शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

चुका भी हूँ मैं नहीं'... : शमशेर बहादुर सिंह.
[13 जनवरी : शमशेरजी की जयन्ती पर विशेष रूप से लिखित संस्मरण]

पिताजी के जीवनकाल में पाँच वर्षों का दिल्ली-प्रवास संघर्षपूर्ण, लेकिन आनन्ददायी था। पिताजी जहाँ रहे, दो चीजें उनके पास हमेशा जुटती रहीं--एक तो साहित्यिक विभूतियाँ, दूसरी पुस्तकें। साप्ताहिक 'प्रजानीति' का सम्पादन, छोटी बहन की सेवा, अनुवाद-कार्य और स्वलेखन की व्यस्तताओं के बीच भी पिताजी इन विभूतियों के लिए पूरी हार्दिकता के साथ हमेशा उपलब्ध रहते थे और उनके लिए वक्त का लंबा-लंबा टुकड़ा निकालकर प्रसन्न होते थे। सच मानिये, लिखना-पढ़ना और साहित्यिक चर्चाएँ उनकी असली खुराक़ थी। मुझे याद नहीं कि सौ व्यस्तताओं के बीच कभी कोई ऐसा दिन वहाँ बीता हो जब दिल्ली के टैगोर पार्क (माॅडल टाउन) वाले हमारे किराए के छोटे-से मकान में कोई साहित्य-प्रेमी पिताजी से मिलने न आये हों। बेशक, यह भीड़ तब अधिक जुटाने लगी, जब आपातकाल लागू होते ही वह इंडियन एक्सप्रेस की सेवा से मुक्त हो गये। मुलाकातियों में हर आयु, हर वर्ग के लोग होते--साहित्यानुरागी, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राध्यापक, नवयुवक कवि-कथाकार, साहित्य-दर्शन के अध्येता और कुछ विद्वान् वीतरागी बुज़र्ग भी। पिताजी सबका स्वागत करते, यथोचित स्नेह-सम्मान और समय देते, लेकिन वह तब अत्यधिक प्रसन्न हो उठते, जब उनके साहित्यिक मित्र आ जुटते। फिर तो उनके छोटे-से बैठके का रंग ही बदल जाता, बातें लंबी खिंच जातीं, अट्टहासों की आख्यायिका लिखी जाती, संस्मरणों की गंगा धाराप्रवाह बहने लगती, जिसे सुनने से न तो आगंतुक अघाते और न सेवा को तत्पर मैं।

इन्हीं साहित्यिक मित्रों में एक त्रय ऐसा भी था जो पिताजी के दरबार में सप्ताह में दो-तीन बार तो अवश्य ही पधारता। इस त्रय के दो पात्र माॅडल टाउन के निवासी थे और एक तो हमारे टैगोर पार्क में ही रहते थे और वह थे--महाकवि नागार्जुन। दो अन्य साहित्य के महारथी थे--त्रिलोचन शास्त्री और शमशेर बहादुर सिंहजी। ये तीनों प्रतिभा-पुरुष जब हमारे घर आ जाते तो घर में साहित्य की त्रिवेणी प्रवाहित होने लगती। एक ऐसी शीतल बयार चलती कि मन-प्राण अनुप्राणित हो जाते। इन चार विभूतियों में पिताजी वयोज्येष्ठ थे, फिर नागार्जुनजी-शमशेरजी, कनिष्ठ थे त्रिलोचनजी।... शमशेरजी छोटी कद-काठी के कृश व्यक्ति थे।

पिताजी से शमशेरजी के किस्से पहले भी सुन चुका था, लेकिन ऐसा लगता है कि उन्हें पहली बार अपने इसी घर में देखा था मैंने। कृश काया, छोटा क़द, खड़ी नासिका, गेहुँआ रंग, सहज-सामान्य परिधान, असावधानी से छोड़े हुए बिखरे केश और आँखों पर बहुत मोटे शीशे का पावरवाला चश्मा, जिससे झाँकती थीं उनकी बड़ी-बड़ी पारदर्शी आँखें। सहसा उन्हें देखकर यह विश्वास करना कठिन हो सकता था कि वह प्रगतिवाद के स्तम्भ कवि हैं। बहुत शालीनता से धीमी आवाज़ में बोलते थे। उन्हीं बैठकों में सबों के बहुत आग्रह पर सुनायी हुई उनकी एक कविता मैं कभी भूलता नहीं--
'लेकर सीधा नारा
कौन पुकारा
अंतिम आशाओं की संध्याओं से ?
पलकें डूबी ही-सी थीं --
पर अभी नहीं;
कोई सुनता-सा था मुझे
कहीं;
फिर किसने यह, सातों सागर के पार
एकाकीपन से ही, मानो हार,
एकाकी उठ मुझे पुकारा
कई बार ?
मैं समाज तो नहीं; न मैं कुल
जीवन;
कण-समूह में हूँ मैं केवल
एक कण ।
--कौन सहारा !
मेरा कौन सहारा !...
शमशेरजी का कविता-पाठ का अंदाज कुछ ऐसा था कि स्वर झंकृत होते हुए अर्थ-अभिप्राय के पट स्वयं खोलता चलता था। वह अपनी कविता में कहीं गहरे डूबकर उसे सुनाते थे, यह बात और है कि वह हमेशा काव्य-पाठ से बचने की चेष्टा में लगे रहते थे। लेकिन पिताजी की पकड़ से वह छूट न पाते थे।...
(क्रमशः)

3 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (14-01-2018) को "मकर संक्रंति " (चर्चा अंक-2848) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हर्षोंल्लास के पर्व लोहड़ी और मकर संक्रान्ति की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Meena Sharma ने कहा…

इन संस्मरणों को पढ़ना जानना भी एक उपलब्धि व प्रेरणा से कम नहीं है। आप इसी तरह लिखते रहें और हम पढ़कर आनंद,ज्ञान एवं साहित्य के संगमस्नान का लाभ उठाते रहें।
सादर शुभकामनाएँ ।

Onkar ने कहा…

सुन्दर रचना