मंगलवार, 13 जून 2017

'वो जो सुफैद-सा गुलाब वहाँ फूला था...' (4) पं. हंसकुमार तिवारी

रेल की देशव्यापी हड़ताल खत्म क्या हुई, सेवा-दान का वह अनुबंध भी समाप्त हो गया। हमें अपना बोरिया-बिस्तर बाँधकर गया से पटना लौट आना पड़ा। इतना भी वक्त नहीं मिला कि एक बार हंसकुमारजी से मिलकर बता आता कि पटना लौट रहा हूँ।

उसके बाद स्थितियों ने तेजी से करवट बदली। समय को पंख लगे। पिताजी दिल्ली जा बसे और कालांतर में मैं भी दिल्लीवासी बना। लेकिन, पटना छोड़ने से पहले, सन् 1975 के आरम्भिक महीने में, मैं बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् पिताजी के किसी काम से गया तो परिसर में ही एक अधिकारी महोदय से ज्ञात हुआ कि निदेशक के कक्ष में पं. हंसकुमार तिवारीजी विराजमान हैं। मैंने समझा, हंसकुमारजी निदेशक से मिलने आये होंगे। मैं हुलसकर निदेशक के कक्ष में प्रविष्ट हुआ तो देखा कि वह तो निदेशक के आसन पर बैठे हैं। बिहार सरकार राजभाषा विभाग में उन्होंने 'राजभाषा पदाधिकारी' के रूप में सन् 1951 में पद-भार सँभाला था और उसी विभाग से सेवा-मुक्त हुए थे। यह जानकर मुझे अतीव प्रसन्नता हुई थी कि शासन ने उन्हें राष्ट्रभाषा परिषद् का निदेशक (8-1-1975 से 31-12-1977) मनोनीत किया था। सुदर्शन व्यक्ति तो वह थे ही, श्वेत वस्त्र-परिधान में और भी आकर्षक व्यक्तित्व लग रहा था उनका। उनके आसपास एक प्रभा-मण्डल होता था। उस वक्त भी मैं इतना छोटा था कि उन्हें बधाई देने की मेरी योग्यता नहीं थी, मैंने चरण-स्पर्श कर अपनी प्रसन्नता व्यक्त की। मुझे देखकर वह खुश हुए, पिताजी और घर-परिवार की कुशलता पूछते रहे।...



हंसकुमार तिवारीजी राष्ट्रीय चेतना के अनूठे कवि थे, बांग्ला और हिन्दी दोनों भाषाओं पर उनका असाधारण अधिकार था। उन्होंने बांग्ला के श्रेष्ठ साहित्य को हिन्दी में यथावत् भाषान्तरित किया था। मुझे लगता है, उन्होंने बांग्ला के सर्वश्रेष्ठ साहित्यकारों की शताधिक कृतियों का अनुवाद तो अवश्य किया होगा। और, इस कार्य में उन्होंने अथक परिश्रम के साथ अपने जीवन का लंबा श्रमसाध्य वक्त व्यतीत किया था। उन्होंने कहानियाँ लिखीं, नाटक लिखे और आलोचनाओं-निबंधों की लंबी श्रृंखलाएँ रचीं। यह जानकर मुझे प्रसन्नता हुई थी कि 'साप्ताहिक बिजली' के संपादन में भी उन्होंने सन् 1938-39 में सहयोग किया था। कालांतर में 'किशोर' (पटना) और 'उषा' (गया) नामक पत्रिका का संपादन करते रहे। साहित्य की हर विधा में उनके हस्तक्षेप और परिश्रम की स्पष्ट छाप मिलती है।... नौवीं या दसवीं कक्षा में उनकी एक कविता पढ़ी थी। अब वह पूरी कविता तो स्मरण में नहीं रही, लेकिन उसकी कतिपय पंक्तियाँ याद आती हैं। छायावाद-रहस्यवाद के संधिकाल में लिखी गयी हंसकुमारजी की इस कविता ने रहस्यवाद को कैसा विस्मयकारी विराट् रूप दिया है, आप स्वयं देख लें--
"घर आये, मेहमान बने,
अब निष्ठुर प्राण बने जाते हो!...
अब तुम फूलों में हँसते हो,
रजत चाँदनी में मुस्काते,
अब तक तो तुम ही तुम थे,
अब भगवान बने जाते हो!!"

बलहरहाल, परिषद् में हुई उस मुलाकात के बाद मैं भी दिल्ली चला गया। देश में जब आपातकाल  की घोषणा हुई, उसी के कुछ महीने बाद पिताजी इण्डियन एक्सप्रेस से सेवा-मुक्त हुए और सन् 1977-78 में पटना आये। पटना-प्रवास में उनकी मुलाकात भी हंसकुमारजी से परिषद्-कार्यालय में हुई थी। फिर पिताजी दिल्ली चले आये। कुछ वर्षों बाद जीवन में व्यतिक्रम उपस्थित हुआ। मैं नयी नौकरी पर 1979 में दिल्ली छोड़ ज्वालापुर (हरद्वार) चला आया। कुछ महीने बाद पिताजी भी वहीं आ गये। दिन बीतते रहे।...

सन् 1981-82 में जब हम सपरिवार पटना लौटे, उसके डेढ़-दो वर्ष पहले ही मात्र 62 वर्ष की आयु में हंसकुमार तिवारीजी लोकांतरित (27-9-1980) हो गये थे।...

गया में हंसकुमारजी के घर का नाम 'मानसरोवर' था। पिताजी को संबोधित उनके जितने भी पत्र/पोस्टकार्ड आते, सबके शीर्ष पर तिथि के साथ लिखा होता--'मानसरोवर'। बहुत छुटपन में उनकी चिट्ठियाँ पिताजी को देते हुए मैं कहा करता--'बाबूजी! मानसरोवर से चिठ्ठी आयी है।' तब अक्षरों को टटोल-जोड़कर पढ़ लेने-भर की बुद्धि थी। अर्थ-अभिप्राय समझ पाने की योग्यता नहीं थी। मैं समझता था कि हिमालय की चोटियों पर तरंगित जिस किसी प्रशांत झील का नाम 'मानसरोवर' है, पत्र वहीं से आया है। यह तो कुछ वर्षों बाद समझ में आया कि 'मानसरोवर' से आये पत्र गया से हंसकुमारजी के भेजे हुए पत्र होते हैं। लेकिन, उनके निधन की सूचना प्राप्त होने के बाद गहरी वेदना के साथ कुछ ऐसी अनुभूति हुई थी कि गया के मानसरोवर का हंस अनन्त आकाश को लाँघता न जाने कहाँ चला गया है अब...!

मानसरोवर के प्रांगण में वो जो सुफैद-सा गुलाब खिला रहता था, वह काँटों की टहनी पर अंततः ईसा-सा झूल ही गया अपनी मधुर-मनोहार स्मृतियाँ और मुग्धकारी सुगंधि छोड़कर, ...जो साहित्य में सदा सुवासित रहेगी!...
(समाप्त)

(चित्र : 1. पं. हंसकुमार तिवारी 2. बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् का प्रांगण 3. परिषद्-निदेशक की सूची का काष्ठपट्ट।)
क्षेपक : संयोग से कल शाम (6 मई, 2017) पटना आ पहुँचा और आज बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् गया था। वहीं से प्रकाशित एक पुस्तक से मिल गयी है मुझे हंसकुमार तिवारीजी की एकमात्र छवि, जिसे आप मित्रों के सम्मुख रखकर मै संतोष का अनुभव कर रहा हूँ।--आनन्द.

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरूवार (15-06-2017) को
"असुरक्षा और आतंक की ज़मीन" (चर्चा अंक-2645)
पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक