शनिवार, 13 जून 2009

लघु-कथा

स्पर्श-भेद

भीड़ से उसका वास्ता कई बार पड़ चुका था। वह भीड़ का हिस्सा था या एक पूरी भीड़ उसमें समाहित थी, कहना मुश्किल है। वह परम संवेदनशील समझता था ख़ुद को। स्वप्नदर्शी था, गुणग्राही था, परदुखकातर था, विनयी-सुशील था और न जाने क्या-क्या था ! वह बड़ा वाचाल था, कभी-कभी बहुत चुप्पा। वह छोटी-छोटी बात पर विचारशील हो उठता, भावनाओं में बहता, तो बहता चला जाता। उसे अपनी सुध न रह जाती, क्रोधित होता तो ऋषि दुर्वासा शर्मिंदा होते। कहना न होगा कि वह सचमुच अतिवादी था। उसके साथ जो कुछ होता, अति में ही होता था। वह यारबाश आदमी था, लेकिन एकांत में अत्यन्त निस्पृह, एकाकी रह जाता--अपने मानसलोक में जाने कैसी-कैसी शिल्प-सृष्टि करता रहता।

उसे कथा-कहानी, कविता में गहरी रूचि थी। साहित्यिक गोष्ठियों में वह अनिवार्य रूप से उपस्थित होता। एक बार ऐसा हुआ कि एक साहित्यिक समारोह में, अचिंतित रूप से उसकी मुलाकात एक सुविख्यात साहित्यकार से हुयी। उसने उन्हें प्रणाम निवेदित किया। विद्वान साहित्यिक विनम्र और सुहृद व्यक्ति थे। उन्होंने उस से हाथ मिलाया और बातें कीं। जब वह समारोह से लौट रहा था, उसके मन में विचारों का भूचाल था, अनुभूति कि अजीब सिहरन थी। उसके दायें हाथ की मुट्ठी बंधी थी और उसे उसने यत्नपूर्वक अपनी जेब में रख लिया था, जैसे उसकी मुट्ठी में कोई अनमोल रत्न हो, जैसे साहित्यकार महोदय के हाथ का स्पर्श-मूल्य वह अपनी हथेलियों में सहेजे रखना चाहता हो। फिर तो कई दिनों तक उसने अपने हाथ को सामान्य कार्य-कलाप से अलग रखा और इस महनीय अनुभूति को अंदर-ही-अन्दर महसूस करता रहा।

तभी एक हादसा हो गया। वह सायकिल से भरे बाज़ार में, तेजी से चला जा रहा था कि सहसा भीख मांगनेवाली मलिनवसना एक नवयुवती ठीक सायकिल के सामने आ पड़ी। सायकिल की सीट पर बैठे-बैठे उसने अपने बाएँ हाथ से युवती के सीने पर प्रहार कर उसे परे धकेला और तेजी से आगे बढ़ गया। एकाएक उसने महसूस किया कि उसका बायाँ हाथ सायकिल से नदारद है और पैंट पर रगड़ खा रहा है, जैसे वह साफ होना चाह रहा हो। उसका मन वितृष्णा से भरा था। उसे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उसने किसी घिनौनी चीज को छू लिया है। वह विचारशील हो उठा। उसके मन में तीव्र प्रतिक्रिया हुई। सोचने लगा कि अनुभूति के धरातल पर दो अलग-अलग मानव-स्पर्श में इतना अन्तर वह क्यों महसूस कर रहा है? स्पर्श-भेद का यह विचित्र अनुभव उसे बहुत समय तक परेशान करता रहा।

2 टिप्‍पणियां:

Kishore Choudhary ने कहा…

लघु कथा मर्स्पर्शी है,

Kishore Choudhary ने कहा…

लघु कथा मर्मस्पर्शी है,