गुरुवार, 19 नवंबर 2009

साहित्याकाश के शब्द-शिल्पी : बेनीपुरी

[छठी और अन्तिम किस्त]

बेनीपुरीजी से जब कुछ पूछने, जानने और सीखने की योग्यता हुई, तब उन्होंने जीवन-जगत से छुट्टी पा ली थी। पूज्य पितामह के एकमात्र चित्र की जो चर्चा मैंने पहले की है, उसका पूरा विवरण भी मैंने उंनकी इसी संस्मरणात्मक पुस्तक में पढ़ा था, फिर पिताजी से पूछ-पूछकर सम्पूर्ण इति-वृत्त जाना था। संभवतः १९२९-३० में, इलाहबाद में बेनीपुरीजी ने किस तरह मेरे कठोर सिद्धांतवादी और अपनी मान्यताओं पर दृढ़ रहनेवाले पितामह को अपने वाक्-चातुर्य से एक चित्र खिंचवाने के लिए विवश कर दिया था।
बेनीपुरीजी ने अपने दीर्घ जीवन में साहित्य और राजनीति--दोनों दिशाओं में बहुत काम किया था। वह लोकनारायण जयप्रकाश नारायण के बहुत निकट और अंतरग रहे। उन्होंने हिन्दी गद्य को नए आयाम दिए, नई ऊँचाइयाँ दीं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन प्रकाशन किया, जिनमें 'बालक', 'युवक', 'जनता' और 'योगी' बहुचर्चित पत्रिकाएं रहीं। अपने हिंदीसेवी मित्र गंगाशरण सिंह के साथ मिलकर उन्होंने 'युवक' का सम्पादन किया था और माखनलाल चतुर्वेदी के आग्रह पर दैनिक पत्र 'कर्मवीर' से भी जुड़े थे। उनके ललित निबंध ऐसे थे कि उन्हें हिन्दी साहित्याकाश का चितेरा शैलीकार कहा गया। उन्हें भाषा पर असाधारण अधिकार था। वह शब्दों की पहचान रखनेवाले अनूठे शिल्पी थे।
मेरे पिताजी से उनकी युवावस्था की मित्रता थी। उम्र में बेनीपुरीजी ५ वर्ष बड़े थे, लेकिन मित्रता 'तुम-ताम' की थी। सन १९३४ में मेरे पितामह की मृत्यु के बाद पिताजी आजन्म-सेवित इलाहाबाद छोड़कर पटना आ बसे थे। सन १९३९ में पिताजी ने अज्ञेयजी के साथ मिलकर 'आरती' मासिक का सम्पादन-प्रकाशन किया था। 'आरती' के बारे में प्रसिद्ध कवि मोहनलाल महतो 'वियोगी' जी ने सन १९४० के एक पत्र में पिताजी को लिखा था--''भाई ! 'आरती' आयी। प्रकाशमान है। एक 'युवक' था, जिससे बड़ी उम्मीदें थीं, वह असमय ही काल-कवलित हो गया ! जैसी हरि-इच्छा ! बेटा न सही, बेटी ही सही। बिटिया 'आरती' ही घर को बेचिराग होने से बचावे !... और तुम--क्या मैं भूल गया हूँ तुम्हें ? इस जन्म में तो गंगा, मुक्त और बेनीपुरी--त्रिदेवों को भूल नहीं सकता, पर-जन्म की राम जाने !''
वक्त का कितना लंबा और बड़ा टुकड़ा हाथ से फिसल गया है, मौसम ने कितनी बार और कैसे-कैसे रंग बदले है कि अब बहुत पीछे तक साफ-साफ़ दीखता भी नहीं। लेकिन इतना तय है कि आज वे सारे मित्र देवलोक में निवास करते हैं, वे वहाँ भी मिलकर किसी नई कार्य-योजना में ही लगे होंगे। कौन जानता है, वे सभी कब अपना समय वहाँ पूरा करके पुनः भारत-भूमि का स्पर्श करेंगे और देश के वन्दन में सम्मिलित स्वर में गायेंगे... । जब ऐसा होगा, तब मैं जाने कहाँ होउंगा ! लेकिन मन में कामना जागती है.... और चाहता हूँ कि वे सभी जब भारत और भारती के वंदन में, समवेत स्वर में गायें, मैं भी वहीँ कहीं आसपास होऊं....!!

11 टिप्‍पणियां:

अनिल कान्त : ने कहा…

आपके जीवन के द्वारा बेनीपुरी जी के बारे में इतना कुछ जानने को मिला कि मन प्रसन्न हो गया

Apoorv ने कहा…

कितनी सरस कथा-सरिताएँ अपने प्रवाह मे सहसा कब समापन-सागर के निकट पहुँच जाती हैं..सरिता-पान करने वालों को पता ही नही चलता..जीवन-सरिता की तरह..
बेनीपुरी साहब को हम अपनी कक्षाओं मे पढ़ा करते थे (तब उनका नाम भी मेरे बाल-कुतूहल का कारण था एक समय)..मगर उनके ललित निबंधों की सरस और चमत्कृत करने वाली भाषा सम्मोहित कर लेती थी..
जिस तरह इन महान व्यक्तित्वों के सर्वथा अन्छुए और अदृष्ट पहलू आपकी कलम की रोशनी मे सामने आये हैं..यही आपके ब्लॉग को ब्लॉग जगत मे अद्वितीय बनाता है..वर्ना ऐसे संस्मरण किस किताबे, लाइब्रेरी, सीरियल या फ़िल्म के द्वारा जानने को मिलते..और इसी लिये सारे पाठक आपके ऋणी ही रहेंगे..वक्त के इस टुकड़े का सिरा थमाने के लिये..

वक्त का कितना लंबा और बड़ा टुकड़ा हाथ से फिसल गया है, मौसम ने कितनी बार और कैसे-कैसे रंग बदले है कि अब बहुत पीछे तक साफ-साफ़ दीखता भी नहीं।

Kishore Choudhary ने कहा…

आपने अपने ब्लॉग का नाम उचित ही रखा है मुक्ताकाश...
जाने कितने ही सुखनवर इस आकाश के मन में मुस्कुराते हैं बरसों बरस से. गध्य के महारथी की समापन किस्त पढ़ने से पूर्व सब कड़ियाँ पढ़ी, सोचता रहा कि किस तरह की लाईब्रेरी विकिसित की है आपने दिमाग में.यहाँ स्मृति दोष इस तरह हावी है कि आपके संस्मरण घोर अचरज जगाते हैं मन में.

मुकेश कुमार तिवारी ने कहा…

आदरणीय आनन्दवर्धन जी,

अगर पेट नही होता
और उसमें भूख शूल की तरह नही चुभती
तो शायद
दिन-रात यूँ ही गुजार देता
आपको पढ़ते हुये

सादर,


मुकेश कुमार तिवारी

पिछली सारी किश्तें पढ़ना बाकी है, आज रात पढ़ना है और किसी टाईम मशीन की नांई उस दौर से गुजरना है।

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

अद्भुत और अनमोल संस्मरण.हम अपने आप को उसी काल में महसूसने लगते हैं, इतनी जीवंत भाषा शैली है आपकी. आपकी याददाश्त पर किशोर जी का चमत्कृत होना लाज़िमी ही है.

गौतम राजरिशी ने कहा…

आह ! एक और अप्रतिम संस्मरण का समापन...

आखिरी पंक्तियां कुछ भिगो गयी अम्दर कहीं मन की परतों में।

अर्कजेश ने कहा…

आखिरी अनुच्‍छेद में आपकी आत्‍मीयता जीवंता हो गई है शब्‍दों के रूप में । बहुत सुंदर कहा है ।

ज्योति सिंह ने कहा…

वक्त का कितना लंबा और बड़ा टुकड़ा हाथ से फिसल गया है, मौसम ने कितनी बार और कैसे-कैसे रंग बदले है कि अब बहुत पीछे तक साफ-साफ़ दीखता भी नहीं। लेकिन इतना तय है कि आज वे सारे मित्र देवलोक में निवास करते हैं, वे वहाँ भी मिलकर किसी नई कार्य-योजना में ही लगे होंगे। कौन जानता है, वे सभी कब अपना समय वहाँ पूरा करके पुनः भारत-भूमि का स्पर्श करेंगे और देश के वन्दन में सम्मिलित स्वर में गायेंगे... । जब ऐसा होगा, तब मैं जाने कहाँ होउंगा ! लेकिन मन में कामना जागती है.... और चाहता हूँ कि वे सभी जब भारत और भारती के वंदन में, समवेत स्वर में गायें, मैं भी वहीँ कहीं आसपास होऊं....!!
adbhut ,aapke liye kya kahoon samajh nahi aata ,aakhri kuchh panktiyaan man ko andar tak chhu gayi ,hamare liye to aap hi adbhut hai ,ek divya purush se kam nahi ,jo hame divya gyan ki raushni nirantar pradan karte aa rahe hai ,hum sabhi aapse jud kar bhagyashali ho gaye .

MUFLIS ने कहा…

ek mahaan vyaktitva ke baare meiN
jaan kar sukhad anubhav huaa...
waqt aur fursat se mohlat maaNg kar...deegar kisteiN bhi padhuNgaa,
aur...aapki paak raah-numaaee ka muntazir rahuNgaa

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

माताजी के निधन का जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला वृत्तान्त बेनीपुरीजी ने शब्दों में बांधा है, उसे पढ़कर मैं अन्दर तक हिल गया था। मैंने भी मातृ-वियोग का आघात ताज़ा-ताज़ा सहा था, आहत था, मर्म-विद्ध था। ऐसे में बेनीपुरीजी का वह दस्तावेज़ मेरे कलेजे की हड्डियाँ मरोड़ता था !.... रूढ़िवादी मान्यताओं और लोकाचारों की दुहाई देकर उनकी माता के शव-दाह के पूर्व किए गए अमानवीय कृत्यों का मार्मिक वृत्तान्त तो पाषाण को भी पिघला देनेवाला था.....

कब आपने ये दस्तावेज शुरू किये पता ही नहीं चला ......पिछली पोस्ट से पढ़ रही हूँ .....नतमस्तक हूँ आपकी लेखनी पर ....धन्य हुई मैं जो ये महान हस्ती अपनी कलम से मुझे कमेन्ट करती है .....!!

वे सभी कब अपना समय वहाँ पूरा करके पुनः भारत-भूमि का स्पर्श करेंगे और देश के वन्दन में सम्मिलित स्वर में गायेंगे... । जब ऐसा होगा, तब मैं जाने कहाँ होउंगा ! लेकिन मन में कामना जागती है.... और चाहता हूँ कि वे सभी जब भारत और भारती के वंदन में, समवेत स्वर में गायें, मैं भी वहीँ कहीं आसपास होऊं....!!

निःशब्द हूँ .....कुछ दिनों पहले आपकी बाल कवितायेँ पढ़ी थी ....इतना कोमल ह्रदय जो एक मासूम मुस्कराहट पे खिल उठे और आज ये इतनी गंभीर लेखनी ...क्या ये दोनों आनंद एक ही हैं .......हैरानी होती है .....!!

आनन्द वर्धन ओझा ने कहा…

Atyant aabhaari hun aap sabon ka!
--Anand v. ojha