गुरुवार, 25 जनवरी 2018

मेरे बुद्धिजीवी झोले में दस दिनों का जीवन...

[अंतिम क्षेपक]

मेरे कंधे पर युवावस्था से रहा है बुद्धिजीवी झोला। पुणे में मेरे पास दो झोले थे--एक कहीं छूट गया, दूसरा बहुत पुराना और जर्जर हो गया। मैं झोले के बिना ही यात्रा पर निकल आया। अनुज हरिश्चंद्र दुबे के सुपुत्र अविजित ने विदा होते वक़्त खादी ग्रामोद्योग से मेरे पसंदीदा दो झोले मुझे खरिदवा दिये थे। ऐसे झोले पुणे में नहीं मिलते न!...भाई सुनील तिवारी के घर जब शाम होने को आयी, चाय पीने का मन था; लेकिन श्रेया विद्यार्थी बिटिया का फोन बार-बार आ रहा था--'कब आओगे मामा? यहीं आकर चाय पीना। बस, अब चले आओ।'

यह इस प्रवास की अंतिम कनपुरिया शाम थी। दूसरे दिन हमें लखनऊ से पकड़नी थी पुणे की फ्लाइट। जब कानपुर की सड़कों पर दौड़ती कार में अपने नये खरीदे झोले के साथ चला तो याद आया--इन्हीं सड़कों को तीन वर्षों तक कितना धाँगा है मैंने साइकिल से। तब भी कंधे से लटकता था ऐसा ही झोला, लेकिन तब उसमें होता नहीं था पनडब्बा, सुपारी-सुरती की झन-झन बजती टिन की डिब्बियाँ और कविता की एक अदद डायरी; बल्कि उसमें होता था प्लेनचैट का बोर्ड, शीशे की छोटी गिलसिया--नर्म-मखमली कपड़े की तहों में लिपटी हुई और सिल्क की स्वच्छ धोती। सोचने लगा, कितना बदल गया है वक़्त और कितना बदल गया हूँ मैं। आईने के बिना अपनी ही शक्ल तो देखी नहीं जा सकती न! लेकिन, मन हुआ, देखूँ अपना चेहरा, पहचानूं, वही हूँ न, जो वहाँ जा रहा हूँ; जहाँ होती थीं मेरी स्नेहमयी दो-दो दीदियाँ! स्वदेशी-सेवा के ज़माने में जिनके पास प्रति सप्ताह शनिवार की शाम पहुँच जाता था मैं। दफ़्तर से छुट्टी पाते ही बुद्धिजीवी झोला कंधे से लटकाकर मैं मित्रवर ध्रुवेन्द्र के साथ चल पड़ता अपनी-अपनी साइकिलों से। आर्यनगर में ध्रुवेन्द्र ठहर जाते अपने बड़े पापा के घर, मैं वहाँ से आधा किलोमीटर आगे बढ़ जाता तिलक नगर तक, जहाँ हुतात्मा पूज्य गणेशशंकर विद्यार्थीजी की बड़ी-सी कोठी थी, विशालकाय परिसर में। जिसमें रहती थीं मेरी दोनों दीदियाँ--श्रीलेखा और मधुलेखा विद्यार्थी--गणेशशंकरजी की पौत्रियाँ!

यह गणेशशंकर विद्यार्थीजी से चला आ रहा हमारी चौथी पीढ़ी का स्नेह-संबंध था। अपने जीवनकाल में गणेशशंकरजी जब-जब प्रयाग जाते, मेरे पितामह 'शारदा'-संपादक साहित्याचार्य पं.चन्द्रशेखर शास्त्री से मिलना न भूलते। पितामह के दारागंज स्थित आवास पर उनसे मिलकर और एक लंबी बैठक के बाद ही प्रयाग से लौटते। 'प्रताप' पत्र में गणेशशंकरजी ने पिताजी की कई कहानियां छापी थीं और पिताजी भी 'प्रताप'-कार्यालय में कई बार गणेशजी से मिले थे। वह युग तो बीत गया, लेकिन उसी संपर्क-सूत्र को मैंने अपने तीन वर्षों के प्रवास में थाम लिया था और दोनों बहनों का अनुगत भ्राता बना था।

प्रति सप्ताह शनिवार की रात बिछ जाता था हमारा बोर्ड और शुरू होतीं हमारी परा-शक्तियों से लंबी-लंबी वार्ताएं! जिसमें रोना-गाना और यदा-कदा हँसना भी होता था। कई बार तो सुबह के वक़्त पक्षियों का कलरव सुनकर हम बोर्ड से उठते और शय्याशायी होते। रविवार विश्राम का दिन बन जाता।...फिर सोमवार की सुबह मैं वहीं से स्वदेशी के लिए निकलता, आर्यनगर से ध्रुव को लेता हुआ। यही क्रम अबाध चलता रहा...

मन में स्मृतियों के कितने स्फुलिंग कौंध रहे थे उस शाम, जब पत्नी के साथ मैंने उसी परिसर में प्रवेश किया, जिसमें अपनी माताओं के साथ श्रेया को बित्ते-भर का देखा था कभी...! अब वह बड़ी और समझदार बेटी बन गयी है। हमारे पहुँचते ही उसने हमें चाय पिलायी, मुझसे और अपनी मामी से बातें कीं, फिर हमारे लिए बाटी-चोखा बनवाने में जुट गयी। मामीजी भी उसी के साथ हो लीं।...

मैं उस भवन के हर कमरे में गया--बड़ी दीदी और मधु दीदी के शयन कक्ष में, श्रीदीदी के ऑफिस में, बैठक में--सर्वत्र। घर के गोशे-गोशे से मेरी अटूट संपृक्ति थी। मैंने और मधु दीदी ने मिलकर कभी पुराने गट्ठर खोले थे, प्राचीन काल के बक्से खोलकर गणेशशंकरजी के महत्वपूर्ण साहित्यिक अवदानों को सहेजा था। एक गहरा सन्नाटा पसरा था वहाँ! बड़ी दीदी के जिस दफ़्तर में हाली-मुहाली लगी रहती थी कभी, आज वहाँ अस्त-व्यस्तता और धूल का साम्राज्य था। विधि-न्याय की पुस्तकों का अंबार शेल्फ में उदास पड़ा था। मधु दी' की साहित्यिक पुस्तकें भी गुमसुम थीं--यह सब देखकर मन दुखी हो गया, अवसाद से भर आया, एक अव्यक्त बेचैनी मेरी संपूर्ण सत्ता पर छाने लगी और मैं बीच के डायनिंग हाॅल में एक सोफ़े पर ख़ामोश बैठ गया। सच है, जगत् का सारा कार्य-व्यापार व्यक्ति के होने से चलता है। जब वही नहीं होता तो लगता है, वक्त वहीं ठिठक-सहमकर रुक गया है। एक वर्ष के अंतराल पर दोनों दीदियाँ जगत्-मुक्त हुईं--पहले छोटी, फिर बड़ी दीदी! मैं उस शाम जहाँ, जिस सोफ़े पर बैठा था, उसके पीछे दोनों दीदियाँ मालाएं धारण किये शीशे के फ्रेम में कैद थीं, फिर भी मुस्कुरा रही थीं और मुझसे जी-भरकर रोया भी न जा रहा था। ऊपर दीवार पर उन दोनों के पूज्य पिता स्व. हरिशंकर विद्यार्थीजी का चित्र था। मैं इन सारी विभूतियों से नज़रें मिलाने से बचता पीठ दे बैठा रहा। जाने कब श्रीमतीजी कमरे में आयीं और उन्होंने पीछे से इसी भाव-भंगिमा की मेरी एक तस्वीर उतार ली।

श्रेया की पुकार पर हम सबों ने मिल-बैठकर बाटी खायी, बातें कीं और जब लौटने को उद्यत हुए तो श्रेया खादी के दो बुद्धिजीवी झोले मुझे देते हुए बोली--'ये लो मामा! मैं ले आयी तुम्हारे लिए झोले!' मैंने कहा--'मैंने तो आज ही खरीद लिया है बेटा! इस सर्दी में तुमने नाहक दौड़ लगायी।'... लेकिन उसने मेरी एक न सुनी और दोनों झोलों के साथ ही मुझे विदा किया। मुझे ऐसा प्रतीत हुआ, जैसे दोनों दीदियों ने एक-एक झोला मुझे श्रेया के हाथों दिलवाया है।... अब बुद्धि चाहे जितनी हो मेरे पास, झोले बहुत हो गये थे--चार-चार।...

31 दिसम्बर की रात कठिनाई से बीती। पुरानी स्मृतियाँ चैन से सोने न देती थीं। दूसरे दिन सुबह ही हम कानपुर से विदा हुए और एक अभिन्न बाल-सखा का अनुसंधान करते हुए लखनऊ से पुणे की हवाई यात्रा पर चल पड़े। 1 जनवरी की मध्य रात्रि में हम पुणे पहुँच गये।...






अब तो यात्रान्त हुए दस दिन बीत गये हैं, लेकिन मन उन्हीं दस दिनों की सुधियों में खोया हुआ है। इस संक्षिप्त यात्रा में मैंने दुनिया की भीड़ में गुम हुए भाई को खोज निकाला, दीर्घकाल से बिछड़े मित्रों और आत्मीय अनुज से मिला--समझिये, परमानंद हुआ! इसे मैं वर्ष 2017 की उपलब्धि मानता हूँ और इसका सारा श्रेय अपनी गृहलक्ष्मी को देता हूँ; क्योंकि उन्होंने ही नौ वर्षों के मेरे एकरस जीवन को देखकर इस कार्यक्रम की सहर्ष स्वीकृति दी थी मुझे।... जैसे किसी चलचित्र में पिता ने पुत्री से कहा था न--'जा सिमरन, जा, जी ले अपनी ज़िंदगी!'... यह सुनकर सिमरन बेतहाशा दौड़ चली थी और भागती ट्रेन में चढ़कर अपने प्रेमी की बाँहों में झूल गयी थी।... मैं भी श्रीमतीजी की स्वीकृति पाकर दौड़ चला, लेकिन सिमरन की तरह मैं अकेला नहीं था, मेरे साथ तो मेरी जीवन-संगिनी थीं ही; लिहाज़ा मैंने मित्रों को अपनी बाहों में बाँध लिया।... पिता का आदेश पाते ही कलानेत्री 'सिमरन' तो जीवन-भर के लिए भाग चली थी, लेकिन मुझे सिर्फ दस दिनों का जीवन जीने की मुहलत मिली थी।...
(--आनन्द. 31-12-2017.)

[चित्र : 1) श्रेया विद्यार्थी 2) उद्विग्न-मन--मैं 3) बड़ी दीदी के वीरान दफ़्तर में 4) मैं, जब दोनों दीदियों की ओर देखने की हिम्मत न रही 5) मैं और साधनाजी, जब प्रस्थान के लिए उठ खड़े हुए 6) बुद्धिजीवी झोलों के साथ वापसी के गलियारे में 7) कोठी के द्वार पर...।

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (27-01-2018) को "शुभकामनाएँ आज के लिये" (चर्चा अंक-2861) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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गणतन्त्र दिवस की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'