शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

यदि जीवन दुबारा जीने को मिले : "मुक्त'


[मित्रो ! पूज्य पिताजी को स्मरण-नमन और श्रद्धांजलि अर्पित करने के मेरे संकल्प की अंतिम कड़ी के रूप में उन्हीं का यह अंतिम और अधूरा आलेख प्रस्तुत कर रहा हूँ। काश यह आलेख पूरा हुआ होता, लेकिन... 'होइएहैं वही जो राम रचि राखा...' इस आलेख को इतना ही होना था। कलकत्ता से प्रकाशित होनेवाली पत्रिका 'वागर्थ' के तत्कालीन सम्पादक श्री प्रभाकर श्रोत्रिय के आग्रह पर पिताजी ने इसे लिखना शुरू किया था। किन्तु आलेख पूरा न हुआ... जीवनदीप बुझ गया। सन १९९५ के अंक ९ नवम्बर-दिसंबर में यह लेख 'वागर्थ' में प्रकाशित हुआ था, अब आपकी नज्र है। पिताजी को पुनः प्रणाम सहित--आनंद]

(मुक्तजी आजीवन साहित्य समाराधक रहे--निष्कलुष, निर्वैर, नई पीढ़ी को राह दिखानेवाले। विभिन्न विधाओं में उनकी कोई दो दर्जन से अधिक पुस्तकें हैं। गत दस वर्षों से वे अपने पिता श्री चंद्रशेखर शास्त्री द्वारा प्रणीत 'वाल्मीकि रामायण' का हिंदी में सृजनानुवाद कर रहे थे। उन्हीने आरती, नया प्रतीक, प्रजानीति के सम्पादन में योगदान किया था। 'वागर्थ' के लिए लिखने के वादे को अंतिम क्षण तक निभाने की कोशिश का यह अधूरा प्रतिफल (उनका अंतिम आलेख) श्रद्धांजलि के साथ.... --सम्पादक, 'वागर्थ')


इतिहास के झरोखे से देखते-देखते...


अजीब लगती है यह संभावना कि यदि मुझे दुबारा जीने का अवसर मिले तो मैं क्या करूंगा। एक ही ज़िन्दगी में मैं क्या तीन-तीन जिंदगियां नहीं जी चूका हूँ ? छियासी साल के विस्तार में मैंने क्या-क्या नहीं देखा है ? क्या-क्या नहीं सहा-भोगा है और कैसे-कैसे अतिसाह सिर काम नहीं किये हैं ? फिर मैं दुबारा क्यों जीना चाहूँगा? क्या करूंगा जीकर ? एक ही जीवन में तीन तरह कि जिंदगियां जीकर मुझे जो अनुभव प्राप्त हुए हैं, आज भी हो रहे हैं, उसके बाद क्या एक बार फिर जीने कि लालसा मेरे मन में उत्पन्न हो सकती है ? राम कहिये !

बहुत पुराने ज़माने में, इसी ज़िन्दगी में एक बार फिर जीने कि लालसा ययाति के मन में जगी थी। लेकिन उनकी समस्या दूसरी थी। वह सांसारिक सुख-भोगों से तृप्त होने के पहले ही, शापवश बूढ़े हो गए थे। उन्होंने अपने बेटे पुरु से उसकी जवानी उधार मांगी और जिए। छककर सांसारिक सुखों का उपभोग किया। नतीजा क्या निकला ? उधार कीजवानी की अवधि पूरी होने पर खुद उन्हें ही कहना पड़ा की--

न जातु कामः कामानामुपभोगेनशाम्यति। हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ।।

अर्थात मनुष्य चाहे जितना सुख-भोग करे, कामनाएं कभी सीमित नहीं होतीं। वे तो उसी तरह बढती चली जाती हैं, जैसे हविष पड़ते अग्नि की ज्वालायें बढती हैं। मतलब यह कि जो ज़िन्दगी मिली है, हमें उससे अधिक की लालसा नहीं करनी चाहिए। उसी को सहेज-संभाल कर रखना चाहिए और लोक-कल्याण के लिए उसे अर्पित कर देना चाहिए। ऐसा करने से एक ही ज़िन्दगी तृप्त और संतुष्ट हो सकती है। लेकिन मैंने कहा, मैं तो एक ही ज़िन्दगी में तीन जिंदगियां जी चुका हूँ--बेशक, उनकी तस्वीर और उनके रंग मुख्तलिफ रहे हैं, कहूँ कि बद से बदतर होते गए हैं। मैं उन स्थितियों के साथ, उन लोगों के साथ जिया हूँ , उन लोगों के हर्ष-विषाद, सुख-दुःख, मन की शान्ति और पीड़ा के दंश को मैंने अनुभव किया है; बदकिस्मती से आज भी कर रहा हूँ।

आज से आठ-दस साल पहले मैंने एक लम्बी कविता लिखी थी। उसमे मैंने यही स्पष्ट करने का प्रयास किया था कि कैसे मैं एक ही ज़िन्दगी में दो जिंदगियां जी चुका हूँ और तीसरी जी रहा हूँ। इस लेख में अपनी बात कि पुष्टि के लिए मैं उसी कविता का सहारा लेना चाहता हूँ। इस शती के दूसरे दशक में जब मैंने होश संभाला, अपने आसपास के, समाज के लोगों को जानने-समझने लगा, सामाजिक परिवेश में हो रही गतिविधियों में रूचि लेने लगा तो जिन लोगों को मैंने देखा-जाना, उनमें --
ज्ञान था, किन्तु अभिमान उसका न था
शक्ति थी, किन्तु पीडन नहीं ध्येय था,
था विभव भी बहुत लोक-कल्याण को,
कोष का धन सभी के लिए देय था।
व्यक्ति था व्यक्ति, आसक्ति थी
एक तो धर्म की धारणा के लिए
भक्ति थी देश की, कार्य था भूमि पर
शांति की कान्त अवतारणा के लिए।

प्रेम की शक्ति थी जीतने के लिए,
लोक-अनुरक्ति थी एक ही भावना,
थी न सुख की उन्हें चाह अपने लिए
सब सुखी हों यही एक थी कामना।

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुखभागभवेत ।
मेरी ज़िन्दगी का दूसरा दौर शुरू होने में ज्यादा समय नहीं लगा। प्रथम विश्व-युद्ध समाप्त होने के बाद भारत में ब्रिटिश हुकूमत का दमनचक्र तेजी से चलने लगा। सन १९१९ में हमारे देश पर रौलट एक्ट लागू किया गया। उसी साल अप्रैल में जालियांवाला बाग का नृशंस हत्याकांड भी हुआ। देश की स्वाधीनता के लिए छटपटाती हुई भारत की आत्मा ब्रिटिश शासन के दमनचक्र से जितनी दबी-पिसी, छटपटाई, उसके हौसले उतने ही बुलंद हए, उसका संकल्प उतना ही दृढ हुआ और इसी समय भारतीय राजनीति के क्षितिज पर गांधीजी का आविर्भाव हुआ। आज़ादी के लिए अब तक हमारे देश में दो प्रकार के प्रयास किये जा रहे थे--एक तो क्रांतिकारियों के द्वारा गोली-बन्दूक की लड़ाई और दूसरी कांग्रेस के द्वारा ब्रिटिश सरकार से अनेक प्रकार की रियातों की मांग। क्रांतिकारियों ने उस ज़माने के संयुक्त बंगाल से आरम्भ करके पंजाब तक में क्रान्ति का बिगुल बजाकर और अत्याचारी अंग्रेज शासकों को मौत के घात उतारने के लिए जो छिटपुट प्रयास किये, उनसे विदेशी शासकों को परेशानियां होती रहीं, लेकिन उसी अनुपात में उनका दमन भी बढ़ता रहा। रौलट एक्ट, खिलाफत और जालियांवाला बाग का हत्याकांड ऐसी घटनाएं थीं, जिन्होंने भारत के स्वाभिमान को ठोकर मारकर जगाया। पूरा देश घृणा, अपमान और पीड़ा से तड़पकर मानसिक रूप से इस बात के लिए तैयार हो गया था कि अब इस शासन को अधिक समय तक नहीं झेला जा सकता। होनी का चमत्कार कि ठीक इसी समय गांधीजी बिहार में निहले गोरों कि बर्बरता के खिलाफ अपने अहिंसक संघर्ष का प्रयोग करने के बाद, उसमे सफलता पाकर भारतीय स्वतन्त्रता युद्ध में एक दैवी वरदान के रूप में उपस्थित हुए थे।
[क्रमशः]

4 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

पिताजी को नमन और श्रद्धांजलि.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

पूज्य पिता जी के लिए आपकी श्रद्धा को प्रणाम!
पिताजी को श्रद्धाञ्जलि.

अर्कजेश ने कहा…

"मतलब यह कि जो ज़िन्दगी मिली है, हमें उससे अधिक की लालसा नहीं करनी चाहिए।"

इस लेख में आपके पिताजी द्वारा जीवन के प्रति व्‍यक्‍त‍ किया गया दृष्टिकोण बहुत अच्‍छा लगा । उनके विचारों को पढकर मन में आदर पैदा होता है और सोचता है कि काश यह पूरा लिखा गया होता ....

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

मैं पहले भी कह चुकी हूं, एक बार फिर दोहराउंगी, कि बाबूजी की लेखनी पर टिप्पणी करने की योग्यता नहीं है मुझमें. बस पढती जा रही हूं.