बुधवार, 2 सितंबर 2009

दो टुकड़े ज़िन्दगी...


आदर्शों की कमरतोड़ मेहनत से खीझकर
लटक गए शब्द-शब्द वक्त के त्रिशूल पर
दो टुकड़े ज़िन्दगी बाँट दी गई
रोटी के टुकड़े-सी सुबह और शाम
उग आया एक और विराम !

कल तक जो अर्थों को रौंदते थे
गर्दिश की भीगती सभाओं में
चिर-प्रतीक्षित सपनों की अगवानी
तलाशते रहे... तलाशते रहे--
इतने में हो आई शाम
हहराकर डूबे संघर्षों में प्राण !

दुर्दिन की हथकड़ियों में
कांपते शरीर का सम्मोहन
बादल गईं कितनी संज्ञाएँ
उल्टे कांच के गिलास पर
पानी की धार पड़ी...
युद्ध-स्थल झुर्रियों और लकीरों का
गड्ढे में पड़ी आंखों का डूबता निशान
वक्त के विराम की हो गईं चर्चाएँ आम !

शहरों की कोलतार पुती सड़कों पर
या गावों की लहरदार गलियों में
अंधी लाठी से रास्ता बनाने की
होती हैं पुरजोर कोशिशें
पंक्तिबद्ध लम्बी ज़िन्दगी
बन बैठी गूंगी है...
तालू से जीभ के चिपकने की साजिश में
बंद हुए खुलते आयाम
कुछ मेरे, कुछ तेरे नाम !

जंग लगे, बंद पड़े कमरों में
मकड़ी के जालों का खूबसूरत दर्पण
हड्डी की गर्मी और पिघलते नासूर का
दर्दीला मौसम...
प्रतीक्षा की उठी हुई पलकों में
साथ-साथ तैरता आकाश
बिखरती ज़िन्दगी का टूटता विश्वास
गले में रेगिस्तान लिए
भटक रही प्यास
हर क्षण, प्रतिपल, अविराम
सुबह और शाम !!

11 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

जंग लगे, बंद पड़े कमरों में
मकड़ी के जालों का खूबसूरत दर्पण
हड्डी की गर्मी और पिघलते नासूर का
दर्दीला मौसम...

इस भावभीनी कविता के लिए बधाई!

शिवम् मिश्रा ने कहा…

लाजवाब कविता के लिए बधाई!

Apoorv ने कहा…

रोटी के टुकड़े-सी सुबह और शाम

..गजब के उपमान
..सिरके सी तीखी कविता के लिये बधाई

चंदन कुमार झा ने कहा…

बहुत ही सुन्दर कविता....मैं समझने की कोशिश कर रहा हूँ. आभार

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

ज़िन्दगी की तल्खियों को बयां करती रचना.सचमुच ही सुन्दर.

vandana ने कहा…

zindagi ki sachchiyon se ru-b-ru karwati rachna.............badhayi

Poonam Agrawal ने कहा…

Sunder abhivyakti.....Dhanyavaad.

अर्कजेश ने कहा…

"दो टुकड़े ज़िन्दगी बाँट दी गई
रोटी के टुकड़े-सी सुबह और शाम
उग आया एक और विराम !"
बहुत सफ़लता से उभारा है जिन्दगी के सन्घर्ष से उपजी विडम्बनाओं को ।

यह एक बेहतरीन रचना है ।
बधाई ।

Ishwar ने कहा…

sir,
bahut hi gahari baate likhte hai aap
maine teen baar padhi fir bhi puri tarah samajh nahi paaya
lekin abhi bhi do baar or padhne ki chahat hai kya khub likha hai


दो टुकड़े ज़िन्दगी बाँट दी गई
रोटी के टुकड़े-सी सुबह और शाम


हड्डी की गर्मी और पिघलते नासूर का
दर्दीला मौसम...

Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

गहरे अनुभवों की अनुभूति देती आपकी यह बेहतरीन कविता दिल को छू गई.
हार्दिक बधाई स्वीकार करें

चन्द्र मोहन गुप्त
जयपुर

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

इस कविता पर अपने विचारों-मनोभावों से अवगत कराने का आभार मानता हूँ ... आप सबों का शुक्रिया !!