मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

कहानी की शक्ति : प्रेमचंद की...

[तीसरी और समापन कड़ी]

प्रेमचंदजी संकोच से, लज्जा से पानी-पानी हुए जा रहे थे। गृह-स्वामी ने जब उनका चरणोदक मुंह में डाल लिया तो उन्होंने उनका हाथ पकड़ लिया। कहा--"आप यह सब तमाशा कीजिएगा तो मैं उठकर चला जाउंगा।" लेकिन इन बातों पर ध्यान देने की मनःस्थिति गृह-स्वामी की नहीं थी। वह आनंदातिरेक में विभोर हो रहे थे। साक्षात भगवान् के प्रकट होने पर जो दशाकिसी भक्त की हो सकती है, वही उनकी हो रही थी। अश्रु-गदगद स्वर में उन्होंने कहा--"आपके चरणों की धुल यहाँ पड़ी, मेरे सारे अरमान पूरे हो गए। अगर आप न होते, आपने वह अफ़साना न लिखा होता, मैं उसे न पढ़ पाता, तो आज मैं इस दुनिया में न होता। तब यह भरा-पूरा घर भी न होता, ये बाल-बच्चे न होते, यह धन-दौलत न होती। यह सब तो आपका ही दिया हुआ है। अब अगर अपने पिछले जन्मों के पुण्य से आज मैंने आपको पा लिया है तो मैं अपने अरमान तो पूरे कर लूं !"
इस तरह गृह-स्वामी अपने अरमान पूरे करते रहे, प्रेमचंदजी संकोच से सिमटते-सिकुड़ते रहे और वक़्त बीतता रहा। आखिर लगभग एक घंटे प्रेम का यह अत्याचार सहते रहने के बाद प्रेमचंदजी का धीरज छूट गया। उन्होंने कहा--"खाने में कितनी देर है ? शाम की गाडी से तो मुझे हर हालत में चला ही जाना है।"
गृह-स्वामी ने कहा--"देर कहाँ है ? लेकिन अभी तो कोई आया ही नहीं। मैंने तो कल सारी सभा को दावत दी थी। इंतज़ार कर रहा था कि और लोग आ जाएँ..... ।"
मैंने कहा--"आपने तो हंसी की बात को सच मान लिया, लेकिन और लोग शायद उसे नहीं मान सके। जो अब तक नहीं आया, वह आगे भी नहीं आयेगा।"
उन्होंने कहा--"और कोई आये न आये, मुझे फर्क नहीं पड़ता। मेरे भगवान् मेरे घर आ गए, मैं सब कुछ पा गया। कब मैंने यह उम्मीद की थी कि जिस अफ़साने ने मुझे मौत के जबड़े से खींच निकाला था, उसके लिखनेवाले को मैं अपनी आँखों से देख सकूंगा, उसके पाँव पखार सकूंगा ? लेकिन आज तो.... ।"
आनंदातिरेक में भर आयी अपनी आँखों पर हथेलियाँ रगड़ते वह उठ खड़े हुए थे और ज़रा देर बाद ही घर के बच्चों ने हमारे सामने थालियों-कटोरियों कि नुमाईश खड़ीकर दी। भोजन का इतना समारोह देखकर प्रेमचंदजी ने हँसते हुए कहा था--"मुझे खाना खिला रहे हैं या सज़ा दे रहे हैं ? आपने तीन सौ आदमियों के लिए जो खाना बनवाया है, वह सब क्या हमीं तीनों को खाना पडेगा ?"
गृह-स्वामी बड़े भोलेपन से बोले थे--"आप कैसी बातें करते हैं ? आप खाना तो शुरू कीजिये।"
और उस लम्बे-चौड़े कमरे में प्रेमचंदजी का अट्टहास गूँज उठा था।
सच्चे अर्थों में जूठन गिराकर प्रेमचंदजी उठ खड़े हुए तो एक बार फिर आरंभिक क्रियाएं दुहराई गईं, यानी परिवार के प्रत्येक व्यक्ति ने आकर उनके पैरों पर माथा टेका और आशीर्वाद लिया। गृह-स्वामी की अधीर आखें बार-बार भर आती थीं। उनका कंठ अवरुद्ध हो जाता था। विदा की घडी सचमुच बड़ी मार्मिक थी।
प्रेमचंदजी उसी शाम वापस चले गए थे और मैं कहानी की असीम शक्ति की बात सोचता अपने आप में खोया रह गया था। आज तो एक ज़माना गुज़र गया है, फिर भी उस घटना की मार्मिक स्मृति जब भी मन में जाग उठती है, तो अनायास मैं अत्यंत भाव-विह्वल हो जाता हूँ। रचना का महत्व और रचनाकार का दायित्व मेरे मन में एक बार फिर सजीव हो जाता है।
['अतीतजीवी' में संग्रहीत होने के पूर्व १९७६-७७ में यह संस्मरण 'नया प्रतीक', नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ था। ]

8 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

संस्मरण की यह कड़ी भी रोचक रही!
प्रकाशित करने के लिए आभार!

dimple ने कहा…

ज़माना गुज़र जाता है.पर रचना का महत्व कभी कम नहीं होता और रचनाकार का अस्तित्व सदेव बना रहता है.

अर्कजेश ने कहा…

वाह । आप बेशकीमती खजाने खोल रहे हैं । यही तो सार्थकता है लेखन की । लेकिन अच्‍छी रचनाऍं बदलाव तो करती ही हैं , खामोशी से । बदलाहट कर देती हैं । वह भी प्रेमचंद ! जब भी पढता हूँ तो लगता है कि उनकी रचनाऍं सामयिक होते हुए भी अपने समय से आगे थीं ।

आभार ।

वाणी गीत ने कहा…

प्रेमचंदजी जी की रचनाये हर काल में समसामयिक लगती रही है ...
आपके संस्मरण में भी उनके जैसी कसावट नजर आ रही है ...आभार ...

Devendra ने कहा…

वाह!
ये संस्मरण अमुल्य निधि हैं.
..आभार.

गौतम राजरिशी ने कहा…

काश कि रचनाकर के इस महत्व को आज के रचनाकार समझ पाते...!

शुक्रिया गुरुवर इस अप्रतिम दस्तावेज को हम सब संग साझा करने के लिये।

अपूर्व ने कहा…

आपका ब्लॉग किसी साहित्यिक जादूगर के रहस्यमय पिटारे सा होता जा रहा है..जिसमे से हर बार कोई अनछुई सी मगर बहुत महत्वपूर्ण चीज निकल कर दर्शकों की आँखे चौंधिया देती है..एक से एक प्रसंग..एक से एक संस्मरण..एक से एक पोस्ट..

ज्योति सिंह ने कहा…

itni achchhi post dalti jaa rahi hai aur ghar me mehmaam aane ki wazah se main yahan samya nahi de paa rahi ,kyoki aese waise to padh nahi sakti ,itminaan se padhna hoga ,fursat paate hi dheere dheere sabhi padungi ,aapka likha hua aur anubhav ko na padh pana afsos se kam nahi hoga ,vande matram ,ekta ka aadhaar jaroori hai desh ki pragati ke liye .sahyog vicharo ka milta rahe sada ,namaskaar .jai hind .