बुधवार, 12 अगस्त 2009

अनंत यात्री नागार्जुन

[गतांक का शेषांश]

नागा बाबा के मुख से कवितायें सुनने का आनंद अलग था। वह अपनी कवितायें झूम-झूमकर सुनाया करते थे। 'बादल को घिरते देखा है...' और 'बहुत दिनों तक चूल्हा रोया...' --इन दोनों कविताओं का उनका पाठ मेरे मन पर नक्श होकर रह गया है। आन्दोलन-समर्थित उनकी कवितायें भी जेहन में गूंजती रहती

बहरहाल, राजकमल की सेवा से मुक्त होने के बाद मैंने दूसरी नौकरी पकडी। दिल्ली छूटी तो बाबा से प्रायः रोज़ का संपर्क भी छूट गया। लेकिन बाबा के पोस्टकार्ड की चार-छः पंक्तियाँ मुझ नाचीज़ तक अवश्य पहुँचती रहीं और मुझे अहसास दिलाती रहीं कि वह मुझ से दूर नहीं हैं। यह उनका असीम स्नेह ही था।
नौकरी को नितांत प्रतिभानाशी व्यापार माननेवाले मेरे दिमाग ने अंततः निर्णय लेकर अपने पितामह की तरह ही सन १९८२ में अच्छी-खासी नौकरी को लात मारी और मैं पटना आ बसा। पटना के लोहिया नगर के छोटे-से मकान में सुख-दुःख के दोनों तीरों को छूती ज़िन्दगी चल पड़ी। पिताजी मुझसे पहले ही पटना आ गए थे। एक दिन घर के बरामदे में चटाई बिछाकर वह लिखने-पढने का कुछ काम कर रहे थे कि अचानक नागार्जुनजी प्रकट हुए और अपना झोला रखकर चटाई पर ही पिताजी के पास बैठ गए। पिताजी ने मुझे आवाज़ लगाई और बाबा के आगमन की सूचना दी। मैं भागकर उनके पास पहुँचा और प्रणाम करके मैंने पूछा--''बाबा ! आप अचानक कैसे आ पहुंचे ?'' वह पूरी सहजता से बोले--''हाँ, तुम लोगों से मिले बहुत दिन हो गए थे, सोचा मिलता चलूँ ।'' उस दिन बाबा देर शाम तक हमारे साथ रहे थे, उन्होंने बहुतेरी बातें की थीं, कवितायें सुनाई थीं और अपनी मनपसंद खिचडी खाई थी। मेरे घर में उनका निर्बाध प्रवेश था। वह स्वयं रसोईघर तक चले जाते और मेरी गृहलक्ष्मी को नाश्ते, खाने और चाय का आदेश दे आते।

बाबा दमे के मरीज़ थे। वह दमे के दम को बेदम करते निरंतर यात्राएँ करते रहे। लेकिन, १९८६ के बाद उनका स्वस्थ्य तेज़ी से गिरने लगा। यात्राएँ भारी पड़ने लगीं। अंततः उन्होंने अपने पुत्र श्रीकांत के पास दिल्ली में रहने का निश्चय किया। तब तक श्रीकांत ने अपना प्रकाशन संस्थान खोल लिया था और बाबा की पुस्तकों का पुनरमुद्रण करने लगे थे। गिरते स्वास्थ्य के बावजूद बाबा प्रकाशन के कामों में श्रीकांत की मदद करने लगे, लेकिन पटना और पित्रीगृह का मोह उन्हें बार-बार बिहार ले आता था।
९० के दशक में सूचना मिली कि पटना के डी.आई.जी श्री रामचंद्र खान की कोठी पर नागा बाबा ठहरे हुए हैं। मैं उनसे मिलने खान साहब के बंगले पर पहुँचा। बाबा अपने कक्ष में अकेले थे। वह बड़ी आत्मीयता से मिले। दमे के कष्ट के कारण उन्हें बोलने में असुविधा हो रही थी। मैंने उनसे कहा--"बाबा ! आप न बोलें, मैं आपको घर-परिवार और अन्य मित्रों की सारी बातें बताता हूँ।" लेकिन बाबा के अपने प्रश्न थे और उन्हें पूछे बिना उनका मन मान नहीं रहा था। बोलने में उन्हें जो असह्य पीड़ा हो रही थी, उसे देखकर मैं विचलित होता रहा। उनके पास दो घंटे रूककर मैं जब लौटा, तो मन बहुत दुखी था। सरल शिशु की उन्मुक्त और निश्छल हँसी हंसनेवाले नागा बाबा को उस दिन मैंने पहली और अन्तिम बार असह्य पीड़ा में देखा था। उस मुलाकात में बाबा ने कहा था--''आज ज्यादा कष्ट में हूँ। कल ऐसी हालत नहीं थी। सरस्वती ही रूठ जायें तो मुझ-जैसा मसिजीवी क्या करे ?'' उनके इस वाक्य में जो मर्मंतुद वेदना थी, पीड़ा थी, उसने मुझे आहात कर दिया था। इस मुलाकात के बाद बाबा से फिर कभी मिलना न हो सका।
कुछ समय बाद वह गंभीर रूप से अस्वस्थ हो गए। समाचार-पत्रों से उनके स्वास्थ्य की क्रमशः बिगड़ती दशा की सूचनाएं मिलती रहीं। एक दिन यह शोक-समाचार भी मिला किदरभंगा के पैत्रिक निवास पर महाकवि नागार्जुन ने अन्तिम साँस ली। जीवन-भर अपने स्वास्थ्य कि अनदेखी कर निरंतर यात्रा करनेवाले बाबा उस दिन काल के सम्मुख अवश हो गए थे; किंतु क्या यह भी सत्य नहीं है कि जीवनपर्यंत यात्रा करनेवाले बाबा एक नवीन महायात्रा पर प्रस्थित हो गए थे। ....
[दो-तीन शब्द शुद्ध नहीं हो पाते , ब्लॉगर मित्र उन्हें मेरे साथ बर्दाश्त करें !]

9 टिप्‍पणियां:

sanjay vyas ने कहा…

बहुत आदर और आत्मीयता से परिपूर्ण स्मृति.आभार.

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

व्यास जी,
बाबा की जो स्मृतियाँ मैंने मन में संजो राखी थीं, उन्हें आपने मेरे साथ शेयर किया और कंप्युटर के चमकते स्क्रीन पर इतना लम्बा आलेख पूरा पढने का श्रम किया. आभारी हूँ. बाबा की सूरत ही नहीं, थोडी सीरत भी मिल जाती तो मेरा परम सौभाग्य होता. आ.व्.ओ.

ज्योति सिंह ने कहा…

aanad ji namaskaar .tyoharo ki vajah se vyastta bani rahi .aapki tippani to laazwaab avam prernadayak hoti hai .is baar milane par kuchh sikhane ki koshish rahegi .aap to all rounder hai ,har kshetra pe raj karate hai .adbhut likhane ke saath adbhut avam guni mahaguni logo ka sampark bhi raha .hum soubhagyashali hai jo aapko padhane ka awsar paa rahe .baba ji ki smriti se unki rachana padhane ki ichchha jagrit ho uthi .
aapka anubhav taarife qabil hai .ye sar aap hi is blog par samman se jhukjaata hai .

Suman ने कहा…

nice

अर्कजेश ने कहा…

आज बाबा नागार्जुन के दोनों सन्समरण फ़िर से पूरा पढा । कई जानकरियां मिलीं ।

बाबा के व्यक्तित्व के बारे में भी जानकारी हुई ।
इतनी विद्वता और इतनी सरलता । सचमुच ’विद्या ददाति विनयं’।

आभार आपका ।

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

जितना स्नेह और जुडाव आपका बाबा के साथ था उतनी ही शिद्दत के साथ आपने इस संस्मरण को संजोया है. एक-एक शब्द दिल में उतरता जाता है. लगता है, जैसे ये सारी घटनायें हमारे साथ घटित हो रही हैं. सामने दिखने लगते हैं बाबा. इतनी रोचक और प्रभावपूर्ण शैली में संस्मरं लिखा गया है, कि पूरा पढे बिना चैन कहां.बधाई और साधुवाद.

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

ज्योतिजी,देर आयद दुरुस्त आयद ! थोडा अनुमान था आपकी व्यस्तता का... आपकी टिपण्णी से मेरा लिखना सार्थक हुआ !
सुमनजी, आपका एक शब्द ही काफी है. आभार !
अर्जकेशजी, सचमुच बाबा विद्या और विनय की असामान्य मूर्ति थे. आपकी दूसरी टिपण्णी से बात पूरी हुई. आभारु हूँ!
वंदनाजी, आप इसे पूरा न पढ़तीं तो यह संस्मरण के प्रति आपका अन्याय होता, सच में आपके मंतव्य से उपकृत हुआ. धन्यवाद् ! आप जानती हैं, मैं यात्राओं में था और मैं जनता रहा कि आप व्यस्तताओं में हैं, अन्यथा आपकी टिपण्णी पहले ही आती और मेरा धन्यवाद-ज्ञापन पहले ही इस बॉक्स पर झलकता. आ.

Kishore Choudhary ने कहा…

जब आप व्यास जी कहते हैं कि कंप्यूटर के स्क्रीन पर इतना पढ़ने का कष्ट किया तो मैं मुदित हो जाता हूँ कि काश आप ऐसे पढ़वाते रहें और ये स्क्रीन भले ही और चमकता जाये. संस्मरण दिल को छू जाने वाला है अपनी किताबों में फिर से बाबा को खोजता हूँ देखता हूँ दीवारों पर छिपकलियों की गश्त
आप साधुवाद के पात्र है, बताईये कहाँ मिलेंगे आप ?

चंदन कुमार झा ने कहा…

संस्मरण पढ़कर मन तृप्त हुआ....तीनों कड़ियां बहुत ही पसंद आयी....आभार.