रविवार, 30 अगस्त 2009

वह फिर आयी है...

{मेरे घर अजन्मी बिटिया के लिए}



वह मचलती-इठलाती रही--
मैं देखता रहा।
वह बहुत-सी बातें करती-सुनाती रही
मैं निहारता रहा !
वह आँखें चमकाती,
अभिनय करती,
शरारतें फैलाती रही--
में मूक दर्शक ही रहा--
ईश्वर बना !

लम्बी प्रतीक्षा के बाद
नद-नाले फलांगती,
पहाड़ी दर्रों के बीच राह बनाती
वह आयी थी--
शांत-सुरम्य घाटी में
शान्ति के दो पल बिताने
अपने प्रियतम के पास;
लेकिन उसमे वायु की विकलता थी,
असीम उत्साह था,
अबूझ आतुरता थी--
मैं हतप्रभ, हतवाक था--
मनुष्य बना !

जाने किस प्रमाद में,
नववर्ष की पूर्व-संध्या में
उसने मेरे हाथ पकड़े,
और बलात खींच लिया था मुझे
नृत्य के मंच पर !
मेरे पावों में शक्ति तो थी,
नृत्य की चपलता न थी,
किंचित परिज्ञान न था,
कोई शास्त्रीय विधान न था;
फिर भी मंत्र-मुग्ध-सा
संगीत की धुन पर
मैं नृत्य का अभिनय करता रहा...
मेरी तंद्रा पर
चेतना का ज्वर चढ़ता रहा !

शाम ढली, लेकिन--
रात ठहर गई;
वह व्यतीत होती ही न थी;
फिर भी जाने किन यादों को
पास बुलाता, दूर हटाता रहा रात भर...
सौम्य-सजीली उन आंखों में--
जैसे कोई बात अजब थी,
पैनी-सी वह धार गज़ब थी !

सुबह-सवेरे वायु-यान पर बैठ अचानक
आसमान से बातें करता लौट गया मैं--
यादों के उन गलियारों में
दौड़-दौड़ कर टुकड़े-टुकड़े
बिखर गया मैं !

प्रश्न बहुत थे, हल मुश्किल था--
तन के घाव भरे जाते हैं,
लेकिन मेरे चेतन-तल पर
धंसा हुआ एक शूल विकल था !
कैसे पहचानू मैं उसको
मेरा अंश छोड़ मुझे ही चला गया था,
मेरे बच्चों की जननी का
भाग्य सहज ही छला गया था !
मैं निष्ठुर ही रहा--
अमानुष बना !

स्मृतियों की आंधी सहसा ठहर गई थी
मन को समझाया था मैंने
बीत गया जो, रीत गया जो--क्षण
वह अतीत हो गया,
पूरा वर्ष व्यतीत हो गया !

वह फिर आयी है---
याद दिलाने मुझको मेरी
हठधर्मी की,
निर्दयता की
और न जाने कितने-कितने प्रश्न-बाण से
छलनी करने मेरे मन को !
निरुपाय हो, फिर चुनता हूँ
स्मृतियों के छोटे कण को !

मानव मन की दुर्बलता के
जाने किन अभिशप्त क्षणों में
मैंने निर्णय लेकर जिसको त्याग दिया था--
वह तो मेरी ही बिटिया थी,
हाँ, मैंने पहचान लिया था !!

5 टिप्‍पणियां:

मुकेश कुमार तिवारी ने कहा…

आदरणीय आनन्दवर्धन जी,

शायद अपने ही अंश में स्वंय की खोज ही जीवन है यह बहुत ही सधे हुये तरीके से पुनः परिभाषित हुआ है :-

नववर्ष की पूर्व-संध्या में
उसने मेरे हाथ पकड़े,
और बलात खींच लिया था
मुझे नृत्य के मंच पर !
मेरे पावों में शक्ति तो थी,
नृत्य की चपलता न थी,
किंचित परिज्ञान न था,
कोई शास्त्रीय विधान न था;
फिर भी मंत्र-मुग्ध-सा संगीत की धुन पर
मैं नृत्य का अभिनय करता रहा

कविता की अंतिम पंक्तियों में निहित भाव स्वाभाविक तौर पर किसी अमानुष को भी रूला सकते हैं।

कविता अपने सुन्दर शिल्प, शब्द संयोजन में प्रभावी है।

सादर,


मुकेश कुमार तिवारी

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

जानती हूं कि केवल प्रशंसा से आप बहुत प्रसन्न नहीं होते, आलोचना-समालोचाना के भी आकांक्षी हैं लेकिन क्या करूं यदि रचना केवल प्रशंसा के योग्य हो?

अनाम ने कहा…

shayad to har man bitiya ke liye is tarha utsahit nahee

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

मेरी इस (निजी) कविता को जिन बंधुओं ने सराहा है, उनका बहुत-बहुत आभार मानता हूँ ! इतना और कहूँ कि यह मेरी दुलारी-प्यारी रचना है... हाँ, 'बेनामी' बन्धु विश्वास करें कि बेटियों के लिए मेरे मन में सत्यतः उत्साह, प्रीती और स्नेह की कोई कमी नहीं; दुनिया की, निगोडी दुनिया जाने ! आ.

अनाम ने कहा…

kaas har dil me betiyo ke liye aapke pyar aapki komal bhawana ka thoda sa ans hota kyuki ye dard jheltee betiya hi jaan saktee hai ----aap ki kavita shayad har kisi ke man me thoda pyar bhar de --aur ham jaiso ko kuchh sukun de de