रविवार, 11 नवंबर 2018

शब्द-निःशब्द

जब तुम प्रयासपूर्वक निचोड़ते हो
शब्दों से अतिरिक्त अर्थ,
शब्दों को अच्छा नहीं लगता,
वे मुँह फुलाकर बैठ जाते हैं
और करीब बैठे शब्द से
बस, इतना ही कह पाते हैं--
'दोस्त ! बहुत दोहन हो रहा है मेरा!'

बगलगीर शब्द सांत्वना देते हुए
कहता है--
'फ़िक्र मत करो,
बहुत चबाकर उगले हुए शब्दों को
निचोड़ने से कुछ हासिल नहीं होता,
तुम्हारा निहितार्थ, तुममें ही रहता है--
चुपचाप...!
निचोड़नेवाले की उँगलियों में ही
दर्द होता है--बेपनाह...!!

(--आनन्द, 13/06/2018.
)

3 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (13-11-2018) को "छठ माँ का उद्घोष" (चर्चा अंक-3154) पर भी होगी।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

अनीता सैनी ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.
अनीता सैनी ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना 👌