गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

याद आते हैं गंगा चाचा...

[तीसरी कड़ी]

सच है, गंगा चाचा आजीवन हिंदी-प्रेम को अपनी आत्मा में बसाये रहे। फ़ोन की घण्टी  बजते ही वह उसे उठाते और 'जी', 'जी हाँ', 'हाँ कहिये', 'मैं गंगाशरण बोल रहा हूँ, कहा जाए' आदि से वार्तारंभ करते। उनके उपर्युक्त कथन से प्रभावित होकर मैंने भी यह प्रयोग कुछ समय तक किया था; लेकिन बाद में मैं उसे निभा न सका था, इसका मुझे खेद है। मुझे लगता है कि सेठ गोविन्द दास और राजर्षि टण्डन के बाद गंगा चाचा ही हिंदी के ऐसे हिमायती थे, जिन्होंने हिंदी-सेवा को ही अपने जीवन का एकमात्र ध्येय बना लिया था। वह अप्रतिम हिंदी-सेवा-व्रती थे। उन्होंने कश्मीर से कन्याकुमारी तक हिदी के प्रचार-प्रसार का बहुत काम किया था। मुझे लगता है कि वह शताधिक हिन्दीसेवी संस्थानों से अभिन्न रूप से जुड़े हुए थे। निरंतर गिरते स्वास्थ्य की अनदेखी करके वह लगातार देशव्यापी यात्राएँ किया करते थे। आयोजनों, व्याख्यानों, अभिभाषणों,मंत्रणाओं और बैठकों के दौर से उन्हें जीवन-भर मुक्ति नहीं मिली। मुझे याद है, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के एक आयोजन में वह सम्मिलित हुए थे, जिसमें 'संस्मरण सत्र' की अध्यक्षता करने के लिए पिताजी भी पटना से दिल्ली गए थे। सभा-भवन में गंगा चाचा की तबीयत बिगड़ गई थी और वह मूर्च्छित हो गए थे। जब उनकी हालत थोड़ी सँभली तो पिताजी ने उन्हें समझाया था और थोड़ी तुर्शी से कहा भी था--"तुम क्या समझते हो, तुम न रहोगे तो क्या ये आयोजन ठप पड़  जायेंगे ? जब तबीयत इतनी नासाज़ थी, तो तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था।" पिताजी की नाराज़गी देखकर गंगा चाचा निरीह भाव से बोले थे--"तब तो सारा झगड़ा ही ख़त्म हो जायेगा। लोग इतने प्यार से बुलाते हैं कि इनकार  करते नहीं बनता। बोलो,क्या करूँ?" सच है कि गंगा चाचा अंतिम समय तक शारीरिक व्याधियों-पीड़ाओं की  परवाह किये बिना हिंदी और हिन्दीसेवी संस्थानों के उत्थान के लिए प्राणपण से जुटे  रहे।

४  अप्रैल १९८७ का एक वाकया याद आता है। उस दिन अचानक गंगा चाचा मेरे घर आ पहुंचे थे। वाहन से उतरकर दस-पंद्रह कदम चलना भी उनके लिए दुष्कर था। बड़ी कठिनाई से वह पिताजी के पास पहुँच सके थे। उन्होंने अपने शरीर को एक लौह-शिकंजे से जकड़ रखा था, सोफे पर बैठते हुए उनका एक पाँव भी सहजता से मुड़ता नहीं था। उसे लंबवत उन्होंने ज़मीन पर टिका दिया था. उठाने-बैठने में उन्हें असह्य पीड़ा होती थी, लेकिन जाने किस योग-बल से चहरे पर उसका प्रभाव वह आने न देते थे। वह उसी शाम अपने साथ पिताजी से लखीसराय के बालिका विद्यापीठ के वार्षिकोत्सव में मुख्य-अतिथि के रूप में सम्मिलित होने का आग्रह करने आये थे। पिताजी का स्वास्थ्य अच्छा नहीं था। उन्होंने अपनी असमर्थता व्यक्त करते हुए क्षमा-याचना की। पल भर को गंगा चाचा पिताजी को देखते रहे, फिर बोले--"तुमसे सौ गुना ज्यादा मैं तकलीफ में हूँ और अनेक व्याधियों से जूझ रहा हूँ। मैं मानता हूँ कि इस दशा में यदि मैं इस उत्सव में शरीक हो सकता हूँ तो तुम भी सम्मिलित हो सकते हो।" इसके बाद उन्होंने अपनी व्याधियों और शारीरिक दशा का जो वर्णन किया, वह सचमुच मर्म-विद्ध करनेवाला था। उनकी रीढ़ की हड्डी में एक दोष हो गया था, जिससे रक्त-प्रवाह में अवरोध उत्पन्न होता था और उन्हें चक्कर आते थे। इसी वजह से वह लोहे का एक बेल्ट कमर पर बांधते थे। बेल्ट बांधने में उनकी हड्डियां तड़कती थीं और वह पीड़ा से तड़प उठते थे। गठिया ने उनके पाँव को जकड़ लिया था और पाँव मोड़ पाना भी उनके लिए असम्भव हो गया था। बहरहाल, पिताजी उसी दिन गंगा चाचा के साथ लखीसराय गए थे और वहीं उन्हें और गंगा चाचा को आकाशवाणी से यह दुःखद समाचार मिला था कि हिंदी के वरेण्य साहित्यकार महाकवि अज्ञेय नहीं रहे। लखीसराय का समारोह संपन्न कर पिताजी पटना लौट आये थे, किन्तु अज्ञेयजी के विछोह से बहुत विकल और अवसन्न-मन थे।

गंगा चाचा अपनी शारीरिक अक्षमताओं और असह्य पीड़ा की अनदेखी कर निरंतर यात्राएं करते रहे, किन्तु उनके श्रीमुख पर हमेशा एक सहज मुस्कान खेलती रही। वह विनोदी वृत्ति के थे, बातें खूब रस लेकर करते थे और बातों-बातों में अपने अनुभवों, संस्मरणों और शेरो-शायरी की ऐसी छौंक लगाते कि सुननेवाला मुग्ध भाव से सुनता ही जाता। उनके मुख से कथा-सरित-सागर ही छलकता जाता था। मेरे पिताजी भी इसी कोटि के रस-सिद्ध साहित्यकार थे, दोनों मित्र जब मिलते, समय को पंख लग जाता। एक बार गंगा चाचा पिताजी और दिनकरजी को अपने साथ देवघर ले गए थे। रात की गाडी से जाना था। वह पूरी रात का सफ़र नहीं था। मध्य-रात्रि में ही देवघर स्टेशन पर उतरना था। तीनों मित्रों ने तय किया कि ट्रेन में सवार होते ही थोड़ा विश्राम कर लिया जाएगा और एक नींद ले ली जायेगी, ताकि मध्य-रात्रि में जब ट्रेन से उतरना पड़े तो सभी तरोताज़ा रहें। उस यात्रा से लौटकर पिताजी ने बताया था कि ट्रेन में सवार होते ही बातों का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह देवघर तक अनवरत चलता रहा और तीनों मित्र मुखर वक्ता बने रहे तथा ठहाकों का दौर चलता रहा।
{क्रमशः}

4 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शुक्रवार (13-12-13) को "मजबूरी गाती है" (चर्चा मंच : अंक-1460) पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

शास्त्रीजी,
आपकी संस्तुति के लिए आभारी हूँ. संस्मरण आपको प्रीतिकर लग रहा है, यह जानकार पुलकित भी हूँ. बहुत दिनों बाद आपका आशीर्वाद मिला है. कृपा बनाये रखें.
सादर-आ.

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन संसद पर हमला, हम और ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

संस्मरण-लेखन में आपका जवाब नहीं...खूब आनंद आ रहा है पढने में..