बुधवार, 30 सितंबर 2015

मेरी परलोक-चर्चाएँ... (६)
[निष्कम्प दीपक जलता रहा रात भर.... ]
दूसरे दिन का दफ्तर का वक़्त मुश्किल से कटा। इतने-इतने प्रश्न, शंकाएं, जिज्ञासाएँ कि बस, राम कहिये ! मैं लगातार यही सोचता रहा कि क्या आज रात मेरी माता से सचमुच बातें हो सकेंगी? क्या वह औघड़ इतना सक्षम है ? माता से बातें हो सकेंगी, यह विचार ही रोमांचकारी था। माता को गुज़रे सात वर्ष हो चुके थे--४ दिसंबर १९६८ को ब्रह्ममुहूर्त्त में, किसी से बिना एक शब्द कहे, उन्होंने शरीर त्याग दिया था और पूरा परिवार अवसन्न रह गया था। बिहार सरकार के शिक्षा विभाग में उच्च-पदस्थ मेरी माँ पूर्णतः स्वस्थ-प्रकृतिस्थ थीं।
बहरहाल, शाम पांच बजे दफ्तर से छुट्टी मिली। संभवतः, ध्रुवेंद्र मेरे मन की उलझन का कुछ हद तक अनुमान कर चुके थे, लेकिन वह बिलकुल नहीं जानते थे मेरी लगन कहाँ लगी हुई है और मैं किस दिशा में दौड़ने को तत्पर हूँ। वह पीछे पड़े कि मैं उनके साथ आर्यनगर चलूँ, लेकिन मैं सिरदर्द की बात कहकर उनसे विलग हुआ। वह आर्यनगर गए और मैं तीर की तरह अपने कमरे पर पहुंचा। हाथ-मुंह धोकर हीटर पर चाय बनायी, पी और बेसब्री से वक़्त के गुजरने की प्रतीक्षा करने लगा। वक़्त था कि ठहरा हुआ लग रहा था। बमुश्किल साढ़े सात बजे, मैंने धुला हुआ वस्त्र निकाला और तैयार होकर साइकिल से भैरोंघाट के लिए चल पड़ा। औघड़ बाबा की धूनी पर मैं ४५ मिनट पहले ही पहुँच गया और उन्हें वहाँ न पाकर बेचैन होने लगा। कहाँ चले गए वह? कल अपनी ही किसी मौज में वह मुझे आमंत्रण तो न दे बैठे थे और आज भूल गए ! मन आशंकाओं से भर गया था। मैंने वहीं खड़े-खड़े दूर-दूर तक नज़र दौड़ाई। मेरे दृष्टि-पथ में कहीं नहीं पड़े बाबा। मेरी छटपटाहट चरम पर पहुँच रही थी। मैं बेचैनी में वहीं टहलने लगा।
जब नौ बजने में दस मिनट बच रहे थे, अचानक बाबा अवतरित हुए। आज उनके नेत्र कल की तरह रक्ताभ नहीं थे। मेरे पास पहुंचते ही बोले--'अरे, आ गया तू! चल-चल, अंदर आ जा। तू तो समय का बड़ा पाबन्द निकला। आ जा, करता हूँ तेरा काम...!' डूबते मन को सम्बल मिल गया था।
मैंने पहली बार उनकी छोटी-सी कोठरिया में प्रवेश किया। द्वार पर एक लालटेन जल रही थी, जिसका हल्का प्रकाश कक्ष के अंदर तक पहुँच रहा था। वहाँ एक जर्जर खाट पड़ी थी और एकरंगे में बंधी छोटी-बड़ी कई पोटलियाँ थीं, मालाएं खूँटी पर टँगी हुई और बेतरतीब पड़े दो-चार बर्तन । कोठरी के एक कोने में पूजा का एक चौरस स्थान खड़िये से चिन्हित किया हुआ था, जिसके मध्य में हवन के लिए छोटा-सा गड्ढा था । अगल-बगल खप्पर और कटोरे-जैसा पात्र रखा था। बाबा ने चिन्हित दीर्घा के अंदर एक आसनी डाल दी और उसके बगल में कुछ सादे पृष्ठ एक कलम के साथ रख दिए। टाट और कम्बल का एक मोटा आसान वहाँ पहले से ही लगा हुआ था।
बाबा ने मुझसे गंगा-जल से हाथ-पैर धोकर आसनी पर बैठने को कहा। मैंने उनके आदेश का पालन किया। बाबा कोठरी के दूसरे कोने से एक काष्ठ-पट्ट उठा लाये। उसे उन्होंने आसन के ठीक सामने रखा और स्वयं आसन पर विराजमान हुए। मैं प्रबल जिज्ञासा से भरा ये सारा क्रिया-कलाप देख रहा था। काष्ठ-पट्ट के तीन तरफ किनारे-किनारे अंग्रेजी की पूरी वर्णमाला लिखी हुई थी--ए से जेड तक, एक कोने पर 'YES' अंकित था, तो दूसरे कोने पर 'NO'। चौथे किनारे पर अंक लिखे थे--1 से 0 तक । मैं हैरत में था, सोच रहा था--क्या है यह सब! तभी बाबा ने एक दीपक जलाया और उसे वर्गाकार चिह्न के एक कोण पर रख दिया। तत्पश्चात उस गड्ढे में अग्नि-संयोग किया, अगरबत्तियां जलाईं। अग्नि प्रज्ज्वलित होकर जब मंद पड़ी, तब उन्होंने उसमें दो-तीन प्रकार के चूर्ण पदार्थ डाले, जिससे तीव्र गति से सुगन्धित धूम उठने लगी। सर्वत्र मौन था--एक रहस्यमय वातावरण का निर्माण उस कक्ष में हो चुका था और मेरे दिल की धड़कनें बढ़ रही थीं।...
यह सब कृत्य करने में ४०-४५ मिनट का वक़्त व्यतीत हो गया था। सहसा बाबा ने मुझसे कहा--"अब तू अपने हाथ जोड़ ले और आँखें बंद कर अपनी माता के स्वरूप का ध्यान कर। उनसे यहां आने को कह। जब उनका मुख-मंडल साफ़-साफ़ तेरे ध्यान में आ जाए, तब उनसे मन-ही-मन प्रार्थना कर कि 'मैं आपको कष्ट नहीं देना चाहता, बस अपने कुछ सवालों का जवाब पाना चाहता हूँ। आप यहां, मेरे पास आवें।' जब तक तू मेरी कोई आवाज़ न सुन ले, 'आप यहां, मेरे पास आवें' बार-बार कहता रह।"
इतना कहकर, मेरे आँख मूँदने के पहले ही, बाबा ध्यानस्थ हो गए और निःशब्द कुछ बुदबुदाने लगे। मैंने उनकी आज्ञा का पालन किया। माता की मूर्ति को मेरे मानस-पटल पर उभर आने में वक़्त ही कहाँ लगना था। जैसा बाबा ने कहा था, मैंने आँखें मूंदकर, करबद्ध हो, प्रार्थना के शब्द कहे, फिर 'आप यहां, मेरे पास आवें' वाक्य की पुनरावृत्ति मन-ही-मन करने लगा। दो मिनट भी न गुज़रे न होंगे कि मुझे बाबा का स्वर सुनाई पड़ा--'देवि, क्या आप यहां विराज रही हैं?'
मैंने अपनी आँखें खोलीं और सिहर उठा। देखा, बाबा के दायें हाथ में एक छोटी-सी शीशी है, जिसे वह काष्ठ-पट्ट पर उलटकर मध्य में रख रहे हैं। मैंने कक्ष के मंद प्रकाश में चारो ओर दृष्टि घुमाकर देखा, कहीं कोई नहीं था। सहसा मेरे मुंह से कातर स्वर निकला--'बाबा, क्या मेरी माँ यहां आ गई हैं?' बाबा ने इशारे से मुझे चुप रहने का संकेत दिया और अपने दोनों हाथ जोड़ लिए, फिर किसी अज्ञात से पूछा--"माता, आप यहां आ गईं हैं तो 'हाँ' कहिये।"
प्रश्न पूछकर बाबा हाथ जोड़े स्थिर बैठे रहे।
अचानक मैंने देखा काष्ठ-पट्ट पर रखी शीशी हिल उठी और धीरे-धीरे सरकने लगी। आगे बढ़कर उसने 'YES ' शब्द का स्पर्श किया और फिर मध्य में आ ठहरी। मेरे पूरे शरीर में अजीब-सी सिहरन हुई और मन में विचित्र आलोड़न। शीशी का स्वतः चल पड़ना और उत्तर के लिए शब्द का चयन करना बहुत विस्मयकारक था। मैं विभ्रम में पड़ा था और आँखें नम हुई जा रही थीं। ...
बाबा ने पट्ट पर रखी शीशी की ओर इशारा करते हुए मुझसे कहा--'देख, तेरी माता यहीं विराज रही हैं। अब पूछ अपने मन की।' मैंने थोड़े संशय के साथ बाबा की ओर देखा। उन्होंने जोर देकर कहा--'अरे, सवाल पूछ, क्या सोचता है?' मेरे सामने विकल्प नहीं था, जबकि मन दुविधाग्रस्त था। मैंने स्वयं को समेटकर पहला प्रश्न पूछा--'माँ ! तुम तो पूरी तरह स्वस्थ थीं, शरीर में कोई रोग-दोष भी नहीं था; फिर अचानक तुम हमें छोड़कर चली क्यों गयीं?' इतना कहते-कहते मेरा गला भर आया। परम आश्चर्य कि प्रश्न पूरा होते-होते शीशी चल पड़ी। अक्षर-स्पर्श से जो वाक्य बना, वह था--'I died choking of thirst' (प्यास के कारण दम घुटने से मेरी मृत्यु हुई।)
उत्तर जानते ही मेरी तो हिचकियाँ बांध गयीं, आँसू बह निकले। कलेजे की हड्डियों में अजीब-सी ऐंठन हुई। तो क्या मेरी माँ इस दुनिया से प्यासी चली गईं? यह ख़याल मुझे निरीह-कातर बना गया।
मुझे इस तरह विह्वल होता देख बाबा ने वर्जना दी--'नहीं, ऐसा मत कर, सँभाल अपने को। तू आत्मा को पीड़ा पहुंचा रहा है।' मैंने बाबा की वर्जना सुनी, लेकिन भावोद्वेग इतना प्रबल था कि रुलाई उबल-उबलकर फूट पड़ती थी। बाबा ने जब देखा कि मैं स्वयं को संयत नहीं कर पा रहा हूँ तो उन्होंने हाथ बढ़ाकर मेरी पीठ पर रखा और बोले--'तूने माता को बुलाते हुए उनसे कहा था कि तू उन्हें पीड़ा पहुंचाने के लिए नहीं बुला रहा है, लेकिन यह क्या है? तू उन्हें पीड़ित ही तो कर रहा है न! यह गलत है, अब शांत हो जा।' बाबा की बात सुनकर मैंने बड़ी कठिनाई से स्वयं को संयत किया। मैंने अभी कोई प्रश्न भी न किया था कि अचानक शीशी चल पड़ी। अक्षर जोड़कर मैंने जाना कि माँ मुझसे कह रही हैं--'मेरे लिए शोक करना व्यर्थ है, मेरे पास उतना ही समय था और वही मेरी गति थी। तुम विलाप मत करो।'
अपने को समेटकर, किंचित विराम के बाद मैं माँ से फिर प्रश्न करने लगा और शीशी बोर्ड पर घूम-घूमकर, अक्षरों को छूकर, उत्तर देने लगी। बाबा ने मुझसे कहा--'अक्षरों को कागज़ पर लिखता जा, बाद में भूल जाएगा।' शीशी जैसे ही किसी अक्षर का स्पर्श करती, मैं उसे लिख लेता। इस तरह उत्तर के वाक्य बनते जा रहे थे। यह प्रश्नोत्तर देर तक चलता रहा और वातावरण की असहजता में भी कमी आई। बाबा कभी आँख मूँद लेते, कभी खोलते, कभी अप्रज्ज्वलित अग्नि में समिधा डालते, लेकिन ज्यादा वक़्त तक आँखें बंदकर करबद्ध रहे। बोर्ड पर शीशी की गति भी क्षिप्र हो गई थी। माँ ने परिवार हर सदस्य के विषय में मुझे हिदायतें दीं, कतिपय सावधानियाँ बरतने का निर्देश दिया--खासकर छोटी बहन (महिमा) के विषय में, जो ज्यादातर अस्वस्थ रहती थी।
अक्षरों के स्पर्श से जैसे-जैसे उत्तर आ रहे थे, उससे अंततः मुझे विश्वास हो गया कि मेरी माता वहीं उपस्थित थीं। उनसे जो उत्तर मुझे मिले थे, उसे केवल वही दे सकती थीं। रात के बारह बजते ही मेरी माँ ने स्वयं लौट जाने की इच्छा व्यक्त की। बाबा क्षिप्रता से उन्हें विदा करने को तत्पर हुए। उन्होंने मुझसे कहा--'बस बच्चे, बस! आज बस इतना ही। चल, तू माँ को प्रणाम कर, मैं उन्हें विदा करता हूँ।' इतना कहकर बाबा कुछ बुदबुदाने लगे। मैं हाथ जोड़े भावुक हो रहा था। बाबा ने निःशब्द बोलना बंद किया और शीशी को सीधा करके पट्ट पर रखकर प्रणाम किया। जब पूजन-कोष्ठक से मैं उठा, एक कोण पर रखा दीपक निष्कम्प जल रहा था। मैंने उसे भी कृतज्ञता से भरकर प्रणाम किया।
बाबा लालटेन लेकर मुझे सीढ़ियों तक छोड़ने आये। मैंने उनकी असीम कृपा के लिए कृतार्थता से द्रवित होकर थोड़े-से रुपये उन्हें देने चाहे, तो उनका रोष भरा स्वर सन्नाटे में गूँज उठा---'ख़बरदार..... !'
(क्रमशः)
[चित्र : देवीस्वरूपा मेरी माँ--भाग्यवती देवी]

2 टिप्‍पणियां:

राजेंद्र कुमार ने कहा…

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (02.10.2015) को "दूसरों की खुशी में खुश होना "(चर्चा अंक-2116) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ, सादर...!

प्रियदर्शिनी तिवारी ने कहा…

आपने जो महसूस लिया ..उसे शब्दों में भी बहुत अच्छे से व्यक्त कर पा रहे हैं ..पढ़ते हुये ऐसा लगता है मानो यह सब हमारी आँखों के सामने हुआ हो ... मृत्यु के बाद भी एक भरी -पूरी दुनिया है ..क्या है यह सब ? और क्यों है ! कभी ,कहीं कुछ खत्म भी होता है या नहीं !