बुधवार, 26 मार्च 2014

पंडित नाथूराम शर्मा 'शंकर' की स्मृतियों के साथ जागरण की एक रात...

मित्रो,
कल रात बिस्तर पर देर तक नींद नहीं आयी, करवटें बदलता रहा. मौसम खुशगवार था, लेकिन लगता है, मन का मौसम कुछ ठीक नहीं था...लेकिन रात तो नींद में बितानी थी और नींद आती न थी. मंत्र-जाप शुरू किया.. और यह सब करते बहुत देर हो गई.... तभी पूज्य पिताजी की याद आयी, उन्हें नमन करने लगा... बहुत छुटपन से उनसे मैंने बहुत-सी कहानियाँ सुनी थीं, उनमें से एक याद आयी--अपने समय के प्रसिद्ध आशुकवि पंडित नाथूराम शर्मा 'शंकर' की कथा. आपको संक्षेप में उनकी कथा सुनाऊँ...?
सन १८५९ में जिला अलीगढ़ में जन्मे महाकवि शंकर ब्रजभाषा और खड़ी बोली के कवि थे. उनकी प्रतिज्ञा थी :
'दीजै समस्या ता पर कवित बनाऊँ चट,
कलम रुके तो, कर कलम कराइये ... !'
पिताजी बताते थे कि इलाहाबाद में एक आशु-कवि-सम्मलेन में 'शंकर' पधारे हुए थे और लट्ठधारी एक कवि और थे जो स्वयं को कवि केशव (जिन्हें कठिन काव्य का प्रेत कहा गया है) का शिष्य कहते थे. वहाँ समस्या दी गई थी--'नीके'.
जब मंच पर शंकर आये तो समस्या-पूर्ति करते हुए उन्होंने कई पंक्तियाँ पढ़ीं और जब अंतिम दो पंक्तियों पऱ आये तो सभा में तहलका मच गया, वे पंक्तियाँ थीं--
'एक तs केसव  प्रेत भये,
दूजे भये बेटा भुतनी के.!'
इन पंक्तियों को पढ़ते हुए शंकरजी ने हाथ का इशारा लट्ठधारी कवि की और किया..., फिर क्या था, पंक्तियाँ समाप्त होते ही लट्ठधारी कवि अपनी लाठी भांजते दौड़ पड़े... अब शंकर जी आगे-आगे और वे पीछे-पीछे सभा-भवन से दौड़ते-भागते बाहर निकल गए... और पूरी सभा ठहाकों से देर तक गूंजती रही...! पिताजी इस अपूर्व दृश्य के स्वयं साक्षी थे.
पं. नाथूराम शर्मा 'शंकर'जी ने कई काव्य-ग्रन्थ लिखे. एक तो 'समस्या-पूर्ति' के नाम से ही प्रकाशित हुआ. उन्होंने 'अनुराग रत्न', 'शंकर-सरोज', 'गीतावलि', 'कविता-कुञ्ज', 'दोहा', 'कलित-कलेवर', 'शंकर सतसई' आदि अनेक पुस्तकों का प्रणयन किया. अंग्रेज़ों के ज़माने में वे कानपुर में सिंचाई विभाग में कार्यरत थे और आयुर्वेद की औषधियों से उपचार भी करते थे. वे आयुर्वेदाचार्य थे, साथ ही आर्यसमाज-आंदोलन से भी प्रभावित थे.
कालान्तर में उनके परिवार में अघटनीय घटनाएं एक-के-बाद-एक होती गईं. माता, पत्नी, पुत्री, पुत्र, भगिनी की मृत्यु ने उन्हें तोड़कर रख दिया था.
इन सारी विपदाओं के बाद किसी आशु-कवि सम्मलेन से उन्हें आमंत्रण मिला. वे वहाँ गए. समस्या दी गई थी--'मन की'! शंकरजी ने जो समस्या-पूर्ति की, वह मर्मविद्ध करनेवाली है. आप भी देखें :
"देवी शंकरा ने देवलोक में निवास पाया,
पीर पति की-सी न सहारी बूढ़ेपन की,
शारदाकुमारी बूढ़ी दादी के समीप गई,
माँ से महाविद्या मिली राख त्याग तन की,
माता, सुता, भगिनी की ओर उमाशंकर ने
कूच किया ओढ़कर चादर कफ़न की,
हाय, शोक-मूसल से काल ने कुचल डाली
कोमल कवित्व-शक्ति 'शंकर' के मन की!"
ये सारी पंक्तियाँ पिताजी से सुनकर मैंने अपनी डायरी में लिख ली थीं. १९९५ में पिताजी के निधन के बाद एक दिन पं. रामनरेश त्रिपाठी की पुस्तक 'कविता कौमुदी' से अंत की दो पंक्तियाँ और मिलीं :
"क्या सूझे कवि कौमुदी, हा बुध रामनरेश,
हा, शंकर को हो गया अन्धकारमय देश...!"
हिंदी-उर्दू और ब्रजभाषा के इस महान कवि ने सन १९३२ में इहलीला समाप्त की...!

यह प्रकरण याद करते, पुरानी डायरी खोजते और लिखते सुबह के चार बज गए...! फिर जब बिस्तर पर गया तो गहरी नींद सो गया...! पिछली रात तो पूज्य बाबूजी और शंकरजी की यादों के साथ जागकर बितानी थी, बिस्तर पर जाते ही कैसे सो जाता भला....?

2 टिप्‍पणियां:

Gudden-Online Shopping India ने कहा…

Nice Info Thanks

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

भाई मुकेश तिवारी जी लिखते है :
वाक़ई, फ़ेसबुक पर संग्रहणीय भी कुछ रहता है....इस विश्वास को मज़बूत करती हुई पोस्ट, अनिद्रा मुबारक हो आन्नद जी।
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12 hours ago