सोमवार, 17 दिसंबर 2012

यादों के आइने में कवि बच्चन...


[नवीं क़िस्त]

कालान्तर में हम हरद्वार होते हुए पटना आ गए। भौतिक दूरियां बढ़ गई थीं, लेकिन बच्चनजी और पिताजी के मन की प्रीति अक्षुण~ण रही। पत्र आते-जाते रहे--बहुत अन्तरंग और आत्मीय पत्र ! बच्चनजी अद्भुत व्यक्ति थे। उन्होंने संघर्षों के दिन भी देखे और आराम-आशाइस  के भी और दोनों स्थितियों में वह दृढ़ता के साथ अविचल भाव से चलते रहे, लिखते रहे। उनकी कविताओं में जीवन-दर्शन को शब्द मिले हैं तो मार्मिक पीड़ा को भी अभिव्यक्ति मिली है। जीवन-संघर्षों की आँच में तपकर उन्होंने मधुगीतों की रचना की है। उन्होंने स्वयं लिखा भी है--
हो खड़े जीवन समर में, हैं लिखे मधु-गीत मैंने !
लेखन उनके जीवन का नियमित व्यायाम सरीखा था। वह निश्चित समय पर अपनी टेबल पर जा बैठते और लिखना प्रारंभ कर देते। वह अपनी लेखानावाधि को 'समाधि में रहना' कहते थे। पिताजी को लिखे अनेक पत्रों में उन्होंने सूचित किया है--"अभी समाधि में हूँ, तुम्हारे पत्र का बाद में विस्तार से उत्तर दूंगा।" उनके पास जीवनानुभवों का खज़ाना था, जिसे वह मुक्तहस्त से जीवन भर पाठकों के बीच बाँटते रहे।

मुझे अच्छी तरह याद है, जब उनकी आत्मकथा का पहला खंड प्रकाशित हुआ था, उसके महीने भर पहले उनका पत्र पटना आया था। उन्होंने पिताजी को आदेशात्मक स्वर में लिखा था--"मैं चाहता हूँ, अमुक.... तारीख को तुम मेरे पास रहो। मार्ग-व्यय की चिंता मत करना, वह मेरी ज़िम्मेदारी है। बस, इसे आदेश समझना और दिल्ली चले आना।" पिताजी जान न सके कि बच्चनजी के इस बुलावे का कारण क्या है। उन्होंने कभी ऐसे आदेश के स्वर में कुछ कहा भी नहीं था। थोड़े संभ्रम में पड़े पिताजी निश्चित तिथि के एक दिन पहले ही दिल्ली जा पहुंचे और मेरे छोटे चाचाजी (स्व. भालचंद्र ओझाजी) के पास राजौरी गार्डन में ठहरे। नियत तिथि को शाम के वक़्त जब पिताजी अपने अनुज भालचंद्रजी के साथ बच्चनजी के आवास पर पहुंचे, तो उन्होंने वहाँ बहुत हलचल देखी। किसी आयोजन की व्यवस्था की गई थी। बच्चनजी पिताजी से बड़े उत्साह से गले मिले। वहाँ अनेक पुराने साहित्यिक मित्र भी उपस्थित थे। एक बड़े-से हॉल में, आयताकार स्वरूप में ज़मीन पर ही मसनद सहित आसन बिछाए गए थे। कार्यक्रम के प्रारंभ में बच्चनजी ने कहा--"मैंने आप सबों को एक विशेष प्रयोजन से यहाँ आमंत्रित किया है। अपनी युवावस्था के दिनों के दो मित्रों को मैंने आदेश देकर कहा था कि वे आज की शाम मेरे साथ व्यतीत करें। मुझे ख़ुशी है कि उन्होंने मेरे आदेश की अवहेलना नहीं की और आज वे दोनों मेरे अगल-बगल में बैठे हैं, उनमें पटना से मेरे परम मित्र मुक्तजी और सुल्तानपुर (अवध) से राजनाथ पांडेयजी पधारे है। ..."

फिल्मों के पार्श्व-गायक महेंद्र कपूर ने गायन प्रस्तुत कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया, फिर अमिताभजी ने भी बच्चनजी की कविताओं का पाठ किया। इसी बीच पिताजी ने देखा कि किसी पुस्तक की दो प्रतियां सभा में उपस्थित गण्यमान्य साहित्यकारों के हाथों में क्रमशः खिसकती आ रही हैं और प्रत्येक सभासद उस पर बारी-बारी से हस्ताक्षर कर रहे हैं। वे प्रतियां जब बच्चनजी के पास पहुँचीं, तो उन्होंने भी उन पर हस्ताक्षर किये और फिर खड़े होकर एक प्रति पिताजी को और दूसरी राजनाथ पांडेयजी को दी। वह बच्चनजी की आत्मकथा के पहले खंड 'क्या भूलूँ क्या याद करूँ' की प्रतियां थीं, जिसे उन्होंने अपने इन्हीं दो मित्रों को समर्पित किया था। यह सौहार्द, यह समर्पण और ऐसी अनूठी प्रीति देखकर पिताजी विह्वल हो उठे थे और उन्होंने बच्चनजी को गले से लगा लिया था। जलपान और चाय-कॉफ़ी के बाद सभा समाप्त हुई थी। 'क्या भूलूँ क्या याद करूँ' की वह दुर्लभ प्रति आज भी मेरे संग्रह में कहीं सुरक्षित है।

पिताजी का वर्चस्व और प्रभामंडल ऐसा था कि  उनका आदेश पाकर ही हवा का झोंका भी उनके कक्ष में प्रविष्ट होता था। वैसे, वह कोमल ह्रदय के, संवेदनशील, मितभाषी और अति स्नेही थे; लेकिन उनके आदेश के विरुद्ध किसी को बोलने का साहस नहीं होता था। संभवतः 1984-85 (संभव है, काल-गणना में त्रुटि हो) में उन्होंने निर्णय लिया कि वह अपनी एक आँख का ऑपरेशन अलीगढ़ में डॉo पाहवा से करवायेंगे और वहाँ अकेले जायेंगे। ऑपरेशन के लिए अकेले जाना निरापद नहीं है, यह मानकर मैंने दबी ज़बान में प्रतिरोध करना चाहा तो उन्होंने मुझे यह कहकर चुप रहने पर विवश कर दिया कि "घर और छोटी बहन की देखभाल के लिए तुम्हारा यहाँ रहना आवश्यक है।" बहरहाल, वह अकेले ही अलीगढ़ गए। वहाँ डॉo पाहवा ने उनकी एक आँख की शल्य-चिकित्सा की। ऑपरेशन के बाद के दस दिनों में उन्होंने बहुत कष्ट उठाये। स्थिति यहाँ तक बिगड़ी कि दिल्ली फ़ोन करके उन्हें छोटे चाचाजी (स्वo भालचंद्र ओझा) को बुलाना पड़ा, जो स्वयं बहुत स्वस्थ नहीं थे। उन्होंने चार-पांच दिनों तक पिताजी की बहुत सेवा की, फिर उन्हीं की तबीयत बिगड़ने लगी। चाचाजी दिल्ली लौट गए। दस दिनों बाद डॉक्टर ने पिताजी को घर जाने की इजाजत दी। पिताजी ने अलीगढ़ से पटना का नहीं, दिल्ली का टिकट लिया और एक आँख पर हरी पट्टी बांधे वह दिल्ली चले गए। दिल्ली में उन्हें वाल्मीकीय रामायण के प्रकाशन के काम से कई मित्रों से मिलना था, जिनमें बच्चनजी का नाम सर्वप्रथम था।

उन दिनों बच्चनजी गुलमुहर पार्क के अपने नए भवन में रह रहे थे। पिताजी सुबह-सबेरे उनके घर पहुंचे। छोटे चाचाजी उन्हें द्वार पर टैक्सी से छोड़ गए थे। घर के लॉन में पड़ी कुर्सियों पर दोनों मित्र बैठे और बातों का सिलसिला शुरू हुआ। पिताजी की आँख पर बंधी पट्टी और उनकी जर्जर दशा देखकर बच्चनजी फूट-फूटकर रो पड़े थे। बच्चनजी की विकलता देखकर पिताजी भी स्वयं को रोक न सके थे। दोनों मित्रों ने आंसुओं की ज़बान में क्या-कुछ कहा-सुना, यह तो मैं नहीं जानता; लेकिन यह सच है कि जब पिताजी वहाँ से विदा हुए तो घर से बाहर आकर जाने क्यों उस भवन के लौह्द्वार को उन्होंने प्रणाम किया था। क्या उन्हें प्रतीति हो गई थी कि  अब कभी बच्चनजी से उनकी मुलाक़ात नहीं होगी? पिताजी का यह प्रणाम ही उनका अंतिम प्रणाम सिद्ध हुआ।...
[क्रमशः]

3 टिप्‍पणियां:

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

हृदयस्पर्शी वर्णन!

ई. प्रदीप कुमार साहनी ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (19-12-12) के चर्चा मंच पर भी है | अवश्य पधारें |
सूचनार्थ |

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

आनंद भैया ,लगातार, हर क़िस्त पढ़ रही हूँ और एक क़िस्त ख़त्म होने से पहले ही अगली क़िस्त का इन्तेज़ार शुरु हो जाता है
क्या लिखते हैं वाक़ई मज़ा आ जाता है सब कुछ जैसे जीवंत हो उठता है ,इतना सरल और सहज लेखन है आप का कि कहीं कोई कठिनाई महसूस नहीं होती न भाषाई और न किसी और प्रकार की