शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

बर्फीली घाटियों का क्लेश...

[ताड़-पत्र से ली गई एक और पुरानी कविता]


मैं विवश हूँ सोचने पर
मान्यताओं और आस्थाओं का ज्वार
कब और क्यों
भावनाओं के तट से टकराता है,
एक साथ कई शून्य
कब मस्तिष्क में उभर आते हैं,
अशांति के गीत गाते हैं !

जख्मों की मरहम-पट्टी कर लो
शायद ज़िन्दगी फिर से बुलाने
आ गई है,
शब्द सारे शून्य में यूँ मत उतारो
भावनाओं का महासागर खड़ा है,
एक अन्तिम अस्त्र का विश्वास क्या है ?

रात्रि की निस्तब्ध काली यातनाओं का
करो मत ज़िक्र,
मित्र मेरे मान जाओ--
वह आघात ऐसा है
जो हृदय में सीधे उतरना चाहता है,
अवरोध तुम्हारा सरल है,
यह नहीं है बूँद अमृत की
अपमान का अमृत गरल है !

लेकिन,
मैं तुम्हें कैसे बताऊँ
आज का आदमी बहुत बंधा है,
विषमताओं के भयंकर
काल के सम्मुख खड़ा है;
दृष्टियों का दोष ही अब शेष है;
पर नियति की क्रूरता का क्या ठिकाना

यह बर्फीली घाटियों का क्लेश है !!

[पूज्य बच्चनजी को उनके १०२ वें जन्म-वर्ष पर सप्रणाम--आनंद !]

14 टिप्‍पणियां:

अनिल कान्त : ने कहा…

अच्छी कवितायेँ सुनकर और पढ़कर मन प्रसन्न हो जाता है

Apanatva ने कहा…

bahut sunder gahrae soch aur insaan ke chahu ore ghiree vishamtao kee dastan . Badhai

Kishore Choudhary ने कहा…

रात्रि की निस्तब्ध काली यातनाओं का
करो मत ज़िक्र,
मित्र मेरे मान जाओ--
वह आघात ऐसा है
जो हृदय में सीधे उतरना चाहता है,
अवरोध तुम्हारा सरल है,
यह नहीं है बूँद अमृत की
अपमान का अमृत गरल है !

वैसे तो जो कहूं वो कम ही होगा फिर भी हर शब्द उअतरता है गहरे तक, कभी आऊँगा तो ताड़ पात्र पर लिखी कविता भी देखना चाहूंगा.

वन्दना ने कहा…

barfili ghatiyon ka klesh..........title ne hi itna aakarshit kar liya aur jab kavita padhi to dil moh liya.

Devendra ने कहा…

००००
शब्द सारे शून्य में यूँ मत उतारो
भावनाओं का महासागर खड़ा है,
एक अन्तिम अस्त्र का विश्वास क्या है ?
०००
आज का आदमी बहुत बंधा है,
विषमताओं के भयंकर
काल के सम्मुख खड़ा है;
०००
आज की आबोहवा को आपने
जहरीली घाटियों का क्लेश कहा
आदमी की विवषता बताई
फिर यह भी लिखा कि शब्द सारे शून्य में यूँ मत उतारो
अंतिम अस्त्र का प्रयोग सभांल कर करना चाहिए।
--गहन चिंतन।

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

नहीं आपकी कविताओं पर टिप्पणी करने की योग्यता नहीं है मुझमें.

Apoorv ने कहा…

आपके यह ताम्रपत्र किसी स्वर्णपत्र से कम नही हैं..
मान्यताओं और आस्थाओं का ज्वार
कब और क्यों
भावनाओं के तट से टकराता है,
एक साथ कई शून्य
कब मस्तिष्क में उभर आते हैं,

दिमाग के उठते दुविधा के ज्वार-भाटे गहरे तक प्रतिध्वनित होते हैं..

दरअस्ल आपकी कविताएं जटिल आत्ममंथन और भावनात्मक उहापोह के पैदाइश लगती हैं..इसलिये बार-बार पढ़ने पर नये नये अर्थ सामने आते रहते हैं..

गौतम राजरिशी ने कहा…

सच कहूँ, तो इतना सक्षम नहीं हूँ कि कुछ सटीक लिख पाऊँ आपकी कविता पर। थोड़ी-बहुत कविताओं की समझ का जो भ्रम पाले हुये हूँ तो उसी बिना पर आपके शब्दों पर, वाक्य-विन्यासों पर और आस-पास के वातावरण से उपजी भावनाओं को कविता की शक्ल दे देने की अद्‍भुत कला पर मुग्ध हूँ।

...और ये पुरानी कहाँ है? ये तो उतनी ही सामयिक है जितनी आज की तारिख।

अर्कजेश ने कहा…

पर नियति की क्रूरता का क्या ठिकाना
यह बर्फीली घाटियों का क्लेश है !!


यह बर्फीली घाटियों का क्‍लेश है । पंक्तियां भा गईं ।

कविता का बहुत बढिया समापन किया है इस पंक्ति ने ।

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

मैं विवश हूँ सोचने पर
मान्यताओं और आस्थाओं का ज्वार
कब और क्यों
भावनाओं के तट से टकराता है,
एक साथ कई शून्य
कब मस्तिष्क में उभर आते हैं,
अशांति के गीत गाते हैं

क्या बात है आनंद जी आज ये इतनी गंभीर रचना .....मन कहीं अशांत सा लग रहा है .....पर रचना बहुत ही प्रभावशाली और सशक्त है .....!!

डॉ.पदमजा शर्मा ने कहा…

आनन्द वर्धन ओझा जी
"बर्फीली घाटियों का क्लेश..." कविता सोच के कई एंगल देती और सच को कई कोणों से दिखाती पाठक की संवेदना को समृद्ध करती है .
मान्यताओं और आस्थाओं का ज्वार भावनाओं के तट से सदा टकराता रहा है.कुछ संवेदनशील व्यक्ति लीक से हटकर चलते हैं , शायद इसी कारण .
मनुष्य विषमताओं और विसंगतियों के बीच जीने को विवश है .

ज्योति सिंह ने कहा…

लेकिन,
मैं तुम्हें कैसे बताऊँ
आज का आदमी बहुत बंधा है,
विषमताओं के भयंकर
काल के सम्मुख खड़ा है;
दृष्टियों का दोष ही अब शेष है;
पर नियति की क्रूरता का क्या ठिकाना
यह बर्फीली घाटियों का क्लेश है !!
behtrin ,man par thahar gayi adbhut pahchan liye .aur kya kahoon shabd mere paas hai nahi iske liye .jo kahna hai use aapki rachna hi kah rahi hai ,

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

hindi me likhnewala box rooth gaya hai, kya uttar dun ? aayaa maa ki zaban me likhne ki ichchha nahin hoti...
aap sabon ne is purani kavita ko pasand kiya, aabhaari hun!
kishorji, tad-patra dekhne kab aayenge aap dilli ? besabra prateeksha rahegi...
harkeeratji, man ki yeh ashaanti 37varsh purani ho chuki hai...
sapranaam--anand v. ojha

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

जख्मों की मरहम-पट्टी कर लो
शायद ज़िन्दगी फिर से बुलाने
आ गई है,
शब्द सारे शून्य में यूँ मत उतारो
भावनाओं का महासागर खड़ा है,
एक अन्तिम अस्त्र का विश्वास क्या है ?

शब्दों की गहराई लिए एक भावपूर्ण कविता!
बधाई!