मंगलवार, 4 मई 2010

सच, 'बौरा डूबन डरा...'

[आत्म-निरीक्षण]

एक दिन मुझसे कहा उन्होंने--
'आओ मेरे साथ,
सागर में उतरो,
गहरी भरकर सांस
यार, तुम डुबकी मारो;
क्या जाने सागर कब दे दे--
रंग-बिरंगे रत्न और
एक सच्चा मोती !'

चला गया मैं सागर-तट पर
रहा सोचता बहुत देर तक--
साहस संचित कर
बहुत-बहुत श्रम करना होगा,
गहरी साँसें भर,
सागर में मुझको गहरे धंसना होगा !
श्रम की आकुल चिंता से
भय-भीरु बना मैं--
रहा किनारे बैठ !

सागर ने अपने गर्जन-तर्जन से
मुझको थोड़े शब्द दे दिए,
तट पर छोड़ गया जो सागर--
चिकने पत्थर, कंकड़-सीपी
चुनकर उनको मैंने अपनी
अंजुरी भर ली ;
उसने मुझको मुद्राएँ दीं,
उच्चावच लहरों ने मुझको संज्ञाएँ दीं,
सम्यक शोध-समन्वय का
अद्भुत सौम्य विचार दिया,
भाव-बोध का सचमुच उसने
मुझको पारावार दिया !

इस जीवन में
रहा खेलता उनसे ही मैं !
जितना मिला,
उसीसे मैं तो तृप्त रहा !
जुगनू-सा मेरा जीवन यह
बुझा-बुझा-सा दीप्त रहा !

बस थोड़े-से शब्द,
चिकने पत्थर, कंकड़-सीपी,
अनछुई मुद्राएँ
अनाहत संज्ञाएँ,
भाव-बोध और सद्विचार--
इतना कुछ, क्या कम है ?
वैसे, जीवन से मैंने जाना--
करना हर क्षण श्रम है !

गहरे नहीं उतरने का
मुझको क्षोभ नहीं है !
मन पर मेरे अवसादों का
बिलकुल बोझ नहीं है !!

किन्तु, बन्धु !
सच है,
मैं 'बौरा डूबन डरा...
जो रहा किनारे बैठ !'

12 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

किन्तु, बन्धु !
सच है,
मैं 'बौरा डूबन डरा...
जो रहा किनारे बैठ

-बहुत जबरदस्त! वाह!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

ओझा जी!
आत्म-निरीक्षण के साथ आपका गवेषणात्मक चित्र बहुत ही बढ़िया रहा!

kshama ने कहा…

किन्तु, बन्धु !
सच है,
मैं 'बौरा डूबन डरा...
जो रहा किनारे बैठ !'
Haan...shayad ham sabhi is avasthase kabhi na kabhi guzarte hain...aapne abhiwyakt behad sanjeedgee aur khoobsoortise kiya hai!

वन्दना ने कहा…

बेहद गहन अभिव्यक्ति…………………आत्ममंथन करने को मजबूर करती रचना अन्दर तक भिगो गयी।

वाणी गीत ने कहा…

सागर ने अपने गर्जन-तर्जन से
मुझको थोड़े शब्द दे दिए...
और ये थोड़े से शब्द ही तो जीवन की कुल जमा पूंजी है ...
गहरे नहीं उतरने का मुझको क्षोभ नहीं है !
मन पर मेरे अवसादों का बिलकुल बोझ नहीं है !!

मन यहाँ सहमत था ...बोझ तो नहीं रहना चाहिए था ...मगर अगले ही पल ...

मैं 'बौरा डूबन डरा...जो रहा किनारे बैठ !'

अपना निर्मम सत्य उजागर हो गया ...

बेचैन आत्मा ने कहा…

..बस थोड़े-से शब्द,
चिकने पत्थर, कंकड़-सीपी,
अनछुई मुद्राएँ
अनाहत संज्ञाएँ,
भाव-बोध और सद्विचार--
इतना कुछ, क्या कम है ?
वैसे, जीवन से मैंने जाना--
करना हर क्षण श्रम है !
...वाह! शानदार कविता की जानदार पंक्तियाँ.
..आभार.

बेचैन आत्मा ने कहा…

..बस थोड़े-से शब्द,
चिकने पत्थर, कंकड़-सीपी,
अनछुई मुद्राएँ
अनाहत संज्ञाएँ,
भाव-बोध और सद्विचार--
इतना कुछ, क्या कम है ?
वैसे, जीवन से मैंने जाना--
करना हर क्षण श्रम है !
...वाह! शानदार कविता की जानदार पंक्तियाँ.
..आभार.

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

इस जीवन में
रहा खेलता उनसे ही मैं !
जितना मिला,
उसीसे मैं तो तृप्त रहा !
जुगनू-सा मेरा जीवन यह
बुझा-बुझा-सा दीप्त रहा !
कितना अद्भुत जीवन दर्शन. बहुत सुन्दर.

Pratik Maheshwari ने कहा…

भावों को बहुत ही गहराई से कहा आपने..
भले ही सागर में गोता नहीं लगाया पर जिस गहराई से आपने यह कविता लिखी है वो सागर जैसी ही गहरी थी..
बहुत बढ़िया..
आभार

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

मुझे इस बात का बहुत खेद है कि
मैं आपकी अच्छी रचनाएँ
पढ़ने के लिए
आपके ब्लॉग पर
जल्दी-जल्दी नहीं आ पाता हूँ!

--
आज ख़ुशी का दिन फिर आया!
ख़ुशी : यश तिवारी की अँगरेज़ी कविता का हिंदी भावानुवाद!
--
संपादक : सरस पायस

अपूर्व ने कहा…

आपकी इस कविता के बहाने हमें अपनी आत्म-तुष्टि की निस्सारता के दर्शन होते हैं..किनारे के कंकड़-सीपी-शंख चुन कर जब हम अपनी समृद्धि पर बालवत्‌ खुश हो रहे होते हैं..तब हमारे सामने पड़ा संभावनाओं का निस्सीम समुद्र हमारी कष्ट-भीरुता पर हँस ही रहा होता है..यह सबकी कहानी है..जीवन मे जितना ग्रहण कर पाते है उसके अनुपात मे बहुत अधिक को अप्राप्य मान कर छोड़ चुके होते हैं..यहाँ कबीरदास जी की लेखनी को आपने और स्पष्ट आकार दिया है..
उच्चावच लहरों से संज्ञाएं लेने की बात तनिक समझ नही आयी...

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

मेरे सच को स्वीकारोक्ति देनेवाले आप सभी बंधुओं का आभारी हूँ !
अपूर्वजी, 'संज्ञा' के अर्थ-समूह में एक अर्थ है--'चेतना' ! 'उच्चावच लहरों ने मुझको संज्ञाएँ दीं', पंक्ति में 'संज्ञा' इसी अर्थ में प्रयुक्त हुआ है ! ऊँची-ऊँची लहरों ने मुझको बार-बार सचेतन किया, चेताना दी ! आभारी हूँ !
--आ.