गुरुवार, 23 जून 2016

पर्वतीय प्रदेश में ठहरी साँसों का हसीन सफर...

तब हिन्दुजा बंधुओं की सेवा में था। सन १९७९ के अंत में राजकमल प्रकाशन, दिल्ली के सम्पादकीय विभाग की नौकरी छोड़कर मैं ज्वालापुर (हरद्वार) में अशोका प्लाईवुड ट्रेडिंग कंपनी में एडमिनिस्ट्रेटर के पद पर बहाल हुआ था। पांच-छह महीने ही हुए थे कि मुंबई के प्रधान कार्यालय से मुझे एक हरकुलियन टास्क मिला। और वह आदेश भी श्रीचंद पी. हिंदुजाजी का था, जिसकी अवमानना नहीं की जा सकती थी।

बात दरअसल यह थी कि इंग्लैंड में हिंदुजाजी का एक गढ़वाली पाकशास्त्री था। वह कई वर्षों से विदेश में, उन्हीं की सेवा में, तत्पर था और गाँव पर उसकी पत्नी बहुत बीमार थी। इसीसे वह बार-बार छुट्टी की अर्ज़ी दे रहा था और स्वदेश आकर रुग्ण पत्नी की चिकित्सा करवाना चाहता था। हिंदुजाजी के लिए यह असुविधाजनक था। उनका मुझे स्पष्ट आदेश था कि मैं स्वयं उस कुक के गांव-घर चला जाऊँ। उसकी सहधर्मिणी अगर बहुत बीमार हो तो किसी परिजन के साथ उसे हरद्वार ले आऊं और किसी अस्पताल में उसके इलाज़ की व्यवस्था करवा दूँ। पाकशास्त्री के गाँव-घर का पता-ठिकाना उन्होंने मुझे भेज दिया था। अविलम्ब कार्रवाई वांछित थी। लेकिन जो पता मुझे मिला था, उसे आसानी से समझ पाना कठिन था। बहुत अनुसंधान से ज्ञात हुआ कि हरद्वार से कोटद्वार, कोटद्वार से दुगड्डा, दुगड्डा से भिर्गुखालपाथीमाला और भिर्गुखालपाथीमाला से पहाड़ों की लम्बी पदयात्रा करके बागोड़गाँव पहुँचना था मुझे। इस अनुसंधान के बाद यात्रा-पथ निश्चित हुआ।

दूसरे ही दिन, रात की गाड़ी (ट्रेन) से मैंने कोटद्वार के लिए प्रस्थान किया। सुबह-सबेरे कोटद्वार पहुँचा। वहाँ से बस लेकर दुगड्डा पहुँचा। दुगड्डा पहुंचकर गाड़ी बदलनी थी। पहाड़ों पर जानेवाली गाड़ियां अपेक्षाकृत छोटे आकार-प्रकार की और कम सवारियाँ ढोनेवाली होती हैं। ऐसे ही एक छोटे वाहन पर मैं सवार हुआ और चल पडा भिर्गुखालपाथीमाला की ओर ! पहाड़ों की यात्रा का वह मेरा पहला और रोमांचक अनुभव था। हमारी छोटी-सी लॉरी उत्तुंग शिखरों को अपने सर्पिल पाश में बाँधती ऊँचाइयाँ चढ़ती जा रही थी और मैं भय-जड़ित पखेरू-सा यात्रा कर रहा था। पतली सड़क के एक ओर ऊँचे पहाड़ों और दूसरी ओर गहरी खाइयों पर दृष्टिपात करते हुए भी भय होता था। लेकिन प्रकृति की उद्दाम सुंदरता को निहारने का लोभ भी प्रबल था--मैं अधखुली आँखों से कभी दायीं ओर देखता, तो कभी बायीं ओर। प्रकृति-नटी रूपसि-सी नज़र आती थी सर्वत्र, और मैं मन्त्रमुग्ध हुआ जाता था। मन में एक कविता उपजने लगी, लेकिन उछलती-मचलती लॉरी में उसे लिख पाना आसान नहीं था। कविता की पंक्तियाँ मन में सँजोता मैं आगे बढ़ता रहा।

दोपहर दो बजे भिर्गुखालपाथीमाला पहुँचा। अगला चरण पद-यात्रा का था। भिर्गुखालपाथीमाला में उल्लेखनीय कुछ भी नहीं था। बस, सड़क के दोनों किनारों पर बहुत छोटी-छोटी पत्थरों से बनी दुकानें थीं, जिनमें प्रवेश करते हुए नत-मस्तक होना पड़ता था। दिन चढ़ आया था, भूख लग रही थी, सोचा कुछ खा लूँ, फिर पद-यात्रा शुरू करूँ। मैं अपने झोले में ब्रेड-बटर और बिस्कुट घर से लेकर चला था। सामने की लघ्वाकार एक दूकान में सिर झुकाकर प्रविष्ट हुआ। दुकानदार भाई सेवा को तत्पर मिले...! पूछने लगे--"क्या चाहिए शाब? कहाँ जाना है...?"

मैंने उन्हें बताया कि ब्रेड मेरे पास है, खा लूँगा तो एक कप चाय चाहिए होगी। लेकिन दुकानदार भाई तो मुझ ग्राहक की आवभगत 'अतिथि देवो भव' की भावना से कर रहे थे, बोले--"हाँ शाब, आप ब्रेड खा लो, मैं चाय बनाता हूँ !" मैंने अपने बुद्धिजीवी झोले से ब्रेड निकली, तो पाया कि उससे दुर्गन्ध आ रही है। मैंने दुकानदार भाई से कहा--"भाई, ब्रेड तो खराब हो गयी है! मैं दो-चार बिस्कुट ही खा लेता हूँ, आप चाय बना दें !"
दुकानदारजी तो व्यग्र हो उठे। कहने लगे--"ऐशा कैशे चलेगा शाब? नहीं-नहीं, खड़ी चढ़ाई है, मिहनत का लम्बा राश्ता है, पेट भरे बिना कटेगा नई ! मेरी रसोई तैयार है, आज आपके लिए ही शायद कुछ ज़्यादा बन गयी लगती है।" मेरी लाख मनाही के बाद भी उन्होंने एक थाली में कोदो का हलुवेनुमा भात और पीली कढ़ी-सा कोई तरल पदार्थ परस दिया। उसे प्रेम का प्रसाद समझ मैंने खाना शुरू किया तो पांच-सात मिनट में थाली साफ़ कर दी, जबकि वह खाद्य पदार्थ अप्रिय-दर्शन लगा था मुझे..! वह इसरार करके थोड़ा और लेने की ज़िद पर उतरे तो मैंने मना कर दिया। तृप्त हो चुका था मैं...! मैं अपनी थाली धोने चला, तो उन्होंने झपटकर थाली मुझसे ले ली और कहा--"इतनी सेवा का मौका हमें भी दो शाब !"

पाँच मिनट में ही भाई ने भर-गिलास चाय मेरे सामने रख दी। चाय अभी समाप्त भी नहीं हुई थी कि दुकानदार भाई झपटते हुए अपनी दूकान से बाहर निकले और अपनी पहाड़ी भाषा में चिल्लाकर किसी खच्चरवाले से बातें करने लगे। मैं भी चाय का गिलास लिए उनके पीछे गया ! दूर, पहाड़ की पथरीली राह पर एक खच्चरवाला ठहरा हुआ था और दुकानदार भाई के प्रश्नों के उत्तर उच्च स्वर में दे रहा था। मैंने अनुमानतः जान लिया कि दुकानदार भाई मेरी ही हितचिन्ता में लगे हुए हैं। अपनी वार्ता समाप्त करके दुकानदार भाई मुझसे मुख़ातिब हुए, कहने लगे--"शाब, इसके साथ चले जाओ। यह बागोड़गाँव के आधे रास्ते तक आपके साथ जाएगा, फिर किसी और के साथ आपको लगा देगा, मैंने कह दिया है।"
मैंने अपना झोला उठाया, भोजन और चाय का पैसा देने लगा तो दुकानदार भाई हाय-तौबा करने लगे ! बहुत आरज़ू-मिन्नत के बाद उन्होंने चाय की अठन्नी लेना स्वीकार किया ! भोजन के नाम पर एक पैसा भी पकड़ना उन्हें अपमानजनक लग रहा था। मैंने बहुत-बहुत आभार व्यक्त किया और नमस्कारोपरांत विदा हुआ।

अब खच्चरवाले भाई का साथ था और लम्बा पथरीला, खड़ी चढ़ाई का रास्ता ! पहाड़ों की धूप बहुत प्रखर होती है, शरीर को दग्ध करती लगती है। बहरहाल, मैं खच्चरवाले बन्धु के साथ चल पड़ा। अभी दो फर्लांग ही बढ़ा था कि पसीने-पसीने हो गया और मेरी श्वास-गति भी तेज हो गयी। खच्चरवाले के हाथ में एक छाता था, उसे मुझे देते हुए वह बोला--"छाता ले लो शाब, आपको दूर तक जाना है !"
मैंने संकोच करते हुए कहा--"लेकिन आप...?
उसने कहा--'हमें तो रोज़ की आदत है, हम छाते के बिना भी चल लेंगे।"

अपना छाता उसने बलात मुझे पकड़ा दिया। छाते की छाया में दुश्वारियाँ कम हो गयीं। हम दोनों थोड़ी-थोड़ी बातें करते आगे बढ़े। लम्बी दूरी तय करके हम एक पहाड़ के शीर्ष पर पहुँचे, जहाँ थोड़ी समतल भूमि थी, शिवजी का छोटा-सा मंदिर था और एक बड़े घड़े में शीतल पेय-जल रखा था। उस सुस्वादु-मीठे जल को पीकर सूखे कंठ को बड़ी राहत, बहुत तृप्ति मिली। मंदिर में मत्था टेककर हम फिर आगे बढ़े। हम एक पहाड़ लाँघ चुके थे, अब दूसरे पहाड़ की चढ़ाई पर थे। दूसरे पहाड़ के शीर्ष पर पहुंचने के थोड़ा पहले ही एक दोराहे पर पहुँचकर खच्चरवाला ठहर गया। नीचे जाते एक रास्ते ही ओर इशारा करते हुए मुझसे बोला--"शाब, मुझे वहाँ, उस गाँव जाना है। कोई संगी-साथी तो दिखता नईं, आप ये रास्ता पकड़ लो शाब ! बीच-बीच में आपको खच्चरवाला रास्ता भी मिलेगा, उस पर मत मुड़ जाना ! यही चौड़ा रास्ता पकड़कर चलते चले जाना। वो जो अगला पहाड़ दिखता न, उसके परली पार जब आप उतरोगे तो दूर से ही दिखने लगेगा बागोड़गाँव। बस, रास्ता भटकना मत शाब, उसमें खतरा है।"

मैंने खच्चरवाले भाई को उसकी छतरी लौटा दी, आभार व्यक्त किया और उसकी बताई राह पर चल पड़ा--तनहा...! धूप की तीक्ष्णता कम हो गयी थी, रास्ता तय करना सहल था। देखने से भी लगता था कि अगला पहाड़ तो बस बगल में खड़ा है, शीघ्र उसके पार पहुँच जाऊँगा। लेकिन जितना नज़दीक वह दीखता था, उतना समीप वह था नहीं। लम्बी मशक़्क़त की दूरी थी वह। मैं खच्चरों की राह से बचता हुआ आदमी की राह पर चलता रहा ! अब मैं था, मेरा झोला था, मेरी सिगरेट थी और जनशून्य मार्ग था। पथरीली पगडण्डी पर धुआँ उड़ाता और मुकेशजी का एक गीत 'सुहाना सफर और ये मौसम हँसी' गाता, मैं चल पड़ा।...

अपनी ही धुन और मस्ती में जाने कब मुझे विभ्रम हुआ और मैं मार्ग से भटक गया। मनुष्य-मार्ग मुझसे पीछे कहीं छूट गया था और मैं खच्चरों की राह पर, पता ही नहीं कब, आगे बढ़ आया था ! पीछे लौटना भी मुहाल था। समझ में आने लगा कि खच्चरों की राह अधिक ऊबड़-खाबड़ है, लेकिन अब कोई उपाय नहीं था। मैं सावधानी से आगे बढ़ता रहा। राह कठिन थी। पगडण्डी के दोनों ओर जंगल-झाड़ थे, सनसनाती हवाएँ थीं, मनोरम दृश्य था, लेकिन मन के किसी कोने में दुबका हुआ भय भी बैठा था कि कहीं कोई हिंस पशु अचानक सामने आ खड़ा हुआ तो ? क्या करूँगा मैं? माचिस की तीलियों के सिवा मेरे पास कुछ नहीं था।

सूर्य निष्प्रभ हो चला था। वह अस्त हो और अंधकार छाने लगे, इसके पहले गंतव्य पर पहुँचना जरूरी था। मैंने क्षिप्रता से चलना शुरू किया ही था कि एक तीखे मोड़ पर पाँव में ठोकर लगी और मैं संतुलित न रह सका। रामधड़ाका गिरा और ढालुवीं पथरीली ज़मीन पर फिसलने लगा। फिसलने की गति प्रतिक्षण बढ़ रही थी और मन-प्राण आतंकित हो उठा था। तभी प्रभु-कृपा हुई--तेजी से फिसलते हुए मेरे हाथों ने एक मुट्ठी जङ्गली घास को कसकर थाम लिया। गति को विराम लगा, लेकिन जंगली घास को पकड़कर अधर में झूलते हुए मैंने सिर घुमाकर जैसे ही नीचे देखा, प्राण कंठ में आ फँसे। नीचे कई सौ फ़ीट की गहरी खाई थी और मैं घास पकड़े दोलक-सा झूल रहा था। एक क्षण का और विलम्ब हुआ होता, तो मैं न जाने कहाँ होता ! बाबूजी, बहन-भाई याद आये, मायके गयी हुई पत्नी याद आईं, जो उम्मीद से थीं--ओह, आनेवाली प्रथम संतान जान भी न सकेगी कि मेरे पिता किन परिस्थितियों में काल का ग्रास बन गए...! पिता-भाई मुझे खोजते-तलाशते इन पहाड़ों की ख़ाक छानते फिरेंगे... उफ़, यह सब क्षण-भर में चक्रवात-सा मस्तिष्क में घूम गया। धमनियों का रक्त-प्रवाह रुकता और साँस ठहरी-ठहरी-सी लगने लगी। दुश्चिंताओं का अंत नहीं था, तभी लगा, किसी ने ललकारा मुझे--'अनित्य चिंतन छोड़, हिम्मत कर, ऊपर आ !'
घास की जड़ें मज़बूत थीं। उन्हें पोर-पोर पकड़कर मैं ऊपर आया, स्थिर हुआ। मैंने देखा जंगली-कटीली घास ने मेरी हथेलियों पर खरोंच के कई लंबवत रक्ताभ निशान छोड़ दिए हैं। मैंने अपनी हथेलियाँ मिट्टी में रगडीं और तब खच्चर के रास्ते पर उल्टा लौटा। दोमुँहे पर आकर मैंने दुबारा मनुष्य की राह ली। मनुष्य हूँ, तो मनुष्यता की राह चलना ही मैंने श्रेयस्कर जाना।...

(अगली कड़ी में समापन)

3 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (25-06-2016) को "इलज़ाम के पत्थर" (चर्चा अंक-2384) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Onkar ने कहा…

बहुत सजीव वर्णन

सु-मन (Suman Kapoor) ने कहा…

सुंदर वर्णन