बुधवार, 19 जनवरी 2011

कैसे समझाऊं उसे...

[मित्रवर श्रीमुकेश कुमार तिवारी को सप्रीत...]
{कई महीने पहले मित्रवर श्री मुकेश कुमार तिवारी की एक कविता ब्लॉग पर पढ़ी थी--'वो करती है मुझसे शिकायत'। उसे पढकर मैं बहुत प्रसन्न हुआ था--शानदार कविता थी वह । उसे पढ़ते हुए लगा था कि कवि मेरी बात कुछ अलग अंदाज़ में कैसे लिख रहा है ? फिर याद आया कि बहुत पहले बिलकुल इसी भाव-भूमि की एक कविता कभी मैंने भी अपनी छोटी बेटी के लिए लिखी थी। मुकेश जी की कविता पर टिपण्णी भेजते हुए मैंने उन्हें यह लिखा भी था। प्रत्युत्तर में उन्होंने मेरी कविता देखने की इच्छा प्रकट की थी, लेकिन कविता पटना में थी और मैं नॉएडा प्रवास में। कविता उन्हें मैं भेज न सका था। पिछले दिनों जब पटना गया, तो पुरानी डायरी से यह कविता ले आया हूँ। २५-५-१९९३ की यह कविता भाई तिवारी जी के और आप सबों के सम्मुख रख रहा हूँ । --anand }
एक शाम मेरे घर के
मुंडेरे पर उतर आयी है,
दूर धुंधली-सी
एक तस्वीर उभर आयी है,
जिसके हाथो में चाक़ू है;
वह काटेगी केक -- आज !
ज़िन्दगी की उमंग में
ग्यारह साल पहले लिखी
एक पुरानी कविता को
सजीव , सम्मुख देखता हूँ--
खूब पहचानता हूँ उसे,
जाने कितनी खंडित प्रतिमाओं से
जिसने आकार पाया है :
उस भोली-भाली लड़की के
मासूम चहरे पर
वही जानी-पहचानी मायूसी है
और वह करती है
मुझसे कई सवाल...
मांगती है मुझसे--
अपने हिस्से की कविता !
ग्यारह मोमबत्तियों की रौशनी में
देखता हूँ--
उसका उदास चेहरा,
जिसे उसने टेबल के सिरे पर
केहुनी टिका,
अपनी मुट्ठी पर
ठुड्डी रख
स्थिर कर लिया है--
उसकी उल्लासित आँखों में
आज भी जल रहे हैं सवाल,
थोड़ी मायूसी भी है उसके चहरे पर...
सोचना नहीं पड़ता मुझे
उसकी मायूसी का सबब !
जानता हूँ,
फ़रमाईशें पूरी नहीं हुई उसकी;
लेकिन वह मासूम
मेरी पसलियों के दर्द
और खाली जेब की
पीड़ा क्या जाने ?
अपनी आँखों में ही
उसके प्रश्नों का उत्तर
लिखना चाहता हूँ
और मेरी आखें
निष्प्रभ हुई जाती हैं !
उसके प्रश्न मेरी चेतना पर
छा गए हैं घने कुहरे की तरह
मैं उद्विग्न होता हूँ;
कैसे समझाऊं उसे--
कि तू ही तो मेरी सबसे मासूम
और दुलारी कविता है--
मेरी बेटी !
अपनी ही कविता पर
कविताई कैसे हो भला ?
कोई बतलाये मुझे--
कैसे समझाऊं उसे ??

10 टिप्‍पणियां:

वन्दना ने कहा…

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (20/1/2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
http://charchamanch.uchcharan.com

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

बहुत सुंदर !
भाव विभोर कर गई ये कविता !
पीड़ा को अगर सही शब्द मिल जाएं तो दूसरे भी उसे
पूरी तरह महसूस करते हैं और
आप की कविता एह्सास की उसी शिखर को छूती है
अति उत्तम !

Anupriya ने कहा…

bahot sundar...bhaowibhor ho gai main...itni achchi prastuti ke liye aapka dhanyawad.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत सुन्दर ...भावपूर्ण कविता

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

कैसे समझाऊं उसे--
कि तू ही तो मेरी सबसे मासूम
और दुलारी कविता है--
मेरी बेटी !
अपनी ही कविता पर
कविताई कैसे हो भला ?
कोई बतलाये मुझे--
कैसे समझाऊं उसे ??
लम्बे अन्तराल के बाद आपकी रचना पढने को मिली, लेकिन यदि इतनी खूबसूरत कविता अन्तराल मांगती है, तो अफ़सोस नहीं. आज कई
कविताओं की भरपाई हो गई. कुछ बातों को बचपन समझ नहीं पाता, और हम समझा नहीं पाते.ये कशमकश उभर कर सामने आई है. बहुत सुन्दर कविता. आभार.

umesh ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता, समझ नहीं पा रहा क्या टिप्पणी करूं. वैसे भी इतनी सुन्दर कविता टिप्पणियों की मोहताज नहीं होती.

शिवम् मिश्रा ने कहा…


बेहतरीन पोस्ट लेखन के लिए बधाई !

आशा है कि अपने सार्थक लेखन से, आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है - पधारें - नयी दुनिया - गरीब सांसदों को सस्ता भोजन - ब्लॉग 4 वार्ता - शिवम् मिश्रा

वाणी गीत ने कहा…

अपनी ही कविता पर कविताई कैसे हो भला ...मगर फिर भी कविता बन ही गयी

सुन्दर भावपूर्ण कविता !
आभार !

Sangya Ojha ने कहा…

Dear Papa,

I created this account only to be able to read your precious creations...being so far away from you I miss our everyday meetings where we heard you recent creations. BUT THIS POEM IS ALL THE MORE SPECIAL...BECAUSE IT'S ABOUT ME!....Yes, I alwayes coxed you to write a poem about me! I didn't know you already had written such a beautiful one :) Now I will never complain!
Love and Pranam!
Your Ziddi Beti
Sangya

Vijai Mathur ने कहा…

आप सब को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभ कामनाएं.