बुधवार, 5 अगस्त 2009

आशियाना कहे तो क्या...?


रौशन हुआ है राज़, ज़माना कहे तो क्या,
हर शख्श बेनियाज़ है, फ़साना कहे क्या ?

हर दरो-दीवार सूनी, गुल हैं बत्त्तियाँ,
सहमा हुआ ज़माना, ज़माना कहे तो क्या ?

ले गए हैं पंख कौवे, गोश्त गीदड़ ले गया,
रूह एक सहमी हुई, अफसाना कहे तो क्या ?

और नारे और झंडे और घबराया वजूद--
हर साँस गिरफ्त्तार है, ठिकाना कहे तो क्या ?

बेदाग़ होना जुर्म है, पाक होने के लिए,
देती सियासत ये सबक, आशियाना कहे तो क्या ??

6 टिप्‍पणियां:

ओम आर्य ने कहा…

एक उत्कृष्ट रचना .......आशियाना को कहे तो क्या....

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

हर शे’र कमाल का!! बहुत सुन्दर.लेकिन मैं इससे पहले शायद ४ ता. को पोस्ट की गई आपकी कविता ढूंढ रही थी....मिली ही नहीं मैने उसी वक्त पढ ली थी और सोचा था, आराम से टिप्पणी करूंगी....

ज्योति सिंह ने कहा…

बेदाग़ होना जुर्म है, पाक होने के लिए,
देती सियासत ये सबक, आशियाना कहे तो क्या ?? bahut khoob .

Ram Shiv Murti Yadav ने कहा…

और नारे और झंडे और घबराया वजूद--
हर साँस गिरफ्त्तार है, ठिकाना कहे तो क्या ?
....Bebak abhivyakti..badhai.

Kishore Choudhary ने कहा…

हर शेर पर दाद देनी होगी इतने कंप्रेस्ड हैं की पूरा गध्य झांकता है कुछ शब्दों में.

डाकिया बाबू ने कहा…

Wah, itni dillagi se likha ki ham apke kayal ho gaye..lajwab rachna ke liye badhai.Kabhi Dakiya babu ke yahan bhi tashrif laiye na !!