मंगलवार, 24 जून 2014

'आचार्य चंद्रशेखर शास्त्री' : आचार्य शिवपूजन सहाय

[मित्रो, सोच था, पितामह पर पिताजी के लिखे दो संस्मरण ब्लॉग पर रखकर स्मृति-तर्पण की इति कर लूंगा; लेकिन पितामह पर आचार्य (स्व०) शिवपूजन सहाय का लिखा एक और बहुत रोचक संस्मरण हस्तगत हुआ है और उसे आपके सम्मुख रखने के लोभ का मैं संवरण नहीं कर पा रहा हूँ। आलेख लम्बा है, फिर भी मैं चाहूँगा कि आप भी थोड़ा श्रम और समय खर्च करके इसे अवश्य पढ़ें। इसे आप पढ़ेंगे तो कुछ-न-कुछ प्रसाद ही पाएंगे, ऐसा मेरा मन कहता है। --आनंद.]



बिहार प्रदेश के शाहाबाद जिले में 'ब्रह्मपुर' बहुत प्रसिद्ध स्थान है। वहाँ फाल्गुनी और वैशाखी शिवरात्रि के अवसर पर बहुत बड़ा मेला होता है। शिवजी का वैसा विशाल और प्रशस्त मंदिर बिहार में शायद ही कहीं हो। कहते है कि महाकवि तुलसीदास वहाँ आये थे। वहाँ से एक-डेढ़ कोस दूर दक्षिण जो 'रघुनाथपुर' नामक गांव है, उसका नामकरण तुलसीदासजी ने ही किया था। यह रघुनाथपुर पूर्वीय रेलवे का एक स्टेशन है।

उपर्युक्त ब्रह्मपुर से लगभग एक कोस उत्तर 'निमेज' नाम का एक बड़ा गांव है। शास्त्रीजी उसी गाँव के निवासी थे। पर उन्हीं के कथनानुसार वह अपने बालपन में ही जो घर से निकले तो फिर गांव में कभी बसेरा न लिया। संयोगवश यदा-कदा  गांव जाते-आते थे, किन्तु रहे जीवन भर बाहर ही। कहा करते थे, बचपन में मुझे घुड़सवारी का बड़ा शौक था। गधा और खसी पर चढ़कर अभ्यास करता  था। खेतों में चरते हुए लद्दू-टट्टुओं पर चढ़कर घूमता चलता था। तब धूप और वर्षा की भी कुछ परवाह न थी। बचपन का यह अभ्यास सयाना होने पर घुड़सवारी में बड़ा काम आया।

एक बार पंडित सकलनारायण शर्मा (महामहोपाध्याय) से बातचीत करते समय शास्त्रीजी ने उपर्युक्त बातें बतलाई थीं। शर्माजी ने भी अपने बचपन का किस्सा सुनाते हुए कहा था, "मैं तो उठती जवानी तक सैलानी रहा, बचपन में नंबरी नटखट और रेख-उठान तक हुरदंगी।"

किन्तु बचपन के ये दोनों घुमक्कड़ आगे के जीवन में संस्कृत के उद्भट विद्वान हुए। हिंदी-जगत में भी दोनों का यश अमर है।


शास्त्रीजी जब बालक थे, तभी उनके मन में विद्यानुराग जाग उठा। वह डुमरांव (शाहाबाद) जाकर वहाँ के राजा की संस्कृत-पाठशाला में पढने लगे । ऐसे प्रतिभाशाली निकले किदूसरे विद्यार्थी उनसे बड़ी ईर्ष्या करने लगे। पर सहनशीलता उनके स्वभाव की मुख्या विशेषता थी। धैर्य के साथ उन्होंने कशी जाने की योग्यता अर्जित कर ली।

काशी में उन्होंने क्वींस कॉलेज में नाम लिखाया। कॉलेज के प्रिंसिपल वेनिस साहब ने उनकी लगन और श्रद्धा से संतुष्ट होकर कई अँगरेज़ और जर्मन छात्रों को संस्कृत सिखाने का काम सौंप दिया। शास्त्रीजी कहा करते थे कि वेनिस साहब तो संस्कृत के अनन्य अनुरागी थे ही, संस्कृत सीखनेवाले अँगरेज़ और फ्रेंच तथा जर्मन छात्रों में जो तत्परता थी, वह भारतीय छात्रों में भी नहीं थी। यूरोपवालों के संस्कृत-प्रेम कि प्रशंसा वह प्रायः किया करते थे। जिन विदेशी छात्रों को वह संस्कृत पढ़ाया करते थे, उनलोगों ने वेनिस साहब से शास्त्रीजी की अद्भुत मेधाशक्ति की बड़ी प्रशंसा की। वेनिस साहब भी उन्हें प्रत्येक कक्षा में सर्वोच्च स्थान पाते देखकर बहुत प्रभावित हुए थे। उनसे शास्त्रीजी को प्रोत्साहन तो मिलता था, पर वह कभी उनसे अपने अभावों की चर्चा नहीं करते थे। उन्हें जो छात्रवृत्ति और संस्कृत पढ़ाने का पारिश्रमिक मिलता था, उसीसे अपना निर्वाह कर लेते थे। डुमरांव अथवा काशी में पढ़ते समय कभी घर से कोई सहायता न मांगी। स्वावलम्बन ही उनका आजीवन व्रत रहा। जब वह अपने अभावों और कष्टों की कहानी सुनाने लगते थे,तब उनकी विद्वत्ता और तपस्या देखकर उनके प्रति अनायास ही श्रद्धा उत्पन्न होती थी।

छात्रावास में कई बार उन्हें भूखों रह जाना पड़ा। जाड़े में भी धोती की जगह अंगोछा मात्र लपेटे, नंगे बदन, कम्बल ओढ़े रह जाते। पर किसी भी दशा में उन्होंने कभी किसी के आगे हाथ नहीं पसारा। एक बार तो पैसा न रहने पर अपने गाँव से पैदल ही काशी की ओर चल पड़े थे। अभावों और कठिंनाइयों को वह ईश्वर की दें कहा करते थे। हर हालत में सदैव प्रसन्न रहना उनका सहज स्वभाव था। दरिद्रता को वह अपनी जीवनसंगिनी कहते थे, जिसका वरण उन्होंने स्वेच्छापूर्वक किया था।

जहां तक मुझे याद है, लगभग बावन वर्ष की उम्र में भूकम्प के साल उनका देहांत हुआ, तो हिंदी-संसार के प्रतिष्ठित विद्वानों और पत्र-पत्रिकाओं ने मुक्त-कंठ से उनका गुणगान किया था। उनके विषय में लोकमत का उतना ऊंचा धरातल देखकर ही समझ में आया कि वह देश की कितनी बड़ी विभूति थे। परन्तु यह संसार कभी युगपुरुष को जीते-जी नहीं पहचानता।

शास्त्रीजी के काशी के सहपाठियों में स्वनामधन्य पंडित रामावतार शर्मा (महामहोपाध्याय) भी थे। महामहोपाध्याय गंगाधर शास्त्री के दोनों ही पट्टशिष्य थे। दोनोँ ही अपने युग की गौरव-वृद्धि कर गए। शर्माजी को भी, उनके निधन के बाद ही, बड़े-से-बड़े विद्वानों ने कपिलकणाद के तुल्य कहा। यही इस संसार की रीति चली आ रही है। शर्माजी और शास्त्रीजी ने बिहार की धरती पर जन्म लेकर उसे धन्य बनाया, पर उसने दोनोँ अनमोल लालों को ठीक-ठीक नहीं पहचाना। मृत्यु के उपरान्त ही पिंडदान की तरह कीर्तिगान करने की भी परंपरागत प्रथा है। शास्त्रीजी सच्चे त्यागी-तपस्वी थे, यह बात अगर दुनिया निगोड़ी उनके उठ जाने से पहले समझ पाती, तो शायद उसकी असलियत की पोल खुल जाती।

शास्त्रीजी के सर्वप्रथम दर्शन का सौभाग्य मुझे प्रयाग में प्राप्त हुआ। 'विद्यार्थी' के संपादक पंडित रामजीलाल शर्मा के घर पर बैठे वह कुछ लिख रहे थे। उस समय वह 'शारदा' नमक संस्कृत-मासिक पत्रिका के संपादक थे। 'समाज' नाम का एक हिंदी-मासिक भी निकालते थे। मेरे साथ मेरे मित्र कुमार देवेन्द्रप्रसाद जैन भी थे। जैनजी ने अपने प्रेम-मंदिर (आरा) से 'प्रेमकली', 'प्रेम-पुष्पांजलि', 'त्रिवेणी', 'सेवाधर्म' आदि सुन्दर पुस्तकें प्रकाशित की थीं। वे पुस्तकें वहाँ के इंडियन प्रेस में बड़े आकर्षक ढंग से छपी थीं, उन पर शास्त्रीजी की सम्मति की आवश्यकता थी। शास्त्रीजी उन पुस्तकों को देखकर कहने लगे--"आज बीसवीं शताब्दी के उषःकाल में चारों ओर प्रेम-पुष्पों की सुगंध बड़े वेग से फाइल रही है--जान पड़ता है कि मध्याह्न होते-होते यह मादक गंध नयी पीढ़ी को मदांध बना देगी। आपको साहित्य-सेवा करने का अनुराग ईश्वर ने दिया है तो रामायण-महाभारत आदि को हिंदी-प्रेमियों तक पहुंचाने का प्रयत्न कीजिये।"

जैनजी उनका मुंह ताकने लगे। वह (शास्त्रीजी) दो-टूक बात कहने में बड़े निर्भीक थे। स्पष्टवादिता भी उनकी एक विशेषता थी। वह जैनजी को हतोत्साह देखकर भी कहते रहे--"मनुष्य को प्रेम सिखाने की आवश्यकता नहीं है, वह सांसारिक प्रेम में अत्यंत निपुण है, उसे परमार्थ और परमात्मा के प्रेम की ओर प्रेरित करने की आवश्यकता है।"

जैनजी ने मंद स्वर में निवेदन किया कि यही सम्मति लिखकर देने की कृपा कीजिये। पर उन्होंने फिर कहा, "अनुचित प्रोत्साहन देने के लिए सम्मति प्रदान करना मेरी प्रकृति के विरुद्ध है। मेरा मत है कि सबसे पहले अपने देश के प्राचीन साहित्य का उद्धार और प्रचार होना चाहिए तथा उसी के आधार पर नये साहित्य की सृष्टि करनी चाहिए, फिर कूपमंडूकता के दोषारोपण से बचने के लिए अन्यत्र के साहित्य को अपनाना चाहिए। प्रेम और सेवा पर जो साहित्य आपने (जैनजी) प्रकाशित किया है, उसमे अधिकाँश विदेशी सामग्री है। क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि भारतीय साहित्य में प्रेम और सेवा पर जो सामग्री मिल सकती है, वह अन्यत्र कहीं नहीं?"

जैनजी मौन ही रहे। तब शास्त्रीजी ने मेरा परिचय पूछा। वह यह जानकार बड़े प्रसन्न हुए कि मैं भी उन्हीं के जिले (शाहाबाद) का निवासी हूँ। उन्होंने यह उपदेश दिया कि हिंदी-लेखक बनना चाहते हो तो संस्कृत खूब पढ़ो। मैंने जब कहा कि संस्कृत की प्रथमा परीक्षा पास कर चुका हूँ, तब बड़े जोर से हंसकर मेरी पीठ ठोकते हुए बोले कि--"तुम बड़े भोले जान पड़ते हो। अरे, मैं तो साहित्याचार्य होने पर भी यही समझता हूँ कि अभी संस्कृत-महासागर को दूर से ही तरंगित देख रहा हूँ, उसमें प्रवेश करना तो दूर, उसके तट तक भी नहीं पहुंचा हूँ।"

उनकी बात सुनकर मेरा चेहरा उतर गया। मैंने कहा कि मैं संस्कृत पढ़ना चाहता हूँ। बोले, "तुम्हारे ठाट-बाट से संस्कृत पढ़ने के लक्षण नहीं प्रकट होते। तुम बाल सँवारे, पान खाए हुए हो, तुम्हारे जूते चमकते हैं, सुनहली कमानी का चश्मा है--ये सब लक्षण संस्कृत सीखने के नहीं हैं। अंगेज़ी-फ़ारसी की तरह संस्कृत नहीं सीखी जा सकती, उसके लिए कठोर साधना की आवश्यकता है--संस्कृत के विद्यार्थी को ब्रह्मचारी और संयमी होना चाहिए, वह ऋषियों और त्यागी-तपस्वियों की भाषा है। विलासियों से देववाणी की पटरी नहीं बैठती।"

उनके वे मार्मिक शब्द आज भी मेरे कानों में गूँज रहे हैं। मैं हतप्रभ हो गया। पहाड़ के पास पहुंचकर ऊँट अपनी ऊँचाई भूल गया।

पंडित रामजीलाल शर्मा आर्यसमाजी थे। वह पहले इंडियन प्रेस में 'सरस्वती' विभाग का काम करते थे। फिर स्वतंत्र रूप से प्रेस खोलकर 'विद्यार्थी' निकालने लगे और स्वाबलंबी बनकर अपने अध्यवसाय के बल से बहुत उन्नति कर गए। अपने देश के विद्यार्थियों के लिए उन्होंने प्रचुर सत्साहित्य प्रकाशित किया। शास्त्रीजी के बाद वह भी हम दोनों को सीख देने लगे। उन्होंने रामानंद सरस्वती के आदर्श जीवन से शिक्षा ग्रहण करने की सलाह दी। शास्त्रीजी सनातनधर्मी थे। उनकी स्वाभाविक विनोदप्रियता हुलसी। बोले, "तुम लोग मेरे मित्र शर्माजी की बात मानकर स्वामीजी के आदर्श से अवश्य पाठ सीखो, क्योंकि इन्होंने भी स्वामीजी के सिद्धांतों के अनुसार कोट-पतलून धारण किया है और एक यवनी युवती की शुद्धि करके उससे विवाह किया है तथा एक अक्षतयोनि विधवा का पुनर्विवाह कराने के लिए अपने परिवार के एक युवक को प्रेरणा देकर उत्साहित कर रहे हैं। तुमलोगों की वेश-भूषा से इनको पता लग गया कि तुमलोग विवाहित हो, नहीं तो ये अपना रसायन सिद्ध करने के लिए ठोक-पीटकर वैद्यराज बना लेते। आजकल इन्होंने यही धंधा उठाया है कि मनचले नवयुवकों को देखकर विधवा-विवाह के लिए उन पर डोरा डालते रहते हैं।"

वे दोनों मित्र हँसने लगे और हम दोनों मित्र वहाँ से चल पड़े। जैनजी उस समय यमुना के पुल के पास वाले ईसाई-मिशनरी कॉलेज में पढ़ रहे थे। उन दिनों उस अमेरिकन मिशन कॉलेज में विद्यार्थियों को इतनी स्वतन्त्रता प्राप्त थी कि जैनजी फिलाडेल्फिया-हॉस्टल में पुस्तक प्रकाशन-सम्बन्धी सारा कार्य स्वच्छंदतापूर्वक करते रहते थे। वह अपनी धुन के बड़े पक्के थे। उन्होंने इंडियन प्रेस के बूढ़े मालिक बाबू चिंतामणि घोष के ज्येष्ठ सुपुत्र पोदी  बाबू (अब स्वर्गीय) द्वारा पंडित रामजीलाल शर्मा को पत्र लिखवाया कि शास्त्रीजी की सम्मति प्राप्त कराने में सहायक हों। और भी अनेक सूत्रों का सहारा लिया। किन्तु शास्त्रीजी पर उनके ऐसे धुनी की भी कोई कला न लही।

शास्त्रीजी की सेवा में दूसरी बार उपस्थित होने की घटना पटना में हुई। घटना इसलिए कि इस बार भी अपने एक साहित्यिक मित्र  के आग्रह से उनके पास गया। मित्र महाशय ने अखिल भारतीय हिंदी-साहित्य-सम्मलेन के मंगलाप्रसाद पारितोषिक की प्रतियोगिता में अपनी एक पुस्तक भेजी थी, जो जांचने के लिए शास्त्रीजी के पास आई थी। उन दिनों रेलवे लाइन के पास शास्त्रीजी अपने ओझाबंधु आश्रम में रहते थे। सादगी और सफाई से सचमुच वह आश्रमतुल्य ही था।

मेरे मित्र को देखते ही वह ताड़ गए। उनकी प्रशंसा का पुल बांधने लगे। वह भी शास्त्रीजी का भाव भांप गए। दोनों आपस में भले निपटते देख मैं मन-ही-मन हंसकर चुप रहा। शास्त्रीजी उनकी ओर इशारा करके मुझसे कहने लगे--"इनके साथ तुम्हारे आने की कोई आवश्यकता न थी। इनको मैं खूब पहचानता हूँ। इन्होंने पहले कभी मेरी कुटिया को  कृतार्थ नहीं किया था, आज मेरी झोपड़ी पवित्र हुई--भगवान ही इनका मनोरथ सफल करेंगे।"

इसके बाद शास्त्रीजी ने मुझे अलग ले जाकर चेतावनी दी कि "फिर कभी ऐसी मूर्खता न करना--मैं कभी किसी की सिफारिश नहीं सुनता। मंगलाप्रसाद पारितोषिक की मर्यादा तुम नहीं समझते। चाटुकार को उसी के अनुरूप पुरस्कार मिलता है। तुम अपने मित्र को समझा दो कि अपने भाग्य पर भरोसा करे, अपनी योग्यता पर नहीं।"

मेरे मित्र ने रस्ते में एकांत की बात पूछी और मैंने कह भी दी। वह विद्वान तो थे ही, शास्त्रीजी के कथन का औचित्य समझ पश्चात्ताप करने लगे।

तीसरी बार शास्त्रीजी 'मतवाला-मंडल' (कलकत्ता) में स्वयं पधारे। नंगे बदन, कम्बल ओढ़े प्रातःकाल पहुंचे। अपनी लिखी हुई पुस्तक 'दरिद्र-कथा' की पाण्डुलिपि भी साथ ले गए थे। उसे स्वयं छपवाना चाहते थे। एक कलकतिया प्रकाशक ने उसे प्रकाशित करने का उन्हें वचन दिया था, पर उसने विवशता प्रकट कर दी। शास्त्रीजी कहने लगे--"आज भोर होते ही एक कृपण का मुंह देखा था, इसलिए जहां आशा पूरी होनेवाली थी, वहाँ मैं नकार का शिकार हो गया और वहीँ पर मैंने उस नकारनेवाले तथा शिकार होनेवाले अपने-आपको नमस्कार किया; क्योंकि मुझ-जैसे निरीह को नकार सुनानेवाला तो नमन के योग्य है ही, उसके समान नगण्य के नकार का शिकार होनेवाला मैं भी नमस्य ही हूँ, इसी कारण मैंने वहाँ 'शिवपंचाक्षर-स्तोत्र के दो श्लोक उसके सामने ही सुनाकर अपनी ग्लानि व्यक्त कर दी :
'नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय, भस्मांगराय महेश्वराय।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय, तस्मै नकाराय नमः शिवाय।।
शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्दसूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय तस्मै शिकाराय नमः शिवाय।।'
अब इस 'दरिद्र-कथा' को 'चंद्रशेखराय' संकल्प करके स्वयं ही प्रकाशित करने का दृढ निश्चय किया है। चाहता हूँ, इस छोटी-सी पुस्तक को एक ही सप्ताह में छपवाकर उसे धन-मदांध प्रकाशक के पास पठवा दूँ--वह भी एक दरिद्र ब्राह्मण का साहस देख ले।"
सचमुच, उन्होंने पुस्तक की पांच प्रतियां उस प्रकाशक के पास यह लिखकर भिजवाई--"आपके नकार को दूर से ही नमस्कार !"

जब मैं काशी में रहता था, तब शास्त्रीजी भी वहीँ थे। वाल्मीकीय रामायण का हिंदी-अनुवाद कर रहे थे।  वहाँ के एक प्रकाशक ने उसे सात खण्डों में निकाला था। उन्होंने श्रीमद्भागवत और महाभारत का भी हिंदी अनुवाद किया था, किन्तु पूरा न कर सके। रामायण की तरह महाभारत में भी मूल के साथ अनुवाद छपा था। महाभारत को मासिक खण्डों के रूप में स्वयं प्रकाशित करते थे। मैं भी उसका ग्राहक था। उनके निधन के बाद उनके ज्येष्ठ सुपुत्र पंडित प्रफुल्लचन्द्र ओझा 'मुक्त'जी भी महाभारत को उसी रूप में फिर कुछ दिनों तक निकालते रहे। वह काफी पूंजीवाला काम था। शास्त्रीजी ने अपनी गृहस्थी को साधन-संपन्न बनाने के उद्देश्य से कभी द्रव्य-संग्रह पर ध्यान ही नहीं दिया। त्यागी तो उनके सदृश हिंदी-जगत में कम ही हुए। त्याग और तप ही उनका असली बाना था।

एक बार उन्हें रोग-शय्या पर देखने के लिए स्वामी सत्यदेव परिव्राजक आये और चुपके से कुछ गिन्नियां उनके सिरहाने तकिये के नीचे रख गए। शास्त्रीजी को पता चला तो तुरंत स्वामीजी के पास सधन्यवाद लौटा दीं। अपने अभावों की पूर्ति के लिए उन्होंने कभी किसी मित्र की भी आर्थिक सहायता न चाही और न ली। ऐसी बात वह सोचते तक न थे। प्रयाग में जब अखिल भारतीय हिंदी-साहित्य-सम्मलेन के साहित्य-मंत्री थे, तब अपने दूरस्थ आवासगृह से सम्मलेन-कार्यालय तक आने-जाने के लिए कभी इक्का-भाड़ा नहीं लेते थे। राजर्षि टंडन उनको भाई मानते-कहते थे, पर टंडनजी के आग्रह से भी वह अपने सिद्धांत को लचने नहीं देते थेl

वह अपनी स्थिति को प्रभु की देन समझ सदा उससे संतुष्ट ही रहेl आजीवन परिस्थितियों से सहर्ष संघर्ष करते रह गएl कठिनाइयों से जूझते समय भी उनके चहरे पर कभी विषाद की रेखा नहीं दीख पड़ी। काशी में चौखम्भा के पास मोतीकटरा में उनके निवास-स्थान पर एक रात मैं मिलने गया तो वह किरासन तेल की ढिबरी जलाकर बटलोही मांज रहे थेl मुझे देखकर हँसते-हँसते पूछने लगे--"तुमने कभी यह सुकर्म किया है या नहीं? सद्गृहस्थ को पारिवारिक सेवा में संकोच न होना चाहिए, गुरुचरणों के समीप रहकर संस्कृत पढ़े बिना यह सेवा-प्रणाली अभ्यस्त नहीं हो सकतीl तुम्हारे हिन्दीवाले आजकल स्त्रियों की बड़ी दुर्दशा कर रहे हैं--पत्र-पत्रिकाओं में भाँति-भाँति की भाव-भंगी से भरे चित्र छप रहे हैं, कोई खड़ी है, कोई बैठी है, कोई सोयी है, कोई हंसती है, कोई प्रतीक्षा करती है, कोई वीणा बजाती है, कोई अभिसार करती है--क्या यह चित्रों का रीतिकाल है या भगवद्गीता के मिथ्या-प्रचार का मूर्त्तरूप है ?"

शास्त्रीजी के सरस विनोद बड़े आनंददायक होते थे। बातें करते समय दूसरों को 'मालिक' और अपने को 'भगवान' शब्द से अभिहित करते थे, कहिये मालिक, आज भगवान का एक काम कर दीजियेगा!"

पंडित सकलनारायण शर्मा और पंडित ईश्वरीप्रसाद शर्मा के बाद शास्त्रीजी ही खड्गविलास प्रेस (पटना) की साप्ताहिक पत्रिका 'शिक्षा' के संपादक हुए थे। उनकी 'भारत-चरित' नामक पुस्तक उसी प्रेस से प्रकाशित हुई थी। उस प्रेस के स्वामी और 'शिक्षा' के संचालक रायबहादुर रामरणविजय सिंह (बबुआजी) उनका बड़ा सम्मान करते थे। उनकी निःस्पृहता और चिरप्रसन्नता सबसे बरबस उनका आदर कराती थी। वह सच्चे अर्थों में एक मस्तमौला फ़कीर थे। नितांत निरभिमान होते हुए भी सदा स्वाभिमान एवं संतोष के साथ दुर्दिन को झेलते रहना उनका जन्मजात गुण था। उनकी निर्भीकता और स्पष्टवादिता किसी के खिंचे रहने की परवाह नहीं करती थी। अभावों के दरेरे उनके धैर्य को कभी डिगा न सके। एक बार महाशक्ति प्रेस (काशी) में प्रसिद्ध कथाकार कौशिकजी से बातें करते समय उन्होंने हंसकर कहा था, "कठिनाइयाँ-कामिनियाँ अपने पादमंजीर की रुनझुन मुझे सुनाती रहती हैं", तो कौशिकजी मौन होकर उनका उल्लसित मुखड़ा घूरने लगे और चले जाने पर इस वाक्य को दुहराते हुए झूमने लगे।

जब मैं प्रयाग के इंडियन प्रेस की अतिथिशाला में रहकर काशी नागरी प्रचारिणी सभा की ओर से द्विवेदी-अभिनन्दन-ग्रन्थ छपवाता था, शास्त्रीजी से उस ग्रन्थ के लिए एक लेख माँगने गया। उन्होंने पूज्य आचार्य (द्विवेदीजी) की साहित्य-सेवा और संस्कृतज्ञता तथा उनकी पुस्तक 'कालिदास की निरंकुशता' पर अपने प्रशंसात्मक और समीक्षात्मक विचार व्यक्त करते हुए एक संस्मरणात्मक लेख लिखने का वचन दिया। मैंने लेख लेने के लिए फिर आने का समय पूछा तो हंसकर बोले कि "अपनी श्रद्धांजलि लेकर मैं स्वयं आऊंगा" और सचमुच दूसरे ही दिन आये भी। लेख उनका छोटा ही था--'द्विवेदीजी की एकनिष्ठ साधना'--पर उसे देखकर 'सरस्वती'-संपादक पंडित देवीदत्त शुक्ल कहने लगे कि भंग में जैसे केसर की भीनी-भीनी सुगंध बोलती है, वैसे ही शास्त्रीजी के लेख के शीर्षक में उनकी 'एकनिष्ठ' साधना बोल रही है। अब जान पड़ता है कि वैसी साधना का युग लद गया।

शास्त्रीजी संस्कृत-शिक्षा के ह्रास पर प्रायः खेद और चिंता प्रकट किया करते थे। कई विश्वविद्यालयों (पटना, काशी, पंजाब आदि) में वह संस्कृत की उच्चतम परीक्षाओं के परीक्षक थे। उत्तर-पुस्तिकाएं देखकर झुंझला उठाते थे। 'शारदा' और 'शिक्षा' में इस विषय के कई लेख उन्होंने लिखे थे। संस्कृत और हिंदी भाषाएँ बहुत सरल लिखते थे। रामायण-महाभारत की टीकाएँ भी सुगम भाषा में लिखी हैं। वह मनसा-वाचा-कर्मणा सरलता आज भी स्मृति को पुलकित और सिर को श्रद्धावनत करती है।

{लेखक की संस्मरणात्मक पुस्तक 'वे दिन वे लोग' से साभार}

1 टिप्पणी:

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

यह भी खूब रही, किसी ने शिवपूजनजी का ये महत्त्व का संस्मरण पढ़ा ही नहीं क्या...? हाँ, आलेख लंबा था, फिर भी मुझे आशा थी कि दो-चार साहित्यप्रेमी पाठक तो मुझे मिल ही जाएंगे... लेकिन ऐसा हुआ नहीं! कोई बात नहीं, दुनिया बहुत व्यस्त है, मैं इतना व्यस्त नहीं...! मैं तो अपनी ही राह चलूँगा...!--आनंद.