शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

जब आचार्य द्विवेदी रो पड़े.... : 'मुक्त'

[समापन किस्त]

पिताजी द्विवेदीजी के चरणस्पर्श के लिए झुके ही थे कि उन्होंने दोनों हाथ बढ़ाकर पिताजी को गले से लगा लिया। अपनी कार से जो सज्जन उन्हें ले आये थे, वह हिंदी प्रेस के स्वामी रामजीलाल शर्मा के ज्येष्ठ पुत्र रघुनान्दंजी थे। द्विवेदीजी उन्हीं के यहाँ ठहरे थे।
द्विवेदीजी जब पिताजी से बातें करने लगे, तो मैंने ध्यान से उन्हें देखा। सफ़ेद घनी मूंछें, घनी भौहें, आँखों पर चश्मा--आँखें, जिनकी ज्योति मंद हो चुकी थी, लेकिन जिनका तेज बरकरार था। यह चेहरा जाना-पहचाना था, चित्रों के माध्यम से। उस दिन पहली बार मैंने उन्हें प्रत्यक्ष देखा।
बातें काफी देर तक होती रहीं। कुशल-क्षेम से आरम्भ होकर बातों का सिलसिला बढ़ता गया। पिताजी के कुरेदने पर द्विवेदीजी अतीत-सृतियाँ सुनाने लगे। उन्होंने बहुत-सी बातें सुनाईं। अचानक पिताजी ने कहा--'महाराज, आपके पास तो अनुभवों का अक्षय भण्डार है। मेरा निवेदन है कि आप उन्हें लिख डालें, भावी पीढ़ियों के लिए वह दस्तावेज़ बहुत प्रेरणाप्रद होगा। '
द्विवेदीजी पालथी मारकर बैठे हुए थे। पिताजी की बात सुनते ही वह घुटनों के बल बैठ गए। उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर स्वरचित एक श्लोक सुनाया। उनकी आँखों से अश्रुधारा बह चली। अचानक विनय, विषाद और करुणा की त्रिवेणी बहने लगी। हम स्तब्ध रह गए।
इतने दिनों बाद अब वह श्लोक तो मुझे याद नहीं रहा, लेकिन उसका आशय कुछ इस प्रकार था--'इस विशाल संसार-सागर में मैं क्या हूँ ? एक अपदार्थ बुलबुला, जिसके शरीर में न शक्ति है, न मन में उत्साह, परिवार में पुत्र-कलत्र भी नहीं है। नितांत एकाकी, निःसंग, मेरा जीवन क्या, और मेरी उपलब्धियां भी क्या ?'
वातावरण बोझिल हो उठा। मैंने सोचा, नईउम्र के हमलोग अपने आपको बड़ा तीसमारखां समझते हैं। हम अति-भावुक होने का दम भरते हैं। लेकिन द्विवेदीजी की इस गहन-गंभीर वेदना और भावुकता के मुकाबले हमारी भावुकता का क्या मूल्य है ?
इलाहाबाद का अभिनन्दन समारोह अपनी भव्यता के लिए बहुत समय तक लोगों को याद रहा। उस अवसर पर द्विवेदीजी ने ऐतिहासिक महत्त्व का जो भाषण दिया था, लोगों के मन में उसकी याद बहुत दिनों तक बनी रही थी। पता नहीं, उनका वह भाषण लिपिबद्ध हुआ था या नहीं।
एक शाम पंडित रामजीलाल शर्मा ने आचार्य द्विवेदीजी से अनौपचारिक रूप से मिलने के लिए इलाहाबाद के कुछ विशिष्ट साहित्यिक विद्वानों को हिंदी प्रेस में आमंत्रित किया था। मैं तो विशिष्ट क्या, अविशिष्ट की श्रेणी में भी नहीं आता था, फिर भी पिताजी का पल्ला पकड़कर मैं उस जमात में उपस्थित था।
गोष्ठी औपचारिक रूप में ही शुरू हुई थी। फिर अपने आप ही उसने अनौपचारिक रूप धारण कर लिया। कई लोगों ने द्विवेदीजी की सेवाओं का बखान करते हुए उनके प्रति श्रद्धा-कृतज्ञता प्रकट की। कुछ लोगों ने अपनी कवितायें सुनाईं। अंत में द्विवेदीजी ने प्रत्येक व्यक्ति का नामोल्लेख करते हुए अपनी स्पष्ट, निर्भीक और किसी कदर तल्ख़ टिप्पणियाँ प्रस्तुत कीं। उन्होंने कहा--"आपने मुझ पर असंभव प्रशंसाओं का बोझ डाल दिया है। मैं नहीं जानता कि मैं अपने जीवन में ऐसा कुछ कर सका हूँ, जो प्रशंसा के योग्य हो। मैंने जो कुछ किया, वह कर्तव्य समझकर किया। फिर भी यदि आप उसे उचित और उपयोगी मानते हैं, तो मेरी प्रशंसा मत कीजिये, उससे आगे कुछ करने का प्रयास कीजिये। वही मेरी सच्ची प्रशंसा होगी। उसीसे मुझे संतोष होगा।"
कविताओं के सम्बन्ध में भी उन्होंने कुछ ऐसे ही विचार प्रकट किये। उन्होंने कहा--"कविता साहित्य की बहुत बड़ी शक्ति है। उसे मनोविलास या व्योम-विहार की वस्तु मत बनाइये। अपनी कविता के द्वारा साहित्य को और समाज को कुछ ऐसा दीजिये, जो उसे समृद्ध बनाए।"
उस साहित्यिक ऋषि ने उस समय अपने जीवन की अभिज्ञताओं और अनुभव के आधार पर युवा पीढ़ी को जो सीख दी थी, क्या आज के सन्दर्भ में वह उस समय की अपेक्षा कहीं अधिक उपयोगी और आवश्यक नहीं है ?
एक अल्प कालावधि में मैंने तीन अवसरों पर आचार्य द्विवेदी के दर्शन का और उनकी बातें सुनने का सौभाग्य प्राप्त किया था, लेकिन मेरी स्मृति में उनकी वही मूर्ति सबसे अधिक उज्ज्वल और स्पष्ट है, जब वह पिताजी को श्लोक सुनाते हुए रो पड़े थे।
[मित्रो ! इस सप्ताह में सिर्फ बाबूजी की बातें ही होंगी। इन आलेखों से जो प्रेरक तत्त्व मिलें, उन्हें हम सभी ग्रहण करें; यही उनको सच्ची श्रद्धांजलि होगी--ऐसा मेरा मन कहता है। विनीत ----आनंद]

10 टिप्‍पणियां:

Devendra ने कहा…

आह! कितना जरूरी संस्मरण है यह.

-"कविता साहित्य की बहुत बड़ी शक्ति है। उसे मनोविलास या व्योम-विहार की वस्तु मत बनाइये। अपनी कविता के द्वारा साहित्य को और समाज को कुछ ऐसा दीजिये, जो उसे समृद्ध बनाए।" उस साहित्यिक ऋषि ने उस समय अपने जीवन की अभिज्ञताओं और अनुभव के आधार पर युवा पीढ़ी को जो सीख दी थी, क्या आज के सन्दर्भ में वह उस समय की अपेक्षा कहीं अधिक उपयोगी और आवश्यक नहीं है ?
...आज, इतने वर्षों के बाद ये वाक्य और भी उपयोगी और आवश्यक हो हमारे सामने यक्ष प्रश्न बन सामने खड़े हैं.
..इस पोस्ट के लिए हम आपके आभारी हैं.

अर्कजेश ने कहा…

इस लेख के साथ ही पिछले दो लेख भी पढे । आनंदित और लाभान्वित हो रहे हैं । पुण्‍य - स्‍मरण ।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

इस संस्मरण को प्रकाशित करने के लिए आभार!

अपूर्व ने कहा…

फ़लदार वृक्ष जितने ज्यादा फ़लित होते हैं..उतनी ही विनम्रता से झुकते जाते हैं..आज के युग ’एट्टीट्यूड’ और ’आइ एम द बेस्ट’ के युग मे जब विनम्र और विनीत होना कमजोरी समझा जाता है..इस तथ्य को समझना बहुत मुश्किल होता जाता है..किंतु सुखद है कि साहित्य के शलाकापुरुषों के व्यक्तित्त्व के विविध पहलुओं को सामने लाने वाली आपकी इन पोस्ट्स की श्रंखला के द्वारा इन लोगों की महानता के रहस्य सामने आते हैं....
कविता के बारे मे कहे गये द्विवेदी जी के विचार मनन योग्य हैं..
आभार

umesh ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
umesh ने कहा…

बाबू जी के ये संस्मरण हमारी धरोहर हैं. संस्मरणों के माध्यम से आज मैं उन्हें पुन: अपने बीच महसूस कर पा रहा हूं. आभार.
उमेश दुबे

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

बाबू जी के संस्मरण पर टिप्पणी करने की धृष्टता नहीं कर सकती मैं. अनमोल संस्मरण.

गौतम राजरिशी ने कहा…

विलंब से आ रहा हूं..और अभी बैठ कर दोनों किश्तें साथ पढ़ ली है। पूरे हफ़्ते बाबूजी को समर्पित...मेरी भी मौन श्रंधाजलि!

मैं सोच ही रहा था कि अज्ञेय और बेनीपुरी जी के पश्चात आनंदवर्द्धन जी अब किस महापुरुष का संस्मरण लगायेंगे...मुक्त जी जैसे पिता साथ बीता बचपन...आह!

श्रद्धा जैन ने कहा…

मैं नहीं जानता कि मैं अपने जीवन में ऐसा कुछ कर सका हूँ, जो प्रशंसा के योग्य हो। मैंने जो कुछ किया, वह कर्तव्य समझकर किया। फिर भी यदि आप उसे उचित और उपयोगी मानते हैं, तो मेरी प्रशंसा मत कीजिये, उससे आगे कुछ करने का प्रयास कीजिये। वही मेरी सच्ची प्रशंसा होगी। उसीसे मुझे संतोष होगा।"

ek ek shabad sach


कविता साहित्य की बहुत बड़ी शक्ति है। उसे मनोविलास या व्योम-विहार की वस्तु मत बनाइये

bahut sateek baat

aapne itna achcha sansmaran post kiya
abhaar

अनूप शुक्ल ने कहा…

आभार आपका इस संस्मरण को पढ़वाने का। अद्भुत!