बुधवार, 5 दिसंबर 2012

यादों के आइने में कवि बच्चन...


[दूसरी क़िस्त]


सन 1970 में मैं पिताजी के साथ पहली बार दिल्ली गया था. तब मैं 18 वर्ष का था और दिल्ली-दर्शन के उत्साह से भरा हुआ था. हम चाँदनी चौक के कटरानील में प्रसिद्ध संस्कृतज्ञ पं. रामधन शर्माजी के यहाँ ठहरे थे. वह पिताजी के परम मित्र और बड़े भाई-जैसे थे. पिताजी प्रतिदिन अपने मित्रों से मिलने चले जाते और मैं दिल्ली-दर्शन के लिए निकल पड़ता; लेकिन जिस दिन पिताजी बच्चनजी से मिलने जाने लगे, मैं भी उनके साथ गया था. 13 विलिंगटन क्रिसेंट संख्यक एक बंगले में उनका निवास था. वह विशाल अहाते के बीचो-बीच बना खासा बड़ा बँगला था. कॉल बेल बजाने पर एक सेवक ने द्वार खोला और हमें ड्राइंग रूम में बिठा गया. मैं बैठक को निहार रहा था--उसे सुरुचि से सजाया गया था. जल्दी ही एक लंबा गाउन धारण किये बच्चनजी आ गए, फिर तेजीजी आयीं. पिताजी बच्चनजी से  हुलसकर मिले. मैंने दोनों के चरणों का स्पर्श किया. पिताजी बच्चनजी से बातें करने लगे और मैं विमुग्ध-सा उनकी बातें सुनता रहा. थोड़ी देर बाद शीतल पेय और बर्फी की प्लेट लेकर सेवक ड्राइंग रूम में आया. तेजीजी ने आग्रहपूर्वक हमें बर्फियाँ खिलाईं और शीतल पेय पीने को दिया. तब तक मैं बच्चनजी की अनेक पुस्तकें पढ़ चुका था और मेरे पास अपने कई सवाल थे, जिज्ञासाएं थीं, जिनका समाधान मैं बच्चनजी से चाहता था; लेकिन पिताजी और बच्चनजी की आत्मीय वार्ता विराम लेने का नाम ही नहीं ले रही थी. मैं अपने सवालों को मन में लिए कसमसा रहा था, तभी बच्चनजी के कनिष्ठ पुत्र अजिताभजी (अजिताभ बच्चन) कमरे में आये. उन्होंने पिताजी के चरण छुए और मैंने उनके. थोड़ी-बहुत औपचारिक बातों के बाद वह मुझे बाहर ले गए. मैं उनके साथ बाहरी दालान और आहाते में घूमते हुए बातें करता रहा. दालान में छोटे-बड़े प्रस्तर खण्डों को तराश कर और कूची-कलाम-ब्रश से उसे रंगकर आकार देने की चेष्टा की गई थी और उन्हें करीने से सजाकर रखा गया था. घर से बाहर निकलते ही एक वृक्ष के नीचे छोटे-छोटे पत्थरों को तरतीब से सजाकर उन्हें एक मंदिर का स्वरूप दिया गया था. तब मेरे पास आगफा क्लिक-3  नामक श्वेत-श्याम चित्र खींचनेवाला एक साधारण कैमरा था. मैंने उसीसे अजिताभ भैया और मंदिर का चित्र लिया. बंगले की एक परिक्रमा करके हम पुनः घर में दाखिल हुए और सोफे पर बैठ गए.

बच्चनजी और पिताजी की वार्ता के बीच व्यवधान डालते हुए मैंने मौक़ा देखकर अपनी पॉकेट डायरी निकाली और बच्चनजी की ओर बढ़ाते हुए कहा--"इसमें ज़िन्दगी के बारे में कुछ लिख दीजिये." उन्होंने डायरी ले ली और एक क्षण कुछ सोचकर डायरी में जो कुछ लिखा, उसे शब्दशः मैं यहाँ रख रहा हूँ : "जीवन को बहुत गंभीरता से नहीं लेना चाहिए. उसे एक खेल समझो और आनंद से खेलो.--बच्चन." दो-ढाई घंटे की इस मुलाक़ात में मैंने अपने अटपटे प्रश्नों से बच्चनजी को खूब प्रसन्न किया. उन्होंने मेरे कई प्रश्नों पर ठहाके लगाये और कई प्रश्नों को मुस्कुराकर टाल गए. जब हम घर से बहार निकले तो मैंने बच्चनजी से उस मंदिर के बारे में पूछा. वह आनंदित हुए और बोले--"मैं सुबह की सैर पर रोज़ जाता हूँ. यह नियम मैंने कभी नहीं तोड़ा. कई वर्ष पहले मैं बहुत दूर तक टहलता हुआ निकल जाता था और लौटते हुए रास्ते का कोई आकर्षक पत्थर उठा लाता था. उन्हीं पत्थरों से मैंने इस मंदिर का निर्माण किया है. अब तो इस मंदिर पर ऐसी श्रद्धा हो गई है कि जब भी घर से बाहर जाता हूँ, यहीं शीश नवाता हुआ निकलता हूँ." मैंने आग्रह करके तेजीजी और अजित भैया के साथ चित्र खिंचवाया और प्रणाम निवेदित करके हम लौट पड़े.

दिल्ली में हुई इस मुलाक़ात के बाद बच्चनजी से मेरे पत्राचार की गति बढ़ गई थी. परिवार की हर छोटी-बड़ी बात की सूचना दिल्ली से पटना और पटना से दिल्ली पत्रों द्वारा आती-जाती रही. अधिक पत्र तो पिताजी के नाम आते, लेकिन मेरा भी कोई पत्र निरुत्तरित नहीं रहता. पिताजी की पत्र-मंजूषा में बच्चनजी के आत्मीय पत्रों की संख्या शताधिक ही होगी, वह भी तब से, जब से मैंने उन्हें सहेजकर रखना शुरू किया.
[क्रमशः]

8 टिप्‍पणियां:

Himanshu Kumar Pandey ने कहा…

मुग्ध भाव से पढ़ गया दोनों प्रविष्टियाँ!
"शती के साथी : बच्चन" नामक संस्मरण क्या पुस्तक रूप में है? यदि हाँ..तो कहाँ से प्रकाशित है?

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

आप का लेखन एक फ़िल्म की तरह चित्रों को साकार कर के आँखों के समक्ष ला देता है और उस पर स्व. मुक्त जी और बच्चन जी के शब्दों का समावेश चार चांद लगा रहा है इस संस्मरण में

ashish ने कहा…

बिना रुके पढ़ते गए , अब इंतजार अगली कड़ी का

सदा ने कहा…

यादों के आइने में कवि बच्‍चन जी और बाल मन की जिज्ञासाएं सहज़ ही आ‍कर्षित करती हैं ... अनुपम प्रस्‍तुति

आभार

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

हम पढ रहे हैं चुपचाप...
कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं, जिन्हें हम बिना किसी व्यवधान के पढना चाहते हैं...लेकिन क्रमश: जैसा शब्द व्यवधान डाल ही देता है :(

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

हिमांशुजी,
आपकी टिपण्णी के लिए आभारी हूँ !
प्रश्न के उत्तर में 'हाँ' और 'ना' दोनों कहूँ तो ? बहुत पहले ओंकार शरद और डॉ. अजित कुमार के सम्पादन में राजपाल प्रकाशन, दिल्ली से एक पुस्तक प्रकाशित हुई थी--'बच्चन निकट से.' पिताजी का संस्मरण शती के साथी : बच्चन' उसमें 'एक अन्तरंग झांकी' के नाम से छापा था, संभवतः बच्चनजी की षष्ठिपूर्ति पर. कालान्तर में पिताजी ने इसमें कई प्रसंग और जोड़ के उसे नया नाम दिया और अपनी पुस्तक 'पहचानी पगचाप' में संकलित किया. उनके जीवनकाल में यह पुस्तक छाप न सकी, इसका मुझे गहरा क्षोभ है. शीघ्र ही मैं इसे छापूंगा.
सप्रीत--आ.

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

आशीषजी, सदाजी, बहन इस्मत,
संस्मरण लंबा जाएगा. आप सभी पढ़ते जाने का हौसला बनाये रखें ! आभारी हूँ !
वंदनाजी, 'क्रमशः' को तो झेलना ही पडेगा. बूढी होती आँखें अब अधिक अंखफोड़वा कर्म करने की इजाज़त नहीं देतीं ! आभार !!

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

:)