शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

जब आचार्य द्विवेदी रो पड़े... : 'मुक्त'


[पंडित प्रफुल्लचंद्र ओझा 'मुक्त' जी के संस्मरण-संग्रह 'अतीतजीवी' से उद्धृत]

बहुत छोटी उम्र से निरंतर पिताजी के साथ रहने के कारण मुझे एक लाभ हुआ था, तो एक हानि भी हुई थी। हानि गौण थी । मुझे अपनी उम्र के बच्चों के साथ मिलने-जुलने, खेलने-कूदने का अवकाश नहीं मिला था। आज मैं अपने जीवन के पचासी वर्ष पूरे कर चुका हूँ, मुझे नहीं लगता कि वह कोई बड़ी हानि थी। लाभ के खाते में ही अंकों की बहुतायत रही थी। पिताजी के मित्र ही मेरे भी मित्र बन गए। इससे मन में कभी हीन-भावना नहीं आयी। पढने-लिखने का व्यसन लगा। यह बुरा व्यसन नहीं थ।
इलाहाबाद में पिताजी की गोष्ठी मशहूर थी। सुबह-शाम जुटती थी। शहर के लोग तो आते ही थे, समय-समय पर देश-भर के विभिन्न भागों के विद्वान्, साहित्यिक, अध्यापक, पत्रकार आते-जाते रहते थे। वेदोपनिष्द्दर्शन-साहित्य से लेकर आधुनिक साहित्य और साहित्यकारों की चर्चा होती रहती थी। मैं विस्मय-विमूढ़ होकर सब कुछ सुनता रहता था। पल्ले चाहे कुछ न पड़ता हो, बातें तो कानो में पड़ती ही थीं। उन्हीं बातों के सिलसिले में मैंने पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी का नाम भी सुना था।
द्विवेदीजी इंडियन प्रेस, इलाहाबाद से प्रकाशित होनेवाली 'सरस्वती' मासिक पत्रिका के सम्पादक थे। इंडियन प्रेस से बच्चों का एक मासिक 'बालसखा' भी प्रकाशित होता था। ये दोनों मासिक पिताजी के पास आते थे। मैं चार-पांच वर्ष की उम्र से उनका नियमित पाठक बन गया था। द्विवेदीजी का नाम मेरे लिए सुपरिचित हो गया था। मेरे मन में उनका एक काल्पनिक चित्र भी बन गया था। बरगद के विशाल वृक्ष, छाया-सघन-वृक्ष का, भीष्म पितामह के वज़न पर, साहित्य के पितामह का एक भव्य-विराट चित्र !
द्विवेदीजी इलाहाबाद में नहीं रहते थे। सम्पादन का काम कानपूर में रहकर करते थे। लिहाजा, उनके दर्शनों का सौभाग्य मुझे नहीं प्राप्त हुआ था। फिर भी इतना मैं जानता था कि हिंदी साहित्याकाश में वह दोर्दंड प्रतापी भास्कर की भाँति चमक रहे थे। आधुनिक हिंदी के प्रवर्तक के रूप में उनका वर्चस्व स्थापित हो चुका था।
मैं जब सोलह-सत्रह साल का हुआ, तो उनकी लिखी एक पुस्तक मेरे हाथ लगी। तब तक मैं नियमित रूप से लिखने लगा था और मेरी कवितायें और कहानियाँ पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगी थीं। पुस्तक का नाम तो अब मुझे स्मरण नहीं है, लेकिन इतना याद है किवह पुस्तक १९ वीं शती के अंतिम दशक में छपी थी, जब द्विवेदीजी रेलवे में मुलाजिम थे और झाँसी में पदस्थापित थे।
मैंने पुस्तक की भूमिका पढनी शुरू की। पढ़कर स्तब्ध रह गया। उसकी भाषा इतनी भोंडी, अनगढ़ और पुराने ढंग की थी कि आश्चर्य हुआ कि जो व्यक्ति आधुनिक हिंदी का संस्कारक है, वह कभी ऐसी लचर भाषा भी लिखता था।
पहले मैं इंगित कर चुका हूँ कि पिताजी और उनके मित्रो के बीच रहते मेरी मनोरचना ऐसी हो गई थी कि बड़े-से-बड़े व्यक्ति से भी मैं सामान धरातल पर और खुलकर बातें करने का अभ्यासी हो गया था। इसका यह आशय बिलकुल नहीं है कि मुझमें शिष्टता या विनम्रता का अभाव था, लेकिन निर्भीक होकर किसी से भी अपनी बात कहने में मुझे झिझक न होती थी। बेख़ौफ़ अपनी बात कह देता था।
जब मैंने वह पुस्तक देखी थी, उसके कुछ समय पहले से ही द्विवेदीजी कानपुर छोड़ कर अपने गाँव चले गए थे और निवृत्त जीवन बिता रहे थे। वह निःसंतान थे। उनकी पत्नी का भी देहावसान हो चुका था। उन्होंने पत्नी एक मंदिर बनवा लिया था और वह निःसंग एकाकी जीवन व्यतीत कर रहे थे। कभी-कदाचित जब कोई लेखक उनके दर्शनों के लिए दौलतपुर (उनके गाँव) पहुँच जाता तो वह अभिभूत और संकुचित हो जाते थे। दौलतपुर की तीर्थ-यात्रा से लौटे उन्हीं व्यक्तियों के लेखों से द्विवेदीजी के बारे में जानकारी मिलती रहती थी।
उनकी पुस्तक देखने के बाद मैंने उन्हें एक पत्र लिखकर जानना चाहा किजिस व्यक्ति ने आरम्भ में ऐसी अनगढ़ और खुरदुरी भाषा लिखी थी, कालान्तर में वही आधुनिक हिंदी का प्रवर्तक और संस्कारक कैसे बन गया ।
मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब लौटती डाक से उनका एक पोस्टकार्ड मुझे मिला। इस तरह हमारा पत्र-व्यवहार प्रारंभ हुआ। जब कभी मैं किसी बात को लेकर उन्हें पत्र लिखता, उत्तर में उनका पोस्टकार्ड अवश्य आ जाता। मुझ अनजान-अनाम व्यक्ति के प्रति उनकी यह कृपा मुझे श्रद्धानत बनाती रही।
कुछ समय बाद कशी नागरी प्रचारिणी सभा ने उन्हें एक अभिनन्दन-ग्रन्थ देने कि योजना बनाई। मैं पुलकित था कि अंततः मुझे उनके दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त होगा।
काशी का समारोह निबट चुका था। तय यह हुआ कि वहां से लौटे हुए द्विवेदीजी इलाहाबाद भी रुकेंगे। इलाहाबाद के समारोह की तिथियाँ उन्हीं की सुविधा के अनुसार तय हुई थीं। समय निकट आ रहा था, तैयारियां जोर-शोर से चल रही थीं। समारोह के परिशिष्ट के रूप में हम तरुणों ने एक कवि-दरबार लगाने का निश्चय किया था। उसके संयोजक के रूप में मैं पूरी तत्परता से जुटा हुआ था।
एक दिन सबेरे मैं पिताजी के साथ बैठक में बैठा कुछ बातें कर रहा था। अचानक घर के सामने एक कार आकर रुकी। कार पर पिताजी की नज़र पड़ी, तो वह उठ खड़े हुए। 'द्विवेदीजी' कहकर आगे बढे। कार से जो वृद्ध सज्जन उतरे, वही आधुनिक हिंदी के जन्मदाता आचार्य द्विवेदी थे।
[अगली कड़ी में समापन]

5 टिप्‍पणियां:

वन्दना ने कहा…

bahut hi badhiya sansmaran.

Devendra ने कहा…

...अगली कड़ी की प्रतीक्षा में.

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

’अतीतजीवी’ कहाँ से प्रकाशित है ?

आभार प्रविष्टि के लिये ।

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

हिमांशुजी,
वर्ष १९९५ में 'अतीतजीवी' को हमने अपनी प्रकाशन संस्था 'आस्था प्रकाशन', पटना से प्रकाशित किया था. अब तो उसकी प्रतियां प्रायः अनुपलब्ध हैं; किन्तु उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग ने समस्त राजकीय और इंटर कॉलेज लायब्रेरी के लिए उसकी खरीद की थी. 'अतीतजीवी' आपको किसी पुस्तकालय में अवश्य मिल जायेगी.
आभार सहित--आ.

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…
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