सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

कहानी की शक्ति : प्रेमचंद की...


[ 'अतीतजीवी' से ऋषिकल्प पंडित प्रफुल्लचन्द्र ओझा 'मुक्त' का एक अनूठा संस्मरण ]


सन १९३१ या ३२ में जब मैं पहली बार जैनेन्द्रजी के पहाड़ी धीरज वाले मकान में जाकर ठहरा था तो उनका प्रथम पुत्र दिलीप साल भर का हो रहा था। मेरे आने के कई दिन बाद प्रेमचंदजी भी आ गए और चार-पांच दिनों तक ठहरे रहे। वह अपने किसी काम से दो-एक दिन के लिए ही आये थे, लेकिन दिलीप की पहली वर्षगाँठ के बहाने हमलोगों ने उन्हें कई दिनों तक रोक लिया था। उधर बनारस में सरस्वती प्रेस और 'हंस' का काम रुका पडा था, प्रेमचंद जी परेशान हो रहे थे, अतः तय हुआ कि कल सबेरे कि गाड़ी से ज़रूर चले जाएँ। कल इसलिए कि आज शाम को दिल्ली नागरी प्रचारिणी सभा ने उनका अभिनन्दन करना चाहा था। प्रेमचंदजी तो उससे भी छुटकारा पाना चाहते थे, लेकिन हमलोगों के जोर देने पर अभिनन्दन स्वीकार करने के लिए राज़ी हो गए थे।

चांदनी चौक में पहली मंजिल के हॉल में अभिनन्दन-समारोह का आयोजन हुआ था। प्रेमचंदजी के साथ जैनेन्द्रजी और मैं भी मंच पर बैठा था। सभा हुई, वक्ताओं ने भाषण दिए, प्रेमचंदजी ने आभार प्रकट किया और सभा समाप्त हो गई। लोग उठाने ही वाले थे कि बड़े नाटकीय ढंग से एक पंजाबी सज्जन मंच पर आये और गिडगिडाने लगे कि श्रोतागण दो मिनट रुककर उनकी बातें भी सुन लें। सभा-समाप्ति के बाद उनका आकस्मिक आविर्भाव और पंजाबी-मिश्रित हिंदी ने श्रोताओं में ऐसा कौतूहल उत्पन्न किया कि जो जहां था, वहीँ रुक कर तमाशा देखने को उद्यत हो गया। वक्ता की हिंदी चाहे जितनी खुरदुरी रही हो, लेकिन वह दो मिनट भी न बोलने पाए थे कि उनकी बातों की ईमानदारी, उनके ह्रदय की गहरी कृतज्ञता और उनकी भावुकता के आतिशय्य ने श्रोताओं को स्तब्ध कर दिया॥ लोग ध्यान देकर उनकी बातें सुनने लगे। उन्होंने अपनी लम्बी वक्तृता में जो कुछ कहा था, उसे संक्षेप में यों प्रस्तुत किया जा सकता है :

"मैं ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं हूँ। अदबी दुनिया से मेरा कोई ताल्लुक नहीं है। मैं प्रेमचंदजी को नहीं जानता--ये मुझे जानें, इसका तो सवाल ही नहीं उठता। लेकिन फिर भी एक बार इन्होंने मेरी जान बचाई है। इनकी एक कहानी मुझे मौत के मुंह से खींच लाई थी। मैं वही कहानी आपको सुनाना चाहता हूँ।

"भाइयो, मैं एक जौहरी हूँ । कलकत्ते में जवाहरात का मेरा अच्छा-खासा कारोबार था। लेकिन किस्मत की बात, एक बार ऐसा हुआ की मुझे दीवालिया हो जाना पड़ा। मैं पैसे-पैसे का मोहताज हो गया। दौलत और अफरात में पले-बढ़ेमेरे बच्चे दाने-दाने को तरसने लगे। मेरी हर कोशिश बेकार हो गई। मैं किसी तरह सँभल नहीं सका। भूखे बच्चों का बिलखता चेहरा मुझसे देखा न जाता था। उनकी बेबस आखें, भूख से सूखा-सिकुड़ा देखने से मर जाना बेहतर था। आखिर मैंने यही तय किया। मैं हुगली में डूबकर मर जाने के लिए घर से निकला। साहबान, जब आदमी जान देने पर आमादा हो जाता है तो उसकी सोचने-समझने की ताकत जाती रहती है। उसका दिमाग सुन्न हो जाता है। उसके दिल में एक वीरानगी घर कर जाती है। मेरी भी ठीक यही हालत हो गई थी। मैं घर से निकला और चल पड़ा। मेरे पाँव चल रहे थे, लेकिन मुझे पता नहीं था कि मैं कहाँ, किस ओर जा रहा हूँ। अचानक मैंने अपने आपको हाबड़ा स्टेशन पर भीड़ से घिरा पाया। भीड़ से निकलने की कोशिश में मैं एक बुक-स्टाल पर पहुँच गया। वहाँ ढेर सारी किताबें और मैगजीनें लगी हुई थीं। कुछ लोग वहाँ खड़े होकर मैग्जीनो के पन्ने पलट रहे थे। जाने कैसे मैं भी वहाँ जा खड़ा हुआ और एक उर्दू मैगजीन उठाकर उसके पन्ने पलटने लगा। उसमें प्रेमचंदजी का एक अफ़साना छापा था। उसकी दो-चार सतरें ही मैंने पढ़ी होंगी कि उसने मुझे बांध लिया। मैंने अपनी जेबें टटोलीं। जाने कैसे मेरी जेब में एक चवन्नी पड़ी रह गई थी। मैंने रिसाला खरीद लिया। उसे लेकर हुगली के किनारे जा बैठा। एक सांस में वह अफ़साना मैंने पढ़ लिया। और हजरात, जब मैंने पढ़ना ख़त्म किया तो मैं एक बदला हुआ आदमी था। उस अफ़साने ने मुझ पर यह असर डाला कि मौत का ख़याल मेरे जेहन से जाता रहा। मैं खुद ही अपनी लानत-मलामत करने लगा। मेरा नज़रिया अचानक बिलकुल बादल गया। मैं सोचने लगा--मैं कैसा बुजदिल हो गया था ? जिन बच्चों को भूख से बिलखता देखकर मैं ख़ुदकुशी के लिए आमादा हो गया था, मेरे मरने के बाद उनका क्या होता ? मेरे मरने से ही उनकी ज़िन्दगी के सारे मसले हल हो जायेंगे ? तब मेरी बीवी, मेरे छोटे-छोटे बच्चे सड़कों पर मारे-मारे फिरेंगे और एक के बाद एक भूखे-प्यासे दम तोड़ देंगे। नहीं, नहीं, मुझे मरना नहीं है। मुझे ज़िंदा रहना है। अपने बच्चों की परवरिश के लिए नई ज़िन्दगी बनानी है।

"हाँ साहेबान, प्रेमचन्दजी के उस अफ़साने ने मुझे मौत से बचाया। मुझे नई ज़िन्दगी दी। मैं वापस घर लौट आया। मैंने फिर काम शुरू किया। उस अफ़साने की ताक़त मेरे साथ थी। किस्मत ने साथ दिया। आज मैं पहले भी अच्छी हालत में हूँ। मेरे बच्चे सयाने हो गए हैं। पढ़े-लिखे हैं। बेटियों की शादियाँ हो गई हैं। और यह सब प्रेमचंदजी की मेहरबानी से हुआ है। ये मेरे लिए इंसान नहीं, भगवान् हैं। और आज वह भगवान् मेरे सामने हैं। कभी सपने में भी मैंने यह नहीं सोचा था किएक दिन ऐसा आएगा, जब मुझे नई ज़िन्दगी देनेवाला मेरा भगवान् मेरे रू-ब-रू होगा। लेकिन अब, जब मैंने अपने भगवान् को पा लिया है, मैं उन्हें यों ही नहीं चला जाने दूंगा। कल मेरे घर अपने पैरों कि धुल देकर, मेरे यहाँ जूठन गिराकर ही यह दिल्ली से जा सकेंगे।"

भावावेश में वक्ता की आवाज़ लडखडाने लगी थी। उनकी आखों से आंसू झरने लगे थे। सारी सभा स्तब्ध थी। प्रेमचंदजी संकोच से गड़े जा रहे थे। वक्ता की बात ख़त्म होने से पहले ही उन्होंने घबराकर कहा--"नहीं, नहीं, कल तो मेरा जाना निहायत ज़रूरी है। मेरा बड़ा नुकसान हो रहा है। कल मैं किसी तरह नहीं रुक सकूंगा। माफी चाहता हूँ। "

वक्ता मंच पर ही खड़े थे। प्रेमचंदजी की बातें उन्होंने सुन लीं और उसी रौ में कहने लगे--"प्रेमचंदजी कहते हैं किकल उनका जाना निहायत ज़रूरी है। इनका बड़ा नुकसान हो रहा है। लेकिन मैं कहता हूँ, इनके जाने से मेरा जो नुकसान होगा, उससे बड़ा किसी का कोई नुकसान हो ही नहीं सकता। एक दिन इनका लिखा अफ़साना मुझे मौत के मुंह से वापस ले आया था, अब अगर यह कल नहीं रुकते, मेरे गरीबखाने पर जूठन गिराए बिना चले जाते हैं तो आप याकीन मानिए, जिस गाड़ी से ये जायेंगे, उसी से कटकर मैं अपनी जान दे दूंगा। यह बात मैं जज्बाती तौर पर नहीं कह रहा, पूरे होशो-हवास में, पूरी इमानदारी के साथ कह रहा हूँ। एक दिन जो ज़िन्दगी इन्होंने बचाई थी, ये चाहें तो कल उसे वापस ले सकते हैं। इनकी दी हुई ज़िन्दगी इन्हीं की है, इन्हें अख्तियार है कि उसे वापस ले लें। मैं ख़ुशी से यह ज़िन्दगी इन्हें सौंप दूंगा।"
(संलग्न चित्र : बाएं 'मुक्तजी' एक मित्र के साथ, संभवतः १९३८-४० )
[क्रमशः]

5 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

यह प्रेरक प्रसंग प्रस्तुत करने के लिए आभार!

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

इस संस्मरण का आभार ।
कितना अच्छा होता इसी प्रकार सम्पूर्ण ’अतीतजीवी’ क्रमशः नेट पर उपलब्ध हो जाती ! यद्यपि यह श्रमसाध्य है, पर आवश्यक है !

Devendra ने कहा…

मार्मिक..प्रेरक ...पढ़ते-पढ़ते आँखे नम हो गईं ..इसे पढ़कर साहित्य कि शक्ति का पता चलता है.कई बार मेरे साथ भी ऐसा हुआ है कि दुःख और चिंता से बोझिल मन साहित्य गंगा में डूब सज-सवंर कर निखरा है.

Kishore Choudhary ने कहा…

आपके पास अथाह सम्पदा है. इसके लिए जाने कितने ही प्रयास किये जाने होंगे कि इस अमूल्य निधि को बचा लिया जाये. इस दौर में पाठक गायब है और माध्यम पूँजी की चपेट में हैं तो ये किस तरह संभव होगा सोचने में असमर्थ हूँ फिर भी मैं आपके ब्लॉग को पढ़ता हूँ और गहरी अनिश्चितता के बीच कई सारी आशाओं को उदित होते हुए देख पाता हूँ. अगले भाग की प्रतीक्षा बनी हुई है.

गौतम राजरिशी ने कहा…

अहा, एक और अप्रतिम श्रृंखला की शुरुआत...