सोमवार, 27 मार्च 2017

अनजाने-से दिनकर...

वो गुज़रा हुआ ज़माना...(2)
सन् 1972 में जब मैं 'दिनकर की डायरी' की पाण्डुलिपि पर काम कर रहा था और दिनकरजी के पूज्य चरणों में बैठने का मैंने सौभाग्य पाया था, उन्हीं दिनों की बात है। डायरी का काम पूरा होने में डेढ़ महीने लग गये थे। फिर, लोहे की चादर का एक बड़ा-सा बाॅक्स मैंने दिनकरजी के कमरे में रखा देखा था। मेरी जिज्ञासा पर उन्होंने एक शेर सुनाकर मुझसे कहा था--
"चंद तस्वीरें बुताँ, चंद हसीनों के ख़ुतूत
बाद मरने के मेरे घर से सामाँ निकला।'
'हम लेखकों-कवियों के पास और होता ही क्या है! अरे, इसमें बहुत-सी तस्वीरें हैं और पुरानी चिट्ठियों का ज़ख़ीरा है, लेकिन सब गड्डमड पड़ा है !"
मैंने उसे व्यवस्थित करने का जिम्मा स्वयं उठा लिया और दो दिनों के लिए दिनकरजी के कक्ष पर अपना आधिपत्य जमा लिया था। पूरे कमरे में चिट्ठयाँ-ही-चिट्ठयाँ फैल गयी थीं। उसी बक्स से निकली थीं पिताजी की सन् 1937 की तीन-चार चिट्ठियाँ, जिन्हें देखकर मैं रोमांचित हो उठा था। मैंने दिनकरजी को पिताजी के वे पत्र दिखाये तो उन्होंने मुझसे सहज ही कहा था-- "मेरी प्रारंभिक कई कविताएँ मुक्तजी ने ही 'बिजली' में प्रकाशित की थीं।"

पटना में 'बिजली' की पुरानी जिल्द देखते हुए मुझे दिनकरजी के कथन की सत्यता के दर्शन भी हुए थे, जब उनकी कई रचनाएँ मैंने सन् 37 की जिल्द में प्रकाशित देखी थीं । सन् 1937 से 2017-- अस्सी वर्षों का विशाल कालखण्ड, एक युग के अवसान की मार्मिक अनुभूति हुई! अपनी बाल्यावस्था से युवावस्था तक मैंने दिनकरजी को जैसा देखा-जाना था, उस अद्भुत और दिव्य स्वरूप से बिलकुल भिन्न युवावस्था के दिनकरजी मुझे 'बिजली' में मिले और मैं विस्मित-अभिभूत हो उठा। क्या आप बिजली-काल के दिनकरजी के दर्शन नहीं करना चाहेंगे? उनकी प्रकाशित तत्कालीन किसी कविता की क्लिपिंग तो मुझसे हड़बड़ी में छूट गयी है, लेकिन आपके साथ साझा करने के लिए उनकी तस्वीर मैं जरूर साथ ले आया हूँ। संभव है, इस चित्र में दिनकरजी आपको भी अजाने-से लगें। दिनकरजी की किसी पुस्तक, किसी चित्रावली में, कहीं यह चित्र मैंने देखा हो, यह मेरी स्मृति में तो नहीं है।...
(क्रमशः)
(चित्र : सन् 1937 के दिनकरजी, 'बिजली' की फाइल से।)

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरूवार (30-03-2017) को

"स्वागत नवसम्वत्सर" (चर्चा अंक-2611)

पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'