बुधवार, 17 जनवरी 2018

जब दुनिया के मेले में बिछड़े थे दो भाई...!

[भ्रमण-कथा]

जीवन-पथ है बड़ा विलक्षण! आज से 46 साल पहले सन् 1971में जब मैंने विद्यालय की दहलीज़ लाँघकर महाविद्यालय की देहरी पर पाँव रखा था, तब दुनिया के मेले में दो भाई मिले थे, मित्र बने थे, फिर उसी मेले में बिछड़ भी गये। यह उसी युग की कहानी है। उस युग में उन दोनों की बस दो-तीन मुलाक़ातें हुईं; क्योंकि वे दोनों दूर-दूर के शहरों में रहते थे, छोटे भी थे और माता-पिता की आज्ञा के बिना एक-दूसरे के शहर की दौड़ नहीं लगा सकते थे। वह युग बुजुर्गों की अवज्ञा का युग नहीं था। फिर भी, दो-तीन संक्षिप्त मुलाक़ातों में ही उनकी मैत्री प्रगाढ़ हो गयी। चूँकि दुनिया के मेले में बिछड़ने के पहले दोनों पढ़ना-लिखना सीख गये थे, लिहाज़ा पत्राचार के दम पर मित्रता पलती रही और दिन बीतते रहे। फिर पत्राचार शिथिल हुआ, वे दोनों अपने-अपने जीवन में संघर्षों का जुआ कंधे पर लेकर अलग-अलग दिशाओं में दौड़ने लगे। फिर तो दशक पर दशक बीतते गये। एक मित्र का तो पता नहीं, पर दूसरे को याद रह गया वह पता, जिस पते पर वह लिखता रहा था पत्र, अपने मित्र के नाम। चार दशक बीत गए। दूसरे मित्र की स्मृति से मिट गया पता, नाम भर याद रह गया दोस्त का और भीनी-भीनी सुगंधि बसी रह गयी मित्रता की मिठास के साथ...।

मैं बताऊँ आपको वे दो मित्र कौन थे? एक थे राकेश शर्मा और दूसरे थे आनन्दवर्धन ओझा। 46 साल बाद, विगत शरदावकाश में, जब परम मित्र ध्रुवेन्द्रप्रताप शाही और विनोद कपूर की पुकार पर मैं लखनऊ गया और ध्रुवेन्द्र के घर पहुँचा तो मुझे अपने बिछड़े मित्र का नाम याद आया, उसके घर की शक्ल याद आयी। उसका घर शाही के निवास से दूर नहीं था। मैंने शाही से कहा, कल मुझे पार्क रोड जाना है, पुराने और बिछड़े भाई से मिलने। शाही मुझे अपने वाहन से वहाँ ले चलने को सहर्ष तैयार हो गये।

अर्द्धशती में पार्क रोड की शक्ल बेतरह बदल गई थी। बचपन की आँखों देखे घर को चिह्नित कर लेना आसान नहीं था। गली-गली पूछता-ढूँढ़ता मैं उस लेन में प्रविष्ट हुआ जो धुंधली यादों में कहीं रचा-बसा था। जब एक सज्जन के बताये हुए ठिकाने पर पहुँचा तो स्मृतियों की कोठरी रौशन हो गयी। ओह, यही तो था, मेरी स्नेहमयी मौसी और अनुशासनप्रिय, कठोर सिद्धांतवादी मौसाजी का घर, जिसकी तस्दीक कर रहा था घर के द्वार पर लगा शिलापट्ट! मेरे घण्टी बजाने पर जो भद्र महिला प्रकट हुईं, उन्होंने बताया कि राकेश शर्मा अब यहाँ नहीं रहते। वह अपने नये आवास पर मिलेंगे। प्रयत्न निष्फल हुआ देख निराशा हुई, लेकिन उन्हीं भद्र महिला से मुझे राकेश भाई का सेलफोन नंबर मिला। मैंने वहीं खड़े-खड़े राकेश से फोन पर बातें कीं। उस वक्त वह कार चला रहे थे। 'ओझा' शब्द सुनते ही उन्होंने मुझे पहचान लिया और गर्मजोशी से बातें कीं। मध्य मार्ग में किसी मीटिंग प्वाइंट पर मिल लेने को कहा। लेकिन उस दिन यह संभव हो न सका और दूसरे दिन सुबह-सबेरे मैं निकल आया कानपुर। राकेश से न मिल पाने का क्षोभ तो था, लेकिन यह संतोष भी था कि अब उसका संपर्क-सूत्र मेरे पास है।

कानपुर पहुँचकर मैंने ह्वाट्सऐप पर राकेश की तलाश की। वहीं उसकी ताजा तस्वीर मैंने देखी और चकित हुआ--वह तो ठीक वैसा ही है, जैसा 46 साल पहले था। इस दीर्घकाल में वक़्त ने प्रयत्नपूर्वक महज उसके केश को रजत महिमा से मण्डित किया था।...मैंने उसे ह्वाट्सऐप पर कई संवाद भेजे। भला आदमी मैसेज देखता ही नहीं था। अचानक मुझे उस एकमात्र तस्वीर की याद आयी, जो किशोरावस्था में बिछड़ने के पहले हमने स्टूडियो में खिंचवाई थी। पिछले वर्ष जब मई में पटना गया था, तब सामानों की उठा-पटक में मिली थी वह तस्वीर और मैंने उसकी क्लिप सेल में सुरक्षित रख ली थी। 28 दिसंबर को मैंने वह तस्वीर राकेश को ह्वाट्सऐप पर भेज दी। 29-30 दिसंबर के दिन बहुत व्यस्तता में बीते। मैं कानपुर के मित्रों, अनुजों से मिलता हुआ आनन्द-मग्न रहा...।

31 दिसंबर की सुबह मुझे ट्रेन से पुणे के लिए प्रस्थान करना था, लेकिन टिकट कन्फर्म नहीं था। 30 की रात जब चार्ट तैयार हो गया तो ज्ञात हुआ कि मेरी यात्रा का योग तो बना ही नहीं। अब यात्रा की नयी योजना बनानी थी। उसी रात वायुमार्ग से पुणे जाने की सारी व्यवस्था बड़ी बेटी शैली ने कोच्ची से की। जिसके अनुसार बहुत मँहगा हवाई टिकट लेकर मुझे फिर लखनऊ एयरपोर्ट से दिल्ली होते हुए पुणे जाना था। दरअसल, योजना तो स्वयं विधि बना रखी थी। नियति ने भाग्य में पहले ही लिख रखी थी पूरी स्क्रिप्ट कि 'रे मूढ़! तुझे मिलना है राकेश नामक भाई-बंधु से ठीक 46 साल बाद। तू कानपुर से वापसी की यात्रा कैसे कर सकता है भला? और, वह घड़ी अब आ गयी है।'...

मेरी भेजी हुई पुरानी तस्वीर ने अपना श्वेत-श्याम रंग दिखाया और राकेश ने मुझे अपने परिवार के चित्र भेजे। लेकिन, जब 30 दिसम्बर की आधी रात में अचानक यात्रा-पथ बदल गया, तब मैंने यात्रा की पूरी तफ़सील उसे लिख भेजी, बताया कि नववर्ष के पहले दिन 12 बजे तक लखनऊ पहुँच रहा हूँ। 31 की रात राकेश का फोन आया। अब पहचाना था उसने मुझे।... मेरा अल्पज्ञान तो यही जानता था कि राकेश के मित्रों की फेहरिस्त में मैं ही अकेला 'ओझा' हूँ। लेकिन यह मेरा भ्रम था। डॉक्टरी की पढ़ाई के दौरान उसका एक मित्र बना था और संयोग से वह भी ओझा ही था। इस मैत्री ने राकेश को भ्रमित किया था। राकेश ने मुझे अपना वही डाॅक्टर मित्र समझ लिया था, जब मैंने उसे उसके पुराने घर के द्वार से पहली बार फोन किया था। राकेश ने फोन पर मुझे बताया कि मैं लखनऊ आते हुए एयरपोर्ट से दो किलोमीटर आगे अमुक होटल पर उतर जाऊँ, जहाँ वह मेरी प्रतीक्षा करता मुझे मिल जायेगा। अब मिलन की आतुरता-अभीप्सा हम दोनों को विकल कर रही थी।...

नववर्ष के प्रथम दिवस की सुबह मैंने सपत्नीक कानपुर से प्रस्थान किया। हमने दस बजे की बस ली और पौने बारह बजे उस होटल पर उतर गये, जिसके लिए मैंने बस-चालक को पहले से सावधान कर रखा था। उस चौराहे पर वाहनों की सघन भीड़ थी। हम जहाँ बस से उतरे थे, उसके परली पार वह होटल था। होटल के ठीक किनारे खड़े एक श्वेतकेशी सज्जन को सबसे पहले मेरी श्रीमतीजी ने चिह्नित किया। मंथर गति से चलती बसों के अंतराल से श्रीमतीजी के इंगित करने पर प्रकट और ओझल होती हुई अस्पष्ट छवि मैंने राकेश की देखी। उनकी आँखों में भी किसी की तलाश थी। जब विश्वास होने लगा कि वही राकेश हैं तो मैं हाथ उठाकर उसका ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करने की चेष्टा करने लगा, लेकिन वह अन्यत्र देख रहा था। वाहनों का रेला रुकता नहीं था, हम सड़क पार करने में असमर्थ थे। हमारे पास तीन अदद वजनी बैग थे और मेरी वृद्धा घुटने से लाचर थीं। वह तो ग़नीमत थी, बैग पहियों पर दौड़नेवाले थे। और, राकेश हमारी तरफ दृष्टिपात कर नहीं रहे थे। पाँच मिनट इसी पार खड़े-खड़े लड़खड़ाती हुई दो पंक्तियाँ मन में उपजीं--
'तुम उस पार खड़े हो भाई,
हम इस पार खड़े हैं,
सुधियों की झंझा में कितने
अवरोधी शकट अड़े हैं।'

अचानक दोनों ओर से यू टर्न की हरी बत्ती रौशन हुई और सामने से गुजरनेवाले वाहनों की कतार यथास्थान रुक गयी। हमें सड़क पार करने का मौक़ा मिल गया।
हमने एक-दूसरे को पहचान लिया, हुलसकर गले जा मिले। पूरे 46 साल बाद मेरा भाई, मेरा बंधु मेरी बाहों में था। मेरे हर्ष और आनन्द का ठिकाना नहीं था। राकेश हमें अपने घर ले गया। भाभी ने पहले चाय पिलायी, फिर थोड़ी देर बाद बढ़िया और सुस्वादु भोजन कराया--पूरी, रायता और तीन प्रकार की, सच में, हरी-हरी बोलती सब्जियाँ! ऊपर से व्याज में मिष्ठान्न!...




हमारी बातें, जिज्ञासाएं अनन्त थीं और अवकाश कम। दो-ढाई घंटे की अल्पावधि में 46 वर्षों के बिलगाव की कथा फरियाई नहीं जा सकती थी। हम तृप्ति-अतृप्ति के सम्मिलित भाव से भरे उठ खड़े हुए प्रस्थान के लिए।... राकेश सपत्नीक हमें चौधरी चरण सिंह के हवाई अड्डे के द्वार तक छोड़ने आया। हम फिर गले मिले और विलग हुए। सघन कुहासे के कारण हमारी फ्लाइट विलंबित थी और विलंबित होती गयी...

उस शाम एयरपोर्ट पर प्रतीक्षा के विशाल कक्ष में बैठा-बैठा मैं यही सोच रहा था कि कितने मजबूत होते हैं 'ये मोह-मोह के धागे...!' परम संतोष बस यही, इतना ही कि दुनिया के मेले में बिछड़े आत्मीय बंधु को मैंने अंततः ढूँढ़ लिया था।...अब वह मेरी पकड़ में रहेगा हमेशा...!
(--आनन्द.)

[चित्र  : 1) 46 साल पहले भाई राकेश के साथ मैं, 2) और 46 वर्षों बाद--1-1-2018 को, 3) मैं, राकेश और भाभी, 4) मेले बिछड़ा भाई राकेश.]

3 टिप्‍पणियां:

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

इस प्रलाप को पढ़नेवाला कोई पाठक ही नहीं...?

Meena Sharma ने कहा…

क्षमा कीजिएगा सर, आपकी हर पोस्ट को पढ़ा है मैंने किंतु टिप्पणी नहीं की । ये संस्मरण इतने मनमोहक, सम्मोहक और भावविह्वल कर देने वाले हैं कि अंत तक पहुँचते पहुँचते मैं मुग्ध होकर खो जाती हूँ। फिर ये भी लगता है कि मेरे शब्द सूर्य को दीपक दिखाने के समान ही साबित होंगे । शुरू से अंत तक एक ही बार में पढ़ जाती हूँ,कई बहुत पुरानी कविताएँ भी पढ़ी हैं मैंने, जिनमें से एक 'महाजाल की मछली रे' मुझे बहुत अच्छी लगी। छुट्टियों में और रचनाएँ भी पढूँगी। सादर ।

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

आपकी यह प्रतिक्रिया पढ़कर ऐसा लगा कि मेरा श्रम सार्थक हुआ। बहु-बहुत आभार!...