सोमवार, 31 मई 2010

परती पर परिकथा लिखनेवाले शिल्पी : 'रेणु'

[गतांक से आगे]

रेणुजी के अद्वितीय कथा-लेखन से सारा देश परिचित है, किन्तु बहुत कम लोग जानते हैं कि 'मैला आँचल' जैसे अप्रतिम आंचलिक उपन्यास ने उनकी लेखनी से कहाँ, किस भूमि पर जन्म पाया था। यह तब की बात है, जब मैं एक अबोध शिशु था और अपनी ननिहाल (पटना सिटी में अवस्थित विशाल परिसरवाली खजांची कोठी') में रहता था । पटना सिटी के मंगल तालाब के किनारे एक सरकारी अस्पताल था। राजेंद्र नगर के फ्लैट में आने से बहुत पहले रेणुजी उसी परिसर के एक आवासीय फ्लैट में निवास करते थे। उन फ्लैटों और मेरी ननिहाल के विशाल आहाते के बीच एक दुर्बल नाला था। रेणुजी अपने फ्लैट के पीछे और पिताजी आहाते के छोर पर जा खड़े होते, तो नाले के अवरोध के बावजूद दोनों आसानी से बातें कर सकते थे। रेणुजी से पिताजी का संपर्क-सम्बन्ध उन प्रारंभिक दिनों का था। पिताजी बताते थे कि मंगल तालाब के उसी छोटे से फ्लैट में रहते हुए रेणुजी के मनःलोक में 'मैला आँचल' के स्फुल्लिंग चमके थे और वहीँ उन्होंने उस अनूठे उपन्यास की रचना की थी।
जब मैं थोड़ा बड़ा हुआ और रेणुजी के लिखे को पढने-समझने लायक हुआ, तो विस्मय-विमुग्ध हो उठा। जिनके घर में मैं शैतानियाँ किया करता था, जिनके कुत्ते को नाहक परेशान किया करता था, वह रेणुजी कितने प्रतिभावान और सरस कथा-लेखक हैं--यह जानकार अपने बालपन की नादानियों का मुझे क्षोभ भी हुआ था; लेकिन तब, मेरा मुझ पर जोर भी कहाँ था ! किराए के मकान को बार-बार बदलने के कारण मेरे पिताजी का आवासीय पता रह-रहकर बादल जाता था। सन १९६१ के अंत में हम श्रीकृष्ण नगर के २३ संख्यक मकान में चले गए थे। राजेंद्र नगर से श्रीकृष्ण नगर की दूरी अधिक थी। अब रेणुजी से साप्ताहिक मुलाकातों में विक्षेप होने लगा था। रेणुजी ही कभी-कभी हमारे घर आ जाते और पिताजी से उनकी लम्बी आकाशवाणीय वार्ताएं हुआ करती थीं । अज्ञेय जी की तरह ही रेणुजी भी गंभीर, किन्तु मस्त मन के यायावर कथाकार थे। उनकी सपनीली आँखों में हमेशा कोई कथा-फलक तैरता रहता था। प्रकृत्या बोलते वह भी कम थे, लेकिन जब बोलते थे, दृढ़ता से बोलते थे। बंधन उन्हें प्रिय नहीं था। स्वछन्द जीवन और लेखन उन्हें रास आता था। हाँ, एक बात उन्हें अज्ञेय जी से किंचित अलग रखती थी--आभिजात्य संस्कारों में पाले-बढ़े अज्ञेय जी अपनी सज-धज और परिधान के प्रति बड़े सजग-सावधान थे और इसके ठीक विपरीत रेणुजी बिलकुल बेफिक्र ! बाद के दिनों में ये बेफिक्री और बढ़ती गई थी। ये बात और है कि बाल्य-काल में मैंने उन्हें सूत-बूट और टाई में भी देखा है। घर में वह ज्यादातर चारखाने कि लुंगी और बनियान पहना करते थे।
एक दिन अचानक ही रेणुजी ने आकाशवाणी की सेवा से छुट्टी पा ली थी और कुछ समय बाद पटना-बम्बई की यात्राओं में व्यस्त रहने लगे थे। उनकी एक कहानी 'मारे गए गुलफाम' पर फिल्म का निर्माण हो रहा था। वह उसी सिलसिले में बम्बई की यात्राएं किया करते थे। अब उनसे मिलना-जुलना कम हो गया था। बाद में वह चलचित्र 'तीसरी कसम' के नाम से जनता के सम्मुख आया। सेल्युलाइड पर वैसा कलात्मक चित्र मैंने दूसरा नहीं देखा। लेकिन, बंबई की रंगीन दुनिया भी उन्हें बाँध न सकी। वह अपनी जड़ और ज़मीन से जुड़े रहे--और अंततः पटना लौट आये।
[क्रमशः]

5 टिप्‍पणियां:

माधव ने कहा…

nice

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

उपयोगी श्रंखला लिख रहे हैं आप!

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

ऐसे-ऐसे महारथियों, दिग्गजों के साथ रहे हैं आप, जिनको हमने केवल पढा है. और हमारे लिये किसी कहानी के पात्र की तरह हैं... लेकिन आपको तो उन सब का सान्निध्य मिला है. और हम लोगों को आपका. बहुत सुन्दर श्रृंखला.

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

मंगल तालाब के उसी छोटे से फ्लैट में रहते हुए रेणुजी के मनःलोक में 'मैला आँचल' के स्फुल्लिंग चमके थे और वहीँ उन्होंने उस अनूठे उपन्यास की रचना की थी।

अद्भुत .....!!

मैला आँचल मैंने भी पढ़ी है एम ए के कोर्स में थी ....!!

बहुत दिनों से कम्प्युताए खराब पड़ा था ....ये यादों का खजाना पढ़ नहीं पाई ....!!

Umra Quaidi ने कहा…

लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

http://umraquaidi.blogspot.com/

उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
“उम्र कैदी”