सोमवार, 16 नवंबर 2009

साहित्याकाश के शब्द-शिल्पी : बेनीपुरी

[तीसरी किस्त]

पटना के श्रीकृष्ण नगर के २३ संख्यक मकान में हमारा निवास था और बेनीपुरीजी का भरा-पूरा परिवार १०८ संख्यक मकान में रहता था। इन दोनों संख्याओं के बीच की दूरी चाहे जितनी हो, मेरे और उनके घर का फासला महज डेढ़ बांस का था। बेनीपुरीजी के पौत्रों की मित्रता के कारण उनके घर में मेरा नित्य का आना-जाना था। सबसे बड़े भाई लालन बेनीपुरी उन दिनों कालेज में पढ़ते थे और यदा-कदा हमारे क्रिकेट के खेल में शरीक हो जाते थे। मनन-रतन हमउम्र थे, छोटन थोड़े छोटे; किंतु इन तीनों भाइयों से मेरा मित्रवत व्यवहार था। कंचे से लेकर क्रिकेट तक जितने खेल हो सकते हैं, सबों में हम समान रूप से सम्मिलित होते थे। कतिपय देसी खेलों में भी उनका साथ-संग होता; जैसे--डोलापाती, कबड्डी, चोर-सिपाही, आइस-बाईस, लाली, बम्पास्तिक और दौड़ की स्पर्धा ! इन खेलों का मैदान बेनीपुरीजी के घर के सामने ही था। हमारे कई खेल वह अपने घर के अहाते में बैठकर चुपचाप देखते रहते थे।
बेनीपुरीजी के बारे में जिस रात मुझे पिताजी ने समझाया था, उसके दूसरे दिन जब मैं स्कूल से लौटा, तो घर में पुस्तकों-कापियों का बैग पटककर मैं पुनः बाहर जाने लगा। माताजी ने पीछे से आवाज़ दी--''खेलने जा रहे हो क्या ? कुछ खाकर तो जाओ।'' 'अभी आया' कहता हुआ मैं सीधे बेनीपुरीजी के घर गया। वहां तो मेरा निर्बाध प्रवेश था। मैं बेनीपुरीजी के कमरे में जा पहुँचा। वह पलंग पर अधलेटे थे। मैंने चरण-स्पर्श कर प्रणाम निवेदित किया, जैसे मैं अपने अपराधों की क्षमा-याचना कर रहा होऊं । बेनीपुरीजी ने इतना-भर पूछा--'कौन ?'
'आनंद' कहता हुआ मैं कमरे से बाहर आया और बेनीपुरीजी के एकमात्र (संभवतः) सुपुत्र देवेन्द्र बेनीपुरीजी के पास पहुँच गया और बोला--''बाबूजी ने कहा है कि आप मेरे बड़े भाई हैं, आज से मैं आपको 'भइया' कहूँगा।'' देवेन्द्र भइया को श्रवण-कष्ट था। मुझे लगा, उन्होंने मेरी बात नहीं सुनी; लिहाज़ा मैं तीर की तरह उनकी पत्नी और मनन-रतन की मम्मी जी के पास पहुँचा और बोला, जैसे घोषणा कर रहा होऊं--''आज से मैं आपको 'भाभी' कहूँगा। बाबूजी ने कल ही बताया है कि आप मेरी भाभी लगेंगी। '' अचानक मेरा यह प्रलाप सुनकर भाभी क्षण-भर को संभ्रम में ठिठकी रहीं; किंतु शीघ्र ही अभिप्राय समझकर बोलीं--''चाचाजी ने ठीक ही बताया है तुम्हें। तुम्हीं तो 'अंकल-आंटी' कहते रहे हो।'' उनके घर से बाहर आकर मैंने मनन-रतन-छोटन के बीच भी उच्च स्वर में घोषणा की--''याद रखना, मैं तुम्हारा चाचा हूँ।'' मेरे तीनों मित्र पलकें झपकाते रहे, और मैं गर्व-स्फीत हुआ शाम का नाश्ता करने कि लिए अपने घर कि ओर चल पड़ा...
[क्रमशः]

8 टिप्‍पणियां:

sandhyagupta ने कहा…

Agli kadi ka intzaar hai.

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

इतना संक्षिप्त । अभी और है न !

Apoorv ने कहा…

मैंने मनन-रतन-छोटन के बीच भी उच्च स्वर में घोषणा कि--''याद रखना, मैं तुहारा चाचा हूँ।'

निश्चय ही आपने एक स्वर्णिम युग जिया है..ईर्ष्या तो हो नही सकती आपसे..बस श्रद्धा ही उपजती है...आपके लिये !!!
प्रतीक्षा है संस्मरण के और आगे बढ़ने की...

वाणी गीत ने कहा…

इन आत्मीय रिश्तो पर ही तो हमारी
संस्कृति टिकी है ...!!

अजित वडनेरकर ने कहा…

सचमुच कभी कभी स्पष्टवादिता, ईमानदार कथन लोगों को क्या खुद हमें भी प्रलाप ही लगते हैं। बढ़िया संस्मरण। अगली कड़ी का इंतजार...

वन्दना ने कहा…

sundar sansmaran........agli kadi ka intzaar.

गौतम राजरिशी ने कहा…

"डोलापाती, कबड्डी, चोर-सिपाही, आइस-बाईस, लाली, बम्पास्तिक"...अहा!

और वो चाचा हो जाने की उद्‍घोषणा...हा! हा!

अगली कड़ियों की प्रतिक्षा है।

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

ऐसा अनोखा संस्मरण जो हमें कहानी का आनंद दे रहा है, साथ ही ढेर सारी सीखें भी...