मंगलवार, 16 जून 2009

वह चलती है...

सुबह से देर रात तक

वह रोज़ चलती है पॉँच-दस मील,

चलना ही उसकी नियति है;

क्योंकि वह जानती है चलना !

उसका कोई गंतव्य नहीं है

उसका चलना अकारण भी नहीं है

और न किसी उल्लेखनीय पदयात्रा-सा है

उसका चलना,

वह चलती है;

क्योंकि उसे चलना है !

'एकला चलो रे' जैसे आदर्श वाक्यों की प्रेरणा से

वह चलती हो--ऐसा नहीं है,

ऐसा भी नहीं की चलना उसे बहुत भाता हो,

वह तो अपने छोटे-छोटे बच्चों की ममता से

कर्त्तव्य -करुणा बोध लिए

शापित सुकुमारी की तरह

रोज़ चलती है

क्योंकि अब उसे आ गया है--चलना !

चलते-चलते

देर रात तक देह बोझ हो जाती है,

उनींदी हो जाती हैं उसकी आँखें;

सुबह, बहुत तड़के जागाकर

उन्हीं विन्दुओं का स्पर्श करते हुए

फिर उसी परिधि में उसे चलना है--

इन्हीं सपनों में खो जाती है वह;

स्वप्न हो गया हो

उसका निरंतर चलना !

इतना सारा रोज़ चलने पर भी

होती हैं लोगों को उससे शिकायतें कि--

उसका चलना बेमानी है,

उसके चलते जाने से--

बिखरे ही रह जाते हैं

उद्यान में खर-पात

इधर-उधर, सर्वत्र !

कितना अराजक हो उठता है

घर में हर व्यक्ति का स्वर !

वह सब सुनती है,

सर धुनती है,

कभी-कभी डबडबा जाती हैं उसकी आँखें,

कभी चीखती-चिल्लाती भी है वह

अपने नन्हें बच्चों पर

बात-बेबात !

फिर वह चलने लगती है;

क्योंकि वह जीवित है

और समझ चुकी है कि

उसका चलते जाना ही उसके लिए

निश्चित और अन्तिम सत्य है !

सुबह से देर रात तक
वह रोज़ चलती है पॉँच-दस मील--

देहरी से दरवाजों

और कमरों से

किचन के बीच !!

6 टिप्‍पणियां:

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

सहज शब्दो में गुंथी सुन्दर रचना.स्त्रीजाति के जिस के जिस विशिष्ट कर्म की ओर आपने इन्गित किया है, मुझे लगता है,अपनी इस मशक्कत की ओर उनका(स्त्रियों का) खुद भी ध्यान नहीं गया होगा. लाजवाब.साधुवाद.

ज्योति सिंह ने कहा…

आनंद जी ,नमस्कार
आपकी सभी रचनाये उंच दर्जे की है ,पढ़ते समय आप के नाम को सार्थक करती है ,और मैं क्या कहूं ,निशब्द हूँ .

ARUNA ने कहा…

वाह बड़ी सुन्दर रचना है आनंद जी! पढ़के मनन को वाकई में आनंद आया!

ARUNA ने कहा…

और हाँ मेरे ब्लॉग में आपकी मीठी सी टिपण्णी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया!

Kishore Choudhary ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

main pravas me hun. cyber ki sharan lekar likh rshs hun ye panktiyan. aap sabon ka dhanyavad. phir milte hain.