रविवार, 20 सितंबर 2015

मेरी परलोक-चर्चाएँ... (२)


[प्रथम स्पर्श]
मेरे रोने की आवाज़ जैसे ही वातावरण में गूंजी, चाचाजी और उस अज्ञात स्त्री की वार्ता अवरुद्ध हो गई। चाचाजी अपनी चौकी से उठकर मेरे पास आये और पूछने लगे--'क्या हुआ, रो क्यों रहे हो ?' मेरे मुंह से तो शब्द ही नहीं निकल रहे थे। बोलने की कोशिश की, तो हकलाकर रह गया। चाचाजी ने मेरी मशहरी उठाई और मेरे पास बैठ गए, मेरी पीठ सहलाते हुए बार-बार अपना वही प्रश्न दुहराते रहे। थोड़ी देर में मैं संयत हुआ और अंततः मेरे मुंह से बोल फूटे--'मुझे यहां डर लग रहा है।' उन्होंने मेरी बात सुनकर कहा--'ठीक है, डरो मत, आओ, तुम मेरे पास सो जाओ...।' लेकिन मुझे तो उनसे भी डर लगने लगा था। मेरे हठ पर चाचाजी मुझे घर के अंदर ले गए और चाचीजी के सुपुर्द कर आये। वह रात करवट बदलते, डरते और जागते-सोते बीत गई।
सुबह मैं देर से उठा और आँखें मींचते सीधे चाचाजी के पास जा पहुंचा। मैंने उनसे हठात प्रश्न किया--'चाचाजी, आप रात में किनसे बातें कर रहे थे? ' वह मुझसे अचानक ऐसे प्रश्न की उम्मीद शायद नहीं कर रहे थे। कुछ क्षण ठहरकर बोले--'तुम्हें भ्रम हो गया होगा।...ओह, तभी तुम रात में डर गए थे...!'
मैंने दृढ स्वर में प्रतिवाद किया--'नहीं, मैं तो आपकी बातचीत सुनकर ही जागा था और आपके पास किसी को न देखकर भयभीत हुआ था। डर के मारे ही मैं रोने भी लगा था। मुझे बताइये न, जब आपके पास कोई नहीं था, फिर आप बातें किनसे कर रहे थे?'
चाचाजी समझ गए कि मैं रात की कोई बात भूला नहीं हूँ। उन्होंने मुझे समझाते हुए कहा--'अच्छा, सब बताऊंगा, पहले दातून कर लो, फिर नाश्ता करके मेरे पास आना।' मुझे लौटना पड़ा। जल्दी-जल्दी मैंने नीम के दातून से दांत साफ़ किये, नाश्ता किया और तुरंत चाचाजी के कमरे में जा खड़ा हुआ। उन्होंने कॉलेज जाने की बात कहकर मुझे फिर टाल दिया। मुझे थोड़ी निराशा हुई, लेकिन मेरी जिज्ञासा चरम पर थी। मैंने अपने चचरे बड़े भाई (श्रीनवीनचन्द्र ओझा) को पकड़ा। पिछली रात की सारी बात बताकर मैंने उनसे पूछा--'भैया, आप मुझे बताइये, रात में चाचाजी किनसे बातें कर रहे थे?' उनके पास भी मेरे प्रश्न का स्पष्ट उत्तर नहीं था, बोले--'अरे, बाबूजी को कभी-कभी नींद में बोलने की आदत है। तुमने वही कुछ सुन लिया होगा और डर गए।' मैंने फिर पूछा--'लेकिन वह जो एक महिला की आवाज़ मैंने सुनी थी...?' भइया बोले--' डरे हुए बच्चे ऐसी कृत्रिम आवाज़ें सुन लेते हैं, वह तुम्हारा भ्रम है अथवा कल्पना।' भइया की बात सुनकर मैंने चुप्पी मार ली और चाचाजी के कॉलेज से लौटने की प्रतीक्षा करने लगा।
दोपहर में देर से चाचाजी घर लौटे। मैं उत्सुकता से भरा शीघ्र उनके पास पहुंचा और मैंने अपना वही प्रश्न फिर दुहराया, लेकिन उस प्रवास में मुझे मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं मिलना था, सो नहीं मिला। ग्रीष्मावकाश अथवा दुर्गापूजा की छुट्टियों में बार-बार तुर्की जाने का अवसर मिलता, किन्तु मेरे मन में गूंजते प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाते। अपनी इसी आतुर जिज्ञासा पर कई बार मुझे उनकी झिड़की भी सुननी पड़ी थी।
अंततः एक दिन अचानक ही वह राज़ मुझ पर फाश हो गया। सुबह के समय कुछ लोग चाचाजी के पास आये थे और बंद कमरे में उनकी बातें हुई थीं। वहाँ बच्चों का प्रवेश बाधित था। आधे घंटे की बातचीत के बाद वे लोग चले गए। शाम के वक़्त वही लोग फिर आये। गोधूलि का समय था। धरा से प्रकाश तिरोहित हो रहा था। वे सब लोग, जिनकी संख्या तीन थी, चाचाजी के कमरे में बंद हो गए। कमरे में बल्ब भी नहीं जलाया गया था, लिहाज़ा, वहाँ बाहर से अधिक अन्धकार व्याप्त था। मेरी उत्कंठा मुझे उस छजली पर ले गई, जहां एक रौशनदान चाचाजी के कमरे में खुलता था। मैंने उसी रौशनदान से अंदर देखने की कोशिश की, वहाँ से बस आधा कमरा दीखता था। रौशनदान से गुगल-हुमाद-लोहबान और अगरबत्ती की खुशबू आ रही थी और धुँआ छनकर निकल रहा था। कक्ष में बस एक मोमबत्ती जल रही थी। मुझे लगा, कोई पूजन-विधान, कोई अनुष्ठान वहाँ हो रहा है। मैं वहीं छजली पर टिका रहा और अंदर की गतिविधियों पर दृष्टि गड़ाए रहा। थोड़ी देर में अस्पष्ट स्वर कानो में पड़े, वह चाचाजी की आवाज़ थी, लेकिन वह क्या बोल रहे हैं, यह समझना कठिन था। वहाँ घुटने के बल बैठे हुए मुझे मुश्किल से पंद्रह-बीस मिनट ही हुए थे कि जाने कैसे चाचाजी को आभास हो गया कि कोई अनुष्ठान में बाधक बन रहा है। उनका तीव्र रोष प्रकट हुआ--'कौन है वहाँ...?' मैं घबराकर रौशनदान से हट गया और वहीं थोड़ा हटकर दुबका रहा। लेकिन चार-पांच क्षणों के बाद ही घर के अन्य सदस्य बाहर निकल आये--सबसे आगे नवीन भैया थे, उनके पीछे गीता दीदी और चाचीजी। उन्होंने आवाज़ देकर मुझे नीचे उतर आने को कहा। मैं क्या करता, चुपचाप नीचे उतर आया--चोरी-जैसे अपराध-बोध के साथ। वह रात गुमसुम बीत गयी।
दूसरे दिन चाचाजी के सामने मेरी पेशी हुई। उन्होंने मेरे कान उमेठे और नाराज़गी के साथ हिदायत दी कि फिर ऐसा कभी न करूँ। मेरा बाल-मन इससे बहुत आहत हुआ; क्योंकि चाचाजी का स्नेहभाजन मैं उस दिन कोपभाजन बन गया था। मेरी सारी चंचलता काफूर हो गई और मैं शाम तक चुपचाप अपनी नाराज़गी का इज़हार करता हुआ मुंह फुलाये रहा। मेरी मनोदशा देखकर शाम के वक़्त बड़ी दीदी (गीता ओझा--अब गीता पाण्डेय) द्रवित हुईं और मुझे समझाने-बुझाने मेरे पास आयीं। उन्होंने बड़े स्नेह से मेरे सिर पर हाथ रखा और कहा--'तुम्हें भी तो ऐसा नहीं करना चाहिए था।' मैंने तपाक से कहा--'मैं तो सिर्फ यह जानना चाहता था कि अंदर क्या हो रहा है... और क्या? मेरे पूछने पर चाचाजी तो मुझे कुछ बताते नहीं और अब तो वह मुझसे नाराज़ भी हो गए हैं। पिछली बार भी, जब रात में वह किसी से बातें कर रहे थे, मैंने कितनी बार उनसे पूछा था कि वह कौन थीं, उन्होंने बताया था क्या...?'
बड़ी दीदी मेरे प्रश्न-प्रतिप्रश्न सुनकर और मेरा भाव-विगलित होना देखकर अंततः बोल ही पड़ीं--'अरे, वह कुछ नहीं, बाबूजी बंद कमरे में आत्माओं का आह्वान कर रहे थे। उनके पास जो लोग आये थे, उनकी किसी समस्या को सुलझाने के लिए...! वहाँ बच्चे नहीं जाते...। तुम्हें भी छज्जे पर नहीं जाना चाहिए था।'
मैंने पूछा--'मरे हुए लोगों की आत्मा का आह्वान...?' बड़ी दीदी के हामी भरने पर मैं चकित रह गया था और मेरी आँखें फटी रह गई थीं। मैं अपने मस्तिष्क में पिछले प्रवास की उस घटना के तंतु जोड़ने-सुलझाने लगा था। तभी पहली-पहली बार मैंने जाना था कि मृतात्माओं को बुलाया जा सकता है और उनसे बातें भी की जा सकती हैं, जटिल जीवन के उलझे धागे सुलझाये जा सकते हैं...! सचमुच, मैं आश्चर्य से अवाक था।...
(क्रमशः)

2 टिप्‍पणियां:

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…


ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, दिल,दिमाग और आप - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Madan Mohan Saxena ने कहा…

बहुत सुंदर ,बेह्तरीन अभिव्यक्ति !शुभकामनायें. और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.