजिले मकान के ऊपरी तल पर उनका आवास था। वह शीघ्र ही झोला रखकर लौट आये। शैलेन्द्र के पिताजी अनुशासनप्रिय व्यक्ति थे, अतः थोड़े कठोर भी प्रतीत होते थे। माता तो सबकी माता-जैसी ही थीं--सरल और स्नेही; लेकिन जीवन में मिले कठोर आघात से उन्होंने भी अप्रसन्नता की एक चादर ओढ़ रखी थी और उनकी अप्रसन्नता अपने ही ज्येष्ठ पुत्र से थी, जो स्पष्ट दृष्टिगोचर होती थी।
बहरहाल, रात ११ बजे तक बाजार-भ्रमण के बाद हम (मैं और शाही) शैलेन्द्र के घर की सीढ़ियों पर चढ़े। ड्राइंग रूम के सोफे किनारे खिसका दिए गए थे और मध्य में जो स्थान निकल आया था, उसमें दरी और कालीन बिछा दी गई थी। अगरबत्तियाँ वहाँ पहले से ही जल रही थीं। कक्ष को देखने से ही पता चलता था कि शैलेन्द्र ने इस अनुष्ठान के लिए परिश्रमपूर्वक सारी व्यवस्था की है। मैं घर के वाश-रूम में गया, अपने हाथ-पैर धोकर मुंह पर पानी के छींटे मारे और सिल्क की अपनी धोती बाँधकर बाहर आया। घर के कई लोग वहाँ उपस्थित थे, जिसमें शैलेन्द्र की माताजी भी थीं, हाँ पिताजी वहाँ नहीं दिखे। इतने लोगों की उपस्थिति में आत्मा के आह्वान का यह पहला मौका था। संभवतः इसी कारणवश थोड़ी घबराहट भी थी। खैर, बोर्ड को मध्य में स्थापित कर मैंने कुछ धूप-बत्तियाँ जलाईं और शैलेन्द्र के अनुज के छोटे-से चित्र पर ध्यान केंद्रित करने लगा, जैसे ही तादात्म्य स्थापित हुआ, मैंने गहरे ध्यान में जाने की चेष्टा की; लेकिन पता नहीं, वहाँ क्या व्यवधान था कि मेरे ध्यान की लय प्रगाढ़ नहीं हो पा रही थी। लगातार आधे घंटे तक किया हुआ प्रयास निष्फल हुआ जाता था और अंततः मैंने हथियार डाल दिए। इससे भला मुझे तो क्या निराशा होनी थी, लेकिन मैंने देखा वहाँ एकत्रित परिवार-जनों को घोर निराशा हुई। ऐसी ही निराशा के लक्षण मैंने शैलेन्द्र के चेहरे पर भी देखे। लेकिन आत्मा को बुलाने की ज़िद पर अड़े रहने से कोई लाभ नहीं था। मैं यह कहते हुए बोर्ड से उठ खड़ा हुआ कि 'रात बारह के बाद एक बार फिर प्रयास करूँगा।'
मैंने फिर अपने वस्त्र बदले और दोनों मित्रों के साथ सीढ़ियाँ उतर आया। बाजार बंद हो चुका था, लेकिन पान-सिगरेट की दूकान अभी खुली थी। हम तीनों ने एक-एक सिगरेट सुलगाई और बातें करते भीड़-विहीन होती सड़क पर बढ़ चले। शैलेन्द्र की आतुर जिज्ञासा का अंत नहीं था और मैं उन्हें धैर्य धारण करने की सलाह दे रहा था। साढ़े बारह बजते ही हम वापस लौटे और थोड़ी देर में ही शैलेन्द्र के कक्ष में पहुँच गए। फिर वही क्रिया, वही वस्त्राचार हुआ और मैं बोर्ड पर आ बैठा। धूपबत्तियाँ फिर जलाईं और शिद्दत से भरी एक पुकार के लिए स्वयं को अनुशासित करने को तत्पर हुआ कि खिड़कियों पर दृष्टि गई, वे सब बंद थीं, सिर्फ सीढ़ियों से नीचे ले जानेवाला द्वार खुला था। मैंने शैलेन्द्र से सारी खिड़कियाँ खोल देने को कहा। पहले प्रयत्न के वक़्त जितने लोग उपस्थित थे, उनमें से कई लोग अब वहाँ नहीं थे।
रात गुमसुम हो गई थी, सर्वत्र नीरव शान्ति थी, माहौल बन चुका था। ध्यानस्थ होकर मैंने पुकार भेजी। मेरी पहली पुकार पर ही छोटे भाई की आत्मा आ पहुँची। उसने मुझे कुछ पूछने का अवसर भी नहीं दिया, शैलेन्द्र को सम्बोधित करते हुए स्वयं बोल पड़ी--'दादा, देखिये मैं आ गया हूँ !'
बोर्ड पर आया यह उत्तर जैसे ही कागज़ पर उतरा, उपस्थित सारे लोग चौकन्ने हो गए। उसके बाद तो बातों का जो सिलसिला चल पड़ा, वह रुकने का नाम न लेता था। बोर्ड पर मैं, शाही और शैलेन्द्र बैठे थे और किनारे के सोफों पर घर के कुछ लोग। मैंने छोटे भाई की आत्मा से पूछा--'तुम्हारी मृत्यु का कारण क्या था?'
आत्मा ने कहा--'मेरे सिर में असहनीय पीड़ा थी और गले में सिर को सम्हाले रखने की शक्ति नहीं रह गई थी। मैं इन स्थितियों से उबर नहीं पा रहा था और मेरी चेतना लुप्त होती जा रही थी। अस्पताल जाते हुए मार्ग में ही मैं मृत्यु का ग्रास बन गया था।'
मैंने पूछा--'तुम तो छत पर पतंग उड़ाने गए थे न?'
आत्मा ने हामी भरी, तो मैंने पूछा--'वह तो शाम का वक़्त था?'
आत्मा ने उत्तर दिया--हाँ, लेकिन अँधेरा तब तक हुआ नहीं था, बहुत उजाला था, वह ४-५ के बीच का वक़्त रहा होगा।'
मैंने आत्मा से निवेदन किया--'उस शाम की पूरी बात विस्तार से बताओ, हम सभी सुनना चाहते हैं।'
बातें अभी हो ही रही थीं कि मैंने देखा, शैलेन्द्र के पिताजी बैठक में आये और सोफ़े के एक कोने पर चुपचाप बैठ गए। घर का कोई सदस्य उन्हें बिस्तर से उठा लाया था।
आत्मा ने अपनी बात जारी रखी--'छत के एक छोर पर दादा और दूसरे छोर पर मैं अपनी पतंगें उड़ा रहे थे। खूब मज़ा आ रहा था। तभी मैंने देखा, एक कटी पतंग की डोर हमारी छत से थोड़ी ऊँचाई पर हवा में तैरती जा रही थी। डोर को पकड़ लेने के लिए मैं छत की मुंडेर पर चढ़ गया। दादा एक पतंग से पेंच लड़ा रहे थे। उनका ध्यान मेरी तरफ नहीं था। मुंडेर पर चढ़ने के बाद भी उस पतंग की डोर मेरी पहुँच से बस थोड़ी ही ऊपर थी। मैं उसे थाम लेने के लिए जैसे ही उचका, मेरा पैर लड़खड़ा गया था और मैं नीचे गिर पड़ा था।'
इतना कहकर आत्मा खामोश हो गई थी और मैंने अगला प्रश्न किया था--'लेकिन घर-भर के लोग तो यही समझते हैं कि शैलेन्द्र और तुम्हारे बीच डोर पकड़ने की होड़ मची होगी और इस धक्का-मुक्की में तुम नीचे जा गिरे होगे। सत्य क्या है, हमें बताओ।'
आत्मा जैसे बाद के वर्षों का सूक्ष्मता से अवलोकन करती रही हो और सारी स्थितियाँ उसे ज्ञात हों, वह तत्क्षण बोली--'यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि मेरी मौत के लिए दादा को दोषी ठहराया जाता रहा है। मुंडेर पर मुझे लड़खड़ाता देख दादा अपना माँझा फेंककर दौड़े आये थे, उन्होंने मुझे थाम लेने के लिए अपना हाथ भी बढ़ाया था, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी।'
मैं तो इस क्रिया-विधि में एकाग्रता से लगा हुआ था, मेरा ध्यान वहाँ उपस्थित लोगों पर नहीं गया था। अचानक मैंने रुँधी हुई आवाज़ में शैलेन्द्र की सिसकियाँ सुनीं, तो आखें उठकर देखा--कक्ष में जितने लोग थे, सभी रो रहे थे। शैलेन्द्र की माताजी आँचल से बार-बार अपनी आँखें पोंछ रही थीं। वहाँ अवसाद मूर्तिमान था। मैंने वर्जना दी--'आपलोग इस तरह विलाप मत कीजिये, इससे आत्मा को कष्ट होगा। आपलोग अपने मन को शांत-स्थिर कीजिये।'
अचानक मेरा गिलास बोर्ड पर स्वतः चल पड़ा और आत्मा ने अपनी माता को सम्बोधित करते हुए कहा--'माँ, आप दुःख मत कीजिये। आपके पास बस उतने ही दिन मुझे रहना था। मेरा पुनर्जन्म भी हो चुका है और मैं वहाँ खुश हूँ। मेरी मृत्यु के लिए दादा को दोष मत दीजिये। मेरे चले जाने में उनकी कोई भूमिका नहीं है।'
यह सुनकर तो कमरे में रुदन और विलाप का फव्वारा फूट पड़ा, जिसे सँभालना मेरे लिए कठिन था। मैंने शैलेन्द्र से कहा, 'सबों को चुप कराओ भाई। आत्मा के लिए यह स्थिति बहुत पीड़ादायी है!' शैलेन्द्र सबों को चुप हो जाने को कह रहे थे और स्वयं रोते जा रहे थे। एक अजीब स्थिति वहाँ उत्पन्न हो गई थी। मैंने बात को जारी रखना ही उचित समझा। मैंने उस बालक की आत्मा से पूछा--'छत से गिर जाने के बाद तुमको कैसे और किस अस्पताल ले जाया गया था ?'
आत्मा बोली--'मुझे एक रिक्शे पर लेकर लोग भागे थे। मुझे अमुक अस्पताल (नाम अब विस्मृत हो गया है) ले जाया गया था, लेकिन बीच रास्ते में ही मैं शरीर छोड़कर बाहर आ गया था। मैंने देखा, दादा बदहवास-से रिक्शे के पीछे दौड़ते आ रहे हैं। मेरे मन में हुआ कि उनसे कहूँ कि अब दौड़ना बेकार है, मुझे घर वापस ले चलो। मैं पूरी शक्ति से चिल्लाया भी; लेकिन मेरे शब्द हवा में घुल गए, स्वर गूँजे नहीं।… '
आत्मा का यह वक्तव्य पूरे परिवार को दुखी और आर्त्त बना गया था। रुदन एकबार फिर फूट पड़ा था। शैलेन्द्र के पिताजी आँखें पोंछते हुए उठ खड़े हुए और धीरे-धीरे अंदर चले गए। मैंने भी आत्मा को अब विदा कर देना ही उचित समझा और उससे पूछा--'क्या तुम लौट जाना चाहोगे अब?' आत्मा ने कहा--हाँ, लेकिन जाने के पहले मुझे दादा से यह कहना है कि वह मेरे लिए दुखी न रहा करें और न माँ-पिताजी से नाराज़। अब वही हैं उनका ख़याल रखने को। बस, यही इतना...।'
यह कहकर ग्लास बोर्ड के मध्य में जा ठहरा। मैंने आत्मा को वापस भेज दिया और इसे सुनिश्चित करके ग्लास को सीधा करके बोर्ड पर रखा और उठ खड़ा हुआ।
मुझे आश्चर्य हुआ, कोई किसी से कुछ नहीं बोला, सब मौन, सब अवसाद से आकंठ भरे हुए--गुमसुम! और सबकी आँखें नम... !
शाही ने कहा--'बहुत रात हो गई है और कल के ऑफिस के कारण जूही लौटना भी है। चलो, अब चलें।' मैंने अपना ताम-झाम शीघ्रता से समेटा और नीचे खड़ी साइकिल के पास पहुंचे।शैलेन्द्र हमें छोड़ने नीचे तक आये थे। उन्होंने हम दोनों को अपनी दो बाहों में समेट लिया था और फूट-फूटकर पड़े थे।.... उस रात घनीभूत अवसाद को आँसुओं ने धो दिया था।...
(क्रमशः)

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (15-11-2015) को "बच्चे सभ्यता के शिक्षक होते हैं" (चर्चा अंक-2161)    पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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बालदिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक