शुक्रवार, 11 दिसंबर 2015

मेरी परलोक-चर्चाएँ... (२७)

['बस, मैं तेरा अन्वेषक ही था, जनम-जनम का… ' ]

दिन हांफते-दौड़ते थककर शाम की छाया में जा बैठा। हम दफ़्तर से लौटे--निःशब्द, अपने-अपने पैर घसीटते हुए। शाही ने चाय बनायी, हम दोनों ने पी, लेकिन कोई किसी से कुछ नहीं बोला। वह अजीब उदास शाम थी। क्लब जाने का मन नहीं हुआ। शाही जॉगिंग पर गये। मैं कभी कमरे में, कभी आहाते में अपनी उलझी मनःस्थिति लिए चहलकदमी करता रहा। फिर शाम भी रात के आगोश में सिमटने लगी। कमरे की कुण्डी लगाकर मैं सामने की सड़क पर आ गया। मैं अवचेतन में कहीं एक पुकार सुन रहा था। मंद गति से टहलते हुए पिताजी का एक बहुत पुराना गीत याद आने लगा--
'तुम पुकारो न मुझको अभी इस तरह,
प्राण ! ये अर्चना के सुमन बन रहे !
देह से दूर देही भले ही रहे,
प्यार के तंतु को तोड़ पाता नहीं,
दूर दो तट नदी के सदा हैं मगर,
जल कभी कूल है छोड़ पाता नहीं,
दूर तुमसे इसी भाँति मैं भी सदा,
फूल से गंध लेकिन कहाँ दूर है ?
इस घड़ी तुम निहारो न मुझको अभी
कि प्रत्यंग मेरे विसुध-से नयन बन रहे!
तुम पुकारो न मुझको अभी इस तरह,
प्राण ! ये अर्चना के सुमन बन रहे !'

जाने क्यों, पिताजी के इस पुराने गीत को गुनगुनाने से मन कुछ स्थिर हुआ। मैं वापस अपने कमरे में आया, फिर स्नान की तैयारी करने लगा। गुसलखाने से लौटा तो देखा, शाही आ गए हैं और अपने फुलाये हुए अंकुरित चने का सेवन कर रहे हैं। साढ़े नौ बजे हम मेस में खाना खाने गए और बीस-पच्चीस मिनट में भोजन से निवृत्त होकर कमरे में लौट आये। मेरी घड़ी कलाई पर बँधी थी और मैं बिस्तर पर लेटकर व्यग्रता से बार-बार समय देख रहा था। शाही भी अपनी कॉट पर लेटे थे--चुपचाप, एक पत्रिका में आँखें गड़ाये हुए। उन्होंने कहा-पूछा कुछ नहीं, मैं भी कुछ बोला नहीं। ऐसा लग रहा था कि हम दोनों पहली बार संवादहीनता के शिकार हो गए हैं।
दस बजते देर न लगी। मैंने शय्या त्याग दी और धुले वस्त्र निकालकर पहनने लगा। शाही अब भी निर्लिप्तभावेन लेटे थे। मैंने भैरव घाट के लिए प्रस्थान का समय १०.३० नियत कर रखा था। हाथघड़ी बता रही थी कि साढ़े दस में अभी भी पंद्रह-अठारह मिनट शेष थे।

मेरे मन की गति बहुत चंचल थी--मैं मुख-मुद्रा से संयत, संतुलित और प्रकृतिस्थ दीखने की चेष्टा कर रहा था; लेकिन हृदय में बहुत हलचल थी, जैसे उत्कंठा, व्यग्रता, चिंता और भय का विशाल समुद्र उसमें तरंगित हो रहा हो, जैसे महासमुद्र में मुझे धंसना हो एक बहुमूल्य सीपी की तलाश में, जिसे ज्वार, प्लवन और समुद्र का उबाल मुझसे दूर लिए जा रहा हो।…

आज मुझे किसी के साथ-संग की बहुत आवश्यकता थी, जो मुझसे बातें करता रहे और मैं उसकी वार्ता में ही निमग्न रहूँ तथा भविष्य के तीन-चार घंटों की मुझे सुधि न रहे। लेकिन मेरे परम मित्र शाही निर्मोही बने वहीं लेटे रहे। मैंने भी निश्चय कर लिया था कि अब उनसे कुछ नहीं कहूँगा और साढ़े दस बजते ही निकल चलूँगा।

काल-चक्र खिसकता जा रहा था। समय-सूचक यंत्र ने जैसे ही साढ़े दस बजने की ख़बर दी, मैं उठ खड़ा हुआ। साइकिल की चाबी उठायी, द्वार खोले और बाहर निकलकर साइकिल में लगा ताला खोलने लगा। तभी पीछे से मैंने शाही का स्वर सुना--'भैरव घाट के लिए निकल रहे हो क्या? तुम्हारा वहाँ जाना निश्चित है न?'
मैंने कहा--'हाँ, वहाँ तो मुझे पहुँचना ही होगा।
शाही ने फिर पूछा--'कितने बजे तक लौटोगे?'
मैंने संक्षिप्त उत्तर दिया--'दो-ढाई बज सकते हैं।
दो-तीन मिनट शाही मौन रहे, फिर बोले--'अब एकदम निकल ही पड़े क्या?'
मैंने कहा--'हाँ, साढ़े दस बजे का समय निश्चित किया था मैंने,अब चलता हूँ।'
शाही ने धीमी आवाज़ में कहा--'दो मिनट ठहरो !'
वह कमरे में गए और प्रायः दो मिनट में ही जींस का पैंट डालकर अपनी साइकिल की चाबी के साथ बाहर आये। उन्होंने भी साइकिल का लॉक खोला और बोले--'चलो, मैं भी साथ चलता हूँ।'
मैंने कहा--'मैं जानता था, तुम मेरे साथ चलोगे।'
उन्होंने निर्विकार भाव से कहा--'तुम क्या समझते हो, तुम चले जाते तो मैं चैन से सो जाता? तुम्हारी चिंता में नींद कहाँ आती, मूर्ख?'
उनकी इस अदा पर मैं मुग्ध हुआ।

हम दोनों साइकिल पर साथ चले। सड़क पर सन्नाटा पसरने लगा था। बीस मिनट में ही हम भैरव घाट पर थे। अभी ग्यारह ही तो बजे थे। एक घंटे का वक़्त शेष था। शाही बोले--'चलो, एक-एक सिगरेट हो जाए। क्या पता, आज के बाद तुम्हारे साथ सिगरेट पीना हो, न हो। सोच लो, तुम अब भी अपना विचार बदल सकते हो।'
मैंने दृढ़ स्वर में कहा--'डराओ नहीं यार! मैं तो तुम्हें बहुत बहादुर समझता था और तुम ही भीरु निकले…?
वह हँसने लगे, साथ ही मैं भी। पास की एक चाय-दुकान की बेंच पर साथ-साथ बैठकर हम दोनों कश लगाने और बातें करने लगे। जब साढ़े ग्यारह बज गए, मैंने कहा--'अब जाता हूँ। तुम फिक्र न करना और यहीं बने रहना, मैं एक-डेढ़ घंटे में लौट आऊंगा।'
शाही ने कहा--'अभी तो आधे घंटे का समय है, अभी से वहाँ जाकर क्या करोगे?'
मैंने कहा--'नहीं, अब जाने दो, वहाँ सीढ़ियों पर बैठकर मैं अपने मन को बाँधूंगा, चित्त को स्थिर करूँगा और स्वयं को सबल और प्रकृतिस्थ बनाये रखने का प्रयत्न करूँगा।'
शाही बोले--'ठीक है, जाओ, लेकिन कुछ भी गड़बड़ हो, तो पूरी ताकत से चीखकर आवाज़ लगाना, मैं तुरंत आ जाऊँगा वहाँ।'

मैंने उन्हें आश्वस्त किया और उन सीढ़ियों की ओर बढ़ा, जिसे कई-कई बार धाँग चुका था। सीढ़ियां तो जानी-पहचानी थीं, लेकिन कभी गौर नहीं किया था कि तेरहवीं सीढ़ी के दायें-बायें कोई झड़बेरी का पेड़ है। आज ध्यान से सीढ़ियाँ गिनता हुआ उतरा और यह देखकर चकित हुआ कि ठीक तेरहवीं सीढ़ी का पाट अन्य सीढ़ियों से चौड़ा तो था ही, उसे दायें हाथ झड़बेरी का एक घना वृक्ष भी था। मैंने अपनी जेब से रुमाल निकालकर तेरहवीं सीढ़ी का फ़र्श साफ़ किया और उस पर बैठ गया, इस संकल्प के साथ कि अब तो चालीस दुकानवाली से मिलकर और बातें कर के ही उठूँगा।

हवा निस्पन्द थी, चाँद की ज्योत्सना भी नहीं, बिलकुल स्याह, अँधेरी रात ! मेरे ठीक सामने गंगा की धारा तरंगित थी, जिस पर काली रात ने स्याही पोत दी थी। नीरव शान्ति सर्वत्र फैली हुई थी, जिसे बीच-बीच में भंग कर रही थी स्वानदेव की भूँक और श्मशान की चिताओं की चड़-चड़.…! रात बारह के बाद शव घाट पर नहीं लाये जाते, ऊपर ही रोक लिए जाते हैं सुबह चार बजे तक के लिए। वाराणसी के दशाश्वमेध घाट को छोड़कर सर्वत्र ऐसी ही मान्यता है कि यह समय गंगा के शयन का है। लिहाज़ा, सीढ़ियों पर भी आवागमन नहीं था।

हाथघड़ी पर आँखें गड़ाकर भी समय का ठीक अनुमान नहीं हो रहा था। ऐसी दिव्य और परम शान्ति मैंने जीवन में पहले कभी नहीं सुनी थी। मैं इस शान्ति को ध्यान लगाकर सुनने लगा। निःशब्द को सुनने का यत्न बहुत विस्मयकारी होता है। एकाग्रता एकनिष्ठ हो तो 'शांत' के स्वर सुनाई पड़ने लगते हैं और यदि उसमें रंच मात्र यति-भंग हो, तो श्रवणेंद्रियां शिथिल हो जाती हैं और चित्त में उपजते विचार प्रभावी हो जाते हैं। उस क्षण मेरे साथ यही हुआ और मन पकड़ से छूटकर भटक गया…। शाही और ईश्वर की चेतावनी याद आई और उनकी बात याद करते ही चित्त कई और गलत दिशाओं में दौड़ने लगा। सबसे पहले पिताजी याद आये और मैं सोचने लगा--'अगर सचमुच मुझे कुछ हो गया तो…? कल सुबह मैं यहीं, इसी सीढ़ी पर मृत पाया गया तो…? यह आघात परिवार के लोग कैसे सहेंगे? मेरे मित्र, नाते-रिश्तेदार क्या सोचेंगे मेरे बारे में, जब शाही उन्हें बताएँगे कि एक आत्मा से मिलने मैं यहां आ पहुँचा था और काल का ग्रास बन गया। मुझे अपनी कविता की डायरियों के साथ आत्माओं के विवरणवाली डायरी भी याद आई.… सब उसे मेरे बाद देखेंगे, पढ़ेंगे और यही सोचेंगे कि आत्माओं के पीछे दौड़ते-दौड़ते मैं अपनी हस्ती मिटा बैठा। सोचते-सोचते हृद्कंप होने लगा, अजीब-सी बेचैनी होने लगी। कलेजा मुँह को आ पहुंचा। …

उस अभेद्य अंधकार में, उस निस्तब्ध काली रात में और दुर्निवार विचारों की सघनता में समय का बोध कहीं खो गया और वह क्षण-विशेष, जिसकी मैंने बेसब्र प्रतीक्षा की थी, कब आ धमका, मैंने जाना ही नहीं।
अचानक झड़बेरी के पत्तों और डालियों में जोरदार खड़खड़ाहट हुई, जैसे किसी ने पूरी शक्ति से उस वृक्ष को झकझोर दिया हो। मेरा जी उस स्वर से काँप उठा, दिल बुरी तरह धड़कने लगा। रोंगटे उठ खड़े हुए। अब सीढ़ियों पर जमे रहना असंभव था, मैं उठ खड़ा हुआ। मैंने नज़रें घुमा कर चारों ओर देखा--दूर-दूर तक कोई नहीं था। मैं क्षिप्रता से दायीं तरफ घूमता हुआ पलटा। सीढ़ियों से थोड़ा नीचे झड़बेरी की जड़ें थीं। दायीं और घूमते हुए क्षणांश में मैंने एक काली छाया को देखा। देखा कि वह छाया सीढ़ियों के ऊपर आने का यत्न कर रही है। मेरी अंतरात्मा में ऐसा भय व्याप्त हुआ कि मैं वहीं अपने प्राण छोड़, तीन-तीन सीढ़ियां एकमुश्त लांघता, बेतहाशा भागा। उसके बाद मैंने पीछे पलटकर नहीं देखा, बस भागता ही गया। मुझे अपनी श्वांस-गति पर ध्यान देने का होश ही कहाँ था! एक विचित्र श्वसन-क्रिया का तीव्र स्वर मैंने अवश्य सुना था, किन्तु ज्ञात नहीं था कि वह स्वर मेरी ही नासिका से प्रस्फुटित हो रहा था।…

निमिष काल में मैं घाट के शीर्ष पर था, लेकिन मैं रुका-ठहरा नहीं, दौड़ता हुआ सीधे शाही के समीप पहुँचा। शाही ने दूर से ही मुझे दौड़ते हुए देख लिया था, घबराकर वह उठ खड़े हुए थे। क्षिप्रता से आगे बढ़कर उन्होंने मुझे अपनी बलिष्ठ भुजाओं में भर लिया था और मैं हतचेत होकर उनकी बाँहों में झूल गया था।…

दस-एक मिनट बाद, मैं जल से भीगा अपना चेहरा लिये सचेत हुआ। चाय-दुकान का मालिक, उसके नौकर-चाकर और कुछ ग्राहक मुझे घेरकर खड़े थे। देर तक मैं चुपचाप सिर झुकाये शाही की प्रगल्भ फटकार सुनता रहा। फिर उन्होंने मुझे पानी पिलाया। दुकान के मालिक स्वयं मेरे लिए चाय ले आये और चाय की शीशे की गिलसिया थमाते हुए बोले--'यहाँ तो अच्छे-अच्छे डर जाते हैं साहब! आपको अकेले नीचे जाना ही नहीं चाहिए था।' मेरे पास कुछ बोलने की शक्ति नहीं बची थी। मैं चुप रहा और चाय पीने लगा। शाही सिगरेट ले आये। चाय के बाद हमने सिगरेट सुलगाई और उसे पीने लगे। आसपास जमा लोग धीरे-धीरे खिसक गए।
थोड़ी देर बाद शाही ने पूछा--'अब कैसा लग रहा है?'
मैंने कहा--'हाँ, अब ठीक हूँ।'
उन्होंने कहा--'हो गई न तुम्हारी ज़िद पूरी? चलो, अब हम भी धीरे-धीरे चलते हैं।'

मैं कुछ बोला नहीं। एक पराजित अन्वेषक की तरह उनके साथ चल पड़ा, उस ओर जहां हमारी साइकिल थी।.…
(क्रमशः)

2 टिप्‍पणियां:

अनाम ने कहा…

आश्चर्यजनक !
वैसे कुछ कुछ अंदाजा था मेरा कि ऐसा होगा इस कड़ी मे.
बहरहाल आपके यह अनुभव मेरे लिए भी यादगार रहेंगें

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

हमारे प्राण तो इस भाग को पढते हुए ही कांपने लगे...आपकी दशा समझ सकते हैं हम.