सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

कहानी की शक्ति : प्रेमचंद की...

[दूसरी किस्त]

वक्ता की बातों से मेरा मन तिलमिला उठा। वह जो कुछ कह रहा था, स्पष्ट था, हृदय से कह रहा था, श्रद्धा से कह रहा था। आश्चर्य नहीं कि प्रेमचंदजी उसका आग्रह टालकर कल जाने का ही निर्णय करें तो सचमुच वह रेल से कटकर अपनी जान दे दे। यह कल्पना भी मेरे लिए असह्य हो उठी। मैंने प्रेमचंदजी से अनुमति लिए बिना ही उसे आश्वासन दे दिया--"आप बेफिक्र रहिये। कल आपके यहाँ खाना खाने के बाद ही प्रेमचंदजी बनारस जायेंगे।" लेकिन विनोद में मैंने एक और वाक्य जोड़ दिया--"इस ख़ुशी में तो शिरकत हम सभी की होनी चाहिए। प्रेमचंदजी अकेले कैसे खाना खायेंगे ?" और उस भले आदमी ने इस विनोद को भी सच मान लिया। उसने फ़ौरन एलान किया--"आप सभी को मैं कल की दावत देता हूँ। मेरा पता नोट कर लें और कल मेरे गरीबखाने पर तशरीफ़ ले आयें। आप सब का मैं इंतज़ार करूंगा।"
इसके बाद उन्होंने अपना नाम-पता, मकान नंबर वगैरह बताया। प्रेमचंदजी के पाँव पकड़कर एक बार फिर 'ज़रूर आने' का आग्रह किया। सभा भंग हो गयी।
लौटते हुए मैं थोड़ा गंभीर हो गया था। मेरी कल्पना में उस व्यक्ति की मनःस्थिति साकार हो रही थी। मैं सोच रहा था--यदि प्रेमचंदजी ने सारे जीवन में यही एक कहानी लिखी होती तो क्या उनका लेखक-जीवन धन्य और सार्थक न हो जाता ? जिस कहानी में इतनी शक्ति हो कि वह मरने के लिए उद्यत एक व्यक्ति को मौत के मुंह से लौटा लाये, उसे नयी प्रेरणा दे, जिजीविषा दे, कर्म-पथ पर अग्रसर होने की अपूर्व शक्ति दे, क्या वह विश्व-साहित्य की अमर कृति नहीं है ? यह तो मात्र एक संयोग था कि हम एक ऐसे व्यक्ति को जान सके, जिसके निराशा के अन्धकार से भरे जीवन में प्रेमचंदजी कीएक कहानी ने आशा का दीपक जलाया, उसके मार्ग को प्रकाश से भर दिया और उसके असफल जीवन में सफलता के नवीन अंकुर उत्पन्न किये। जाने ऐसे कितने लोग होंगे, जिन्हें इसी तरह किसी कहानी से, किसी निबंध से प्रेरणा मिली होगी, कर्म का उत्साह मिला होगा, सफलता की शक्ति मिली होगी। और जो रचना ऐसा कुछ करने में समर्थ हुई होगी, उसकी सार्थकता का, उसकी धन्यता कहीं अंत है ?
मैं अपने विचारों में खोया हुआ था, तभी प्रेमचंदजी का स्वर सुन पड़ा--"आपने खा-म-खाह मुझे परेशानी में डाल दिया। कल मेरा जाना निहायत ज़रूरी था। यों ही मैं कई दिनों की देरी कर चुका हूँ। वहाँ सारा काम ठप पडा होगा।"
मैंने कहा--"क्षमा कीजिएगा, इस समय मैं आपकी बात बिलकुल नहीं सोच रहा था। मैं सोच रहा था उस आदमी की बात, उस कहानी की बात, जिसने उसको मरने से बचाया। मुझे तो लगता है कि अगर ज़िन्दगी-भर में आपने सिर्फ वही एक कहानी लिखी होती और वह किसी की जीवन-रक्षा का कारण बनती तो आपका लिखना सार्थक हो जाता, आपकी कहानी अमर हो जाती। आखिर उस आदमी के प्रति भी आपका कुछ कर्त्तव्य है, जिसे आपकी ही एक कहानी ने ज़िंदा रहने का हौसला दिया था, ताकत दी थी।"
प्रेमचंदजी हँसे, बोले--"अब तो खैर आपने बाँध ही दिया है। उपाय क्या है ?"
अगले दिन यथासमय जब हमलोग भोजन के लिए पहुंचे तो वहाँ की तैयारियां देखकर दंगरह गए। उन्होंने सचमुच एक बरात को खिलाने की तैयारियां कर रखी थीं। दरवाज़े के दोनों ओर कदली-स्तम्भ लगे हुए थे, दो जलपूर्ण कुम्भ रखे हुए थे, ज़मीन पर अल्पना चित्रित थी। गृह-स्वामी बाहर ही खड़े थे। बड़े आदर-सम्मान से वह हमें ऊपर ले गए। प्रेमचंदजी को एक ऊँचे आसन पर बैठाया। ज़मीन पर लेटकर उन्हें प्रणाम किया। फिर पत्नी को, पुत्र-पुत्रियों को, बहुओं को, नाती-पोतों को बुलाया। सब ने बारी-बारी से उनके चरण-स्पर्श किये। गृह-स्वामिनी पीतल के बड़े बर्तन में जल ले आयीं। गृह-स्वामी ने अपने हाथों से प्रेमचन्दजी के पाँव पखारे, फिर उस जल का एक चुल्लू उन्होंने मुंह में डाल लिया।
[अगली कड़ी में समापन की किंचित प्रतीक्षा करें]

3 टिप्‍पणियां:

Devendra ने कहा…

अगले अंक की प्रतीक्षा में .....आभार.

गौतम राजरिशी ने कहा…

अद्‍भुत है ये संस्मरण तो ओझा जी। मुझे नहीं लगता कि हिंदी-साहित्य का ज्याद हिस्सा इससे अवगत है।

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

राजऋषिजी,
हाँ, पिताजी का यह सस्मरण सचमुच अद्भुत और अमूल्य है. जब पहली बार इसे अज्ञेयजी ने 'नया प्रतीक' में छापा था, तो बहुत सारे पत्र आये थे, जिनमे जिज्ञासा की गई थी की प्रेमचंद जी उस कहानी का नाम क्या था, स्मृति पर बहुत जोर डालने पर भी पिताजी को कहानी का नाम याद न आया था. १९९५ में जन मैंने 'अतीतजीवी' में इस संस्मरण को संगृहीत कर प्रकाशित किया तो २००० प्रतियों का संस्करण साल बार में ही शेष हो गया था. फिर भी आपकी यह शंका निर्मूल नहीं है कि हिंदी के बहुत बड़े भ्हाग तक यह संस्मरण पहुँच सका है.
पिताजी के बाद मैं भी व्यावसायिक लेखन और शुद्धिकरण के गोरखधंधे में अपने आपको खपाता रहा. अब कुछ जाल समेटने का यत्न कर रहा हूँ.
सप्रीत--आ.