मंगलवार, 10 दिसंबर 2013

याद आते हैं गंगा चाचा...

 [दूसरी कड़ी]

गंगा चाचा मस्तमौला मन के प्रसन्नचित्त व्यक्ति थे। सबसे खुले ह्रदय से मिलते थे।  सन १९७२ में जब मैं पहली बार पिताजी और बड़ी बहन के साथ दिल्ली गया था, तब गंगा चाचा राज्यसभा के सदस्य थे और वेस्टर्न कोर्ट में सांसदों के एक फ्लैट में उनका निवास था। पिताजी ने उन्हें फ़ोन किया और मिलने कि इच्छा ज़ाहिर की। उन्होंने कहा कि "तुम दोनों बच्चों को भी साथ ले आओ। मेरे पास सुबह का ही वक़्त है, फिर तो संसद जाना है। बच्चे अगर संसद-दर्शन करना चाहेंगे, तो उन्हें भी साथ ले चलूँगा।" हमें बिन माँगे  ही मन की मुराद मिल गई थी। दूसरे दिन सुबह-सुबह हम दोनों पिताजी के साथ वेस्टर्न कोर्ट पहुंचे। गंगा चाचा पिताजी से मिलकर प्रफुल्लित हो उठते थे, उनके साथ हमें देखकर उस दिन वह बहुत प्रसन्न हुए थे और छोटे बच्चों-जैसा व्यवहार हमारे साथ कर थे, जबकि बड़ी दीदी एम० ए० की छात्रा थीं और मैं स्नातक का विद्यार्थी था। उनका यह वत्सल स्वरूप  देखकर हम बड़े खुश थे। हमारे एक-एक प्रश्न का वह विस्तृत उत्तर देते। बातें बहुत बारीकी से हमें समझाते। उनकी बातों में कई कथाएँ, उद्धरण, शेरो-शायरियाँ आ जुड़ती थीं। हमने वेस्टर्न कोर्ट में उनके साथ नाश्ता किया। वह खाने-खिलाने के बड़े शौक़ीन थे।  एक-एक व्यंजन का रस लेकर खाते थे और उतनी ही प्रीति से सबों को खिलाते भी थे--व्यंजनों का गुणावगुण बताते हुए। जल्दी ही संसद पहुँचने का समय गया। वह हम सबों को लेकर संसद-भवन पहुँचे।  उन्हीं की कृपा से हमने पहली बार संसद की कारवाई देखी। संसद-भवन का सम्पूर्ण दिग्दर्शन उन्होंने ही हमें करवाया और वह स्थल भी पूर्ण विवरण के साथ हमें दिखाया, जहां से कभी शहीद भगत सिंह ने बम का प्रहार किया था।  फिर दोपहर के वक़्त गंगा चाचा हमें संसद के भोजनालय में ले गए थे, जहाँ हम सबों ने मिल-बैठकर स्वादिष्ट भोजन किया था। वह पूरा दिन उन्होंने हमारे साथ व्यतीत किया था और बहुतेरी बातें की  थीं। उनकी प्रीति, उनके वात्सल्य और अपरिमित स्नेह से भीगे-भीगे हम शाम ५ बजे उनसे विलग हुए थे।

गंगा चाचा का हिंदी-प्रेम अप्रतिम था। एक बार मैंने उनसे पूछा था--"फ़ोन की घण्टी बजने पर जब आप उसे उठाते हैं तो 'हेलो' के स्थान पर 'जी' क्यों कहते है? सब लोग तो 'हेलो' बोलते हैं।" मेरा प्रश्न सुनकर वह हँस पड़े थे, फिर गम्भीर होकर उन्होंने कहा था--"मैं दूसरी ज़बान में क्यों उत्तर दूँ ? मेरी अपनी भाषा है। मैं अपनी भाषा में उत्तर दूँगा। मान लो, किसी ने तुम्हारे दरवाज़े पर दस्तक दी। तुम द्वार खोलकर आगंतुक को देखोगे, फिर क्या कहोगे ? यही न, कि 'कहिये, किससे मिलना है ?' फ़ोन की घण्टी को मैं दरवाज़े पर हुई दस्तक मानता हूँ, इसीलिए फ़ोन उठाकर 'जी हाँ, कहिये' कहता हूँ। हिंदी ही हमारी बोली-बानी है। हमारी सत्ता की  संरचना में हिंदी की महत्वपूर्ण भूमिका है। हिंदी हमारी आत्मा में रची-बसी है। मैं उसी भाषा में उत्तर देता हूँ।"
{क्रमशः}

3 टिप्‍पणियां:

प्रियदर्शिनी तिवारी ने कहा…

बचपन कि घटनाएं -दुर्घटनाएं बार-बार हमें याद आती है ,जैसे -जैसे उम्र बढ़ती जाती है ..ये यादें और भी ज्यादा परेशान करने लगती है ..हम ये बातें बार -बार अपने उन बच्चों से शेयर करना चाहते है ..जिनके पास अपने ही लिए समय नही है ..[हम जब छोटे थे ..हम भी बड़ों के पुराने किस्से ,जो हम बीसों बार सुन चुके होते थे .सुनने .से बचते थे ...जबकि हमारे पास समय कि कोई कमी न होती थी ]..ब्लॉग एक बढ़िया प्लेटफॉर्म है ..अपने किस्से कहने का ..और आपके किस्से .तो बहुत दिलचस्प होते है ..

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

प्रियदर्शिनी,
संस्मरण तुम्हें अच्छा लग रहा है, यह जानकार खुश हूँ! सोचता हूँ, गाँठ में जो बहुत थोड़ी सम्पदा बाबूजी के आशीर्वाद से प्राप्त हुई है, उसे लिख डालूं/ सार्वजनीन कर दूँ/ बाँट दूँ; पता नहीं इसका अवसर फिर मिले, न मिले...
सप्रीत--आ.

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

पढ रहे हैं लगातार..