शुक्रवार, 3 मार्च 2017

और वह शांत हो गये...

बहुत पहले जयपुर गया था। जाता रहता था वहाँ । तब जयपुर में बड़ी दीदी का निवास था। उनके पड़ोसियों से भी आत्मीय संबंध हो गये थे। दीदी के घर के ठीक सामनेवाले घर में एक बुजुर्ग थे। जयपुर जब जाता, वह बड़े स्नेह से मिलते। खूब बातें करते।

दरअसल हुआ यह था कि किसी एक यात्रा में राजस्थान-भ्रमण पर लिखी अपनी एक कविता मैंने दीदी को सुनायी थी और उसकी प्रतिलिपि वहीं छोड़ आया था। बाद में दीदी ने वह कविता 'राजस्थान पत्रिका' को भेज दी। जब वह कविता पत्रिका में छप गयी तो दीदी आस-पड़ोस में सोल्लास सबको बता आयीं कि यह मेरे भाई की कविता है। तभी से उन बुजुर्ग का मुझ पर अतिरिक्त स्नेह हो आया था, वह मुझे पकड़ बिठाते और पूछते, 'इन दिनों नया क्या लिखा है? कुछ सुनाइये।' मैं भी उल्लसित होता और उन्हें अपनी नयी रचनाएँ सुनाता। उनके परिवार के लोग भी मुझे जान-पहचान गये थे। उन्हें मालूम था कि जब मैं आ गया हूँ तो दादाजी के पास लंबा बैठूँगा। जयपुर में मेरी अनुपस्थिति दीर्घकालिक हो जाती तो दीदी से पूछते रहते, 'कब आयेंगे आनन्दजी?'

मैं जान गया था, उनकी मुझमें आन्तरिक प्रीति है। साहित्य में उनकी रुचि थी, यह तो स्पष्ट ही था। लेकिन कई वर्ष बाद, इस बार की यात्रा में, वह बुजुर्ग कहीं दिखे नहीं--न बारामदे में बैठकर अखबार पढ़ते हुए, न अहाते के पौधों को जल से सींचते हुए। मुझे हैरत हुई। लेकिन कई वर्षों बाद दीदी के पास आया था, बहुत-सी बातें एकत्रित हो गयी थीं करने की और मेरी दोनों भांजियाँ इतनी स्नेही थीं कि मुझे छोड़ती ही नहीं थीं। लिहाजा, दादाजी की बावत कोई बात नहीं हुई।

प्रवास के दो दिन बीत गये। तीसरे दिन, सुबह के वक्त उन्हीं बुजुर्ग के घर से एक युवक दीदी के पास किसी काम से आये। उन्होंने मुझे और मैंने उन्हें पहचान लिया। उन्होंने जैसे ही 'नमस्ते अंकल' कहा, मैंने पूछा--'भाई! दादाजी कहाँ है, जबसे आया हूँ, दिखे नहीं।'
उन्होंने थोड़ी उदासी से कहा--'वह शांत हो गये अंकल!'
मैं कुछ समझा नहीं। यह मेरे लिए एक नव्य प्रयोग था। मैंने तत्काल पूछा--'क्यों? पक्षाघात वगैरह कुछ हुआ क्या? वह शांत क्यों हो गये?'
मेरे प्रश्न पर उन्हें आश्चर्य हुआ, बोले--'नहीं-नहीं, मेरा मतलब है, वह पूरे हो गए।'
मैं कुछ बोला तो नहीं, लेकिन मन में ये ख़याल आया कि वह अधूरे कहाँ थे कि पूरे हो गये? लेकिन 'पूरे हो गये' शब्दों के प्रयोग से इस आशंका ने सिर उन्नत किया था कि कहीं उन्हें कुछ हो तो नहीं गया? तभी दीदी आयीं, उन्होंने बालक से आने का कारण पूछा और मैंने उनसे दादाजी के बारे में जिज्ञासा की। दीदी ने कहा--'अब तो कई महीने हो गये उनको गुजरे।' दीदी के कथन से 'शांत होने' का अर्थ अब मेरी समझ में आया। इस  सूचना से मन व्यथित हुआ। वह युवक जब अपना प्रयोजन सिद्ध करके चले गये और मेरे मर्म की व्यथा कुछ शांत हुई तो मस्तिष्क इस 'शांत' होने का मर्म समझने में व्यस्त हो गया।

मैं ठहरा बिहारी आदमी, सीधी बात सीधे समझता हूँ, टेढ़ी बातें अव्वल तो समझ में आती नहीं और अगर आ गयीं तो फिर टेढ़ी ही करता हूँ। किसी के शांत हो जाने से कैसे मान लूँ कि वह गुज़र ही गया?
 'वक्ता अपना भाषण देकर शांत बैठ गये।' क्या इसका अर्थ यह निकालूँ कि वक्ता अपना भाषण देकर बैठे और मर गये।

कक्षा में बच्चे जब बहुत शोर मचाते हैं तो मेरी श्रीमतीजी उन्हें अक्सर आदेश देती हैं--'बच्चों, शांत हो जाओ।' और बच्चे शांत हो जाते हैं। इस कथोपकथन का क्या अर्थ-अभिप्राय लूँ?
एक अन्य उदाहरण पर गौर करें--'डॉक्टर परिचर्या में लगे हैं और मरीज शांत लेटा है।' अगर मरीज शांत ही हो गया है, तो फिर डॉक्टर परिचर्या क्यों और किसकी कर रहे हैं? बिहारी होकर ऐसा अनर्थ मैं तो कदापि नहीं निकाल सकता। वाक्य जो सीधा अर्थ प्रकट कर रहा है, उसे ही ग्रहण करूँगा।

बात पीड़ादायक थी, लेकिन उस दिन, देर रात तक, 'शांत होने' को लेकर नये-नये शगूफ़े बनते रहे और जीजाजी-दीदी-बच्चों के साथ घर में हँसी के फव्वारे छूटते रहे। बात यहाँ तक आ पहुँची कि तय हुआ कि अब हमें शांत नहीं रहना है, बोलते-बतियाते, चलते-फिरते रहना है। दीदी की छोटी बिटिया गुन्नू तब बहुत छोटी थी, अचानक उसने पूछ लिया--'लेकिन मामा, जब रात में हमलोग सो जायेंगे, कैसे बोल सकेंगे, तब तो सबको शांत होना ही पड़ेगा न?' वह छोटी थी, पर उसने बात पते की पूछी थी। मैं भी चक्कर में पड़ा, क्या उत्तर दूँ उसे? हँसी-हँसी में कैसी गलत धारणा उसके मन में बद्धमूल हुई जा रही है। मैंने सोच-विचार कर उससे कहा--'जब हम सो जाते हैं तो भगवान् हमें शांत नहीं होने देता, वह हमें स्वप्न देता है, करवटें लेने, खर्राटे लेने को बाध्य कर अशांत रखता है।'

मैंने गुन्नू को तो समझा दिया, लेकिन अपने मन का ही समाधान नहीं हुआ। जब सोने गया तो इस चिन्ता ने देर तक सोने न दिया कि कहीं सोते ही मैं शांत हो गया तो? इस 'तो' का उत्तर देने वाला वहाँ कोई नहीं था।

हमारी बोलचाल में भाषा और शब्द-प्रयोग की ऐसी-ऐसी व्यंजनाएँ हैं कि सुनकर बड़ी उजलत और कोफ़्त होती है। यहाँ पुणे में मेरी मेड अक्सर मुझसे पूछती है--'पापा, आपको चाय बना दूँ?' और कई बार उत्तर में मैं उससे कह चुका हूँ कि मुझे चाय मत बनाओ, चाय को बना दो।' मेरा उत्तर सुनकर वह बात समझती और हँसती भी है, लेकिन हर बार प्रश्न यही करती है। यहाँ आप किसी के घर जाइये, आपसे कुछ यूँ पूछा जाएगा--'चाय चलेगी आपको?' मन में आता है, कहूँ मेजबान से--'आप चाय से ही पूछ लीजिए न, क्या वह चलेगी मुझको?'

खैर, पुणे तो अहिन्दीभाषी क्षेत्र है, यहाँ मराठी का बोलबाला है, हिन्दी पर भी उसी का प्रभाव-प्रभुत्व है; लेकिन सुदूर पश्चिम चले जाइये, जहाँ खड़ीबोली हिन्दी का वर्चस्व है, वहाँ भोजन करते वक्त आपसे पूछा जाएगा--'आपको एक रोटी डाल दूँ?' इच्छा होती है, मेजबान से कहूँ--'नहीं, कुत्ते को डाल दीजिए, वह बाहर ही दुम हिलाता बैठा होगा।' लेकिन मुझे शांत रहना पड़ता है।...

हिन्दी में ऐसे शब्द-प्रयोगों की कमी नहीं है। शब्दों से मनचाहे अर्थ निचोड़ लिए जाते हैं और वे सर्व-स्वीकृत होकर प्रचलन में स्थायी भाव में रहते हैं। ऐसे अनेक उदाहरण और दिये जा सकते हैं, जिन्हें सुन-सुनकर सिर धुनने की इच्छा होती है और कभी-कभी तो 'शांत' हो जाने की भी।...

7 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (05-03-2017) को
"खिलते हैं फूल रेगिस्तान में" (चर्चा अंक-2602)
पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "ट्रेन में पढ़ी जाने वाली किताबें “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

sadhana vaid ने कहा…


बात कई साल पुरानी है ! एक बार औरंगाबाद में एक रेस्टोरेंट में हम लोग जलपान के लिए गए ! हम पाँच लोग थे और वहाँ हर टेबिल के साथ चार लोगों के बैठने के लिए चार कुर्सियां ही लगी थीं ! पिताजी ने मैनेजर से एक और कुर्सी की व्यवस्था करने का और चाय जल्दी भिजवाने का अनुरोध किया ! उसने ज़ोर से आवाज़ देकर वेटर को आदेश दिया "साहब को जल्दी से एक कुर्सी मारो और फिर पाँच चाय मारो !" हिन्दी की ऐसी दुर्गति देख कर हम लोग दंग थे ! वहाँ आज भी शायद ऐसी ही भाषा का प्रयोग होता हो !

yashoda Agrawal ने कहा…

शुभ प्रभात
कई जगह कहा जाता है शांत हो गए
पर पूरे हो गए पहली बार पढ़ी
हर बीर मील पर भाषा-बोली का बदलाव होता ही है
सादर

M. Rangraj Iyengar ने कहा…

ऐसी भाषा अनसुनी नहीं है. गुजरात में कहा जाता है ऑफ हो गए. कुछ जगहों पर ठंडे हो गए भी प्रचलित है.

Manav Mehta 'मन' ने कहा…

अच्छी पोस्ट

सु-मन (Suman Kapoor) ने कहा…

बढ़िया व् रोचक पोस्ट