शुक्रवार, 20 जून 2014

मेरे पिता : साहित्याचार्य पं० चंद्रशेखर शास्त्री -- प्रफुल्लचंद्र ओझा 'मुक्त'

[मित्रों, मेरे पितामह साहित्याचार्य पं० चंद्रशेखर शास्त्री संस्कृत और हिंदी के प्रकाण्ड विद्वान थे। उनका जन्म बिहार के भोजपुर जिले के निमेज ग्राम में एक सम्पन्न ब्राह्मण परिवार में १८८३ में हुआ था। मात्र ५१ वर्ष की आयु में, १९३४ में, उन्होंने शरीर-त्याग किया। पितामह के परलोकगमन की यथार्थ तिथि अज्ञात है, लेकिन पिताजी से सुनता था कि वे गर्मियों के दिन थे, जब उन्होंने देवलोक में निवास पाया था। यह वर्ष उनकी पुण्य-तिथि का ८०वाँ वर्ष है। विगत ग्रीष्म के इन दिनों में मैं उनकी स्मृतियों का तर्पण करना चाहता हूँ...! मेरे पूज्य पिताजी (पंडित प्रफुल्लचंद्र ओझा 'मुक्त') ने दो किस्तों में उन पर दो संस्मरण लिखे थे। उन्हीं आलेखों को यहां रखकर मैं पितामह का पुण्य-स्मरण कर रहा हूँ।  पितामह का तपःपूत जीवन अत्यंत प्रेरक और विस्मयकारी है। चाहता हूँ, इन संस्मरणों को आप भी पढ़ें और ग्रहण करने योग्य तत्वों को गाँठ की पूँजी बना लें। संस्मरणों के पहले पिताजी की छोटी-सी टिप्पणी प्रस्तुत है, तत्पश्चात उनके दोनों संस्मरण क्रमशः पोस्ट करूंगा...! आलेख लम्बे है, चाहूँगा आप इन्हें धैर्यपूर्वक पढ़ें...।  --आनंद]

मेरे पिता : साहित्याचार्य पं० चंद्रशेखर शास्त्री
-- प्रफुल्लचंद्र ओझा 'मुक्त'

[इस शीर्षक के अंतर्गत पिताजी के सम्बन्ध में मेरे दो लेख जा रहे है : पहला 'नवनीत', मुंबई के तत्कालीन संपादक सुप्रसिद्ध लेखक-कवि वीरेन्द्र  कुमार जैन के आग्रह से १९८१ में लिखा गया और 'नवनीत' में प्रकाशित हुआ था; दूसरा पिताजी के शरीरांत के तत्काल बाद, उस समय के मासिक 'चाँद' के संपादक बाबू नवजादिक लाल श्रीवास्तव के अनुरोध से लिखा गया था और 'चाँद' के अगस्त १९३४ के अंक में छपा था। यहाँ  सप्रयोजन लेखों के मुद्रण का क्रम बदल दिया गया है--यानी पहले लिखा गया लेख बाद में और उसके ३५-३६ वर्षों बाद लिखा गया लेख पहले दिया जा रहा है। इस स्मारिका के प्रकाशक, अपने पुत्र चिरंजीव आनन्दवर्धन का यह तर्क स्वीकार करके मैं दोनों लेखों के शीर्ष पर ये कतिपय पंक्तियाँ लिख रहा हूँ कि इनसे पिताजी के जीवन और चरित्र को समझने में कुछ सहायता मिलेगी। 
अपने पिता के बारे में कुछ लिखना आसान नहीं होता और ऐसे पिता के बारे में लिखना तो निहायत मुश्किल होता है, जो बनी-बनायी लीक से हटकर चलता हो, जिसकी आन-बान अनूठी हो,जिसे किसी से कुछ लेना-देना न हो और जो अपने उसूलों का इतना पक्का हो कि उन पर खरोंच भी लगे तो सामनेवाले के परखच्चे उड़ा दे या खुद अपना सिर उतारकर रख दे।
मेरे पिता ऐसे ही थे। उनके बारे में लिखना मेरे लिए कभी आसान नहीं रहा। आज भी नहीं है। उनके बहु-आयामी व्यक्तित्व को, उनके तपःपूत तथा सदा सजग-सावधान आचरण को, उनके विचारों के निरालेपन को, उनकी सादगी, उनकी तेजस्विता, उनकी सहज-स्नेह-सिक्त कुसुम-कोमलता और  वज्रादपि कठोरता को सहेज-संभालकर उनके व्यक्तित्व का एक सम्पूर्ण और विश्वसनीय चित्र उकेरने के लिए मैं अपने को बहुत बौना पाता  हूँ।
पिताजी असाधारण विद्वान थे, लेकिन उन्हें देखकर या उनसे सामान्य बातचीत करते हुए किसी को आभास तक नहीं हो पाता था कि  वह इतने बड़े विद्वान को देख रहा या उससे बातें कर है। अपनी खामियों का वर्णन वह बहुत रस लेकर किया करते थे, लेकिन आत्मप्रशंसा के दो-चार शब्द भी शायद ही कभी किसी ने उनके मुँह से सुने हों। दरअसल,आत्मगोपन की कला में वह इतने दक्ष थे कि हम भाई-बहनों को भी कभी ठीक-ठीक यह पता नहीं चल सका कि उन्होंने कौन-कौन से विषय पढ़े हैं, कितनी परीक्षाएं पास की हैं, उनके अध्ययन और ज्ञान का विस्तार कितना है। वह तो उनकी मृत्यु के १५-२० वर्षों के बाद उनके कुछ सहपाठियों और निकट मित्रों के द्वारा मुझे मालूम हुआ कि साहित्य के अतिरिक्त उन्होंने ज्योतिष और वैद्यक की भी पढाई पूरी की थी, आचार्य-परीक्षा केवल साहित्य में इसलिए दी कि आनेवाले दिनों में जीवन-निर्वाह के लिए ज्योतिष अथवा वैद्यक का सहारा लेने में उनकी रूचि नहीं हुई। वह षट्शास्त्री थे और आरंभिक काल में संस्कृत में उच्च कोटि कि काव्य-रचना करते थे। संस्कृतवालों से मोहभंग होने के बाद उन्होंने अपनी सारी गद्य-पद्य संस्कृत पांडुलिपियां जला डालीं। जैसे उनमें धन-संग्रह तथा अन्य भौतिक वस्तुओं के संग्रह के प्रति अरुचि थी, वैसी ही हर तरह के संग्रह और प्रदर्शन के प्रति थी। वह अपने नाम के साथ न तो जाति-गोत्रसूचक कोई शब्द लिखते थे, न कोई डिग्री अथवा उपाधि। एक बार किसी के पूछने पर उन्होंने कहा था--"मैं जो कुछ दीखता हूँ,बस वही और उतना ही हूँ. शेष सब कुछ तो अवांतर बातें हैं। मैं ब्राह्मण हूँ या चमार अथवा मैंने क्या और कितना पढ़ा है, कितनी परीक्षाएं पास की हैं, इससे क्या फर्क पड़ता है? जानने और देखने की बात यह है, होनी चाहिए, कि मैं अपने आस-पास के, समाज के, देश के और उससे भी आगे बढ़कर सारी मानवता के लिए अपने को कितना उपयोगी बना सका हूँ, मैंने अपने मन को पूरी तरह जीत लिया है या नहीं, मेरा आचरण कैसा है, व्यवहार कैसा है, और अपनी शिक्षा-दीक्षा, शक्ति तथा सामर्थ्य से, पूरी निष्ठां के साथ, मैं व्यक्ति और समाज की सेवा कर रहा हूँ या नहीं। अगर मैं ऐसा कर रहा हूँ तो ठीक-ठाक आदमी हूँ, वरना लाखों-करोड़ों मानव-कीटों की तरह मैं भी एक कीड़े से अधिक कुछ नहीं हूँ।" ज़ाहिर है, इस कथन को टिप्पणी की आवश्यकता नहीं है।]

[एक]

अपनी अनपहचानती आँखों से मैंने इस दुनिया को पहली बार ७ जनवरी १९१० के दिन दारागंज में देखा था।इलाहाबाद में गंगा के किनारे बसा एक छोटा-सा मुहल्ला दारागंज। दो-ढाई साल तक की उम्र की कोई स्मृति मेरे मन में नहीं है, लेकिन थोड़ा होश आते ही सबसे पहले मैं जिस व्यक्ति से जुड़ा, वह मेरे पिता थे। वह संस्कृत
के प्रकांड पंडित और अत्यंत आधुनिक विचारों के थे। उनके जीवनकाल में और, १९३४ में उनके निधन के बाद भी, लोग आश्चर्य के साथ यह चर्चा  किया करते थे कि संस्कृत का एक विद्वान इतने प्रगतिशील विचारों का कैसे बन सका था।
पिताजी सच्चे अर्थों में सात्विक ब्राह्मण थे। ब्राह्मण वंश में उत्पन्न होना ही उनके लिए ब्राह्मणत्व कि परिभाषा नहीं थी। ब्राह्मण वह उसे कहते-मानते थे जो सच्चरित्र, सत्यव्रती, अपरिग्रही और तेजस्वी हो; जो किसी भी स्थिति में असत से समझौता न करे; जिसके सिद्धांत अंगद के पाँव की तरह अटल हों--और, मेरे जीवन के चौबीस वर्ष साक्षी हैं, उनमे ये गुण अपनी पराकाष्ठा में थे। वह निहायत सादगीपसंद, निरभिमान, विनयी और स्नेहालु थे, लेकिन उनके मन के किसी कोने में प्रचंड क्रोध भी छिपा रहता था। बेशक, वह क्रोध उमड़ता तभी था, जब वह किसी को सन्मार्ग से रंचमात्र भी विचलित होता देखते थे। ऐसा विचलन उनके लिए सदा असह्य होता था। इसके लिए वह किसी को भी क्षमा नहीं कर सकते थे। यद्यपि उनका क्रोध असंगत नहीं होता था, लेकिन आत्यंतिक तो होता ही था।जीवन में कितनी ही बार मनुष्य को समझौता करना पड़ता है, लेकिन पिताजी के लिए यह असंभव था। वह टूट सकते थे, समझौता नहीं कर सकते थे। उन्होंने कभी किया भी नहीं।
मेरे पिता अपूर्व पुरुष थे। मैंने अपने लम्बे जीवन में वैसा दूसरा व्यक्ति नहीं देखा। इलाहबाद में पिताजी का बड़ा रोब-दाब था, बड़ा दबदबा था। लोग उन्हें इलाहाबाद का बे-ताज़ का बादशाह कहते थे। सभी वर्गों के लोग उन्हें अपना परम आत्मीय, अपना संरक्षक, अपना अभिभावक मानते थे। सभी उनका सम्मान करते थे। उनके लिए सबकुछ करने को तैयार रहते थे और,किसी अंश में उनसे डरते भी थे। उनकी उपस्थिति में स्वभावतः लोग सचेत रहते थे कि उनके मुंह से कहीं कोई ऐसी बात न निकल जाए, जिससे शास्त्रीजी नाराज़ हो जाएँ। उनकी नाराज़गी कोई मोल नहीं लेना चाहता था। मैं बार-बार सोचता रहा हूँ, आज भी परम आश्चर्य के साथ सोचता हूँ कि उस विद्या-तपोधन निरीह व्यक्ति में, उस सीधे-सादे, सरल-निश्छल, आडम्बर-रहित और आत्म-प्रचार-भीरु व्यक्ति में वह कौन-सा आकर्षण था, कौन-सा तेज था, जो प्रत्येक व्यक्ति को इस तरह आकर्षित, आतंकित और श्रद्धा-नमित बना देता था। क्या वह उनकी विद्वत्ता थी? उनका वाग्जाल था? उनका प्रचंड क्रोध था? नहीं। उनके समय में उन-जैसे तथा उनसे बड़े विद्वान भी देश में वर्तमान थे, वाग्जाल से उनका दूर का भी रिश्ता नहीं था., लिखने-बोलने में वह सरल-सामान्य भाषा का प्रयोग करते थे, और उनका क्रोध तो केवल वहीँ प्रकट होता था जहां वह अनौचित्य देखते थे, अन्यथा सब के लिए उनके ह्रदय में स्नेह और वत्सलता का सागर लहराता रहता था। निश्चय ही उनकी सात्विक जीवन-प्रणाली, सत्य के प्रति उनका कुलिश-कठोर आग्रह, उनकी निर्भीकता, उनकी तेजस्विता, उनका तपःपूत जीवन, दोष-लेश-हीन उनका आचरण ही लोगों को उनके प्रति आकर्षित तथा श्रद्धा-नमित करता था।
श्रद्धा के उल्लेख से 'तुराब' की याद आती है। तुराब--इलाहबाद का प्रसिद्ध गुंडा! लम्बा-तगड़ा जवान. यत्नपूर्वक सँवारे गए केशों से चुहचुहाता सुगन्धित तेल, झकाझक साफ़ अद्धी का चुन्नटदार कुर्ता, रंगीन लुंगी, पैरों में ठनठनिया का बहुत मोटा और बहुत चमकदार स्लीपर और हाथो में अपने क़द से बड़ी तेल-पिलायी लाठी--यह उसकी धज थी। शहर में उसका बड़ा आतंक था।अनेक अपराधों से उसका सम्बन्ध जुड़ा रहता था। लेकिन वह तो शेर था। सीना तानकर शहर में चलता था। किसी में हिम्मत नहीं थी किउसका बाल भी बांका करे। शायद पुलिस भी उस पर हाथ डालने से हिचकिचाती थी।
लेकिन वही तुराब जब राह चलते पिताजी को देख लेता तो अपनी शानदार पोशाक और सड़क कि गलीज़-गन्दगी का ख़याल छोड़कर पेट के बल सड़क पर लोट जाता और 'गुरु महाराज जै' कहकर उनके पैर पकड़ने की कोशिश करता था। कभी-कभी पिताजी बचकर निकल जाते और कभी उसकी पकड़ में आ जाने पर उसे झिड़कते हुए कहते--"चलो हटो, रास्ता दो...!" सदा पिताजी के साथ रहनेवाला मैं कई बार इसका साक्षी बना था।
उसी तुराब ने एक बार तूफ़ान खड़ा कर दिया था। दारागंज में एक नए दारोगा तबादले पर आये थे।शायद नए-नए भर्ती हुए थे, इसलिए अकड़ उनमें बहुत थी। वह ज़माना भी ऐसा था कि दारोगा तो दारोगा, पुलिस के सिपाही से भी लोग आतंकित रहते थे। इसलिए नए दारोगा आये तो मोहल्ले के प्रतिष्ठित लोग बारी-बारी से उनसे मिलने जाने लगे।जब यह हुजूम ख़त्म हुआ थो एक दिन दारोगाजी ने किसी से पूछा कि मोहल्ले में और कोई बड़ा आदमी नहीं है? उसने पिताजी का नाम लेकर कहा कि "वह तो कहीं आते-जाते नहीं, दूसरे लोग ही उनसे मिलने जाते हैं।" दारोगाजी को यह बात अच्छी नहीं लगी और उन्होंने कह दिया--"अरे, ऐसे शास्त्री-फास्त्री मैंने बहुत देखे हैं।"
यह बात जिन्होंने सुनी थी, उन्हीं तक सीमित न रही, बाहर फैली। किसी तरह तुराब के कानों में भी पड़ी। और उस शाम, जब घोड़े पर सवार होकर गश्त पर निकलने की तैयारी में दारोगाजी ने रकाब पर पाँव रखा ही था कि अचानक तुराब का आविर्भाव हुआ। उसने एक हाथ से पकड़कर दारोगाजी को ज़मीन पर पटका दूसरे हाथ से अपने पैर से मोटे तल्लेवाला ठनठनिया का स्लीपर निकालकर उन पर प्रहार करना आरम्भ किया। उसके मुंह से गालियों की वर्षा हो रही थी और वह चीख रहा था--"साले, गुरु महाराज के खिलाफ बोलेगा तो ज़बान खींचकर बाहर निकाल लूंगा।"
सरेबाज़ार दारोगाजी का इस तरह पिटना एक अनहोनी घटना थी। बाज़ार में तहलका मच गया। भीड़ इकट्ठी हो गई।दारोगाजी किसी तरह जान बचाकर थाने में जा छुपे. तुराब सीना फुलाये अपने रास्ते लगा।
इस घटना की खबर पिताजी को दूसरे दिन सबेरे मिली। वह बहुत नाराज़ हुए। पहली बार उन्होंने किसी को भेजकर तुराब को घर बुलवाया। वह फ़ौरन हाज़िर हुआ। पिताजी उसपर बरस पड़े। लेकिन उस पर उनके क्रोध की कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। वह नाटकीय मुद्रा में दोनों हाथो से अपने दोनों कान पकड़कर एक टांग पर खड़ा हो गया। अब पिताजी थे कि उसे डांटते जा रहे थे और वह था कि एक ही वाक्य दुहराये जा रहा था--"आप चाहे मेरा सिर कलम कर लो गुरु महाराज, लेकिन जो साला आपकी शान में गुस्ताखी करेगा, उसकी ज़बान मैं उखाड़कर रख दूंगा।"
लगता है कि तुराब के इस एकरस नाटक से शीघ्र ही पिताजी का धीरज जाता रहा। शायद उन्हें हंसी आने लगी थी। यह कहकर वह दूसरे कमरे में चले गए कि "जाओ, भागो यहां से। मैं फिर कभी ऐसी बात नहीं सुनना चाहूंगा।"
तुराब भी यह कहता हुआ सीढ़ियां उत्तर गया कि "नहीं गुरु महाराज, लेकिन जो साला...!"
भद्र समाज के सभ्य, सुसंस्कृत, शिक्षित लोग पिताजी पर श्रद्धा रखते थे, उनका सम्मान करते थे, यह बात तो समझ में आती है, लेकिन तुराब-जैसे व्यक्ति के मन में भी पिताजी के प्रति ऐसी निष्ठा क्यों थी, यह मैं आज भी नहीं समझ पाया हूँ...!"
(क्रमशः)

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